हनुमान जी का बाल्यकाल, सूर्य प्रसंग और रामायण कथा भाग 90 | वाल्मीकि रामायण

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वाल्मीकि रामायण के आरंभिक 6 कांड में केवल तीन के अलावा और कोई भी श्लोक हनुमान जी के बचपन या श्रीराम से मिलने से पहले के जीवन के विषय में बात नहीं करता। अरण्य कांड में जो 3 श्लोक आए हैं उसमें जामवंत जी हनुमान जी से कहते हैं कि आप तो बचपन में एक बार सूर्य को फल समझ कर उस की तरफ 300 योजन की तरफ तक चले गए थे तो फिर 100 योजन पार कर समुद्र पार लंका क्यों नहीं जा सकते हैं! लेकिन उत्तरकाण्ड में श्रीराम की सभा में महर्षि अगस्त जिन कथाओं को सुनाते हैं तो उनमें रावण के बाद हनुमान जी की कथा भी सुनाते हैं। ये प्रसंग इस तरह है:   

सर्ग 35

ऋषि अगस्त्य द्वारा बाली और रावण के बल का वर्णन सुनने के बाद श्रीराम ने उनसे विनम्रतापूर्वक कहा, “यद्यपि बाली और रावण में अतुलनीय बल था, तथापि मेरी समझ में ये दोनों ही हनुमान जी के समान नहीं थे। हनुमान जी शौर्य, चातुर्य, बल, धैर्य, पांडित्य, नीतिपूर्वक कार्यसिद्धि करने की योग्यता, विक्रम और प्रभाव के आश्रयस्थल हैं।”

उनकी बातों का समर्थन करते हुए ऋषि अगस्त्य ने हनुमान जी के समक्ष ही कहा, “आपने इनके विषय में जो कुछ कहा है वह सत्य है, पर मुनियों के शाप के कारण वे अपने बल को भूल जाते हैं। बाल्यकाल में इन्होंने अपनी बाल-सुलभ चपलता के कारण अत्यंत दुष्कर कर्म किए।” इसके बाद ऋषि अगस्त्य ने हनुमान जी के विषय में बताना प्रारंभ किया।

सुमेरु पर्वत पर हनुमान जी के पिता केसरी राज्य करते हैं। उनकी पत्नी अंजना (अंजनी) के गर्भ से पवनदेव ने अपना एक औरस पुत्र उत्पन्न किया। एक दिन जब माता वन में फल लेने गई हुई थीं, तब बालक हनुमान भूख से रोने लगे। तभी उनकी दृष्टि आकाश में उदित होते सूर्यदेव पर पड़ी। वे उन्हें कोई फल समझकर पकड़ने की लालसा से उनकी ओर लपके और आकाश में जा पहुँचे। एक शिशु को इतनी ऊँचाई पर पहुँचते देखकर देवता, दानव और यक्ष अत्यंत आश्चर्यचकित हो गए; क्योंकि उनकी गति उनके पिता पवनदेव से भी अधिक थी। उन्हें चिंता होने लगी कि एक शिशु होने पर जब इनमें इतना बल है, तो युवावस्था में पूर्ण बल प्राप्त कर यह कैसा बलवान एवं वेगवान होगा!

इधर पवनदेव अपने पुत्र के पीछे सूर्यदेव के ताप से रक्षा हेतु शीतलता प्रदान करते हुए चल रहे थे। सूर्यदेव ने बालक समझकर और भविष्य में उसके द्वारा किए जाने वाले महान कार्यों को देखते हुए उसे भस्म नहीं किया। संयोग से जिस दिन हनुमान जी सूर्य को पकड़ने के लिए उछले थे, उसी दिन राहु (सिंहिका का पुत्र) भी सूर्य को ग्रसने के लिए आया था। जब हनुमान जी ने सूर्य के रथ को पकड़ लिया, तब भयभीत होकर राहु हट गया। उसने क्रोधित होकर इंद्र के पास जाकर कहा कि जब वह सूर्य को ग्रास बनाने गया, तो कोई ‘अन्य राहु’ उसे ग्रस रहा था। यह सुनकर इंद्रदेव राहु के साथ सूर्यलोक पहुँचे। राहु इंद्र से आगे निकलकर सूर्य के पास पहुँच गया। राहु, जो केवल मुख के आकार का (शरीर विहीन) था, उसे देखकर हनुमान जी ने उसे ही फल समझ लिया और सूर्य को छोड़कर उसे पकड़ने के लिए उसके पीछे दौड़ पड़े।

