श्रीराम द्वारा एक कुत्ते को न्याय की कथा | Valmiki Ramayan – Part 76

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वाल्मीकि रामायण के उत्तरकांड (सर्ग 59 और 60) में श्रीराम के न्याय प्रिय और निष्पक्ष रूप को दर्शाने वाली एक बहुत ही रोचक कथा आती है। इस कथा में श्रीराम ने एक साधारण पशु (कुत्ते) को भी न्याय प्रदान किया था।

यह कथा इस प्रकार है:

कुत्ते का राजसभा में आना: श्रीराम के राज्याभिषेक के बाद, वे प्रतिदिन अपने दरबार में प्रजा की समस्याएँ सुनते थे। एक दिन श्रीराम ने लक्ष्मण जी से कहा कि वे महल के मुख्य द्वार पर जाकर देखें कि क्या कोई ऐसा प्रार्थी है जिसे न्याय की आवश्यकता है। लक्ष्मण जी बाहर गए तो उन्हें कोई मनुष्य दिखाई नहीं दिया, परंतु द्वार पर एक कुत्ता बैठा रो रहा था।

लक्ष्मण जी के पूछने पर कुत्ते ने कहा, “मैं राजा राम से न्याय माँगना चाहता हूँ।” लक्ष्मण जी ने आकर श्रीराम को यह बात बताई। श्रीराम ने सहर्ष उस कुत्ते को सम्मानपूर्वक दरबार के भीतर बुलाने की आज्ञा दी।

अन्याय की शिकायत: जब कुत्ता राजसभा में पहुँचा, तो श्रीराम ने उससे आने का कारण पूछा। कुत्ते की ठोड़ी पर गहरी चोट लगी थी और खून बह रहा था।

कुत्ते ने कहा, “हे राजन! ‘सर्वार्थसिद्ध’ नाम के एक संन्यासी ने बिना किसी कारण के मुझे डंडे से मारा है, जिससे मैं घायल हो गया हूँ। मैं चाहता हूँ कि आप मुझे न्याय दें।”

संन्यासी से पूछताछ: श्रीराम ने तुरंत उस संन्यासी सर्वार्थसिद्ध को दरबार में बुलवाया। संन्यासी ने आकर स्वीकार किया कि उसने कुत्ते को मारा था।

संन्यासी ने सफाई देते हुए कहा, “हे महाराज! मैं भूख से व्याकुल होकर भिक्षा माँगने जा रहा था। यह कुत्ता रास्ते के बीच में बैठा था। मैंने इसे हटने को कहा, पर यह नहीं हटा। भूख और क्रोध के आवेश में आकर मैंने इस पर डंडे से प्रहार कर दिया। मैं अपराधी हूँ, राजा होने के नाते आप मुझे जो भी दंड देना चाहें, दे सकते हैं।”

दंड का निर्णय और कुत्ते का सुझाव: श्रीराम ने अपने सभासदों और ऋषियों से पूछा कि इस अपराध के लिए संन्यासी को क्या दंड दिया जाना चाहिए? सभासदों ने विचार करके कहा कि शास्त्रों के अनुसार संन्यासी अवध्य (जिसका वध न किया जा सके) होते हैं, अतः इन्हें कोई कठोर शारीरिक दंड नहीं दिया जा सकता।

तब श्रीराम ने कुत्ते से ही पूछा, “तुम ही बताओ, इसे क्या दंड दिया जाए जिससे तुम्हें संतोष मिले?”

कुत्ते ने कहा, “महाराज! आप इस संन्यासी सर्वार्थसिद्ध को ‘कालंजर’ पर्वत के मठ का ‘कुलपति’ (महंत या प्रमुख) नियुक्त कर दीजिए।”

दंड का रहस्य और कथा का सार: कुत्ते के इस अनोखे सुझाव को सुनकर श्रीराम ने संन्यासी को कालंजर मठ का अध्यक्ष (कुलपति) बनाकर हाथी पर बिठाकर ससम्मान विदा कर दिया। दरबार के सभी लोग और मंत्री अत्यंत आश्चर्यचकित हुए कि यह कैसा दंड है? किसी को पद और सम्मान देना दंड कैसे हो सकता है?

तब श्रीराम के पूछने पर कुत्ते ने उस दंड का रहस्य बताया: “हे प्रभु! अपने पूर्वजन्म में मैं स्वयं कालंजर मठ का कुलपति (अध्यक्ष) था। मैंने हमेशा देवताओं और ब्राह्मणों की सेवा की, निष्पक्ष होकर धर्म का पालन किया, फिर भी पद और अधिकार के मद (अहंकार) के कारण मुझसे कुछ गलतियाँ हुईं। उसी के परिणामस्वरूप मुझे इस जन्म में कुत्ते की योनि प्राप्त हुई।”

कुत्ते ने आगे कहा, “यह संन्यासी क्रोधी और विवेकहीन है। जब इसे इतने बड़े मठ का स्वामी बनाया जाएगा, तो पद, प्रतिष्ठा और धन के मोह में आकर इससे अवश्य ही पाप और धर्म-विरुद्ध कार्य होंगे। परिणामस्वरूप, यह अपने आने वाले जन्मों में अपने कुल सहित नरक का गामी होगा और इसे भी मेरी ही तरह पशु योनि भुगतनी पड़ेगी।”

इस कथा का विश्लेषण तीन दृष्टिकोण से किया जाता है-

1. यह कथा श्रीराम के ‘सर्वजन हिताय’ और निष्पक्ष न्याय-दर्शन को दर्शाती है, जहाँ रामराज्य में केवल मनुष्यों के ही नहीं, बल्कि पशु-पक्षियों के अधिकारों और न्याय की भी पूरी चिंता की जाती थी।

2. यह कथा यह संदेश भी देती है कि पद, सत्ता और अधिकार का अहंकार व्यक्ति के पतन का कारण बनता है।

3. इस कथा में मठ का अध्यक्ष होना, पाप का साधन बताया गया है। इसे बौद्ध धर्म का मज़ाक उड़ाने के रूप में भी देखा जाता है।  

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