शिव का शाब्दिक अर्थ होता है ‘कल्याण करने वाला’। वे एक शांत एवं विरक्त संन्यासी हैं। तो फिर अघोरी, तांत्रिक, योगी, नागा इत्यादि विभिन्न वाममार्गी साधु शिव के उपासक कैसे होते हैं? कौन होते हैं ये साधु? वे ऐसे सभी कार्य क्यों करते हैं जिन्हें हिंदू धर्म में पाप माना जाता है? आज के आलेख में इसे समझने का प्रयास करते हैं।
शिव: एक साधक या संहारक?
मूलतः शिव एक ऐसे विरक्त संन्यासी हैं जिन्हें अपने लिए कुछ नहीं चाहिए, लेकिन दूसरे के कल्याण के लिए वे हमेशा तैयार रहते हैं। समुद्र मंथन से 14 रत्न निकले, उनमें से उन्होंने कुछ नहीं लिया, लेकिन कालकूट विष को अपने गले में धारण कर लिया ताकि सृष्टि का विनाश न हो। वे आशुतोष हैं यानी बहुत जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं।
हालांकि वेदों में भगवान शिव का उल्लेख रुद्र नाम से हुआ है। रुद्र नाम उनकी भयंकर आवाज के कारण उनको दिया गया था और यह उनका रौद्र रूप माना जाता था। लेकिन सती की मृत्यु को छोड़कर उनके अत्यधिक क्रोधित होने का कोई अन्य उल्लेख नहीं है। उन्होंने कुछ राक्षस मारे थे, लेकिन उनसे अधिक राक्षस तो भगवान विष्णु ने मारे थे। फिर नरसिंह के रूप में उन्होंने भी तो भयंकर अवतार लिया था। अगर वे तांडव करते थे, तो वे नटराज यानी कलात्मक नृत्य के देवता भी थे।
भगवान शिव किसका संहार करते हैं?
ब्रह्मा, विष्णु और महेश की त्रिमूर्ति में ब्रह्मा को सृष्टि का कर्ता, विष्णु को पोषक और शिव को संहारक कहा गया। बहुत से लोग मानते हैं कि शिव तांडव करते हैं और तब प्रलय होता है, इसलिए वे विनाशक हैं। लेकिन ऐसी बात नहीं है। संहारक का अर्थ पाप, कर्मफल और भय के संहारक के रूप में लिया गया है।
शिव: हाशिए के और ठुकराए गए प्राणियों के भगवान
विभिन्न कारणों से भगवान वनीय पशु, विषैले जीव-जंतु और वनस्पति, समाज के हाशिए पर रहने वाले समुदाय जैसे चांडाल, भूत-प्रेत इत्यादि से किसी-न-किसी रूप में जुड़े थे। इसके विषय में पिछले आलेख में विस्तार से बताया गया है। सीधे शब्दों में कहें, जिसे कहीं शरण नहीं मिलती थी, वह भी शिव की शरण पा सकता था। इसी कारण उन्हें ‘अशरण शरण’ और ‘आशुतोष’ कहा गया है।
शिव के भयंकर रूप की पूजा

पशुपति और रुद्र के रूप में शिव की चर्चा वेदों में और संभवतः उससे पहले भी मिलती है। फिर भी पाँचवीं शताब्दी तक उनकी पूजा सामान्यतः उनके सौम्य रूप में ही होती थी। मूर्तियों और चित्रों में शिव को हमेशा शिवलिंग के रूप में, एक शांत योगी के रूप में समाधि में, या पार्वती के साथ कैलाश पर शांत बैठे रूप में ही दिखाया जाता था।
लेकिन छठी-सातवीं शताब्दी से कुछ ऐसे शैव समुदायों का उल्लेख मिलने लगता है जो अपने को शिव का आराधक कहते थे, लेकिन उनकी पद्धति प्रचलित पूजा विधि के बिल्कुल विपरीत थी। यहाँ तक कि ये उन चीज़ों को अपने धार्मिक क्रिया-कलापों में मुख्य स्थान देते थे जो साधारणतः हिंदू धर्म में वर्जित थीं। इन्होंने शिव के भयंकर रूप को अधिक प्रचलित किया।
तांत्रिक, अघोरी, नागा एवं योगी आदि मतों का आरंभ