राहु “हे इंद्र! मुझे बचाओ” कहता हुआ भागने लगा। इंद्र ने कहा, “डरो मत, मैं इसे मारता हूँ।” इंद्र की आवाज़ सुनकर बाल हनुमान ने उधर देखा, तो उनकी दृष्टि इंद्र की सवारी श्वेत वर्ण के ऐरावत हाथी पर पड़ी। अब उन्हें लगा कि यह तो उस फल से भी बड़ा फल है; अतः वे राहु को छोड़कर ऐरावत के पीछे दौड़ पड़े। बालक समझकर इंद्र ने उन पर अधिक क्रोध नहीं किया और अपने ऐरावत को बचाने के लिए कम बल लगाकर वज्र से प्रहार कर दिया। प्रहार कम बल से किया गया था, फिर भी वह वज्र का प्रहार था; इसलिए आघात लगते ही हनुमान जी मूर्छित होकर पर्वत पर गिर पड़े। गिरने से उनकी ठोड़ी (हनु) का बायाँ भाग टूटकर कुछ टेढ़ा हो गया।

अपने पुत्र को मूर्छित देखकर पवनदेव को इंद्र पर क्रोध आ गया। पवनदेव सूक्ष्म रूप से सभी प्राणियों के शरीर में प्रवाहित होते हैं; उन्होंने अपना संपूर्ण प्रवाह रोक दिया और अपने पुत्र को लेकर एक गुफा के अंदर चुपचाप बैठ गए। इससे समस्त प्राणी त्राहि-त्राहि कर उठे। देवतागण ब्रह्मा जी के पास कष्टमुक्ति की प्रार्थना लेकर गए।

ब्रह्मा जी सभी देवताओं को साथ लेकर पवनदेव के पास गुफा में गए। पवनदेव अपने पुत्र को गोद में लेकर बैठे थे। ब्रह्मा जी को देखकर पवनदेव ने उठकर उन्हें प्रणाम किया। ब्रह्मा जी ने उन्हें उठाकर बालक के शरीर पर हाथ फेरा। उनके स्पर्श मात्र से बालक स्वस्थ और सचेत हो गया। अपने पुत्र को जीवित देखकर पवनदेव प्रसन्न होकर पुनः सभी प्राणियों के शरीर में संचारित होने लगे।

ब्रह्मा जी ने सभी देवताओं से कहा, “यह शिशु बड़ा होकर तुम लोगों का बहुत बड़ा कार्य सिद्ध करेगा, इसलिए इसके पिता को प्रसन्न करने के लिए तुम सब इस शिशु को वरदान दो।” देवताओं ने सहर्ष उनकी यह बात मान ली।

इंद्र ने अपनी स्वर्णिम कमल-पुष्पों की माला बाल हनुमान के गले में डालते हुए कहा, “मेरे चलाए हुए वज्र से इसकी ठोड़ी (हनु) कुछ टेढ़ी हो गई है, इसलिए आज से इसका नाम ‘हनुमान’ होगा। यह मेरे वज्र से भी अवध्य रहेगा।”

सूर्यदेव ने कहा, “मैं अपने तेज का सौवाँ अंश इसे देता हूँ। जब यह पढ़ने योग्य होगा, तब इसे मैं स्वयं पढ़ाऊँगा। इससे यह महान वाग्मी होगा और इसके समान शास्त्रों को जानने वाला दूसरा कोई नहीं होगा।”

