विज्ञापनों में देवी-देवताओं का प्रयोग: आस्था, लापरवाही या कुछ और?

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इन दोनों फोटो में आपको भगवान दिख रहे हैं या फिर कोई विज्ञापन?

विज्ञापनों में देवी-देवताओं का प्रयोग

यूं ही रास्ते में जाते हुए मेरी नजर एक दुकान के बाहर पड़ी। वहाँ हनुमान जी की तस्वीर ऐसे इस्तेमाल की गई थी मानो वे किसी जिम के विज्ञापन के मॉडल हों—मानो संदेश यह हो कि वह सप्लीमेंट खाएंगे तो हनुमान जी जैसा ‘मसलमैन’ बन जाएंगे। कुछ ही दूरी पर एक होटल का पुराना, फटा हुआ होर्डिंग दिखा, जिस पर अस्पष्ट रूप से किसी पौराणिक युगल (शिव-पार्वती) की भेषभूषा से मेल खाती तस्वीर का इस्तेमाल ‘कपल रूम’ के प्रचार के लिए किया जा रहा था। कभी कर्पूर के पैकेट पर माता सरस्वती की तस्वीर दिखती है, तो कभी किसी उत्पाद के साथ भगवान का चित्र चस्पा होता है।

आखिर यह कैसी आस्था है? यह स्पष्ट है कि ये विज्ञापन लगाने वाले लोग नास्तिक नहीं, बल्कि खुद को आस्तिक ही मानते होंगे। उनका उद्देश्य शायद अपनी श्रद्धा प्रकट करना या अपने व्यापार के लिए आशीर्वाद पाना ही हो। किंतु क्या यह अपनी आस्था का एक भद्दा, सतही और लापरवाही भरा प्रदर्शन नहीं है?

विज्ञापनों में देवी-देवताओं का प्रयोग

अपने देवताओं को हम में से अधिकांश लोग अपना ‘इष्ट’ मानते हैं, लेकिन उनके प्रति व्यवहार ऐसा होता है मानो वे हमारे कोई मातहत कर्मचारी हों—”हमारी यह मांग पूरी करो, वो मन्नत पूरी करो।” और अब तो हद यह है कि वे विज्ञापनों के मॉडल भी बनने लगे हैं। झंडों से लेकर परिधानों, चूड़ियों और कड़ों तक पर बिना किसी शास्त्रीय विधान या मर्यादा के आराध्यों की तस्वीरें छाप दी जाती हैं।

डिजिटल युग में भगवान बने ‘संदेशवाहक’ अब तो लोग भगवान को धड़ल्ले से व्हाट्सएप और फेसबुक के संदेशवाहक (Messenger) की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं— “जाओ, मेरे मित्रों को मेरी तरफ से गुड मॉर्निंग या गुड नाइट कहो।” भगवान के दर्शन का बहाना लेकर तस्वीरों को फॉरवर्ड करने का यह दौर हमारी गंभीर होती धार्मिकता पर एक व्यंग्य जैसा है।

मर्यादा का ह्रास और हमारी जिम्मेदारी सनातन संस्कृति में ईश्वर सर्वव्यापक हैं। मूर्ति या तस्वीर की स्थापना का एक विधान और गरिमा होती है। लेकिन छपाई की सुगमता ने भगवान की तस्वीरों का जो अवमूल्यन किया है, वह आदर की कमी का स्पष्ट प्रमाण है। एक क्लिक से पोस्टर बनाओ और एक क्लिक से डिलीट करो। कल यही पोस्टर, झंडे और बैनर पुराने या मैले होकर जब कचरे के ढेर में जाएंगे, तो क्या इससे भगवान के प्रति आदर बढ़ेगा या घटेगा?

भगवान के हमने अनगिनत रूप और अवतार देखे हैं, इस डिजिटल युग में उनका यह ‘मॉडल’ वाला रूप भी देख रहे हैं। अब तो रुकिए, आस्था को बाजार का मोहताज मत बनाइए! अब बस भी कीजिए भक्तो!  

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