श्रीकृष्ण ने अरिष्टासुर का वध क्यों किया? – भाग 31

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श्रीकृष्ण का गाय चरा कर वापस लौटना

दिनभर वन में रहने के बाद शाम को जब श्रीकृष्ण वापस लौटते, तो उस समय ब्रज में किसी उत्सव की तरह आनंद और उत्साह का माहौल रहता था। उनकी बाँसुरी की ध्वनि सुनते ही सभी गोपियाँ अपने घरों से बाहर आ जाती थीं। गायों को लेकर लौटते हुए श्रीकृष्ण के सुंदर मुख-मंडल के दर्शन करने के बाद ही वे कोई अन्य कार्य करती थीं।

अरिष्टासुर का ब्रज आगमन

एक दिन जब श्रीकृष्ण संध्या के समय इसी प्रकार ब्रज में प्रवेश कर रहे थे, उसी समय अरिष्टासुर नामक एक दैत्य बैल का भयानक रूप धारण करके वहाँ आ पहुँचा।

वह मजबूत डील-डौल वाला राक्षस बड़े ज़ोर से अपने खुरों को पटक रहा था और भयंकर गर्जना कर रहा था। वह अपने पैरों से धूल उड़ाता जा रहा था तथा अपनी सींगों से घरों की चहारदीवारियों और खेतों की मेड़ों को तोड़ता जा रहा था। उस तीखे सींग वाले भयंकर बैल को देखकर सभी गोप और गोपियाँ भयभीत हो गईं। यहाँ तक कि डर के मारे अन्य पशु भी अपने रहने के स्थान छोड़कर भाग खड़े हुए।

ब्रजवासियों की यह दशा देखकर सबने घबराकर श्रीकृष्ण को पुकारा और उनकी शरण में गए। श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को ढांढस बँधाया और अरिष्टासुर (जो बैल का रूप धारण करने के कारण ‘वृषासुर’ भी कहलाता था) को ललकारा।

श्रीकृष्ण द्वारा अरिष्टासुर का वध

अरिष्टासुर को और अधिक क्रोधित करने के लिए श्रीकृष्ण ने अपने एक सखा के कंधे पर हाथ रख दिया। क्रोध से पागल होकर वह दैत्य अपने खुरों से धरती को खोदता हुआ और अपने तीखे सींग आगे किए हुए सीधे श्रीकृष्ण की ओर झपटा।

श्रीकृष्ण ने फुर्ती से उसके दोनों सींगों को पकड़ लिया और उसे पीछे की ओर ज़ोर का धक्का दिया। वह दैत्य झटके से अठारह कदम पीछे जाकर धरती पर गिर पड़ा, किंतु तुरंत संभलकर उठ खड़ा हुआ और दोबारा अत्यंत क्रोध में श्रीकृष्ण पर झपटा। भगवान ने इस बार भी उसके सींगों को पकड़ा और अपने पैरों से ठोकर मारकर उसे ज़मीन पर दे पटका।

इसके बाद श्रीकृष्ण ने उसे अपने पैरों से कुचलकर उसका घमंड चूर-चूर कर दिया और उसी का एक सींग उखाड़कर उसी पर प्रहार किया, जिसके परिणामस्वरूप वह अनाथों की तरह तड़पकर वहीं ढेर हो गया और उसकी मृत्यु हो गई।

यह अद्भुत दृश्य देखकर आकाश से देवताओं ने पुष्प वर्षा की और उनकी स्तुति की। सभी गोप उनकी वीरता की प्रशंसा करने लगे। इसके पश्चात श्रीकृष्ण जी ने बलराम जी और अन्य सखाओं के साथ हँसते-गाते ‘गोष्ठ’ (गायों के रहने के स्थान) में प्रवेश किया।

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