वाल्मीकि रामायण के उत्तरकांड में एक अत्यंत संवेदनशील और विचारणीय प्रसंग आता है— शंबूक वध। उत्तरकांड की कथा के अनुसार, श्रीराम के न्यायप्रिय और धर्मनिष्ठ शासनकाल में एक वृद्ध ब्राह्मण रोते हुए अपने मृत बालक का शव लेकर राजसभा के द्वार पर आया।
उस ब्राह्मण का कहना था कि श्रीराम के राज्य में अकाल मृत्यु होना असंभव है; अवश्य ही राज्य में कहीं न कहीं कोई अनधर्म या मर्यादा का उल्लंघन हो रहा है, जिसके कारण उसके निर्दोष पुत्र की मृत्यु हुई है।
अकाल मृत्यु का कारण और नारद जी का परामर्श
ब्राह्मण के विलाप को सुनकर श्रीराम ने तुरंत अपनी राजसभा में इस विषय में विचार -विमर्श किया। जब विमर्श चल ही रहा था तभी महर्षि नारद वहाँ पधारे। नारद जी ने काल-चक्र और युग-धर्म का वर्णन करते हुए श्रीराम को बताया:
- युग-धर्म का नियम: सत्ययुग और त्रेतायुग में तपस्या और साधना के नियम अत्यंत कठोर थे। त्रेतायुग में केवल ब्राह्मणों और क्षत्रियों को ही उग्र तपस्या करने का अधिकार प्राप्त था।
- असमय तपस्या: नारद जी ने बताया कि आपके राज्य में शंबूक नाम का एक शूद्र व्यक्ति, बिना आवश्यक पात्रता और विधि-विधान के, स्वर्गलोक को शरीर सहित प्राप्त करने के लिए अधोमुख (उल्टा लटककर) घोर तपस्या कर रहा है।
- मर्यादा भंग: युग-धर्म की मर्यादा का उल्लंघन होने के कारण ही राज्य में अव्यवस्था फैली और उस ब्राह्मण बालक की अकाल मृत्यु हुई।
शंबूक से श्रीराम की भेंट और वध
नारद जी की बात सुनकर श्रीराम अपने पुष्पक विमान पर सवार होकर तपस्वी की खोज में निकले। उत्तर दिशा से होते हुए वे शैवाल पर्वत के पास पहुँचे। वहाँ उन्होंने एक तपस्वी को पेड़ से उल्टा लटककर घोर तप करते देखा।
श्रीराम ने अत्यंत आदरपूर्वक उस तपस्वी से पूछा, “हे सुव्रत! तुम किस कुल में उत्पन्न हुए हो और किस उद्देश्य से इतनी कठोर तपस्या कर रहे हो? सत्य कहो, मैं रघुकुलपति राम हूँ।”
तपस्वी ने उत्तर दिया, “हे राम! मैं शूद्र जाति में उत्पन्न हुआ हूँ और मेरा नाम शंबूक है। मैं देवलोक (स्वर्ग) पर विजय प्राप्त करने और सशरीर स्वर्ग जाने की इच्छा से यह तपस्या कर रहा हूँ।”
शंबूक के मुख से यह सुनते ही श्रीराम ने अपनी खड्ग (तलवार) निकाली और उसका सिर धड़ से अलग कर दिया।
बालक का पुनर्जीवन और प्रसंग का संदेश
शंबूक का वध होते ही देवताओं ने आकाश से पुष्पवर्षा की और श्रीराम के इस कार्य की सराहना की। इसके तुरंत बाद वह मृत ब्राह्मण बालक पुनर्जीवित हो गया।
जैसे सीता की परीक्षा और निर्वासन के कारण राम को स्त्री विरोधी माना जाने लगा उसी तरह शंबूक की हत्या के कारण उन्हें शूद्र विरोधी भी कई लोग मानते हैं। शंबूक वध का प्रसंग रामायण के विवादास्पद उत्तरकाण्ड में है। कथा के अनुसार शंबूक की हत्या राम के केवल इस कारण कर दिया कि वह शूद्र होकर भी तपस्या कर रहा था। पर अधिकांश शोधकर्ता इस प्रसंग को बाद में जोड़ा गया मानते हैं, मूल वाल्मीकि रामायण का भाग नहीं।
शंबूक प्रसंग के संबंध में विवाद
उत्तरकाण्ड के अधिकांश प्रसंग की तरह शंबूक प्रसंग को भी रामायण में बाद जोड़ा गया अंश माना जाता है। ऐसा मानने के निम्नलिखित कारण हैं:
1. संपूर्ण उत्तरकाण्ड या कम-से-कम उसका अधिकांश भाग कई प्रमाणों के आधार पर रामायण का मूल भाग नहीं बल्कि बाद में जोड़ा गया भाग माना जाता है। उत्तरकाण्ड की भाषा, लेखन शैली और विचार अन्य कांड से बहुत भिन्न हैं।
2. शंबूक प्रसंग रामायण के अन्य प्रसंगों में व्यक्त विचारों से बिलकुल अलग है। रामायण के अन्य किसी कांड में शूद्र के प्रति ऐसे किसी विचार का प्रतिपादन नहीं किया गया। कुछ प्रसिद्ध उदाहरण इस प्रकार हैं:
(1) शबरी, जो कि शबर जाति की भील यानि कि शूद्र थी, को राम ने उच्च आदर दिया। उनके यहाँ भोजन किया। राम ही नहीं उनसे पहले मतंग आदि ऋषियों ने भी उन्हें निस्वार्थ सेवा और आध्यात्मिक जिज्ञासा के कारण बहुत आदर दिया था। मतंग ऋषि स्वयं ब्राह्मण माता और नाई पिता की संतान थे।
