राज्याभिषेक के उपरांत श्रीराम अत्यंत निष्ठापूर्वक शासकीय एवं नीतिगत दायित्वों के निर्वहन में लीन हो गए। वे प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में जागकर नित्य क्रियाओं व धर्मकार्यों का संपादन करते और तत्पश्चात राजसभा में प्रजा की समस्याओं के त्वरित निवारण हेतु उपस्थित रहते थे। उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता यह थी कि न्याय अथवा सहायता की आस में आए किसी भी नागरिक को प्रतीक्षा न करनी पड़े।
श्रीराम इस बात के प्रति भी सदैव सजग रहते थे कि उनकी प्रजा अपने राजा, उसकी शासन-व्यवस्था और आचरण के विषय में क्या विचार रखती है, ताकि लोक-कल्याण हेतु आवश्यक सुधार किए जा सकें।
1. देवी सीता की गंगा-तट दर्शन की अभिलाषा
शासकीय व्यस्तताओं के बीच श्रीराम अपनी प्राणप्रिया सीता जी को परिमित समय ही दे पाते थे। उनके अंतःपुर के पास एक राजकीय उपवन था, जिसका नाम था अशोक वनिका। इसके पास ही एक सुंदर महल था (इसी महल में उन्होने सुग्रीव को ठहराया था।) इसके पास ही उनके महल का मध्य खंड था, जहाँ वे अपने मित्रों आदि से मिलते थे। दोनों के बीच आने-जाने के लिए एक गली थी।
जब भी राजकार्य से अवकाश मिलता, श्रीराम सीता जी के साथ वहाँ रमण करते और राजाओं के अनुरूप संगीत-कला आदि द्वारा विनोदपूर्वक समय व्यतीत करते थे।
कुछ समय पश्चात् उन्हें सीता जी के गर्भवती होने का शुभ समाचार प्राप्त हुआ, जिससे श्रीराम अत्यंत हर्षित हुए। एक दिन अशोक वनिका (वाटिका) में वार्तालाप के दौरान जब श्रीराम ने उनसे उनकी कोई मनोकामना पूछी, तो सीता जी ने निष्पाप भाव से गंगा-तट पर निवास करने वाले महर्षियों एवं उनकी तपस्विनी पत्नियों के दर्शन की इच्छा प्रकट की। उन्होंने निवेदन किया कि वे एक रात्रि ऋषियों के आश्रम में व्यतीत कर अगले दिन लौट आएँगी। श्रीराम ने उनकी इस अभिलाषा को सहर्ष पूर्ण करने का वचन दिया।
2. गुप्तचरों द्वारा लोक-अपवाद का प्रकटीकरण
उसी समय उनके कुछ मित्रों के आने की उन्हें सूचना मिली। हमेशा की तरह वे अपने महल के मध्यखंड में आ गए, जहाँ उनके कुछ मित्र उनसे मिलने आए थे। ये सब मित्र उनका मनोरंजन भी करते और उन्हे सलाह भी देते थे। साथ ही ये नगर में चलने वाली चर्चाओं से उन्हे अवगत कराते रहते थे। इस तरह, वे सब गुप्तचर का कार्य भी करते
श्रीराम द्वारा प्रजा के विचारों के विषय में पूछने पर, उनके मित्र (गुप्तचर) भद्र ने संकोचपूर्वक बताया कि नगरवासी राजा राम के शौर्य, सेतु-निर्माण और रावण-वध की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं, किंतु साथ ही इस बात पर आश्चर्य और निंदा भी प्रकट करते हैं कि राजा ने लंबे समय तक पर-पुरुष (रावण) के गृहांगन में रही स्त्री को पुनः किस प्रकार स्वीकार कर लिया।
जब श्रीराम ने अन्य गुप्तचरों से पूछा, तो सभी ने हिचकिचाते हुए इस लोक-अपवाद की पुष्टि की। (लोक-कथाओं में इसका श्रेय केवल एक धोबी को दिया जाता है, किंतु वाल्मीकि रामायण के अनुसार यह संपूर्ण नगर में चर्चा का विषय बन चुका था।)
3. श्रीराम का वज्रपात-सम कठोर निर्णय
प्रजा में उठते अपयश और लोक-अपवाद से श्रीराम का हृदय अत्यंत व्यथित हो उठा। राजा के रूप में ‘राजधर्म’ को व्यक्तिगत ‘पतिधर्म’ से ऊपर रखते हुए उन्होंने अत्यंत भारी मन से एक अति-कठोर निर्णय लिया।
