33 करोड़ देवी-देवता
कुछ दिन पहले व्हाट्सएप पर एक जोक दिखा, जिसमें 33 करोड़ देवी-देवताओं से केवल एक-एक रुपये की माँग की गई थी। वैसे यह केवल हँसी-मज़ाक था, लेकिन हम सभी भारतीयों ने 33 करोड़ देवी-देवताओं के विषय में कभी-न-कभी ज़रूर सुना होगा। कभी मज़ाक में, कभी व्यंग्य में, तो कभी अज्ञानता में इसकी चर्चा होती है। त्रिपुरा के उनाकोटि नामक स्थान पर एक पहाड़ पर बहुत सारे देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बनी हुई हैं। माना जाता है कि इनकी संख्या एक करोड़ में से एक कम है।
पर ये 33 करोड़ देवी-देवता कौन हैं? इसे समझने के लिए तीन शब्दों को समझना होगा—पहला, ‘तैतीस’, दूसरा ‘करोड़’ (कोटि) शब्द, और तीसरा ‘देवी-देवता’ शब्द।
देवता
सबसे पहले हम “देवता” शब्द को समझते हैं। संस्कृत में “देवता” शब्द संज्ञा, सर्वनाम और विशेषण तीनों रूपों में प्रयुक्त हुआ है। “देवता” शब्द की व्युत्पत्ति “द्योः” शब्द से हुई है, जिसका अर्थ होता है ‘प्रकाशवान’। अर्थात कोई ऐसा व्यक्ति जो अपने सद्गुणों से प्रकाशित हो, वह देवता कहलाता है। इसी अर्थ में हम आज भी कहते हैं कि अमुक व्यक्ति देवता है। धीरे-धीरे यह शब्द एक संज्ञा बन गया, जिसका अर्थ हुआ ऐसा “व्यक्ति” जो अपने गुणों के कारण स्वर्ग में रहने का अधिकारी हो गया और अमर हो गया।
यहाँ यह भी याद रखना होगा कि देवता भगवान या ईश्वर से अलग हैं। भगवान तो वह सत्ता है जिसने देवताओं की भी रचना की है। भगवान अनादि, अनंत, निर्गुण एवं निराकार हैं। चूँकि उनके इस रूप का स्मरण करना ऐसे व्यक्तियों के लिए ही संभव है जिनकी आध्यात्मिक और मानसिक शक्ति उच्च हो, लेकिन साधारण लोग इसे नहीं समझ सकते। इसीलिए वे अपने अंश से कभी-कभी मनुष्य के रूप में अवतार ले लेते हैं। इसके विपरीत अधिकांश देवता पहले मनुष्य थे, जिन्होंने बाद में देवत्व प्राप्त किया था, या वे किसी देवता की संतति थे।

देवताओं की जो पहचान पौराणिक कथाओं में बताई गई है, उसके अनुसार देवता के शरीर में एक विशेष कांति या प्रकाश होता है। वे यदि धरती पर आते भी हैं, तो धरती को कभी स्पर्श नहीं करते—अर्थात उनके पैर धरती से थोड़े ऊपर होते हैं, उनके कभी मैले नहीं होने वाले वस्त्र होते हैं, इत्यादि। साधारण व्यक्ति के अपने पुण्य कर्मों से देवलोक और देवत्व पाने की अनेक कथाएँ हमारे पुराणों में हैं, जिनमें देवराज इंद्र भी शामिल हैं।
अर्थात एक संज्ञा के रूप में यह स्वर्ग में रहने वाले एक विशेष अमर प्राणी का द्योतक था, लेकिन एक विशेषण के रूप में इसका प्रयोग एक विशेष प्रकार के गुणों के लिए हुआ है। यही कारण है कि वेदों में यज्ञ-कर्म में भाग लेने वाले मनुष्यों, प्रत्येक वेद और उनके प्रत्येक मंत्रों के लिए देवता की परिकल्पना की गई है। यहाँ तक कि यज्ञों में प्रयोग होने वाली वस्तुओं, जैसे—सील, लोढ़ा, मूसल, ओखली, नदी, पहाड़ इत्यादि में रहने वाले देवताओं यानी उनके देवत्व के गुणों के विषय में बताया गया है। इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है ‘गायत्री’। गायत्री ऋग्वेद के एक छंद की देवी का नाम था और छंद का भी यही नाम था। गायत्री मंत्र इसी विशेष छंद में श्लोकबद्ध किया गया है। यह मंत्र इतना अधिक लोकप्रिय हुआ कि बाद में इसी देवी को “वेदमाता गायत्री” के रूप में ख्याति मिली।
मुख्य देवताओं के अलावा प्रत्येक गाँव के, प्रत्येक कुल के, यहाँ तक कि प्रत्येक व्यक्ति के एक विशेष यानी इष्ट देवता होते हैं। आज भी लगभग सभी गाँवों के बाहर एक स्थान ग्राम देवता का होता है। ये स्थान साधारणतः गाँव की सीमा पर किसी पेड़ के नीचे या टीले के रूप में होते हैं। देश के प्रत्येक क्षेत्र में एक या अधिक लोकदेवता ज़रूर होते हैं। इस संबंध में राजस्थान के लोकदेवताओं का अध्ययन बड़ा रोचक है।
