भगवान राम, उनके तीनों भाई भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न— ये चारों अपने सशरीर ही परमधाम गए थे। इसलिए इनके लिए ‘मृत्यु’ शब्द का प्रयोग करना अनुचित है। इतना ही नहीं, श्रीकृष्ण अवतार में भी भगवान श्रीकृष्ण सशरीर ही अपने धाम पधारे थे। इन पाँचों का मृत शरीर पृथ्वी पर नहीं मिला था। माता सीता भी पहले ही सशरीर पृथ्वी माता की गोद में समा गई थीं।
भागवत पुराण में इसका कारण बताते हुए कहा गया है कि भगवान का पार्थिव शरीर मनुष्य रूप में होने पर भी अलौकिक होता है। वह भगवान की उस विग्रह मूर्ति की तरह ही होता है, जिसकी भक्त उपासना करते हैं। भागवत-विग्रह होने के कारण उनके शरीर को जलाया नहीं जा सकता। यदि वे साधारण मनुष्यों की भांति शरीर छोड़ते, तो उनके शरीर का दाह-संस्कार करना पड़ता। भगवान राम के तीनों भाई भी भगवान के ही विभिन्न श्रीविग्रहों से प्रकट हुए थे, इसलिए वे सभी अपने दिव्य शरीर के साथ ही स्वधाम लौटे।

किंतु, अपने धाम वापस जाने के लिए मानव लीला के अंतर्गत कोई न कोई माध्यम आवश्यक था। इसीलिए श्रीराम ने सरयू जी के जल में समाधि ली। परंतु इस समाधि से उनकी मृत्यु नहीं हुई, अर्थात उनका शरीर प्राणहीन नहीं हुआ। यह संपूर्ण प्रसंग वाल्मीकि रामायण में इस प्रकार वर्णित है:
1. लक्ष्मण जी का स्वर्ग गमन
अपने दिए गए वचन का पालन करने के लिए श्रीराम को लक्ष्मण जी को मृत्युदंड देना था। कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ की सलाह पर, मृत्युदंड के स्थान पर उन्होंने लक्ष्मण जी का त्याग (निर्वासन) कर दिया। परंतु लक्ष्मण जी अपने भ्राता के बिना जीवित नहीं रहना चाहते थे।
अतः वे सरयू तट पर जाकर योग समाधि में बैठ गए। वहीं से देवराज इंद्र उन्हें सशरीर स्वर्ग ले गए। इस समस्त घटनाक्रम का आरंभ तब हुआ था, जब कालदेव ने श्रीराम से एकांत में मिलकर उन्हें अपने परमधाम लौटने की प्रार्थना की थी। इसके पश्चात् श्रीराम ने भी अपनी भू-लीला का संवरण कर अपने धाम लौटने का निश्चय कर लिया।
2. कुश और लव का राज्याभिषेक
भ्राता लक्ष्मण के जाने के बाद श्रीराम भी अब पृथ्वी पर नहीं रहना चाहते थे। अतः उन्होंने उसी दिन भरत जी को राजपद देकर लक्ष्मण जी का अनुसरण करने की घोषणा की। किंतु भरत जी भी श्रीराम के साथ ही प्रस्थान करना चाहते थे।
उनके अनुग्रह पर श्रीराम ने उसी दिन अपने दोनों पुत्रों—कुश और लव—का राज्याभिषेक किया। उन्हें क्रमशः दक्षिण कोशल और उत्तर कोशल का राजा बनाकर उनकी-उनकी राजधानी के लिए विदा कर दिया।
3. भरत, शत्रुघ्न, सुग्रीव एवं प्रजाजनों का जलसमाधि का दृढ़ निश्चय
श्रीराम ने अपने धाम लौटने की घोषणा अचानक लक्ष्मण जी के जाने के तुरंत बाद की थी। फिर भी यह समाचार समस्त अवधपुरी में तेजी से फैल गया। ऋषि-मुनि एवं संत जन उनके अंतिम दर्शनों के लिए आने लगे। भरत और शत्रुघ्न जी तो पहले से ही साथ जाने के लिए तत्पर थे।
राजकर्मचारी, अयोध्या के आम नागरिक एवं समस्त प्रजाजन भी भारी संख्या में श्रीराम के साथ ही जाने का संकल्प कर चुके थे। अंगद को किष्किंधा का राज्य देकर सुग्रीव जी भी बहुत से वानरों और रीछों के साथ अयोध्या पहुँच गए। विभीषण भी राक्षसों के साथ आ पहुँचे।
हालांकि, श्रीराम ने विभीषण और हनुमान जी सहित पाँच प्रमुख व्यक्तियों को पृथ्वी पर जीवित रहने का आदेश दिया। परंतु अन्य सभी भक्तों के अत्यधिक आग्रह पर श्रीराम ने उन्हें अपने साथ चलने की अनुमति दे दी। देखते ही देखते, एक विशाल जनसमूह स्वेच्छा से श्रीराम के साथ अपने प्राणों का उत्सर्ग करने के लिए तैयार हो गया और राजमहल के प्रांगण में एकत्र हो गया।