वरुणदेव ने कहा, “मेरे पाश और जल में लाख वर्षों तक भी इसकी मृत्यु नहीं होगी।”

यमराज ने वरदान दिया, “मेरे कालदंड से इसका कोई अहित नहीं होगा, इसे न तो कोई रोग होगा और न ही यह युद्ध में कभी विषादग्रस्त होगा।”

कुबेर जी ने कहा, “यह मेरी गदा से भी नहीं मर सकेगा।”

विश्वकर्मा ने कहा, “मेरे बनाए दिव्य अस्त्र-शस्त्रों से यह अवध्य होकर चिरंजीवी रहेगा।”

भगवान शिव ने कहा, “मेरे त्रिशूल और पाशुपतास्त्र से यह अवध्य होगा।”

अंत में ब्रह्मा जी बोले, “यह बालक दीर्घायु, महाबलवान और समस्त ब्रह्मदंडों से अवध्य होगा। यह शत्रुओं को भयभीत करने वाला, कामरूपी (इच्छा अनुसार रूप धारण करने वाला), कामचारी (इच्छा अनुसार कार्य करने वाला), कामगामी (इच्छा अनुसार वेग से चलने वाला), अव्याहतगति (जिसकी गति रोकी न जा सके) और कीर्तिमान होगा। यह युद्ध में रावण के विनाश के लिए श्रीराम के हित में रोमांचकारी कार्य करेगा।”

बाल हनुमान को वरदान देकर सभी देवता लौट गए। पवनदेव भी प्रसन्नतापूर्वक अपने पुत्र को लेकर घर आए और माता अंजना से संपूर्ण वृत्तांत कह सुनाया।

बाल हनुमान स्वाभाविक रूप से अत्यंत शक्तिशाली थे, और वरदानों के प्रभाव से वे और भी अधिक बलशाली हो गए। चंचल स्वभाव के होने के कारण वे ऋषि-मुनियों के आश्रमों में जाकर उपद्रव करने लगे। कभी उनके यज्ञ-पात्रों को तोड़ डालते, अग्निहोत्र की अग्नि को नष्ट कर देते, उनके वल्कल वस्त्र फाड़ देते और आश्रम की वस्तुओं को अस्त-व्यस्त या नष्ट कर देते। अपने पिताओं (केसरी एवं पवनदेव) के मना करने पर भी वे नहीं मानते थे। उनके उपद्रवों से तंग आकर अंगिरा और भृगु वंश के मुनिजनों ने क्रोधित होकर उन्हें शाप दे दिया: “हे वानर! जिस बल के भरोसे तू हम लोगों को सताता है, वह बल तुझे बहुत समय बाद तब स्मरण आएगा, जब कोई तुझे तेरी कीर्ति का स्मरण कराएगा।”

इस शाप के कारण हनुमान जी को अपने बल का स्मरण नहीं रहा और वे शांत भाव से आश्रमों में घूमने लगे। जब वे कुछ बड़े हुए, तो अपने वरदान के अनुरूप सूर्यदेव ने उन्हें पढ़ाना शुरू किया। हनुमान जी भी अत्यंत श्रद्धा से उनसे विद्या ग्रहण करते थे। वे सूर्यदेव से व्याकरण पढ़ते थे। जब सूर्यदेव का रथ आकाश में चलता, तब हनुमान रथ के आगे-आगे चलते हुए व्याकरण का अध्ययन करते थे और इस प्रकार उदयाचल (पूर्व) से अस्ताचल (पश्चिम) तक पहुँच जाते थे। इस तरह उन्होंने सूत्र (अष्टाध्यायी), वृत्ति, वार्तिक, भाष्य और संग्रह (प्रकरणादि) सहित अर्थयुक्त महान व्याकरण ग्रंथों को पढ़कर सिद्धि प्राप्त कर ली तथा छंद शास्त्र में प्रवीण हो गए।