सबके जाने के बाद उन्होने सेवक भेज कर अपने तीनों भाइयों को बुलाया। तीनों भाइयों के आने पर राम ने सीता के कारण अपने अपयश की बात, जो कि गुप्तचरों ने बताया था, उन्हें बताया। फिर लक्ष्मण को सीता को लेकर गंगा के तट पर वन में, जहाँ से वाल्मीकि का आश्रम नजदीक था, वहाँ छोड़ आने का आदेश दिया।
तीनों भाइयों को यह निर्णय कठोर प्रतीत हुआ लेकिन बड़े भाई की दृढ़ता के समक्ष वे कुछ नहीं कह सके। यह आज्ञा देते समय राम भी बहुत दुखी थे और रो रहे थे। इसलिए भाइयों ने चुपचाप उनकी आज्ञा मान ली।
4. लक्ष्मण द्वारा सीता जी को गंगा-तट ले जाना
अगली प्रातः लक्ष्मण अपनी भाभी सीता के पास गए और बताया कि राम ने उन्हे सीता को गंगा तट ले जाने का आदेश दिया है। तभी सुमंत्र रथ लेकर आ गए। सीता जी यह सुनकर प्रसन्न हो गईं क्योंकि एक दिन पहले ही शाम को राम ने उनकी इच्छा की पूर्ति के लिए वचन दिया था। इसलिए उत्साहपूर्वक तैयार होकर वह मुनि पत्नियों के लिए बहुत-सा उपहार लेकर रथ पर चढ़ीं।
जब उन्होने इन उपहारों के विषय में उत्साह से लक्ष्मण को बताया तो लक्ष्मण शांत और शोक में डूबे हुए लगे। रथ पर चढ़ते ही सीता को अपशकुन होने लगे। लक्ष्मण का उतरा हुआ चेहरा और इन अपशकुन को देख कर वे कुछ आशंकित हो उठीं। फिर ईश्वर को प्रणाम कर चल पड़ीं।
यात्रा के दौरान सीता जी अत्यंत उत्साहित थीं, किंतु लक्ष्मण का उतरा हुआ और शोकाकुल चेहरा देखकर तथा विभिन्न अशुभ शकुनों को महसूस कर वे भावी अनिष्ट की आशंका से भयभीत होने लगीं।
दोपहर में गंगा-तट पहुँचते ही लक्ष्मण जी अपने आवेग को रोक न सके और फफक-फफक कर रो पड़े। उन्हे देख कर देवी सीता को उनके रोने का कारण समझ नहीं आया। उन्होने समझा वे शायद अपने भाई राम के लिए रो रहे हैं। सीता में उन्हें समझाया कि आज भर की ही तो बात है कल तो फिर घर चले ही जाएँगे इसलिए उन्हे रोना नहीं चाहिए। लक्ष्मण ने अपने आँसू पोंछे और नदी पार जाने के लिए मल्लाह को बुलाया।

5. सीता-परित्याग की घोषणा एवं सीता जी का करुण विलाप
नाव से लक्ष्मण और सीता दोनों गंगा नदी के पार आ गए। इस पार आकर लक्ष्मण हाथ जोड़ कर रोने लगे। वे रोते हुए कहने लगे ऐसा निर्दय आदेश पालन से अच्छा था कि उन्हें मृत्यु आ जाती। अब सीता आश्चर्य और आशंका के साथ पूछने लगी।
तत्पश्चात लक्ष्मण ने रोते हुए सत्य प्रकट किया:
“हे देवि! श्रीराम और मुझे आपकी परम पवित्रता पर रंचमात्र भी संदेह नहीं है। स्वयं अग्निदेव, इंद्र और ब्रह्मा जी ने आपकी शुद्धता प्रमाणित की है। किंतु अयोध्या की प्रजा में फैले लोकापवाद और अपयश के भय से श्रीराम ने आपका त्याग कर दिया है। मुझे आपको महर्षि वाल्मीकि के पावन आश्रम के समीप छोड़कर लौट जाने का आदेश मिला है।”
यह सुनते ही सीता जी स्तंभित रह गईं। चेत में आने पर वे रोते हुए विलाप करने लगीं—”यदि आश्रम की मुनि-पत्नियाँ मुझसे पूछेंगी कि किस अपराध के कारण पति ने मेरा त्याग किया, तो मैं उन्हें क्या उत्तर दूँगी? यदि मेरे गर्भ में रघुकुल का वंश न पल रहा होता, तो मैं इसी क्षण गंगा की धारा में समाकर अपने प्राण त्याग देती।”