वह संपूर्ण रात्रि उन सभी ने अत्यंत शांत और प्रसन्न मुद्रा में व्यतीत की। उन्हें अपना शरीर छोड़ने का कोई शोक नहीं था, बल्कि श्रीराम के साथ उनके श्रीचरणों का दर्शन करते हुए जाने का असीम आनंद था।
4. महाप्रयाण की तैयारी और सरयू तट के लिए प्रस्थान
प्रातःकाल होते ही श्रीराम ने महाप्रयाण की तैयारी प्रारंभ की। उन्होंने अपने पुरोहित को आज्ञा दी— “मेरी अग्निहोत्र की प्रज्वलित अग्नि ब्राह्मणों के साथ आगे-आगे चले। इस महायात्रा के समय मेरे वाजपेय यज्ञ का सुंदर छत्र भी साथ चलना चाहिए।”
कुलगुरु वशिष्ठ जी ने श्रीराम की आज्ञा पाकर महाप्रयाण के लिए शास्त्रों द्वारा निर्धारित समस्त धार्मिक अनुष्ठानों का विधिपूर्वक संपादन किया।
इसके पश्चात् श्रीराम अत्यंत सूक्ष्म वस्त्र धारण कर, दोनों हाथों में कुशा लेकर वेद-मंत्रों का पाठ करते हुए सरयू नदी के तट की ओर बढ़े। उस समय श्रीराम के दाहिनी ओर श्रीलक्ष्मी जी (श्रीदेवी) और बाईं ओर भूदेवी विराजमान थीं। समस्त दैवी शक्तियां, दिव्य अस्त्र-शस्त्र और चारों वेद साक्षात पुरुष रूप में उनके साथ चल रहे थे।
बिना किसी से कुछ बोले, केवल मूक भाव से वेद-पाठ करते हुए वे सरयू तट की ओर बढ़ते रहे। उनके पीछे भरत, शत्रुघ्न, सुग्रीव, अंतःपुर की देवियाँ, कर्मचारी तथा अयोध्या के समस्त नागरिक चलने लगे। जो भी उस समूह को देखता, वह स्वतः ही उस पावन यात्रा का भागी बन जाता। आश्चर्य की बात यह थी कि किसी के मुख पर दुख, भय या दीनता का कोई भाव नहीं था।
5. सरयू तट पर दिव्य आगमन और विष्णु रूप में स्थिति
अयोध्या से डेढ़ योजन की दूरी पर सरयू जी के दर्शन हुए। श्रीराम समस्त प्रजाजनों के साथ सरयू तट पर पहुँचे। उसी क्षण स्वयं सृष्टि-रचयिता ब्रह्मा जी समस्त देवताओं, गंधर्वों, अप्सराओं और महर्षियों के साथ करोड़ों दिव्य विमानों में विराजमान होकर वहाँ प्रकट हुए। मंद-सुगंधित वायु बहने लगी और आकाश से देवपुष्पों की वर्षा होने लगी।
जब श्रीराम ने सरयू के जल में प्रवेश करने के लिए चरण आगे बढ़ाए, तब ब्रह्मा जी ने प्रकट होकर उनसे अपने मूल ‘विष्णु रूप’ में अपने परमधाम में प्रवेश करने का निवेदन किया।
ब्रह्मा जी की प्रार्थना सुनकर श्रीराम अपने चतुर्भुज विष्णु रूप में प्रकट हो गए। श्रीराम, भरत और शत्रुघ्न तीनों ही सशरीर उस परम विष्णु-तत्त्व में विलीन हो गए और सरयू जल के ऊपर दिव्य रूप में स्थित हो गए।
6. सर्व-जीव मोक्ष और साकेत धाम गमन
विष्णु रूपधारी श्रीराम ने ब्रह्मा जी से अपने साथ आए समस्त प्राणियों को उत्तम लोक प्रदान करने का आग्रह किया। ब्रह्मा जी ने इसे स्वीकार करते हुए घोषणा की कि इनके साथ आए हुए सभी मनुष्य, पशु-पक्षी, दृश्य व अदृश्य जीव ‘संतानक लोक’ (जो साकेत धाम का ही एक पावन भाग है) में स्थान पाएंगे।
इसके पश्चात् भगवान विष्णु रूपी राम सबके देखते-देखते अपने परमधाम साकेत लोक चले गए।
राम-ब्रह्मा के इस संवाद को सुनकर श्रीराम के साथ आए सभी प्राणी अत्यंत प्रसन्न हुए। सबने आनंदपूर्वक श्रीराम का स्मरण करते हुए सरयू नदी में डुबकी लगाई। जल में प्रवेश करते ही उन सभी ने अपना भौतिक शरीर त्याग दिया और दिव्य रूप धारण कर आकाश में स्थित विमानों में जा बैठे।
सरयू के जल में प्रवेश करते ही सबकी आत्माएं बिना किसी शारीरिक कष्ट के मुक्त हो गईं। यह दृश्य दिखने में महाप्रलय जैसा था, किंतु इसमें किसी को कोई पीड़ा नहीं थी—केवल और केवल परम आनंद तथा मोक्ष की अनुभूति थी।
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