श्रीराम का अयोध्या आगमन, राज्याभिषेक और रामराज्य की स्थापना | Valmiki Ramayan – Part 60

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पुष्पक विमान द्वारा श्रीराम के अयोध्या आगमन का शुभ समाचार पूरे नगर में अग्नि की भाँति फैल गया। समस्त अयोध्या नगरी, मार्ग और अट्टालिकाएँ स्वागत हेतु सुसज्जित कर दी गईं। श्रीराम सर्वप्रथम नंदीग्राम पधारने वाले थे, अतः राजपरिवार, गुरुजन, मंत्रीगण तथा आबाल-वृद्ध प्रजाजन नंदीग्राम में एकत्र हो गए।

श्रीराम का आगमन एवं भरत-मिलन

पुष्पक विमान का घोर गर्जन सुनते ही प्रजाजन हर्षध्वनि कर उठे। विमान के ऊपरी भाग में आसीन श्रीराम के दर्शन पाकर सभी लोग वाहनों से उतर पड़े। इस समय सुग्रीव आदि समस्त वानर वीर अपनी इच्छा से मनुष्य का दिव्य रूप धारण किए हुए थे।

भरत जी हाथ जोड़े अश्रुपूरित नेत्रों से खड़े थे। विमान के भूमि पर उतरते ही भरत जी ने भीतर जाकर श्रीराम के चरणों में साष्टांग प्रणाम किया। श्रीराम ने उन्हें उठाकर अत्यंत स्नेह से हृदय से लगा लिया। तत्पश्चात भरत जी लक्ष्मण जी और माता सीता से मिले।

भरत जी ने सुग्रीव को हृदय से लगाकर कहा—”हे सुग्रीव! आप हमारे पाँचवें भाई हैं।” उन्होंने लंकापति विभीषण का भी यथोचित सत्कार किया। इसके बाद शत्रुघ्न जी ने भी भाइयों और भाभी के चरण स्पर्श किए।

श्रीराम ने विमान से उतरकर सभी माताओं (कौशल्या, सुमित्रा, कैकेयी) के चरणों में प्रणाम किया।

चरण-पादुका समर्पित करना

भरत जी ने चौदह वर्षों से सिंहासन पर रखी श्रीराम की स्वर्ण-मंडित चरण-पादुकाएँ लाकर उनके चरणों में रख दीं और गद्गद कंठ से बोले:

“हे प्रभु! धरोहर के रूप में रखा आपका यह संपूर्ण राज्य आज मैं आपके चरणों में पुनः समर्पित करता हूँ। आज मेरा जीवन धन्य हुआ और मनोरथ पूर्ण हुआ।”

पुष्पक विमान की विदाई

नंदीग्राम आश्रम पहुँचकर श्रीराम ने पुष्पक विमान को उसके वास्तविक स्वामी कुबेर के पास वापस जाने की आज्ञा दी। वह दिव्य विमान उत्तर दिशा की ओर उड़ गया।

नंदीग्राम की सभा

नंदीग्राम में भरत जी के आश्रम में गुरु वशिष्ठ जी की उपस्थिति में विचार-विमर्श हुआ। भरत ने राम को उनका राज्य लौटाने और उनके राज्याभिषेक की बात की। कुलगुरु वशिष्ठ के नेतृत्व में राम के राज्याभिषेक के लिए विचार-विमर्श हुआ और आवश्यक निर्देश दिए गए।

स्नान, जटा-मोचन एवं शृंगार

निपुण नाई बुलाए गए। सबसे पहले भरत, फिर लक्ष्मण, फिर सुग्रीव, विभीषण आदि को स्नान कराया गया। इसके बाद चारों भाइयों के जटा सुलझाए गए। अपने भाइयों का जटा सुलझाने के बाद राम ने अपना जटा सुलझाया। स्नान के बाद चारों भाइयों ने राजसी वस्त्र और आभूषण धारण किया। रानियों ने अपने हाथों से सीता का शृंगार किया।

