संस्कृत साहित्य में प्याज
प्याज को जब हम क्षैतिज रूप से काटते हैं, तो उसकी आकृति चक्र की तरह होती है। जब हम उसे लंबवत यानी खड़े रूप से काटते हैं, तो उसकी आकृति शंख की तरह होती है। शंख और चक्र दोनों ही भगवान विष्णु के प्रिय आयुध हैं, जो हमेशा उनके हाथों में रहते हैं। यही कारण है कि प्याज का एक संस्कृत नाम ‘कृष्णावल’ भी है।
आयुर्वेद कहता है कि प्याज और लहसुन के बहुत सारे औषधीय गुण भी हैं। तो एक तरफ जहाँ प्याज-लहसुन के इतने गुण बताए गए हैं और इसे भगवान के नाम के साथ जोड़ा गया है, वहीं दूसरी तरफ हमारे व्रत-त्योहारों और पूजा-पाठ में इसे वर्ज्य (निषिद्ध) माना गया है। भगवान को भोग लगाने में इसका प्रयोग नहीं किया जाता है।
तो आज हम इस कारण को पाँच अलग-अलग दृष्टिकोणों से समझेंगे:
- पुराण इसके बारे में क्या कहते हैं (पौराणिक कथाएं एवं मान्यताएं)?
- इतिहास क्या कहता है?
- आयुर्वेद क्या कहता है?
- आहार संबंधी हमारी शास्त्रीय मान्यताएं क्या कहती हैं?
- इसका व्यावहारिक पहलू क्या है?
प्याज-लहसुन की उत्पत्ति की पौराणिक कथाएं

प्याज और लहसुन से संबंधित सबसे प्रसिद्ध कथा समुद्र मंथन से जुड़ी हुई है। समुद्र मंथन देवता और दानवों दोनों ने मिलकर किया था। इस मंथन में बहुत सी चीजों के साथ अमृत भी उत्पन्न हुआ। इस अमृत के लिए देवता और दानव दोनों लड़ने लगे। इस झगड़े को शांत करने के लिए भगवान विष्णु ने एक बहुत ही सुंदर मोहिनी स्त्री का रूप धारण कर वहाँ प्रकट होकर सबको पंक्ति में बैठ जाने को कहा, ताकि वे सबको अमृत बाँट सकें।
भगवान ने अमृत बाँटने का कार्य देवताओं से शुरू किया। जब वे लगभग सारे देवताओं को अमृत दे चुके थे, तब दैत्यों की पंक्ति में बैठे हुए एक दैत्य को शंका हुई कि कहीं देवता उनसे बेईमानी न करें और सारा अमृत देवताओं में ही समाप्त हो जाए। इसलिए वह रूप बदलकर देवताओं की पंक्ति में जाकर बैठ गया।
जैसे ही वह बैठा और मोहिनी रूपधारी विष्णु अमृत बाँटते हुए उसके पास आए, तो पास ही बैठे सूर्य और चंद्रमा ने उसे पहचान लिया और भगवान विष्णु को इसकी सूचना दे दी। तब तक विष्णु भी बात समझ चुके थे, लेकिन अमृत मुख में जा चुका था। जल्दी से उन्होंने अपने चक्र से उस दैत्य का गर्दन धड़ से अलग कर दिया।
चूँकि अमृत उसके गले तक पहुँच चुका था, इसलिए वह मरा नहीं। भगवान विष्णु के चक्र से उसका सिर और धड़ अलग हो गया, लेकिन वह जीवित रहा। उसके सिर वाले भाग को ‘राहु’ और धड़ वाले भाग को ‘केतु’ कहा गया। उसका गला कटने से खून की कुछ बूँदें जमीन पर गिर गईं।
गिरे हुए खून के अंश से ‘प्याज’ और मांस के अंश से ‘लहसुन’ की उत्पत्ति हुई। चूँकि इनमें अमृत का अंश है, इसलिए इसमें औषधीय गुण बहुत सारे हैं, लेकिन दानव के खून और मांस से उत्पन्न होने के कारण इसे अशुद्ध माना गया।
यह तो प्याज-लहसुन की उत्पत्ति की सबसे लोकप्रिय पौराणिक कथा है। इसके अलावा कुछ दंतकथाएँ भी देश के अलग-अलग भागों में प्रचलित हैं, जैसे—ऋषि के मलमूत्र से पैदा होना, कुत्ते के नाखून से पैदा होना आदि।
आयुर्वेद का प्याज-लहसुन के प्रति विचार
आयुर्वेद इन्हें औषधि की श्रेणी में रखता है, लेकिन इसके अति प्रयोग को वर्जित करता है। आयुर्वेद के अनुसार ये दोनों जमीन के अंदर उगने वाले कंद हैं। इनका उपयोग औषधि और मसाले के रूप में उचित है, पर सब्जी के रूप में यानी अधिक मात्रा में इनका सेवन उचित नहीं है।