राजस्थान में अनेक लोकदेवता हैं। जनसाधारण उन्हें बहुत आदर देते हैं, उनके नाम पर मेले लगते हैं और कई तीर्थस्थल हैं। रामदेव जी, गोगा जी, गुरु जम्भेश्वर, जीणमाता, करणी माता, तेजा जी इत्यादि वहाँ के प्रमुख लोकदेवता हैं। ऐतिहासिक दृष्टि से इन सभी ने गायों, स्त्रियों, जलाशयों, अपने लोगों या अपने क्षेत्र की रक्षा करते हुए अपना जीवन बलिदान किया था। उनके इन महान कार्यों के कारण लोगों ने मृत्यु के बाद उनकी स्मृति को सँजोकर रखा और उनकी पूजा करने लगे। उनके गुणों के कारण यह माना गया कि उन्होंने मृत्यु के बाद देवत्व पाया है और इसलिए वे मृत्यु के बाद भी उनकी रक्षा करते रहेंगे।
उपकार का प्रतिउपकार एवं कृतज्ञता ज्ञापन भारतीय संस्कृति की विशेषता रही है—यह उपकार भले ही किसी व्यक्ति द्वारा किया जाए या प्रकृति द्वारा। अग्नि, वायु, सूर्य, पृथ्वी, समुद्र इत्यादि प्राकृतिक शक्तियों को भी देवता तथा पूजनीय माना गया है। यहाँ तक कि इनके अलग-अलग गुणों के लिए अलग-अलग देवत्व के नाम दिए गए हैं। उदाहरण के लिए, सूर्य एक देवता थे; सुबह में उदय के समय उनके सौम्य रूप में ‘उषा’, शाम को अस्ताचलगामी सूर्य में ‘संध्या’ और दिन के प्रखर सूर्य में ‘सवितु’ नामक देवियों की परिकल्पना की गई थी।
प्राकृतिक शक्तियों और अच्छे व्यक्तियों की पूजा देवता के रूप में करना उनके उपकारों एवं महत्व को याद रखने और अगली पीढ़ी तक पहुँचाने का प्राचीन भारतीयों का अपना तरीका था। सामान्यतः किसी भी काम के आरंभ में संबंधित देवता की पूजा की परंपरा रही है।
संक्षेप में, व्यक्ति या प्रकृति में जो भी अच्छा है, जिससे हमें प्रसन्नता मिलती है या कोई लाभ मिलता है, वे सभी देवता माने गए हैं।
कोटि
अब हम ‘करोड़’ या ‘कोटि’ शब्द को समझते हैं।
देवताओं की इन विशेषताओं को ध्यान में रखकर देखें, तो देवी-देवताओं की संख्या तैंतीस करोड़ से बहुत अधिक होगी। वास्तव में ऐसे देवी-देवताओं की गिनती करना संभव ही नहीं है। इसीलिए वेदों में देवताओं की संख्या नहीं, बल्कि उनके प्रकार यानी कि ‘कोटि’ बताए गए हैं।
संस्कृत भाषा के ‘कोटि’ शब्द के हिंदी में दो अर्थ होते हैं—करोड़ और प्रकार। इसी कारणवश भ्रमवश कुछ लोगों ने ‘कोटि’ का अनुवाद ‘प्रकार’ के बदले ‘करोड़’ समझ लिया। यहीं से 33 करोड़ देवी-देवताओं का यह भ्रम शुरू हुआ।
तैतीस कोटि
अब आते हैं कि ये 33 प्रकार या कोटि क्या हैं? ऋग्वेद के अनुसार देवताओं की तीन श्रेणियाँ थीं—पृथ्वी पर रहने वाले, आकाश में रहने वाले और अंतरिक्ष में रहने वाले देवता। इन तीनों श्रेणियों में 11-11 प्रकार के देवता थे, जिनमें एक देवता सबसे मुख्य था। तदनुसार, पृथ्वी के देवताओं में ‘अग्नि’, अंतरिक्ष के देवताओं में ‘वायु’ तथा आकाश के देवताओं में ‘सूर्य’ सबसे प्रमुख थे। बाद में कहीं-कहीं ‘इंद्र’ को यह स्थान दिया गया है।
विद्वानों ने इन 33 प्रकार या कोटि के देवताओं की और भी अनेक प्रकार से व्याख्या की है। एक मत के अनुसार 33 कोटि देवी-देवताओं में आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, इंद्र और प्रजापति शामिल हैं। कुछ शास्त्रों में इंद्र और प्रजापति के स्थान पर दो अश्विनी कुमारों को 33 कोटि देवताओं में शामिल किया गया है।
दो अश्विनी कुमार हैं—(1) नासत्य, और (2) दस्त्र। अश्विनी कुमार औषधियों के देवता हैं जो जुड़वा भाई हैं। इसलिए इन दोनों को सामान्यतः एक ही नाम “अश्विनी कुमार” से बुलाया जाता है, लेकिन दोनों के ये दो अलग नाम हैं।
वास्तव में ये सभी व्यक्तिपरक देवता नहीं, बल्कि देवत्व के किसी-न-किसी गुण के मूर्त रूप थे। इस दृष्टि से हम सब में भी देवता बनने की संभावना छिपी हुई है। और इसलिए यह एक ईश्वर को मानने वाले धर्मों के पवित्र व्यक्तियों या होली मेन (जैसे—पीर, ख्वाजा, हजरत, औलिया, सेंट इत्यादि) की अवधारणा से भिन्न है।