उस समय वानरों के राजा ऋक्षराज थे। उनके दो पुत्र थे—बाली और सुग्रीव। ऋक्षराज के निधन के बाद मंत्रियों ने उनके बड़े पुत्र बाली को राजा और सुग्रीव को युवराज बनाया। बाल्यकाल से ही सुग्रीव की हनुमान जी से प्रगाढ़ मित्रता थी। जब बाली और सुग्रीव में शत्रुता हुई, तब हनुमान जी अपनी शक्ति को भूले हुए थे; अतः वे अपने मित्र सुग्रीव के साथ तो रहे, परंतु बाली के विरुद्ध युद्ध में सुग्रीव का बलपूर्वक साथ नहीं दे सके। सुग्रीव बाली के भय से जहाँ-जहाँ जाते, हनुमान एक सच्चे मित्र एवं सलाहकार के रूप में उनके साथ रहते थे।

इस प्रकार अगस्त्य ऋषि ने श्रीराम को अनेक कथाएँ सुनाईं। श्रीराम ने उन्हें अपने यज्ञ के समय पुनः आने का निमंत्रण दिया। सबसे विदा लेकर ऋषि अपने आश्रम चले गए। श्रीराम ने भी सूर्य अस्त होने पर राजाओं और वानरों को विदा किया, विधिवत संध्यावंदन किया और तत्पश्चात अपने अंतःपुर चले गए। यह उनके राज्याभिषेक का प्रथम दिवस था।

सर्ग 37

राज्याभिषेक की प्रथम रात्रि के विश्राम के बाद प्रातःकाल बंदीजनों ने राजोचित स्तुति गाकर महाराजा श्रीराम को जगाया। जब वे जागे, तब हज़ारों सेवक हाथ जोड़े खड़े थे, जिनमें से कुछ जल-पात्र लिए हुए थे। इस जल से श्रीराम ने नित्यकर्म संपन्न किए। तदुपरांत पवित्र अग्नि में हवन किया और फिर उस देवालय में पधारे जहाँ समस्त इक्ष्वाकु वंशीय राजा पूजन किया करते थे। वहाँ देवताओं, पितरों और ब्राह्मणों का यथोचित पूजन कर वे महल के बाहरी भाग (ड्योढ़ी) में आ गए।

वहाँ उनके मंत्रीगण, वशिष्ठ आदि पुरोहित तथा अन्य देशों के राजा उपस्थित हुए। उनके तीनों भाई—भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न भी उनकी सेवा में प्रसन्नतापूर्वक तत्पर थे। श्रीराम के सेवक भी उनकी आज्ञा की प्रतीक्षा में खड़े हो गए।

सुग्रीव आदि बीस मुख्य वानर (1. सुग्रीव, 2. अंगद, 3. हनुमान, 4. जांबवान, 5. सुषेण, 6. तार, 7. नील, 8. नल, 9. मैंद, 10. द्विविद, 11. कुमुद, 12. शरभ, 13. शतबलि, 14. गंधमादन, 15. गज, 16. गवाक्ष, 17. गवय, 18. धूम्र, 19. रंभ, 20. ज्योतिर्मुख) उनके निकट आ बैठे। तदुपरांत विभीषण अपने चार मंत्रियों (अनल, शरभ, हर, संपाती) के साथ बैठे। इसके बाद नगर के सम्मानित व्यापारी, व्यवसायी और वृद्धजनों ने राजा राम को प्रणाम करके आसन ग्रहण किया।

उस समय पुराणवेत्ता महात्मा वहाँ उपस्थित लोगों को मधुर धर्म-कथाएँ सुनाने लगे। श्रीराम ने ऋषि अगस्त्य से बाली और सुग्रीव के पिता ऋक्षराज के विषय में प्रश्न किया।

