महर्षि अगस्त्य जब रावण के बलपूर्वक लोगों को अधीनस्थ करने की कथा सुना रहे थे, तो श्रीराम विस्मित होकर बोले, “क्या उस समय कोई ऐसा वीर राजा नहीं था जो उसका सामना कर सके?” इस पर अगस्त्य जी ने माहिष्मतीपुरी के राजा अर्जुन की कथा सुनाई।
कार्तवीर्य अर्जुन से पराजय (सर्ग 31)
माहिष्मतीपुरी का ऐश्वर्य स्वर्ग की तरह था। वहाँ अग्निकुंड में सदा अग्नि का निवास रहता था। वहाँ का राजा हैहय वंश का कार्तवीर्य अर्जुन अग्नि के समान परम पराक्रमी था। उसकी एक हजार भुजाएँ थीं। एक दिन वह नर्मदा नदी पर अपनी पत्नियों के साथ जलविहार करने गया। उसी समय उसके शौर्य की चर्चा सुन कर रावण उसके राज्य में आ गया और उसके मंत्रियों से पूछा कि “राजा अर्जुन कहाँ है, मैं उससे युद्ध करूँगा”। राजा को राजधानी में न पाकर वह विंध्याचल पर्वत पर चला आया। उस पर्वत की शोभा देखता हुआ वह नर्मदा नदी पर पहुँचा, जो कि पर्वत से निकल कर पश्चिमी समुद्र में गिरती थी। रमणीय नर्मदा नदी को देख रावण पुष्पक विमान से उतर कर उसमें स्नान कर उसके तट पर बैठ गया। अनायास ही रावण अपने मंत्रियों मारीच, शुक, सारण, प्रहस्त, महोदर, धूम्राक्ष आदि से अपनी प्रशंसा करने लगा। फिर मंत्रियों को भी स्नान करने के लिए कह कर उसने उनसे कपर्दी (शिव) महादेव की पूजा के लिए फूल चुनने के लिए कहा। जल्दी ही बहुत सारे फूल चुन कर मंत्रियों ने उसके सामने रख दिए। रावण जहाँ भी जाता था, उसके राक्षस सोने का शिवलिंग साथ लेकर चलते थे। रावण ने बालू की वेदी बना कर उस पर शिवलिंग रख कर उसकी पूजा की (श्लोक 42, 43)। पूजा के बाद वह शिवलिंग के सामने नृत्य करने लगा।
सर्ग 32
जहाँ रावण शिवलिंग की पूजा कर रहा था, वहाँ से कुछ ही दूरी पर राजा अर्जुन अपनी रानियों के साथ जलविहार कर रहा था। खेल-खेल में ही राजा ने नर्मदा की धारा को रोक दिया। इससे नदी का जल तटों की तरफ फैलने लगा। रावण ने पूजा के लिए जो सामग्री रखी थी, वह भी जलप्रवाह के साथ बहने लगी। रावण अपनी पूजा बीच में ही छोड़ कर उठ कर देखने लगा कि क्या हुआ था। कुछ देर बाद फिर सब कुछ सामान्य हो गया। उसने अपने दाहिने हाथ की अँगुली से संकेत कर शुक और सारण को नदी में आई अचानक बाढ़ का कारण पता करने के लिए कहा। दोनों पश्चिम की तरफ आकाश में उड़ चले। आधे योजन दूर उन्हें राजा दिखा, जिसने अपने हजार हाथों से नदी के जल को रोक रखा था।

शुक और सारण ने आकर रावण को वह समस्त दृश्य बताया। वर्णन सुन कर रावण समझ गया कि वह वही अर्जुन है, जिससे युद्ध की लालसा में वह आया था। वह उसकी तरफ चल पड़ा।
वहाँ पहुँच कर उसने अर्जुन के मंत्रियों से कहा कि वे अपने राजा को उसके युद्ध का आमंत्रण दें। लेकिन मंत्रियों ने कहा कि अभी राजा जलविहार कर रहे हैं, इसलिए रावण कल युद्ध कर ले; यदि वह इसी समय युद्ध करना चाहता है, तो पहले उनके मंत्रियों से युद्ध कर ले।
