कन्यादान क्यों?
आजकल कुछ बौद्धिकतावादी लोग कहने लगे हैं कि बेटी कोई वस्तु नहीं है, तो फिर विवाह में कन्यादान क्यों करूँ? एक विज्ञापन ने इस विवाद को और बढ़ावा दिया। यह सही है कि समय के साथ रीति-रिवाज बदलते हैं, और बदलना चाहिए भी।
इस संबंध में मेरे पास विचार करने के लिए 5 प्रश्न हैं:
- कन्यादान है क्या?
- कन्यादान और अन्य दान में क्या समानताएँ और असमानताएँ हैं?
- क्या यह विवाह का आवश्यक अंग है?
- यह कब से शुरू हुआ?
- इसके क्या परिणाम हुए समाज के लिए?
‘कन्यादान’ शब्द का अर्थ
सबसे पहले विचार करते हैं ‘कन्यादान’ शब्द पर।
इस शब्द को तीन तरह से समझ सकते हैं:
- पहला, व्युत्पत्ति की दृष्टि से व्याकरण में कन्यादान शब्द का क्या अर्थ होता है?
- दूसरा, दान के क्या अनिवार्य लक्षण होते हैं?
- तीसरा, जहाँ दान की जाने वाली वस्तुओं की सूची दी गई है, क्या वहाँ कन्या को इस सूची में शामिल किया गया है?
कन्यादान क्या है?
‘कन्यादान’ शब्द का विरोध करने वाले इसका अर्थ यह लगाते हैं कि कन्यादान अर्थात बेटी का उसके होने वाले पति को दान कर सदा के लिए सौंप देना। पर व्याकरण के अनुसार ‘कन्यादान’ शब्द की उत्पत्ति ‘कन्या + दान’ अथवा ‘कन्या + आदान’ दोनों से हो सकती है। ‘आदान’ का अर्थ होता है—आना। आज भी व्यापार में ‘आदान-प्रदान’ शब्द का प्रयोग होता है। विवाह में कन्यादान, वाकदान या सगाई, सिंदूरदान आदि शब्दों का प्रयोग होता है, इसलिए संभवतः ‘कन्या + दान’ का अर्थ लगाया जाने लगा।
बिहार और नेपाल में बसे मिथिलांचल क्षेत्र में आज भी कन्या वालों के लिए ‘कन्यागत’ शब्द का प्रयोग होता है, अर्थात जहाँ से कन्या आने वाली हो। स्मृति और सूत्र ग्रंथों में दान की जाने वाली वस्तुओं की सूची दी गई है। इनमें भूमि, गौ, सोना आदि का तो उल्लेख है, लेकिन कन्या या पुत्री इनमें से किसी भी सूची में शामिल नहीं है। इन दोनों में से कौन सा अर्थ सही है, यह अन्य संदर्भों से ही समझा जा सकता है।
दान और कन्यादान में मौलिक अंतर
दान और कन्यादान में कुछ मौलिक अंतर हैं:
- निःशुल्क और सशर्त: सबसे बड़ी बात यह है कि दान हमेशा निःशुल्क और निःशर्त होता था। अगर वृत्ति (आजीविका) के लिए किसी को जमीन या कोई अन्य चीज़ दी जाती थी, तो उसे वृत्ति में गिना जाता था, दान में नहीं। लेकिन कन्यादान के समय पिता या अभिभावक वर से सात वचन लेते हैं। ये वचन कन्या की भलाई के लिए लिए जाते हैं। यदि वर इन वचनों में से किसी को भंग करे, तो कन्या या उसके परिवार को यह अधिकार था कि वह इस बंधन से मुक्त हो सके।
- पुनर्विवाह की मान्यता: जब दान लेने वाला यानी पति मृत्यु को प्राप्त होता था, तब स्त्री के दूसरे पुरुष से विवाह को मान्यता मिली थी। देवर से विवाह सबसे प्रचलित था, पर अन्य व्यक्ति से भी विवाह हो सकता था। हालांकि सूत्र काल से उच्च वर्णों में विधवा विवाह अमान्य कर दिया गया, फिर भी इससे यह सिद्ध होता है कि वस्तु के दान और कन्या के संबंध में मौलिक अंतर था।
- स्वामित्व का अधिकार: वस्तु को दान में देने के बाद दान लेने वाला उसे किसी अन्य को दान कर सकता था, लेकिन कन्यादान के मामले में ऐसा संभव नहीं था—यानी पति अपनी पत्नी को किसी और को दान नहीं कर सकता था। यदि लोग युधिष्ठिर का उदाहरण देते हैं, तो इस संदर्भ में यह भी याद रखना चाहिए कि युधिष्ठिर ने द्रौपदी को ही नहीं, बल्कि अपने चारों भाइयों को भी दांव पर लगाया था, जो कि उन्हें दान में नहीं मिले थे।
