ये कैसी आस्था है?
मैं कई बार सड़कों के किनारे, पेड़ों के नीचे, नदियों के तट पर रखे देवी-देवताओं की अनेक टूटी-फूटी, खंडित मूर्तियाँ, फोटो आदि देखती हूँ। आर्टिफिशियल फूल-मालाएँ, माता की चुन्नी, भगवत नाम लिखा हुआ पटका या अंगवस्त्र इत्यादि भी वहाँ बिखरे होते हैं। शायद आप लोगों ने भी यह सब देखा होगा।
इन्हें देखकर मेरे मन में कई तरह के विचार आते हैं:
पहला विचार: इन्हें वहाँ कौन रखता होगा? कोई नास्तिक तो ऐसा नहीं करेगा; कोई-न-कोई आस्तिक ही होगा, जिसने पहले उनकी पूजा की होगी। अब जब वे पुराने और खंडित हो गए या उन्हें रखने का कोई अन्य स्थान नहीं मिला, तो उन्हें कहीं भी फेंक दिया या रख दिया? यह कैसी आस्था है, जो अपने आराध्य को—जिनकी उन्होंने लंबे समय तक पूजा की है—इस प्रकार कहीं भी बेसहारा छोड़ देते हैं?
एक ऐसी संस्कृति, जहाँ एक साधारण व्यक्ति के मृत शरीर को भी आदर दिया जाता है—भले ही वह शरीर किसी शत्रु का ही क्यों न हो; जहाँ राम और कृष्ण जैसे अवतारी पुरुषों ने इसलिए पार्थिव शरीर का त्याग नहीं किया और शरीर के साथ ही अपने धाम गए कि उनके भौतिक शरीर (जो उनकी साक्षात मूर्ति है) का अंतिम संस्कार न करना पड़े—वहाँ के लोग अपने इष्ट के साथ ऐसा व्यवहार कैसे कर सकते हैं?

दूसरा पहलू: हमारी सनातन पूजा-पद्धति में ऐसा कुछ भी नहीं होता जो प्रकृति में घुल-मिल न सके। फूल, दूर्वा, बेलपत्र, तुलसी, अक्षत (चावल), चंदन, तिल, जौ, कपूर इत्यादि ही हमारी पूजा की मुख्य सामग्री होते हैं। बचपन में मैंने अपने पिताजी को ‘पार्थिव महादेव’ की पूजा करते हुए देखा है। घर से लगे एक छोटे से स्थान को मिट्टी या ईंटों से घेर दिया जाता था। प्रतिदिन की पूजा से निकलने वाली सामग्री यानी ‘निर्माल्य’ और मिट्टी से बने ‘पार्थिव महादेव’ को पूजा के बाद वहीं आदरसहित रख दिया जाता था।
घर के आसपास उस निर्माल्य के रहने से हम लोगों में यह भरोसा रहता था कि कोई नकारात्मक ऊर्जा (नेगेटिव एनर्जी) घर में नहीं आएगी। वर्षों तक एक ही जगह निर्माल्य डालने पर भी वहाँ कचरे का कोई ढेर नहीं बनता था, क्योंकि सभी सामग्रियाँ पूरी तरह मिट्टी में मिलने वाली होती थीं और फूल-पत्तियाँ स्वतः खाद बन जाती थीं। बरसात के दिनों में वहाँ कई फूलों के पौधे, जैसे गेंदा और तुलसी, अपने-आप उग आते थे।
माना कि आज शहरों के फ्लैट संस्कृति में सिमटने के बाद हमारे पास मिट्टी उपलब्ध नहीं है, लेकिन किसी बड़े गमले, पुराने बड़े डिब्बे या टंकी आदि में हम इस निर्माल्य को अब भी सुरक्षित रख सकते हैं। विश्वास कीजिए, ये कचरा नहीं बनेंगे, बल्कि खाद बनकर प्रकृति का हिस्सा बन जाएंगे।
आर्टिफिशियल सामग्री और हमारी ज़िम्मेदारी
लेकिन हाँ, कुछ सामग्रियाँ ऐसी भी होती हैं जो आसानी से नहीं घुलतीं—जैसे धातु की मूर्तियाँ, कांच लगे फोटो, प्लास्टिक या कपड़े से बने कृत्रिम फूल-मालाएँ, मंदिर या भगवान को सजाने वाली अन्य आर्टिफिशियल वस्तुएँ, अगरबत्ती और कपूर के डिब्बे (जिन पर कभी-कभी भगवान की मूर्तियाँ छपी होती हैं)।
तीर्थयात्रा पर जाने वाले लोग अपने सगे-संबंधियों और मित्रों के लिए महँगे प्रसाद के पैकेट लाते हैं, जिनमें देवी-देवता की आकृति वाले सिक्के या छोटी मूर्तियाँ और तस्वीरें होती हैं। वैष्णो देवी जाने वाले लोग अक्सर चुन्नी खरीदते हैं और उसे सिर पर बाँधकर तस्वीरें खिंचवाते हैं। बहुत से लोग दुर्गा पूजा आदि आयोजनों में भी इनका उपयोग करते हैं। कई संस्थाएँ अपने अनुयायियों को भगवत नाम लिखा हुआ पटका भेंट करती हैं।
किंतु तस्वीरें खिंचवाने और उत्सव बीत जाने के बाद उन वस्तुओं का क्या होता है? लोग उन्हें अलमारी में कुछ दिनों तक सहेज कर रख लेते हैं, और चूँकि वे पवित्र होती हैं, इसलिए उन्हें कचरे में भी नहीं फेंक सकते। फिर… अंततः वे सारी चीजें सड़कों के किनारे, पेड़ों के नीचे या नदियों के पानी में पहुँच जाती हैं।
क्या हम इनके प्रयोग को कम नहीं कर सकते? अगर हम अपने मतलब या काम निकलने के बाद अपने इष्टदेव और आराध्य को इस अपमानजनक स्थिति में पहुँचा सकते हैं, तो क्या हमारे बच्चे अपना मतलब पूरा होने पर अपने बूढ़े माता-पिता को वृद्धाश्रम या कहीं और नहीं पहुँचा सकते? क्या यही संस्कार हम अपनी आने वाली पीढ़ी को दे रहे हैं? क्या हम अपने आराध्य को आदरसहित एक उचित विदाई भी नहीं दे सकते?