यह सुनकर रावण के मंत्रियों ने अर्जुन के कितने ही मंत्रियों को मार डाला या मार कर खा डाला। दोनों राजाओं के अनुचरों में युद्ध से नर्मदा के तट पर कोलाहल हो गया।
जब अर्जुन के अनुचर पराजित होने लगे, तो उन्होंने अपने राजा को इसकी सूचना दी। वह तुरंत ही गदा लेकर राक्षस-सेना पर टूट पड़ा। रावण के मंत्रियों के हार जाने के बाद रावण स्वयं अर्जुन के सामने युद्ध के लिए आ खड़ा हुआ। एक हजार हाथ वाले अर्जुन और बीस हाथ वाले रावण के बीच रोमांचकारी युद्ध होने लगा। टक्कर बराबरी का था। अंत में अर्जुन ने गदा का एक भयंकर प्रहार रावण की छाती पर किया। वरदान के प्रभाव से रावण की न तो छाती टूटी, न ही वह मारा गया, किंतु गदा दो टुकड़े होकर जमीन पर गिर पड़ी। पर गदा के तीव्र प्रहार से वह एक धनुष पीछे हट गया और पीड़ा से उसकी चीखें निकल गईं। उसकी यह हालत देख कर अर्जुन ने अपनी भुजाओं से उसे बाँध लिया। रावण उसके बंधन में विवश हो गया। देवताओं और सिद्धों ने अर्जुन पर पुष्प-वर्षा करते हुए उसकी वाहवाही की।
अर्जुन अपनी विजय पर हर्षनाद कर रहा था। इसी समय प्रहस्त की मूर्छा दूर हो गई। प्रहस्त और अन्य कई राक्षस एक साथ अर्जुन पर “छोड़ो-छोड़ो” कहते हुए झपट पड़े। उन सब राक्षसों के प्रहार को नाकाम कर उन्हें भयभीत कर अर्जुन रावण को लेकर अपनी राजधानी पहुँचा। नगरवासियों ने अपने राजा का भव्य स्वागत किया।
सर्ग 33
रावण को एक मनुष्य-राजा कार्तवीर्य अर्जुन द्वारा बंदी बना लिए जाने का समाचार शीघ्रता से फैला। इस समय रावण के पितामह पुलस्त्य स्वर्ग में थे। जब उन्होंने यह समाचार सुना, तो पुत्रस्नेहवश अत्यंत भयभीत हो गए। वे माहिष्मती जा पहुंचे। राजा अर्जुन ने जब तपस्वी पुलस्त्य का आगमन सुना, तो वह उनका स्वागत करने आगे आया। उसने बड़े आदर के साथ ऋषि का सत्कार किया। ऋषि ने कुशल-प्रश्न के बाद अर्जुन की प्रशंसा करते हुए उससे अपने पौत्र रावण को मुक्त कर देने का आग्रह किया। ऋषि का मान रखते हुए आदर सहित न केवल रावण को मुक्त कर दिया, बल्कि उपहारों से उसका स्वागत कर उससे मैत्री की और फिर उसे विदा किया। पुलस्त्य भी अपने पौत्र रावण को विदा कर ब्रह्मलोक चले गए।
अर्जुन ने रावण को ससम्मान विदा किया था, पर पराजय और बंदी बनाए जाने के कारण रावण लज्जित होकर लंका लौटा।
अगस्त्य जी कहते हैं, “हे रघुनंदन! इस प्रकार बलवान से भी अधिक बलवान है; अतएव जो कोई अपना भला चाहे, उसे दूसरों का अपमान करना उचित नहीं है।”
बाली से पराजय (सर्ग 34)
अर्जुन से पराजित होकर रावण लज्जित तो ज़रूर था, पर उसके व्यवहार में कोई अंतर नहीं आया। वह पहले की तरह ही पुष्पक विमान पर अपने मंत्रियों और अनुचरों के साथ घूमता और जिस किसी को शक्तिशाली देखता, उसे युद्ध के लिए ललकारता।