तदुपरांत, अत्यंत धैर्य धारण कर एक पतिव्रता नारी की भांति उन्होंने लक्ष्मण से कहा—”आप श्रीराम के आदेश का पालन करें। यदि मेरे कारण मेरे स्वामी का अपयश होता है, तो मेरा धर्म यही है कि मैं उनसे दूर रहूँ।”
6. महर्षि वाल्मीकि का संरक्षण
लक्ष्मण जी भारी मन से नाव द्वारा पुनः गंगा के इस पार आए और रथ पर सवार होकर अयोध्या की ओर चल दिए। सीता जी दूर तक जाते हुए रथ को देखती रहीं और जब वह ओझल हो गया, तो अनाथ की भांति भूमि पर बैठकर रोने लगीं।
समीप ही खेलते हुए मुनि-बालकों ने एक अत्यंत सुंदरी, राजसी स्त्री को रोते देखा और महर्षि वाल्मीकि को सूचित किया। महर्षि वाल्मीकि ने ध्यान-दृष्टि से संपूर्ण घटनाक्रम प्रत्यक्ष देख लिया। वे तुरंत सीता जी के पास पहुँचे और बोले—
“हे कल्याणि! तुम राजा दशरथ की पुत्रवधू और श्रीराम की धर्मपत्नी हो। तुम परम पवित्र हो और श्रीराम ने केवल लोक-भय से तुम्हारा त्याग किया है। दशरथ मेरे मित्र थे, अतः तुम यहाँ मेरे संरक्षण में पूर्णतः सुरक्षित और सम्मानित रहोगी।”
महर्षि वाल्मीकि सीता जी को अपने आश्रम के निकट स्थित ऋषिपत्नियों के आश्रम में ले गए। सीता का परिचय देकर उनसे बार-बार उनको आदर और स्नेह से रखने के लिए कहा।
गर्भवती सीता उन्ही मुनि पत्नियों के साथ वाल्मीकि आश्रम के पास ही तपस्विनी की तरह जीवन व्यतीत करने लगी।
7. महर्षि दुर्वासा की भविष्यवाणी का प्रसंग
इधर लक्ष्मण छुप कर सब देख रहे थे। उन्होने रथ को थोड़ा दूर कर लिया था लेकिन गए नहीं थे। जब उन्होने देख लिया कि वाल्मीकि आकर सीता को ले गए तो उन्हे थोड़ी संतुष्टि हुई और वे अयोध्या के लिए चले।
अयोध्या लौटते समय लक्ष्मण जी अत्यंत उदास थे। उनके संताप को देखकर सुमंत्र जी ने उन्हें सांत्वना देते हुए एक प्राचीन वृत्तांत सुनाया:
जब चारों भाई बाल्यावस्था में थे, तब महर्षि दुर्वासा कुलगुरु वशिष्ठ के आश्रम में पधारे थे। महाराज दशरथ के पूछने पर दुर्वासा जी ने भविष्यवाणी की थी कि श्रीराम परम यशस्वी और ग्यारह हजार वर्षों तक शासन करने वाले सम्राट होंगे, किंतु उनके जीवन में अत्यधिक मानसिक संताप और वियोग का योग है। वे अपनी प्रियतमा पत्नी और कालक्रम में अपने प्रिय भाई का भी त्याग करेंगे।
सुमंत्र जी ने कहा कि भविष्यवाणी के अनुसार श्रीराम स्वयं लक्ष्मण जी का भी परित्याग कर देंगे। उन्होने लक्ष्मण जी को समझाया कि यह सब ‘विधि का विधान’ (दैव योग) है, अतः उन्हें इसके लिए स्वयं को या परिस्थिति को दोष नहीं देना चाहिए। यह सुनकर लक्ष्मण का मन कुछ शांत हुआ।
8. सीता-परित्याग के उपरांत श्रीराम की मनःस्थिति
अयोध्या पहुँचकर लक्ष्मण ने देखा कि श्रीराम अपने राजप्रासाद में अत्यंत शोकाकुल आसीन थे और उनकी आँखों से निरंतर अश्रु बह रहे थे। उनकी स्थिति देख कर लक्ष्मण का अपना दुख और भी गहन हो गया। लक्ष्मण ने अपने भ्राता को ढांढस बँधाया।
चार दिनों से राम प्रजा से नहीं मिले थे। उन्होने पुनः स्वयं को संभाला और प्रजा-पालन के राजकीय उत्तरदायित्वों में संलग्न किया।
कालक्रम में माता कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी का देहावसान हुआ।
श्रीराम ने एकाकी रहते हुए भी इतनी कुशलता और धर्मपूर्वक शासन किया कि उनका शासनकाल युगों-युगों के लिए ‘रामराज्य’ के रूप में अमर हो गया।
