दिवाली और इससे जुड़े पाँच दिनों के त्योहार से कई कथाएँ जुड़ी हुई हैं, जिनमें से दो सबसे प्रसिद्ध हैं। एक भगवान राम का 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या वापस आना और दूसरी समुद्र मंथन की कथा।
माना जाता है कि भगवान राम अयोध्या जिस दिन लौटे थे, उस दिन रात को अमावस्या थी। लोगों ने उनके आगमन की खुशी में इतने दीप जलाए कि वह अंधेरी रात दीपों से ही जगमग हो उठी।
इससे समुद्र मंथन की कथा भी जुड़ी हुई है। समुद्र मंथन से लक्ष्मी जी के अलावा 13 और वस्तुएँ निकली थीं। इन सबको चौदह रत्न के नाम से जाना जाता है। इन चौदह रत्नों में तेरहवें स्थान पर भगवान धन्वन्तरी प्रकट हुए थे। उनके हाथों में एक स्वर्ण कलश था जिसमें अमृत भरा था। इसी अमृत के लिए समुद्र मंथन हुआ था। ऐसा कहा जाता है कि जो कोई अमृत पी लेता है, वह बीमारी और बुढ़ापे से मुक्त होकर अमर हो जाता है।

भगवान धन्वन्तरी एक बहुत कुशल चिकित्सक थे और उन्हें ही आयुर्वेद का जन्मदाता माना जाता है। उन्हें देवताओं का यानी स्वर्ग का मुख्य चिकित्सक बनाया गया था। समुद्र मंथन से जिस दिन भगवान धन्वन्तरी प्रकट हुए थे, वह तेरस यानी त्रयोदशी तिथि थी।
अब सवाल यह उठता है कि जब धन्वन्तरी स्वास्थ्य के देवता हैं, तो इस दिन धातु क्यों खरीदी जाती है? धातु से उनका क्या संबंध है? वास्तव में, धन्वन्तरी अपने हाथों में अमृत लेकर प्रकट हुए थे, जो सोने के बने एक कलश में रखा था। इसलिए इस दिन सोना खरीदना, और यदि सोना खरीदना संभव न हो तो कोई अन्य धातु खरीदना अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन धातु के साथ अमृत का कुछ अंश भी घर आ जाता है। दिवाली के दिन इस धातु के बर्तन में पूजा की जाती है या भगवान को भोग लगाया जाता है। यह पर्व हमें यह भी याद दिलाता है कि वास्तविक धन स्वास्थ्य ही है, क्योंकि बाकी सभी धनों का उपयोग इसी धन पर निर्भर करता है।
धनतेरस के दिन एक तरफ जहाँ भगवान धन्वन्तरी की पूजा कर अच्छे स्वास्थ्य की कामना की जाती है, वहीं दूसरी तरफ इस दिन यमराज की आराधना भी की जाती है। उनकी आराधना के लिए उनके नाम का एक दीप जलाने की परंपरा है, जिसे ‘यम दीप’ कहा जाता है। दिवाली के दीये शाम होते ही जला लिए जाते हैं, लेकिन यम दीप देर रात को जलाया जाता है और यमराज से घर में अकाल मृत्यु न होने की प्रार्थना की जाती है।
इस दिन से जुड़ी एक अन्य कथा यह भी है कि प्राचीनकाल में हिमा नामक एक राजा था। ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की थी कि उसके पुत्र की आयु अल्प है और विवाह के चौथे दिन साँप के काटने से उसकी मृत्यु हो जाएगी। जब उसके विवाह का समय आया, तब राजा ने अपनी होने वाली पत्नी को यह सारी बात बता दी। लेकिन उस राजकन्या ने विवाह से मना नहीं किया, क्योंकि उसे अपनी निष्ठा और भक्ति पर पूरा भरोसा था।
विवाह की चौथी रात, यानी जिस दिन भविष्यवाणी के अनुसार राजकुमार की मृत्यु होनी थी, उसकी पत्नी ने बेडरूम के दरवाज़े के चारों ओर चमकीले सोने-चांदी के सिक्कों और आभूषणों का ढेर लगा दिया। रात को जब काल-रूपि सांप राजकुमार को डसने आया, तब उन धातुओं और सिक्कों की चमक से उसकी आँखें चौंधिया गईं और वह कमरे के अंदर प्रवेश नहीं कर सका। इस तरह राजकुमार की अकाल मृत्यु टल गई। यमराज की कृपा और अपनी रक्षा के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए ही घर के बाहर यम दीप जलाने की परंपरा शुरू हुई।
कार्तिक अमावस्या के दिन मुख्य दीवाली मनाई जाती है। इस दिन माता लक्ष्मी और भगवान गणेश के साथ-साथ भगवान राम की पूजा करने का विशेष विधान है।
दीवाली के दो दिन बाद द्वितीया तिथि को ‘भैया दूज’ का पर्व मनाया जाता है, जिसे ‘यम द्वितीया’ भी कहा जाता है। पुराणों के अनुसार, इसी दिन मृत्यु के देवता यम अपनी बहन यमुना से मिलने गए थे। अपने भाई को अचानक सामने देख कर यमुना जी की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उन्होंने बड़े उत्साह और आत्मीयता के साथ अपने भाई का स्वागत-सत्कार किया, उन्हें तिलक लगाया और स्वादिष्ट भोजन कराया। बहन के इस अपार स्नेह से यमराज अत्यंत प्रसन्न हुए और उनसे वरदान मांगने को कहा।
बहन यमुना के आग्रह पर भाई यमराज ने वरदान दिया कि जो भी भाई इस दिन पूरी श्रद्धा के साथ अपनी बहन से तिलक करवाएगा, उसे लंबी उम्र, उत्तम स्वास्थ्य और समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होगा। यह पर्व भाई-बहन के अटूट स्नेह और पवित्र रिश्ते का प्रतीक है।