इसी तरह घूमते हुए एक दिन वह किष्किंधापुरी पहुँचा और वहाँ के राजा वानरराज बालि को युद्ध के लिए ललकारा। बालि के मंत्रियों ने उससे कहा कि अभी बालि नहीं हैं, जब तक चारों समुद्रों पर संध्यावंदन कर वे आते हैं तब तक प्रतीक्षा करे; अथवा अगर मरने की जल्दी है, तो दक्षिण समुद्र तट पर चला जाए। रावण मंत्रियों की अवहेलना कर पुष्पक विमान में बैठ कर दक्षिण समुद्र के तट पर चला गया।
दक्षिण तट पर उसने बालि को भगवान की आराधना में लीन देखा। बालि को पकड़ने के लिए वह दबे पाँव चला, पर बालि ने अचानक रावण को देख लिया। वह चुपचाप वैसे ही आराधना करता हुआ खड़ा रहा। राक्षसराज रावण और वानरराज बालि दोनों को ही अपने बल का अभिमान था और दोनों ही एक-दूसरे को पकड़ने की कामना में प्रयासरत थे।
पैरों की आहट से जब बालि ने जान लिया कि रावण उसके हाथ की पहुँच में आ गया है, तो बिना पीछे मुड़े ही अचानक उसने अपना हाथ पीछे कर रावण को पकड़ लिया। बिना कुछ बोले वह उसे अपनी बगल में दबा कर आकाश में उड़ गया। रावण अगर निकलने का प्रयास करता, तो वह उसे और ज़ोर से दबा देता अथवा अन्य प्रकार से पीड़ित कर देता था। अपने स्वामी को इस तरह विवश देख रावण के मंत्री उसे बचाने बालि के पीछे उड़ने लगे। पर बालि बिना इसकी परवाह किए तीव्र गति से उड़ने लगा। रावण के मंत्री उसके वेग की बराबरी नहीं कर सके और रुक गए।
रावण को अपनी बगल में दबाए हुए बालि ने अपने नित्य के क्रम में सभी समुद्रों के तट पर जाकर भगवद-आराधना की। दक्षिण समुद्र से वह पश्चिम समुद्र, फिर उत्तर समुद्र और फिर पूर्व समुद्र पहुँचा। विवश पड़ा रावण सभी जगह उसके साथ था। इतने भारी बोझ को उठा कर इतनी दूर तक चलने के कारण बालि थक तो गया था, पर उसने जो सोचा था वह पूर्ण किया और किष्किंधा के उपवन में पहुँचा। उपवन में पहुँच कर उसने रावण को छोड़ा और हँस कर उससे बोला, “कहिए, आप कहाँ से चले आ रहे हैं?”
थके और घबराए हुए रावण ने अपना परिचय दिया, “मैं राक्षसों का राजा रावण हूँ, तुमसे युद्ध करने की इच्छा से आया था और तुम्हारे द्वारा पकड़ लिया गया। तुम्हारा पराक्रम और बल आश्चर्यजनक है, तुमने मुझे पशुओं की तरह पकड़ कर चारों समुद्रों पर घुमा डाला।” रावण ने बालि के बल की प्रशंसा करते हुए उससे मैत्री की प्रार्थना की। बालि ने इसे मान लिया। तदुपरांत अग्नि प्रज्वलित कर दोनों के मध्य औपचारिक रूप से मैत्री हुई। दोनों किष्किंधा गए। एक महीने तक रावण वहाँ रहा। उसके बाद उसके मंत्री आए और उसे ले गए।
[इस मित्रता का पता राक्षस कबंध को था। इसलिए संभवतः उसने राम-लक्ष्मण को सुग्रीव से मित्रता करने का परामर्श दिया, बालि का नाम नहीं लिया; क्योंकि बालि अग्नि के समक्ष ली गई अपनी शपथ से बँधे होने के कारण रावण से युद्ध में राम का साथ नहीं दे पाता। हाँ, अन्य उपाय द्वारा सीता को लाने का प्रयास कर सकता था। इस तरह बालि राम के मित्र (सुग्रीव) का शत्रु ही नहीं, बल्कि उनके शत्रु (रावण) का मित्र भी था।]
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