अयोध्या नगर में शोभायात्रा (झांकी) एवं प्रवेश

सुमंत्र जी द्वारा लाए गए सुंदर रथ पर श्रीराम सवार हुए। भरत जी ने सारथी की बागडोर संभाली, लक्ष्मण जी चँवर डुलाने लगे और शत्रुघ्न जी ने छत्र धारण किया।

सुग्रीव ‘शत्रुंजय’ नामक विशाल गजराज (हाथी) पर आरूढ़ थे। अन्य वानर-वीर नौ हजार हाथियों पर मनुष्य रूप में चले। सीता जी और वानर-रानियाँ सुंदर सवारियों पर सवार होकर नगर की शोभा देखती हुई चलीं। ढोल-नगाड़ों और मंगल-वाद्य-यंत्रों की मधुर ध्वनि के बीच समस्त अयोध्यावासी इस मनमोहक झांकी के पीछे प्रेमवश चल पड़े।

श्रीराम मार्ग में मंत्रियों और पुरवासियों को सुग्रीव, हनुमान आदि मित्रों के पराक्रम की गाथा सुनाते हुए राजधानी अयोध्या नगर में प्रवेश किया। नगरवासियों ने अपने घरों में लगी पताकाएँ उनके स्वागत के लिए ऊँची कर दी।

इस भव्य शोभायात्रा के साथ श्रीराम अपने पिता महाराजा दशरथ के राजप्रासाद में प्रविष्ट हुए। अतिथियों के ठहरने की व्यवस्था की गई। राम के आदेशानुसार भरत ने बड़े प्रेम से सुग्रीव को राम के विशेष महल में ठहराया।

श्रीराम का अलौकिक राज्याभिषेक

अगले दिन शुभ मुहूर्त में कुलगुरु वशिष्ठ जी के सानिध्य में श्रीराम का भव्य राज्याभिषेक संपन्न हुआ। सिर पर रत्नजटित छत्र शत्रुघ्न जी ने थामा था। सुग्रीव और विभीषण दोनों पार्श्वों से चँवर डुला रहे थे। राज्याभिषेक के सुंदर झाँकी का दर्शन करने देवता, गंधर्व और अप्सराएँ आदि भी आए थे।

उपहारों का आदान-प्रदान

वायुदेव का मुक्ताहार: देवराज इंद्र की प्रेरणा से वायुदेव ने सौ सुवर्ण कमलों की माला और दिव्य रत्नों से जड़ा मुक्ताहार श्रीराम को भेंट किया। श्रीराम ने वह हार सीता जी को प्रदान किया।

सीता जी द्वारा हनुमान जी को उपहार: सीता हनुमान को कुछ उपहार देना चाहती थी। इसलिए उन्होने पति की ओर देखा। उनके मनोभावों को समझ कर राम ने उनसे कहा कि वे जिसे देना चाहे दे सकती हैं। सीता जी ने श्रीराम का संकेत पाकर वह अनमोल मुक्ताहार महाबली हनुमान जी को भेंट कर दिया।

अन्य मित्रों का सत्कार: श्रीराम ने सुग्रीव को स्वर्ण एवं मणि से बनी माला, अंगद को नीलम-जड़ित दो ‘अंगद’ दिया। (बाजूबंद को संस्कृत में‘अंगद’कहते हैं। अंगद बचपन से ही एक विशेष प्रकार का अंगद यानि बाँह पर पहनने वाला आभूषण पहनते थे, इसीलिए उनका यह नाम पड़ा था।)

श्रीराम ने विभीषण, जांबवान, नील, द्विविद, मैंद इत्यादि सभी मित्रों को बहुमूल्य मणियाँ और वस्त्र भेंट के रूप में देकर उनका सत्कार किया।

राज्याभिषेक उत्सव देख कर सभी वानर-वीर किष्किंधा और विभीषण लंका लौट गए।

रामराज्य का स्वरूप एवं प्रजा की खुशहाली

श्रीराम ने अयोध्या के राजा का कार्यभार संभाल लिया। उन्होने भरत जी को युवराज पद पर अभिषिक्त किया और ग्यारह हजार वर्षों तक न्यायपूर्वक शासन किया।

