सीता जी की अग्नि-परीक्षा और उत्तरकाण्ड में लोकापवाद के कारण उनका निर्वासन—ये दो ऐसे घटनाक्रम हैं, जिनके आधार पर आधुनिक समीक्षाओं में कई बार श्रीराम पर स्त्री-विरोधी होने का आरोप लगाया जाता है। किंतु यदि महर्षि वाल्मीकि रचित मूल ‘वाल्मीकि रामायण’ का गहन, समग्र और भाषावैज्ञानिक अध्ययन किया जाए, तो यह धारणा पूर्णतः निर्मूल सिद्ध होती है।
1. सीता-हरण के पश्चात श्रीराम की संवेदनशीलता
पंचवटी से सीता जी के अपहरण के उपरांत पूरे वनवास काल में श्रीराम का आचरण केवल एक शोकाकुल पति का नहीं, बल्कि सीता जी की सुरक्षा के प्रति अत्यंत संवेदनशील प्रेमी का रहा है:
आश्रम में बिखरे फल-फूल, जटायु से प्राप्त अवशेष, ऋष्यमूक पर्वत पर गिरा सीता जी के वस्त्र का अंश देखकर श्रीराम निरंतर उनकी मनोदशा और सुरक्षा को लेकर चिंतित रहते थे।
वे बार-बार यही कहते हैं: “वह अत्यंत भीरु (कोमल) स्वभाव की हैं, न जाने किस हाल में होंगी? उनके बिना अयोध्या लौटने पर मैं उनके पिता जनक को क्या उत्तर दूंगा?”
हनुमान जी जब लंका से लौटकर सीता जी के दुखों का वर्णन करते हैं, तो श्रीराम बिना विलंब किए लंका अभियान की योजना बनाते हैं ताकि सीता जी के दुखों का अंत कर सकें।
2. युद्धकाण्ड के 6 सर्गों का अकस्मात ‘मोड़‘ (Twist) एवं ‘क्षेपक‘ (Interpolation)
युद्धकाण्ड के सर्ग 114 का अंत सीता जी द्वारा अत्यंत प्रसन्नतापूर्वक श्रीराम के सम्मुख उपस्थित होने से होता है। किंतु सर्ग 115 से 120 के बीच का दृश्य अत्यंत नाटकीय, कठोर और अचानक बदलता हुआ प्रतीत होता है:
कटु वचन और अग्नि-परीक्षा (सर्ग 115-120): इन छह सर्गों में श्रीराम द्वारा कठोर बातें कहना, सीता जी का चिता में प्रवेश करना, आकाश में ब्रह्मा, इंद्र, अग्निदेव तथा महाराज दशरथ का प्रकट होना और सीता जी की पवित्रता प्रमाणित करना वर्णित है।
अचानक पूर्व स्थिति: सर्ग 121 में पुनः सब कुछ इतना सामान्य हो जाता है जैसे कुछ हुआ ही न हो, और श्रीराम वानरों से आत्मीय वार्तालाप शुरू कर देते हैं।
शोधकर्ताओं का मत: अनेक भाषाविदों और शोधकर्ताओं के अनुसार, इन छह सर्गों की भाषा, शैली और विचार वाल्मीकि की मूल रचना शैली से भिन्न हैं। यह मध्यकाल में ‘लोक-अपवाद से रक्षा’ या ‘दिव्यता के प्रदर्शन’ हेतु बाद में जोड़ा गया प्रसंग (क्षेपक) प्रतीत होता है।
3. पर्दा-प्रथा का विरोध और स्त्रियों का आर्थिक व सामाजिक सम्मान

पर्दा-प्रथा का विरोध: जब सीता जी श्रीराम के पास लाई जा रही थीं और भीड़ को हटाने का प्रयास किया जा रहा था, तब श्रीराम ने स्पष्ट कहा था कि आपदा, युद्ध, स्वयंवर या विवाह के समय स्त्री का अनावरण अनुचित नहीं है। उन्होंने पर्दा-प्रथा का समर्थन नहीं किया।
माता कौशल्या का स्वावलंबन: रामायण में वर्णन है कि महारानी कौशल्या को अपने व्यक्तिगत व्यय और दान-पुण्य हेतु 1000 गाँव प्राप्त थे, जो रघुकुल में स्त्रियों की आर्थिक स्वतंत्रता और उच्च सामाजिक स्थिति को दर्शाता है।
वीरांगनाओं का परंपरा: महाराज दशरथ के साथ कैकेयी का युद्धभूमि में जाना सिद्ध करता है कि उस युग में स्त्रियों को सैन्य और राजनीतिक प्रशिक्षण प्राप्त था।
4. अहल्या, तारा और रुमा प्रसंग: श्रीराम का प्रगतिशील दृष्टिकोण
अहल्या उद्धार: अहल्या के प्रसंग में श्रीराम ने उनके अतीत को देखने के बजाय उनकी तपस्या और पवित्रता को सम्मान दिया तथा उनके चरण स्पर्श किए।