ऐसे समुदायों में सबसे प्रसिद्ध थे निलपट, कालामुख और कापालिक। कालामुख, कापालिक आदि संप्रदाय भी बाद में विचारधारा और अपने धार्मिक अनुष्ठानों के आधार पर बँट गए और थोड़े-बहुत परिवर्तित भी हो गए। यही समुदाय आगे चलकर तांत्रिक कहलाया। इसमें कुछ अधिक अतिवादी समुदाय अघोरी कहलाया। नागा साधु अपनी वेशभूषा के कारण लोगों की उत्सुकता के केंद्र बन गए। लेकिन साधारण लोगों ने इन सबसे अधिक सम्मान योगियों को दिया, जिनमें 84 योगी विशेष प्रसिद्ध हुए। इनमें सबसे प्रसिद्ध थे- मच्छेन्द्रनाथ, गोरखनाथ आदि। उत्तर प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इसी संप्रदाय से हैं और गोरखनाथ मठ के महंत रह चुके हैं।
हालांकि इन सभी में वर्तमान में आपस में मौलिक अंतर है, लेकिन फिर भी कमोवेश ये जिन सिद्धांतों को मानते हैं, उनमें कई ऐसे होते हैं जिन्हें मुख्यधारा के हिंदू धर्म में अधर्म या पाप माना जाता है। इनमें योगी सबसे अधिक मुख्यधारा के करीब हैं, फिर भी वे पूर्णतः शैव भक्तों के जैसे नहीं होते हैं। उदाहरण के लिए, वे तिलक नहीं लगाते जैसा कि त्रिपुंड तिलक शिव के भक्त लगाते हैं। इसलिए मोटे तौर पर इन अतिवादी पंथों को आधुनिक शब्दावली में वाममार्गी पंथ या संत कह दिया जाता है, हालांकि ये संतों की किसी भी परंपरागत परिभाषा में नहीं आते हैं।
हम इनमें से कुछ प्रमुख अतिमार्गी या वाममार्गी पंथों पर विस्तार से बात करेंगे, पर उससे पहले देखते हैं कि सामान्य यानी मुख्यधारा के हिंदू धर्म से ये किस तरह अलग होते हैं।
हिंदू और वाममार्गी पंथों में मौलिक अंतर
- पंच मकार: जैसे सिख लोग ‘पंच ककार’—केश, कड़ा, कच्छा, कृपाण और कंघा—को अपने धर्म का मूल भाग मानते हैं, वैसे ही ये लोग ‘पंच मकार’ को अपने धर्म का मूल मानते थे। ये थे— मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन। कुछ हद तक मुद्रा को छोड़कर अन्य चारों चीज़ें ऐसी थीं जिन्हें मुख्यधारा के धर्म में धर्म-विरुद्ध माना जाता था और कम से कम किसी संत, साधु या संन्यासी से इसकी उम्मीद नहीं की जाती थी। मुद्रा का अर्थ होता है योग की विभिन्न विधियाँ और शारीरिक मुद्राएँ, जिससे वे मानते थे कि उन्हें विशेष शारीरिक और आध्यात्मिक शक्तियाँ मिलती हैं।
- मृत्यु: इन पंच मकार यानी ‘म’ से शुरू होने वाले शब्दों के अतिरिक्त इनमें एक और ‘म’ को जोड़ा जा सकता है, और वह है— मृत्यु। मुख्यधारा के धर्म में मृत्यु को अपवित्र माना जाने लगा था। यहाँ तक कि आरंभ में जिन समुदायों को अपवित्र या अछूत माना गया था, वे सभी मृत्यु से ही जुड़े हुए थे। वास्तव में भारत में ‘अछूत’ का कॉन्सेप्ट मृत्यु से ही जुड़ा था। पहले वर्ण थे, लेकिन किसी वर्ण को अछूत नहीं कहा गया था, शूद्र को भी नहीं। विदुर शूद्र थे, लेकिन अछूत नहीं। चांडाल, डोंब और पारशव पहले ऐसे तीन समुदाय थे जिन्हें ‘अछूत’ कहा गया, ये सभी मृत्यु से जुड़े हुए थे। बाद की शताब्दियों में अछूत का यह विचार और गहरा हुआ। आज भी यदि कोई मृतक संस्कार कर श्मशान से लौटता है, तो उसे बिना नहाए घर में प्रवेश