उत्तरकांड की विषय-वस्तु और ऐतिहासिक-साहित्यिक विवाद | Valmiki Ramayan Uttarkand – Part 61

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वाल्मीकि रामायण का अंतिम कांड  ‘उत्तरकांड’ कहलाता है। श्रीराम के राज्याभिषेक के उपरांत (उत्तरवर्ती) घटित अथवा वर्णित घटनाओं का समावेश होने के कारण इसे यह नाम दिया गया है।

जहाँ युद्धकांड तक की कथा श्रीराम के राज्याभिषेक एवं रामराज्य की स्थापना पर जाकर पूर्ण हो जाती है, वहीं उत्तरकांड में कई ऐसी घटनाओं का वर्णन मिलता है, जो श्रीराम के जीवन और चरित्र को लेकर शताब्दियों से विवाद का कारण बनी हुई हैं।

1. उत्तरकांड की मुख्य विषय-वस्तु (सर्ग 1 – 41)

(क) महर्षि अगस्त्य द्वारा रावण एवं राक्षसों के इतिहास का वर्णन (सर्ग 1 – 36)

राज्याभिषेक के पश्चात् महर्षि अगस्त्य एवं अन्य ऋषिगण श्रीराम की सभा में पधारते हैं। श्रीराम के पूछने पर महर्षि अगस्त्य रावण और उसके वंश का विस्तार से वर्णन करते हैं:

पुलस्त्य और विश्रवा का वंश: रावण के दादा महर्षि पुलस्त्य की तपस्या, पिता विश्रवा का जन्म, और कुबेर के जन्म तथा लंका पर उनके प्रारंभिक अधिकार की कथा।

राक्षस वंश और विष्णु जी का संग्राम: भगवान शिव के परामर्श से देवताओं द्वारा भगवान विष्णु से प्रार्थना, विष्णु जी द्वारा राक्षसों का संहार तथा राक्षसों का पाताल लोक में प्रवेश।

रावण और उसके परिवार की कथा: रावण, कुंभकर्ण एवं विभीषण का जन्म, उनकी कठोर तपस्या, ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्ति, लंका पर अधिकार, तथा शूर्पनखा के विवाह का विवरण।

रावण के दुष्कृत्य एवं शाप: सती वेदवती का प्रसंग तथा सीता के रूप में उनका पुनर्जन्म; श्रीराम के पूर्वज महाराजा अनरण्य द्वारा रावण को दिया गया शाप; अप्सरा रंभा के साथ दुष्कर्म तथा नलकुबेर द्वारा दिया गया शाप; एवं राजा कार्तवीर्य अर्जुन तथा महाराज बलि से रावण के युद्ध।

हनुमान जी का बाल्यकाल: हनुमान जी के जन्म, सूर्य को फल समझकर निगलने का प्रयास, और देवताओं द्वारा उन्हें विविध वरदान दिए जाने की कथा।

(ख) श्रीराम की राजसभा एवं अतिथियों की विदाई (सर्ग 37 – 41)

सर्ग 37 में श्रीराम की भव्य राजसभा का वर्णन है।

सर्ग 38 से 40 में महाराजा जनक, राजा युधाजित, राजा प्रतर्दन, तथा सुग्रीव, विभीषण व समस्त वानर-भालू मित्रों को बहुमूल्य उपहार देकर आदरपूर्वक विदा करने का वर्णन है।

सर्ग 41 में पुष्पक विमान के आगमन का वृत्तांत आता है।

इस तरह उत्तरकांड के सर्ग 1 से 41 तक उन्हीं बातों का फिर से और अधिक विस्तार से वर्णन है जिसके विषय में इससे पहले के कांड यानि युद्धकांड में संक्षेप में सरलता से बता दिया गया था। जैसे कि सभी अतिथियों से उपहार के आदान-प्रदान और विदाई का वर्णन हो चुका है, पर यहाँ फिर से उनका वर्णन होता है। इसी तरह राज्याभिषेक के बाद ऋषि अगस्त चले गए थे। परंतु उत्तर कांड के सर्ग 1 से 36 तक में उनके द्वारा ही सुनाया गया विभिन्न प्रसंग हैं। रावण और उसके परिवार के विषय में यहाँ वह बहुत ही विस्तार से बताते हैं। इन बातों को उन्होने उस समय भी राम को नहीं बताया था जब वे वन में उनसे मिलने पहुँचे थे, या अगस्त रणभूमि में राम से मिले थे। इसी तरह पुष्पक विमान को तो अयोध्या आते ही राम ने कुबेर के पास लौटने का आदेश दे दिया था। उत्तर कांड में फिर से विमान की चर्चा है।