इसका कारण यह है कि इनमें एंटीऑक्सीडेंट और रोग प्रतिरोधक गुण तो होते हैं, लेकिन इनकी तासीर गर्म होती है। ज्यादा मात्रा में सेवन करने पर ये शरीर में गर्मी को बढ़ावा देते हैं।
इतिहासकारों की विचारधारा
इतिहासकारों का कहना है कि प्याज और लहसुन भारतीय मूल की उपज नहीं हैं। यह वनस्पति बाहर से यानी विदेशियों के साथ हमारे देश में लाई गई है। यही कारण है कि हमारे प्राचीन वैदिक साहित्य (वेद और वेदांग) में प्याज और लहसुन का वर्णन नहीं मिलता है। इनकी चर्चा सबसे पहले पुराणों में मिलती है।
आहार के संबंध में शास्त्रीय धारणा
हमारे शास्त्रों में आहार को तीन श्रेणियों में बाँटा गया है—सात्विक, रजोगुणी और तामसिक। ऐसा माना जाता है कि हमारे भोजन का प्रभाव हमारे व्यवहार और सोच पर पड़ता है।
- सात्विक भोजन: इसमें ऐसे भोजन आते हैं जो वनस्पति से प्राप्त होते हैं। उनमें बहुत अधिक तीखापन या सुगंध नहीं होनी चाहिए, क्योंकि तेज सुगंध भोजन की लालसा को बढ़ावा देती है। ऐसा भोजन उन लोगों के लिए उचित माना जाता था जो शारीरिक श्रम से अधिक मानसिक कार्य करते थे और जिन्हें लंबे समय तक एकाग्र होकर बैठना पड़ता था (जैसे—पुजारी, लेखक, अध्यापक, विद्यार्थी आदि)। मानसिक कार्य के लिए मस्तिष्क की शांति और एकाग्रता जरूरी होती है।
- रजोगुणी भोजन: इसमें ऐसे भोजन आते हैं जो वनस्पति से तो प्राप्त होते हैं, लेकिन उनमें ऊर्जा और तीव्र सुगंध अधिक होती है। ऐसे भोजन की तासीर गर्म हो सकती है। इस भोजन का प्रभाव यह होता है कि व्यक्ति उत्साह और ऊर्जा का अनुभव करता है। ऐसा भोजन उन लोगों के अनुकूल था जो शारीरिक कार्य करते थे (जैसे—सैनिक, किसान आदि)।
- तामसिक भोजन: ऐसे भोजन होते हैं जिनमें हिंसा शामिल हो और जो पचने में बहुत गरिष्ठ हों। ऐसा भोजन व्यक्ति में क्रोध और उत्तेजना को बढ़ावा देता है।
उचित भोजन व्यवसाय के आधार पर तय किया जाता था, जन्म के आधार पर नहीं। पर चूँकि व्यवसाय सामान्यतः जन्म, जाति और वर्ण पर निर्भर करता था, इसलिए कई बार ऐसा लगता है कि भोजन वर्ण के आधार पर है, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं था। यदि कोई ब्राह्मण आजीविका के लिए सैनिक वृत्ति अपनाता था, तो उससे यह उम्मीद नहीं की जा सकती थी कि वह सात्विक भोजन कर यह कार्य करे। इसी प्रकार क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र यदि ब्राह्मण वृत्ति अपनाते थे, तो उनसे सात्विक भोजन की अपेक्षा की जाती थी।
प्याज-लहसुन को रजोगुणी भोजन की श्रेणी में रखा गया है। ब्राह्मण, अध्यापक, लेखक, विद्यार्थी, ब्रह्मचारी, पुजारी इत्यादि के लिए प्याज-लहसुन वर्जित किया गया है। किसी भी पूजा-पाठ, सावन महीने, नवरात्रि, पर्व-त्योहार या अनुष्ठान के दौरान ऐसे लोगों को भी प्याज-लहसुन जैसी राजोगुणी चीजें और मांसाहार निषिद्ध किया जाता है, जो सामान्यतः इन्हें खाते हैं। इसका कारण यह है कि ऐसे समय में उन्हें शांतचित्त और एकाग्र होकर लंबे समय तक बैठना पड़ सकता है, और गरिष्ठ तथा गर्म तासीर का भोजन इसमें बाधा बन सकता है।
यह प्याज-लहसुन न खाने का व्यावहारिक पक्ष है। इसलिए, केवल प्याज-लहसुन खाने से कोई पाप लग जाता है, ऐसी बात नहीं है; बल्कि बात यह है कि ये चीजें आपके मानसिक संतुलन, एकाग्रता औरिक कार्यों में बाधा उत्पन्न कर सकती हैं।