(2) श्रवण कुमार के पिता को वैश्य और माता को शूद्र कहा गया है। वे दोनों मुनि की तरह तपस्या करते थे। राजकुमार दशरथ सहित अन्य लोग भी उन्हें मुनि की तरह सम्माननीय मानते थे।
(3) दशरथ के प्रधान मंत्री सुमंत्र सूत जाति में उत्पन्न थे। सूत रथ चलाने और उसकी मरम्मत करने वाली जाति थी। वैदिक काल में इसे सम्मानीय स्थान प्राप्त थे लेकिन बाद में श्रम की महता घटने के साथ-साथ शारीरिक श्रम करने वाले समुदायों/जातियों का स्थान समाज में निम्न होता गया और सूत शूद्र की श्रेणी में पहुँच गया। लेकिन सुमंत्र अयोध्या के प्रधान मंत्री और राजा दशरथ का सबसे प्रिय मित्र थे। उन्हें किसी भी समय राजमहल के किसी भी स्थान में जाने की अनुमति थी। वे राम के समय में भी इसी पद पर बने रहे थे। राम चारों भाई उन्हें पिता की तरह आदर देते थे। राम का वनगमन, भरत का राम को लाने के लिए वन गमन, राम का अयोध्या में स्वागत जुलूस, सीता का निर्वासन आदि सभी महत्वपूर्ण समय पर रथ सुमंत्र ने ही चलाएँ थे।
(4) राम ने संपूर्ण रामायण में व्यक्ति के चरित्र और कर्तव्य को महत्व दिया है, उसके जन्म को नहीं। उनके मित्र मण्डली में अनेक जाति के मित्र थे। निषादराज उनका परम मित्र थे। यह मित्रता गुरुकुल से शुरू हुई जो कि आजीवन चलता रहा।
(5) राम के राज्य में किसी भी प्रजा को किसी भी तरह का दैविक, दैहिक और भौतिक कष्ट नहीं होने का वर्णन है। अगर सीता के निर्वासन वाले भाग को सत्य माने (हालाँकि शंबूक की तरह यह भाग भी बाद में जोड़ा गया ही लगता है) तो प्रजा के एक व्यक्ति (लोकप्रिय रूप से एक धोबी, पर रामायण में “धोबी” नहीं लिखा है) द्वारा गलत कहने से अपनी प्रिय पत्नी को जिस राम ने निर्वासित कर दिया, जो राम एक कुत्ते को न्याय देने के लिए भी सभाभवन में जाते हैं, वो वैश्यों और शूद्रों की इतनी बड़ी संख्या के दुखों से अप्रभावित रहें, यह स्वाभाविक नहीं लगता है।
(6) राम के अंत से समय उनके साथ एक विशाल प्राणी समूह ने सरयू में जल समाधि ले ली। इसमें मनुष्य ही नहीं बल्कि पशु-पक्षी आदि भी शामिल थे। उनके परिवार के सदस्यों के अलावा प्रजा के लोग भी उनके साथ थे, जो किसी भी हाल में राम के बिना जिंदा नहीं रहना चाहते थे। राम के बहूत समझाने पर भी वे नहीं माने। अगर प्रजा का इतना बड़ा समूह किसी राजा के साथ अपनी जान देने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ हो तो वह राजा समस्त प्रजाजन में अत्यंत लोकप्रिय रहा होगा। उनके साथ जल समाधि लेने वालों में शूद्र और वैश्य जाति के उनके सेवक भी थे। तपस्या करने के लिए किसी शूद्र की हत्या करने वाले राजा के लिए प्रजा, विशेष कर वैश्य और शूद्र प्रजा, का ऐसा भाव संभव नहीं होता।
(7) समस्त रामायण में तपस्वी शूद्र को सम्मान दिया गया है। अचानक उत्तर

काण्ड में एक ऐसा कथा आता है, जिसमे तपस्या करने के अपराध में “मृत्युदंड” राम द्वारा दिया जाता है। यह कथा का मूल भाग नहीं है। बल्कि राजा के रूप में राम के कुछ कार्यों का वर्णन करते हुए यह कथा सुनाया गया है। स्पष्टतः बाद के समय में शूद्रों को दमित करने के लिए इस कथा को रामायण में शामिल किया गया होना अधिक समीचीन प्रतीत होता है।
एक अन्य दृष्टिकोण
आधुनिक संदर्भ में इस कथा को अक्सर जातिगत दृष्टि से देखा जाता है, किंतु कुछ वाल्मीकि रामायण के मर्मज्ञ विद्वानों के अनुसार:
- श्रीराम का यह कार्य किसी जाति विशेष के प्रति द्वेष नहीं, बल्कि युग-धर्म और राज्य व्यवस्था (Law & Order) की रक्षा के लिए था।
- राजा का प्रथम कर्तव्य संपूर्ण प्रजा के अधिकारों और मर्यादा की रक्षा करना होता है। शंबूक का उद्देश्य व्यक्तिगत अहंकार और स्वर्ग पर अधिकार जमाना था, जिसके कारण समाज में संतुलन बिगड़ रहा था।