2. उत्तरकांड को लेकर विवाद का मूल कारण

रामायण के आरंभिक सर्गों में उल्लेख है कि महर्षि वाल्मीकि ने जब रामायण की रचना की, तब श्रीराम का राज्याभिषेक हो चुका था। अर्थात युद्धकांड तक की कथा भूतकाल (घटित घटनाओं) पर आधारित थी।

परंतु उत्तरकांड की कथा के संदर्भ में यह माना जाता है कि इसमें भविष्य की घटनाओं का वर्णन है। रामायण के प्रथम चार सर्गों के अनुसार, ब्रह्मा जी के वरदान से महर्षि वाल्मीकि को समाधि-अवस्था में श्रीराम के जीवन की भूत, वर्तमान और भविष्य—सभी घटनाओं का प्रत्यक्ष ज्ञान हो गया था। इसी आधार पर समर्थक मानते हैं कि उत्तरकांड महर्षि वाल्मीकि रचित मूल ग्रंथ का ही भाग है।

इसके विपरीत, कई प्राच्यविद्या विशेषज्ञ और भाषाशास्त्री संपूर्ण उत्तरकांड  (या इसके बहुसंख्यक अंश) को ‘प्रक्षिप्त’ (बाद में जोड़ा गया अंश) मानते हैं। उनका मानना है कि वाल्मीकि रामायण का मूल अंत युद्धकांड में श्रीराम के राज्याभिषेक और मित्रों की विदाई के साथ हो जाता है।

3. उत्तरकांड  को प्रक्षिप्त‘ (बाद में जोड़ा गया) मानने के ठोस आधार

1. घटनाओं का अनावश्यक दुहराव (Repetition)

युद्धकांड के अंत में सभी सुहृदों, वानरों और विभीषण के सत्कार, उपहार-प्रदान और विदाई का वर्णन अत्यंत सुंदरता से हो चुका है। परंतु उत्तरकांड  (सर्ग 38-40) में उन्हीं पात्रों की विदाई का पुनः विस्तार से वर्णन किया गया है। पूरे रामायण महाकाव्य में किसी अन्य स्थान पर घटनाओं का ऐसा पुनरावर्तन देखने को नहीं मिलता।

2. कथानक एवं संदर्भ में अस्वाभाविकता

महर्षि अगस्त्य का प्रसंग: युद्धकांड के अंत में ऋषि अगस्त का प्रस्थान दर्शाया गया है, किंतु उत्तरकांड में वे पुनः उपस्थित होकर कथाएँ सुनाते हैं। वनवास के समय जब श्रीराम-लक्ष्मण उनके आश्रम गए थे, अथवा युद्धभूमि में जब अगस्त्य जी ने श्रीराम से मिलने आए थे, तब उन्होने  रावण का यह इतिहास नहीं सुनाया था, जो यहाँ अचानक सुनाते हैं।

पुष्पक विमान की उपस्थिति: युद्धकांड  के सर्ग 127 में श्रीराम नंदीग्राम पहुँचते ही पुष्पक विमान को उसके वास्तविक स्वामी कुबेर के पास वापस भेज चुके थे। परंतु उत्तरकांड  (सर्ग 41) में पुष्पक विमान का पुनः अयोध्या आना वर्णित है।

3. फलश्रुति की स्थिति (Epilogue Positioning)

भारतीय साहित्य में ग्रंथ के पाठ का महात्म्य या ‘फलश्रुति’ ग्रंथ के अंत में या फिर आरंभ में दी जाती है। वाल्मीकि रामायण की मूल फलश्रुति युद्धकांड के अंतिम सर्ग (सर्ग 128) में आ चुकी है। युद्धकांड के अंत में फलश्रुति का होना इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि मूल रामायण वहीं समाप्त हो गई थी।

4. भाषा, शैली और छंद में भिन्नता (Linguistic Analysis)

भाषाशास्त्रियों के अनुसार उत्तरकांड की शब्दावली, व्याकरणिक संरचना, और शैली वाल्मीकि जी की सहज, आर्ष और ओजस्वी अनुष्टुप शैली से मेल नहीं खाती। इसमें उत्तर-कालीन (पूर्व-मध्यकालीन) अलंकृत शैली झलकती है।

