गोपियों की कृष्णभक्ति
गोपियों की कृष्णभक्ति कृष्ण के चरित का एक ऐसा पक्ष है, जो महाभारत सहित अनेक युद्ध करने वाले महान योद्धा, रणनीतिकार, अजेय नारायणी सेना के संगठनकर्ता और गीता के रचनाकार श्रीकृष्ण के चरित के मधुर पक्ष को उजागर करता है। साथ ही, कुछ लोग उनके चरित पर प्रश्न भी खड़े करते हैं।
गोपियों की कृष्णभक्ति: अनेक व्याख्याएँ
गोपियों की कृष्णभक्ति और उनके प्रति प्रेम की अनेक प्रकार से व्याख्या की गई है। सगुण उपासक गोपियों को कृष्ण की भक्ति और प्रेम का प्रकट रूप मानते हैं, जबकि निर्गुण उपासक गोपियों को आत्मा और कृष्ण को परमात्मा के प्रतीक के रूप में देखते हैं।
साहित्य में इनके लिए ‘गोपी’ शब्द आया है, जो ‘गोप’ (यानी ग्वाले) का स्त्रीलिंग है। गोपी का तात्पर्य गोप-कन्याओं और गोप-पत्नियों से है। साहित्य में इन गोपियों में सबसे प्रमुख रूप में राधा का निरूपण हुआ है। राधा-कृष्ण की जोड़ी को मध्यकाल के कवियों और लेखकों ने विशेष लोकप्रिय बना दिया, लेकिन भागवत महापुराण में राधा या किसी अन्य विशेष प्रेमिका का नाम नहीं है और न ही उनके किसी तरह के प्रेम-प्रसंग का उल्लेख मिलता है।
भागवत में एक सामान्य वर्णन है, जिससे पता चलता है कि सभी गोपियाँ कृष्ण से अगाध स्नेह करती थीं और गोप-कन्याएँ उन्हें पति रूप में पाना चाहती थीं। गोपियों के वस्त्र चुराने और रासलीला—इन दो प्रसंगों के आधार पर उनकी प्रेमी और रसिक की छवि बनाई गई है।
यह भी ध्यातव्य है कि कृष्ण बाल्यकाल तक ही गोपियों के पास रहे थे। किशोरावस्था में वे मथुरा चले गए और फिर कभी ब्रज वापस नहीं लौटे। इन गोपियों से उनकी दोबारा भेंट प्रणावस्था में तब हुई, जब ब्रज और द्वारका दोनों स्थानों के लोग सूर्यग्रहण के स्नान के लिए एक तीर्थ में एकत्रित हुए थे। इस समय तक कृष्ण द्वारका बसा चुके थे और उनके विवाह हो चुके थे। गोपियाँ उनकी पत्नियों से भी मिली थीं।
भागवत में गोपियों की कृष्णभक्ति का वर्णन

भागवत में गोपियों की कृष्णभक्ति और प्रेम का कई बार वर्णन आया है। उपर्युक्त दो प्रसंगों के अतिरिक्त अन्य सभी प्रसंग शुद्ध आत्मिक प्रेम के हैं। श्रीकृष्ण, बलराम और ग्वालबालों के साथ गायें चराने जाते थे और अपनी वंशी पर मधुर तान छेड़ते थे। श्रीकृष्ण की वह मधुर वंशी भक्तों में भगवान के प्रति प्रेम-भाव और उनके मिलन की आकांक्षा को जाग्रत करने वाली थी।
इस वंशी-ध्वनि को सुनकर गोपियों का हृदय प्रेम से परिपूर्ण हो जाता था। इन गोपियों में सभी उम्र की गोप-पत्नियाँ और गोप-कन्याएँ शामिल थीं, जिनमें कुछ विवाहित थीं और कुछ अविवाहित।
गोपियाँ एकांत में अपनी सखियों से कृष्ण के रूप-गुण और उनकी वंशी की ध्वनि के प्रभाव का वर्णन करने लगती थीं। ब्रज की गोपियाँ उस ध्वनि का वर्णन करना तो चाहती थीं, किंतु वंशी का स्मरण होते ही उन्हें कृष्ण की याद आ जाती थी और कृष्ण का स्मरण आते ही उनसे मिलने की उनकी आकांक्षा और भी बढ़ जाती थी। फिर वे मन-ही-मन वहीं पहुँच जाती थीं जहाँ श्रीकृष्ण थे।
इस परमानंद में मग्न होने के कारण उनकी वाणी उसका पूरा वर्णन करने में असमर्थ हो जाती थी। गोपियाँ आपस में कृष्ण के संबंध में बातचीत करने लगतीं। उनका तरह-तरह से वर्णन करते-करते वे कृष्ण की लीलाओं और कृष्ण-प्रेम में पूरी तरह तन्मय हो जाती थीं।
युगल गीत
दिन में जब श्रीकृष्ण गाय चराने वन में चले जाते थे, तब वह समय गोपियों के लिए बहुत कठिन हो जाता था। वे मन-ही-मन उनका निरंतर चिंतन करती रहती थीं और वाणी से उनकी लीलाओं का गान करती रहती थीं। गोपियाँ आपस में केवल उन्हीं के बारे में बातें करती रहती थीं। इस प्रकार उनका मन हर पल श्रीकृष्ण में ही लगा रहता था और वे पूरी तरह ‘कृष्णमय’ हो गई थीं।
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