नहीं दिया जाता है। हो सकता है यह पहले संक्रमण रोकने के लिए हो, या मृत्यु के डर की वजह से हो, लेकिन सामाजिक दृष्टि से इसके बहुत दुष्परिणाम भी हुए। लेकिन कापालिक, कालामुख जैसे समुदाय मृत्यु को लेकर बड़े फैसिनेटेड थे। वे मृत्यु से जुड़ी चीज़ों को पवित्र मानते थे। श्मशान, शवों की भस्म, इंसानों के कंकाल, नरमुंड आदि उनके लिए पवित्र थे और उनके धार्मिक अनुष्ठानों में इनका प्रयोग होता था।
- सामाजिक समरसता: ये वाममार्गी पंथ सामाजिक भेदभाव को नहीं मानते थे।
- स्त्री को महत्व: स्त्री देवी को महत्त्व देना, स्त्रियों के मासिक चक्र को पवित्र मानना आदि भी ऐसे ही विचार थे।
- भगवान के रौद्र रूप की आराधना: इसी तरह भगवान के क्रुद्ध रूप की सामान्यतः पूजा नहीं की जाती है, लेकिन ये लोग करते थे।
- काम, क्रोध, लोभ आदि से दूरी: ऋषि-मुनियों के लिए क्रोध से रहित होना ज़रूरी होता था। विश्वामित्र को तब तक ब्रह्मर्षि नहीं माना गया जब तक कि उनमें क्रोध रहा। जब वे राजा दशरथ से राम को माँगने आते हैं, तो कहते हैं कि राक्षसों का संहार तो मैं स्वयं भी कर सकता हूँ, लेकिन मैंने जो अनुष्ठान शुरू किया हुआ है, उसमें क्रोध करना मना है। दुर्वासा जैसे कुछ उदाहरणों को छोड़ दें, तो साधारणतः क्रोध ऋषियों के लिए उचित नहीं था। इसी तरह धर्म-विहित काम-संबंध और जीविकोपार्जन की उनसे अपेक्षा की जाती थी। अगर भिक्षा या दान से जीवन चलता हो, तो उतना ही माँगना चाहिए था जितना जीने के लिए ज़रूरी हो। लेकिन वाममार्गी संत इन सब में रिलैक्स होते हैं।
- नग्नता: हिंदू धर्म में यहाँ तक कि स्नान के समय भी निर्वस्त्र होना अधर्म माना गया है। अगर बालक संन्यासी है तो लंगोट, और अगर बड़ा है तो जहाँ तक हो सके मृगचर्म या किसी तरह का कोई न कोई वस्त्र पहनते ही थे ऋषि-मुनि। लेकिन नागा साधु हमेशा निर्वस्त्र रहते हैं।
- नशा: चूँकि ये वे लोग थे जो किसी भी सामाजिक और धार्मिक नियमों को नहीं मानते थे। ये सामाजिक और पारिवारिक बंधनों को छोड़ चुके थे। ये अपनी ही बेमकसद ज़िंदगी में मस्त रहते थे। पर इनकी यह मस्ती भजन-कीर्तन से होने वाली सात्विक मस्ती नहीं, बल्कि नशा और बेपरवाह ज़िंदगी से मिलने वाली मस्ती थी। मुख्यधारा में नशा को महापाप माना जाता था, पर ये लोग मद्य ही नहीं बल्कि किसी भी तरह के नशे के प्रयोग से बाज नहीं आते थे। मद्य यानी शराब के अतिरिक्त भांग, गांजा और चिलम आदि का भी प्रयोग करते थे, जिनका भगवान शिव से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है। आम लोग अपने शरीर को सजाते-संवारते हैं, लेकिन ये अपना रूप भयंकर और अनोखा बनाते थे और अपने को शिव के भूत-प्रेत की तरह देखते थे।
- अन्य रीति-रिवाज: इसी तरह अपने को आघात पहुँचाना, दंड या डंडे के अलावा कोई अन्य भौतिक हथियार रखना, स्नान नहीं करना, इत्यादि अनेक ऐसी बातें हैं जिन्हें मुख्यधारा में धर्म-विरुद्ध माना जाता था। ऋषि-मुनियों के आश्रम में कभी जीव-हत्या नहीं होती थी। यजमान यज्ञ करते थे, जिसमें ज़रूर जीव-हत्या होती थी, लेकिन ब्राह्मणों या ऋषि-मुनियों द्वारा बलि नहीं दी जाती थी। अथर्ववेद में जादू-टोने का ज़िक्र है, लेकिन इसे पाप बताया गया है। मौर्य काल में जादू-टोना करना अपराध घोषित कर दिया गया था और इसके लिए राजकीय दंड भी दिया जाता था, लेकिन तांत्रिक या अन्य वाममार्गी पंथों ने इसे अपनाया था।