5. सामाजिक एवं दार्शनिक मूल्यों में विरोधाभास

शंबूक वध का प्रसंग: उत्तरकांड में वर्णित है कि त्रेतायुग में शूद्र द्वारा तपस्या करना अधर्म था, इसलिए श्रीराम ने शंबूक का वध किया। परंतु मूल रामायण में इसके विपरीत प्रमाण मिलते हैं:

श्रवण कुमार के पिता वैश्य और माता शूद्र थीं, फिर भी वे मुनि की भाँति तपस्वी थे और राजा दशरथ उनका मुनियों जैसा सम्मान करते थे।

शबरी सिद्ध तपस्विनी थीं और श्रीराम ने स्वयं उनके भक्ति-भाव एवं तप की प्रशंसा की थी।

राजा दशरथ के मुख्य मंत्री और रथ-चालक सुमंत्र सूत जाति से थे, जिन्हें श्रीराम पिता समान पूज्य मानते थे।

अतः शंबूक-वध की कथा मूल रामायण के सामाजिक और मानवीय मूल्यों के पूर्णतः विपरीत है।

न्याय माँगने वाले कुत्ते और मठ का प्रसंग: उत्तरकांड में एक कुत्ते के न्याय के प्रसंग में मठाधीश बनने को पाप का कारण बताया गया है। ऐतिहासिक दृष्टि से ‘मठ व्यवस्था’ बौद्ध एवं उत्तर-वैदिक काल में अस्तित्व में आई; श्रीराम के समय केवल ‘आश्रम व्यवस्था’ थी। संपूर्ण प्रथम छह काण्डों में कहीं ‘मठ’ शब्द का उल्लेख नहीं है।

जब कोई ग्रन्थ प्रामाणिक माना जाने लगता है और जनता उसका विशेष आदर करती है, तब अपने मत उस ग्रन्थ द्वारा समर्थित बताने के लिए कभी जानबूझकर और कभी अनजाने में ऐसा परिवर्तन अन्य ग्रंथों में किए जाने के प्रमाण भी हैं।

6. कालक्रमिक असंगतियाँ (Anachronism)

रामायण के अयोध्याकांड (जाबालि प्रसंग) और उत्तरकांड के कुछ अंशों में ‘बुद्ध’ तथा नास्तिक दर्शनों (बौद्ध/जैन/आजीवक) का खंडन मिलता है। ऐतिहासिक रूप से भगवान बुद्ध और महावीर स्वामी का कालखंड श्रीराम के बहुशास्त्र-सम्मत कालखंड के बहुत बाद का है। यह स्पष्ट करता है कि मध्यकाल में नास्तिक मतों के खंडन हेतु रामायण में ये अंश जोड़े गए।

7. हस्तलिखित प्रतियों (Manuscripts) की भिन्नता

भारत के विभिन्न क्षेत्रों (गौड़ीय, पश्चिमोत्तरीय, और दक्षिणी पाठों) से प्राप्त रामायण की प्राचीन हस्तलिखित पांडुलिपियों में उत्तरकांड के सर्गों, श्लोकों और प्रसंगों में भारी भिन्नता पाई जाती है। ताड़पत्रों और भोजपत्रों पर प्रतिलिपि (Copying) बनाते समय तत्कालीन भाष्यकारों और प्रतिलिपिकारों द्वारा अपनी मान्यताओं के अनुसार नए श्लोक जोड़ना उस काल में सुलभ था।

निष्कर्ष

उपर्युक्त भाषाशास्त्रीय, ऐतिहासिक, सामाजिक और कथानकीय साक्ष्यों के आधार पर यह निष्पादित होता है कि सम्पूर्ण उत्तरकांड, अथवा कम से कम, उसका अधिकांश भाग, वाल्मीकि रामायण का मूल भाग न होकर उत्तर-काल (लगभग गुप्त काल या पूर्व-मध्यकाल) में जोड़ा गया प्रक्षिप्त भाग है।

बाद के रचनाकारों ने अपने समय के सामाजिक विचारों, जातीय रूढ़ियों और पौराणिक आख्यानों को धार्मिक मान्यता प्रदान करने के लिए इन्हें आदिकाव्य रामायण में सम्मिलित कर दिया। यही कारण है कि सीता-त्याग, शंबूक-वध और लक्ष्मण-त्याग जैसी घटनाएँ, जो श्रीराम के न्यायप्रिय और मर्यादित चरित्र से मेल नहीं खातीं, उत्तरकांड में ही पाई जाती हैं।

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