- पात्रता और सहमति: ग्रंथकारों ने सुयोग्य व्यक्ति को ही दान देने पर ज़ोर दिया है। ‘दान’ सुयोग्य ब्राह्मण को ही देने की बात कही गई है, लेकिन विवाह तो सभी वर्णों में होते थे। ‘वस्तु’ को जब दान दिया जाता है, तो उस वस्तु से पूछा नहीं जाता है, लेकिन जब कन्यादान की बात आती है, तो कन्या की मर्जी के विरुद्ध उसके विवाह का उल्लेख कहीं नहीं मिलता। स्वयंवर, जो कि क्षत्रियों में अधिक प्रचलित था, इसका सबसे बड़ा प्रमाण है।
इस संदर्भ में राजा रथवीति की कहानी महत्वपूर्ण है, जो ‘बृहद्देवता’ (5-50-80) नामक ग्रंथ में आई है। कहानी इस प्रकार है: श्यावाश्व ऋषि ने राजा के समक्ष उनकी कन्या से विवाह का प्रस्ताव रखा। राजा ने पहले अपनी रानी शशीयसी से सलाह ली। रानी ने पुत्री से पूछने के बाद कहा कि श्यावाश्व को पहले ऋषित्व प्राप्त करना चाहिए। जब श्यावाश्व ने वह पद और प्रतिष्ठा प्राप्त कर ली, तभी रथवीति ने उन्हें अपनी बेटी का पाणिग्रहण करने की अनुमति दी।
- परिवार से संबंध: उत्तर मध्यकाल से पहले ऐसा कहीं वर्णन नहीं मिलता कि कन्यादान के बाद पिता या परिवार का संबंध कन्या से स्थायी रूप से विच्छेद हो गया और अब वे उसकी कोई सहायता नहीं कर सकते। पुत्री के घर का पानी नहीं पीने जैसा कोई संदर्भ प्राचीन काल में नहीं मिलता है। दक्ष प्रजापति की पुत्री सती कन्यादान के बाद भी अपने पिता के घर गई थीं, और इसे कोई असामान्य घटना नहीं माना गया था।
स्पष्टतः कन्यादान में यद्यपि ‘दान’ शब्द आया है, लेकिन यह अन्य दानों से भिन्न और सशर्त है। इस कारण ‘कन्या + आदान’ यानी ‘कन्या का आना’ अर्थ अधिक सही प्रतीत होता है।
क्या यह विवाह का आवश्यक अंग है?
इस संदर्भ में ध्यान देने की बात यह भी है कि सभी विवाह एक ही प्रकार के नहीं होते थे। इन्हें आठ श्रेणियों में रखा गया था, जिनमें से पहले चार—आर्ष, ब्रह्म, दैव और प्राजापत्य विवाह को धर्मानुकूल माना गया था। बाकी चार विवाहों को यद्यपि अधिक स्वीकृति नहीं थी, लेकिन लड़की के हित के लिए उन्हें भी मान्यता दी गई थी, ताकि वधू को विवाहिता स्त्री के सभी अधिकार मिल सकें।
इन आठ में से केवल पहले चार विवाहों में ही कन्यादान किया जाता था। शेष चार (गंधर्व, राक्षस, असुर और पिशाच विवाह) बिना कन्यादान के ही संपन्न होते थे, फिर भी वे पूर्ण रूप से मान्य थे। भगवान कृष्ण के अधिकांश विवाह ‘राक्षस विवाह’ की श्रेणी में थे, जिसमें कन्यादान नहीं हुआ था। इसलिए, यह स्पष्ट है कि कन्यादान के बिना भी विवाह पूर्ण और मान्य होता है। जो लोग इसे नहीं करना चाहते, वे स्वतंत्र हैं।
कुछ लोग तर्क देते हैं कि विवाह के लिए ‘कन्यादान’ नहीं बल्कि ‘पाणिग्रहण’ शब्द आया है, लेकिन यह भी पूर्ण सत्य नहीं है। शास्त्रानुसार:
“वाग्दानञ्च वरणं पाणिपीडनम्। सप्तपदीति पंचांगो विवाह: प्रकीतिर्त:।”
अर्थात—(1) वाग्दान या सगाई, (2) कन्यादान, (3) वरण या वर द्वारा स्वीकृति, (4) पाणिग्रहण करना, और (5) सप्तपदी (सात वचनों के पालन की प्रतिबद्धता)—इन पाँच चरणों में विवाह संस्कार संपन्न होता है।
कन्यादान कब से शुरू हुआ?