आम शिव भक्त त्रिपुंड तिलक यानी तीन क्षैतिज रेखाओं वाला तिलक लगाते हैं। नियमित स्नान और शरीर की स्वच्छता का ध्यान रखते हैं। शुद्ध-अशुद्ध एवं भक्ष्य-अभक्ष्य का विचार करते हैं। उनके लिए पूजा का समय सुबह और शाम होता है, किंतु वाममार्गी इनमें से कुछ नहीं करते। इनके लिए पूजा का सबसे उपयुक्त समय आधी रात का होता है, जिसे ये लोग निशा पूजा कहते हैं। साधु-संन्यासों को क्रोध और हिंसा से दूर रहना चाहिए, ऐसे विचार उन्हें पसंद नहीं हैं; वे हथियार भी रखते हैं।
इतिहासकारों के विचार
मूल धर्म के बिल्कुल उल्टे सिद्धांत अपनाने के कारण इतिहासकार रोमिला थापर मानती हैं कि यह प्रचलित धर्म के विरुद्ध एक तरह का विद्रोह था। इन पर बौद्ध धर्म की वज्रयान शाखा (जो कि तांत्रिक मत का ही एक रूप है) और शाक्त मत का भी प्रभाव माना जाता है।
मुख्यधारा हिंदू धर्म और वाममार्गी पंथ
यहाँ दो बातें बड़ी महत्वपूर्ण हैं:
- ये लोग ऐसे सारे काम करते थे जो मुख्यधारा के विपरीत थे। पर हमारी संस्कृति इतनी सक्षम है कि विरोध को समेटकर एक कर लेती है। इसलिए कभी भी इन लोगों का मुख्यधारा के शिव भक्तों से कोई टकराव नहीं हुआ। बल्कि कठिन साधना और आध्यात्मिक शक्तियों के कारण उन्हें सम्मान दिया गया और शिव के रौद्र रूप के उपासक के रूप में मुख्यधारा ने उन्हें सहज ही स्वीकार कर लिया।
- ये लोग भले ही अलग और रहस्यवादी क्रियाएँ करते थे, लेकिन योग, आयुर्वेद और धातु विज्ञान में महारत के कारण इन्हें कुछ चमत्कारिक शक्तियाँ भी मिल जाती थीं जिन्हें ‘सिद्धि’ कहा जाता था। उदाहरण के लिए— हवा या पानी पर चलना, आग से न जलना, चीज़ों को गायब कर देना या फिर गायब चीज़ों को खोज लेना, तंत्र-मंत्र या जादू-टोना, वशीकरण, बीमारियों को ठीक कर देना, इत्यादि। हठयोगी कई तरह की ऐसी क्रियाएँ करते थे जो सामान्य लोगों के वश की बात नहीं होती थीं, जैसे एक लंबे समय तक बिना खाए रहना या किसी विशेष स्थिति में रहना आदि।
आम लोग इनकी इन चमत्कारिक शक्तियों से एक तरफ प्रभावित होते थे, तो दूसरी तरफ डरते भी थे। ज़्यादातर लोग इनकी चमत्कारिक शक्तियों के कारण ही अपनी समस्याओं के समाधान के लिए उनके पास जाते थे या फिर उनके प्रति उत्सुकता के कारण। सम्मान से ज़्यादा उनके प्रति लोगों में आश्चर्य, डर, रोमांच और उत्सुकता हुआ करती थी। उनकी कठिन साधना सभी लोगों के वश की बात नहीं थी, इसलिए ये कभी मुख्यधारा के अंग नहीं बन पाए, पर एक छोटे समुदाय के रूप में ही सही, उनकी उपस्थिति बनी रही।
अभी हम जिन वाममार्गी साधुओं को देखते हैं, उनमें सबसे प्रमुख हैं— तांत्रिक, अघोरी, नागा और योगी, हालांकि इनके कई उपसंप्रदाय भी हैं। इनके विषय में हम आगे के आलेख में विस्तार से बात करेंगे।