[स्पष्टीकरण: प्रथम दिवस के अंत में ही अगस्त्य ऋषि की विदाई का वर्णन है और पुनः दूसरे दिन भी उनके द्वारा कथा कहने का उल्लेख आता है। ये कोई दूसरे अगस्त्य हों, ऐसा भी कोई संकेत नहीं मिलता। इस कारण इसके आगे के पाँच सर्गों को प्रक्षिप्त (बाद में जोड़े गए) सर्ग माना जाता है। अधिकांश भाष्यकारों ने इन्हें प्रक्षिप्त मानकर इन पर भाष्य भी नहीं लिखा है। इसके अतिरिक्त इतनी बड़ी सभा का राजसभा के बजाय ड्योढ़ी में होना भी तर्कसंगत नहीं लगता। यदि मान भी लें कि इसका अर्थ महल का बाहरी परिसर (राजसभा) है, तो भी ऋषि अगस्त्य के पुनः उल्लेख की कोई तर्कसंगत व्याख्या नहीं मिलती।]

प्रक्षिप्त सर्ग 1

इसमें श्रीराम के पूछने पर अगस्त्य ऋषि बाली और सुग्रीव की माता के नाम तथा उन दोनों के नामकरण की कथा सुनाते हैं। कथा के अनुसार, मेरु पर्वत के शिखर पर स्थित अपने सभा-भवन में बैठे ब्रह्मा जी के नेत्रों से अश्रु-बिंदु गिरे, जिससे एक परम प्रतापी वानर उत्पन्न हुआ। ब्रह्मा जी ने उसका नाम ‘ऋक्षराज’ रखा। वह उस पर्वत के वनों में उगने वाले मधुर फलों को खाता और संध्या समय अच्छे-अच्छे फलों का भोग ब्रह्मा जी को लगाता था।

एक दिन घूमते हुए जब वह पानी पीने एक सरोवर पर गया, तो जल में अपनी परछाई देखकर उसे अपना शत्रु समझा और उसमें कूद पड़ा। जल से बाहर आने पर वह एक अत्यंत सुंदर स्त्री में बदल चुका था। उसी समय इंद्रदेव और सूर्यदेव वहाँ से गुज़र रहे थे। उस सुंदर स्त्री को देखकर मोहित होने से उनका वीर्य स्खलित हो गया। इंद्र का वीर्य उस स्त्री के बालों पर गिरा और सूर्य का गर्दन पर। बालों से उत्पन्न पुत्र ‘बाली’ और गर्दन से उत्पन्न पुत्र ‘सुग्रीव’ कहलाया।

अगले दिन वह स्त्री स्वतः ही पुनः अपने पूर्व रूप (ऋक्षराज) में आ गई। ऋक्षराज अपने दोनों पुत्रों के साथ ब्रह्मा जी के पास पहुँचा। ब्रह्मा जी ने उसे किष्किंधा जाकर वानरों का राजा बनने का निर्देश दिया और उसकी सहायता के लिए अपने दूत भी साथ भेजे। [कथा की अतार्किकता इसी से सिद्ध होती है कि इसमें ‘बाली’ शब्द को ‘बाल’ से उत्पन्न कहा गया है जबकि संस्कृत में बाल को केश कहते हैं, बाल नहीं।]

प्रक्षिप्त सर्ग 2

इस सर्ग में अगस्त्य जी सीताहरण का एक और कारण सुनाते हैं। कथा के अनुसार, पूर्व सतयुग में प्रजापति के पुत्र सनत्कुमार से रावण ने सबसे श्रेष्ठ देवता के विषय में पूछा। सनत्कुमार ने ऐसे प्रभु के रूप में श्रीमन्नारायण का नाम बताया, जिनकी नाभि से ब्रह्मा जी उत्पन्न हुए थे। रावण ने पूछा कि जो लोग उनके हाथों मारे जाते हैं, उन्हें कौन-सी गति मिलती है? सनत्कुमार ने उत्तर दिया, “वे वैकुंठ धाम को जाते हैं।” यह सुनकर रावण श्रीमन्नारायण भगवान से युद्ध करने की युक्ति सोचने लगा।