उन्होने पौंडरीक, अश्वमेध और वाजपेय जैसे अनेक महान यज्ञ संपन्न किए। 

‘रामराज्य’ भविष्य में सर्वोत्कृष्ट और आदर्श शासन का पर्याय बन गया। सर्ग 128 के श्लोक 96 से श्लोक 106 तक में राजा राम के राज्य में सुख और समृद्धि वर्णन है।

वाल्मीकि रामायण में रामराज्य की समृद्धि का वर्णन इस प्रकार है:

ब्राह्मणः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा लोभविवर्जिताः।

स्वकर्मसु प्रवर्तन्ते तुष्टाः स्वैरेव कर्मभिः॥104॥

(अर्थात: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—चारों वर्णों के लोग लोभ से रहित थे। सभी अपने-अपने वर्णाश्रमोचित कर्तव्यों का पालन करते हुए परम संतुष्ट रहते थे।)

आसन् प्रजार्धमपरा रामे शासति नानृताः।

सर्वे लक्षणसम्पन्नाः सर्वे धर्मपरायणाः॥105॥

(अर्थात: श्रीराम के शासनकाल में समस्त प्रजा धर्मनिष्ठ थी, कोई असत्य नहीं बोलता था। सभी लोग उत्तम गुणों से युक्त और धर्म के आश्रय में रहते थे।)

दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च।

भ्रातृभिः सहितः श्रीमान् रामो राज्यमकारयत्॥106॥

(अर्थात: भाइयों सहित श्रीमान राम ने ग्यारह हजार वर्षों (10,000 + 1,000) तक धर्मपूर्वक राज्य किया।)

रामायण महाकाव्य की फलश्रुति (महात्म्य)

महर्षि वाल्मीकि ने युद्ध-कांड के अंत में इस आदिकाव्य के श्रवण और लेखन का फल बतलाया है:

धर्म्यं यशस्यमायुष्यं राज्ञां च विजयावहम्।

आदिकाव्यमिदं चार्षं पुरा वाल्मीकिना कृतम्॥107॥

(अर्थात: महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित यह आर्ष आदिकाव्य धर्म, यश और आयु को बढ़ाने वाला तथा राजाओं को विजय प्रदान करने वाला है।)

यः शृणोति सदा लोके नरः पापात् प्रमुच्यते।

पुत्रकामश्च पुत्रान् वै धनकामो धनानि च॥108॥

लभते मनुजो लोके श्रुत्वा रामाभिषेचनम्।

महीं विजयते राजा रिपूंश्चाप्यधितिष्ठति॥109॥

(अर्थात: जो मनुष्य सदा इसका श्रवण करता है, वह पापों से मुक्त हो जाता है। श्रीराम के राज्याभिषेक का प्रसंग सुनने से पुत्रार्थी को पुत्र और धनार्थी को धन की प्राप्ति होती है। राजा शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है।)

[द्रष्टव्य: श्लोक 123 कहता है कि जो लोग भक्तिभाव से महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित इस रामायण संहिता को लिखते हैं, उनका स्वर्ग में निवास होता है। (यहाँ यह ध्यान देने की बात है प्राचीन भारत में मौखिक ज्ञान की परंपरा अधिक थी, इसलिए अधिकांश ग्रंथ या स्तुति आदि में सुनने की या कभी-कभी पाठ करने का महत्व बताया गया है। ‘लिखने’ का महत्त्व विरले ही मिलता है।]

इसी तरह श्लोक 125 तक में रामायण पाठ का महात्म्य कहा गया है। युद्ध कांड का अंतिम 125वां श्लोक कहता है ‘यह काव्य आयु, आरोग्य, यश तथा भाइयों में प्रेम बढ़ाने वाला है। उत्तम बुद्धि प्रदान करने वाल और मंगलकारी है। अतः समृद्धि की इच्छा रखने वाले सत्पुरुषों को इस उत्साहवर्धक ‘इतिहास’का नियमपूर्वक श्रवण करना चाहिए। 

इस प्रकार, श्रीराम के आदर्श राजकार्य (रामराज्य) की स्थापना और काव्य-महात्म्य के साथ वाल्मीकि रामायण का ‘युद्ध-कांड’ संपन्न होता है।

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