प्राचीन शास्त्रों में ‘कन्यादान’ के बदले ‘विधिवत विवाह’ शब्द का अधिक प्रयोग हुआ है। संभवतः इसका कारण यह हो कि कन्यादान का अर्थ संपूर्ण विवाह नहीं, बल्कि उसका एक भाग मात्र था। धनुष टूटने के बाद कुल गुरु जनक जी से कहते हैं—‘यद्यपि विवाह धनुष टूटने की शर्त के अधीन था, जो कि अब पूरा हो चुका है। अब आप जाकर ‘विधिवत’ रूप से विवाह की तैयारी कीजिए।’
इस संबंध में वर और वधू पक्ष के संबंध का दृष्टिकोण भी महत्वपूर्ण है। दशरथ जी राजा जनक से कहते हैं—‘आदाता हमेशा देने वाले के अधीन होता है, इसलिए आप जैसा आदेश करेंगे, मैं करूँगा।’ अर्थात, चूँकि जनक जी अपनी पुत्री उन्हें बहू के रूप में दे रहे थे, इसलिए उनका स्थान उच्च था। अतः यह विचार कि ‘लड़की वाले लड़के वालों से छोटे होते हैं’, किसी भी प्राचीन ग्रंथ से समर्थित नहीं है।

मनु को सामान्यतः स्त्री विरोधी माना जाता है, लेकिन वे भी पिता या अभिभावक को निर्देश देते हैं कि—“विवाह के लिए इच्छुक पिता अपनी कन्या अति उत्कृष्ट, शुभ गुण, कर्म और स्वभाव वाले, कन्या के सदृश रूप और लावण्य आदि गुणों से युक्त वर को ही दे।” (मनुस्मृति: 9-88)
इन विभिन्न उल्लेखों को देखने के बाद यही लगता है कि भले ही कन्यादान का अर्थ “दान” लगाया जाए या “आदान”, किंतु व्यवहार में इसका आशय पिता या अभिभावक द्वारा वर को पाणिग्रहण करने की अनुमति देना ही है। चूँकि वर और कन्या दोनों की सहमति ज़रूरी थी, इसलिए यदि अभिभावक न भी हों या अनुमति न भी दें, तब भी विवाह विधिमान्य हो सकता था।
इसलिए यह कहना कि “बेटी का दान करने का अर्थ है बेटी पर से उसके माता-पिता का अधिकार हमेशा के लिए समाप्त हो जाना और पति को उसे जैसे चाहे रखने का अधिकार मिल जाना,” पूरी तरह भ्रामक है। यह पितृसत्तात्मक व्यवस्था की निशानी नहीं है, बल्कि एक पारिवारिक संस्कार है।
निष्कर्ष और व्यावहारिक पक्ष
कुछ लोग एक अन्य कारण से भी इसका विरोध करते हैं कि हमारे यहाँ तो स्वयंवर की परंपरा थी, कन्यादान की नहीं। उनके अनुसार कन्यादान मध्यकाल में हिंदू विवाह विधि में आई विकृति है, इसलिए इसका परित्याग किया जाना चाहिए।
कन्यादान करते समय पिता या अभिभावक जो मंत्र पढ़ते हैं, वह भी जानना रोचक है। यह मंत्र ‘पारस्करगृह्यसूत्रम’ के हरिहर भाष्य में दिया गया है:
“अद्येति………नामाहं………नाम्नीम् इमां कन्यां/भगिनीं सुस्नातां यथाशक्ति अलंकृतां, गन्धादि-अर्चितां, वस्त्रयुगच्छन्नां, प्रजापति दैवत्यां, शतगुणीकृत, ज्योतिष्टोम-अतिरात्र-शतफल-प्राप्तिकामोऽहं………नाम्ने, विष्णुरूपिणे वराय, भरण-पोषण-आच्छादन-पालनादीनां, स्वकीय उत्तरदायित्व-भारम्, अखिलं अद्य तव पत्नीत्वेन, तुभ्यं अहं सम्प्रददे।”
अर्थात—’अमुक गोत्र में उत्पन्न, अमुक नाम वाली, यथाशक्ति वस्त्रों तथा आभूषणों से सुसज्जित कन्या को… मैं पिता तुम्हें पत्नी के रूप में अपनाने के लिए वर को संप्रदान करता हूँ।’
वर उन्हें स्वीकार करते हुए कहता है—“ॐ स्वस्ति।”
सैद्धांतिक पक्ष के बाद इसके व्यावहारिक पक्ष पर विचार करें, तो मेरी दादी, परदादी, परनानी और उनकी नानी—सबका कन्यादान हुआ था, लेकिन किसी का न तो अपने मायके से संबंध टूटा और न ही उन्हें ससुराल में दान में मिली हुई ‘वस्तु’ माना गया। दूसरी तरफ, आज भी मेरी कई सहेलियाँ हैं जिनका ‘दान’ उनके पिता ने नहीं किया, उन्होंने अपनी मर्जी से विवाह किया, पर वे भी कई बार वैवाहिक जीवन में प्रताड़ित और अपमानित होती हैं।
अपनी व्यक्तिगत समस्याओं की जड़ हम अपनी परंपराओं में ढूँढ रहे हैं। कन्यादान के बिना भी वैध विवाह हो सकता है, लेकिन क्या इसके बावजूद हर विवाह सफल ही रहेगा, इसकी कोई गारंटी ले सकता है क्या?