प्रक्षिप्त सर्ग 3

रावण की मंशा जानकर सनत्कुमार ने कहा, “तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी होगी, कुछ समय प्रतीक्षा करो।” रावण ने उनकी पहचान पूछी, तो उन्होंने कहा, “वे तो सर्वव्यापी हैं, परंतु जिन पर उनकी कृपा होती है, वही उनके दर्शन पा सकता है। सतयुग बीतने पर त्रेतायुग के आरंभ में देवताओं के कल्याण हेतु वे मनुष्य रूप में अवतार लेंगे। वे इक्ष्वाकु वंश के राजा दशरथ के पुत्र के रूप में जन्म लेंगे, जिनका नाम रामचंद्र होगा। वे वनों में विचरण करेंगे और उनकी पत्नी भूमि से उत्पन्न लक्ष्मी का रूप होंगी।”

प्रक्षिप्त सर्ग 4

सनत्कुमार के वचनों को सुनकर रावण ने विचार किया कि यदि वह उनकी पत्नी का हरण कर लेगा, तो वे अवश्य ही उससे युद्ध करके उसका वध करेंगे और उसे वैकुंठ की प्राप्ति (मुक्ति) हो जाएगी।

प्रक्षिप्त सर्ग 5

यहाँ सीताहरण का एक और कारण बताया गया है। रावण शूरवीरों को युद्ध के लिए ललकारते हुए पृथ्वी पर घूम रहा था। भ्रमण करते हुए एक दिन उसे आकाश में मेघ पर सवार नारद जी मिले। नारद जी से पूछने पर उन्होंने क्षीरसागर के समीप स्थित एक महाद्वीप (श्वेतद्वीप) के विषय में बताया, जहाँ के लोग अत्यंत गौर वर्ण, लंबे-चौड़े और बलवान थे। उनके पराक्रम का कारण यह था कि वे या तो श्रीमन्नारायण के भक्त थे या उनके हाथों मारे गए थे।

रावण सीधे श्वेतद्वीप पहुँच गया। कौतुक देखने के उद्देश्य से नारद जी भी वहाँ चले गए। रावण जब पुष्पक विमान से वहाँ पहुँचा, तो उस स्थान को देखते ही भयभीत होकर उसके सहयोगी भाग खड़े हुए। रावण स्वयं भी पुष्पक से उतरकर पैदल ही एक वन प्रदेश को पार करने लगा। वहाँ उसे स्त्रियों का एक समूह मिला। स्त्रियों के पूछने पर रावण ने कहा कि वह वहाँ युद्ध करने आया है, परंतु उसे कोई वीर पुरुष दिखाई नहीं दे रहा। उसकी यह बात सुनकर स्त्रियाँ हँसने लगीं।

एक स्त्री ने अनायास ही बालक की भाँति उसे पकड़ लिया और अपनी सखियों के बीच यह कहते हुए घुमाने लगी, “देखो, मैंने कैसा अद्भुत कीट पकड़ा है!” एक के बाद दूसरी और दूसरी के बाद तीसरी—सभी स्त्रियों ने उसे अत्यंत तिरस्कारपूर्ण ढंग से घुमाना प्रारंभ कर दिया। रावण दाँतों से काटकर और नखों से नोचकर छूटने का प्रयास करता, परंतु उन स्त्रियों पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। नारद जी रावण की यह दुर्दशा देखकर विस्मित होते हुए अट्टहास करके नृत्य करने लगे।

अगस्त्य जी कहते हैं कि दुरात्मा रावण ने इसीलिए आपके हाथों मृत्यु प्राप्त करने हेतु सीता का हरण किया था।

क्या हनुमान जी ने बचपन में सूर्य को निगला था? वाल्मीकि रामायण का सच/ramayan katha part 89

कार्तवीर्य अर्जुन और वानरराज बाली से रावण की पराजय की कथा | वाल्मीकि रामायण part 88

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