रुमा और तारा का सम्मान: बाली द्वारा सुग्रीव की पत्नी रुमा को बलपूर्वक छीनने पर श्रीराम ने बाली के कृत्य को अधर्म मानकर दंड दिया। उन्होंने कभी सुग्रीव के मन में यह भाव नहीं आने दिया कि किसी अन्य पुरुष के संरक्षण में रहने के कारण रुमा त्याज्य है। श्रीराम ने तारा और रुमा दोनों को सदैव सम्मान की दृष्टि से देखा।
5. ताड़का व शूर्पनखा प्रसंग: स्त्री-वध से संकोच
श्रीराम पराक्रमी योद्धा होने के साथ-साथ अत्यंत विवेकशील थे। जब महर्षि विश्वामित्र ने ताड़का का वध करने का आदेश दिया, तब भी श्रीराम केवल इस कारण हिचकिचा रहे थे क्योंकि वह एक ‘स्त्री’ थी। इसी प्रकार शूर्पनखा के उपद्रव करने पर भी उन्होंने उसका वध न करके केवल अंग-भंग कर दंडित किया, क्योंकि स्त्री-वध धर्मशास्त्रों में वर्जित माना गया था।
6. उत्तरकाण्ड की प्रामाणिकता और राजा का धर्म
यदि उत्तरकाण्ड (जिसकी प्रामाणिकता पर अधिकतर आधुनिक एवं प्राच्य विद्वान संदेह व्यक्त करते हैं) को स्वीकार भी कर लिया जाए, तो भी श्रीराम का आचरण ‘स्त्री-विरोधी’ न होकर ‘राजा के कठोर धर्म’ का परिचायक था:
व्यक्तिगत जीवन में संन्यास: सीता जी के निर्वासन के पश्चात श्रीराम ने कभी द्वितीय विवाह नहीं किया। वे राजप्रासाद में रहते हुए भी एक तपस्वी का जीवन व्यतीत करते थे। अश्वमेध यज्ञ के समय उन्होंने सीता जी की स्वर्ण-प्रतिमा स्थापित की, जो यह सिद्ध करता है कि उनके हृदय में केवल सीता जी का स्थान था।
वाल्मीकि आश्रम का चयन: श्रीराम ने सीता जी को किसी अज्ञात या असुरक्षित स्थान पर न भेजकर अपने विश्वस्त ब्रह्मर्षि वाल्मीकि के आश्रम के निकट भेजा, ताकि वे पूर्ण सम्मान और सुरक्षा के साथ रह सकें।
राजधर्म बनाम व्यक्तिगत धर्म: एक राजा के रूप में प्रजा के असंतोष को शांत करना उनका सर्वोच्च संवैधानिक कर्तव्य था। उन्होंने अपने व्यक्तिगत प्रेम और सुख की बलि देकर राजा के कठोर उत्तरदायित्व को चुना।
7. विवेक एवं तर्कशील दृष्टि के विपरीत
वाल्मीकि रामायण के अद्योपांत पाठ से प्रतीत होता है कि राम साहस और अद्भुत युद्ध कौशल के साथ-साथ वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी रखते थे। अपने दिव्य अस्त्रों को गुरु के घर में रखना, विश्वामित्र से दिव्य अस्त्र-शस्त्र पाना, खर-दूषण से युद्ध के पहले सेना का निरीक्षण और रणनीति, लंका पर चढ़ाई से पहले ऊँचे पर्वत पर चढ़ कर नगर की बनावट का रणनीतिक निरीक्षण करना आदि साबित करता है कि वे अपने कार्यों एवं विचारों के प्रति हमेशा सावधान रहते थे। उन्हें स्वाध्याय का भी शौक था। शिक्षा के लिए गुरु आश्रम जाने से पहले स्वाध्याय द्वारा ही बहुत से ज्ञान अर्जन का उल्लेख है। एक ऐसा व्यक्ति ऐसा कैसे मान सकता था कि “पतिव्रता स्त्री अग्नि-रोधी हो जाती है” या पर-पुरुष द्वारा बंदिनी बनाए जाने मात्र से ‘अपवित्र’ हो जाती है। यह हो सकता है कि बाद के दिनों में जब स्त्रियों की स्थिति में गिरावट आई। तब उन्हें डरा कर नियंत्रण में रखने के लिए अग्नि, जल आदि से परीक्षा की बात हुई हो। (साक्षी देने के लिए इस तरह के परीक्षा के कुछ उल्लेख मध्यकाल में हैं।) इसी समय अपनी बातों को अधिक प्रामाणिक बनाने के लिए सीता के अग्नि परीक्षा की बात गढ़ ली गई हो।
निष्कर्ष
संपूर्ण वाल्मीकि रामायण का निष्पक्ष अवलोकन करने पर यह स्पष्ट होता है कि श्रीराम के संपूर्ण जीवन में स्त्रियों के प्रति आदर, सुरक्षा और सम्मान का भाव कूट-कूट कर भरा था। केवल युद्धकाण्ड के कुछ संदेहास्पद सर्गों और उत्तरकाण्ड के वाद-विवादित प्रसंगों के आधार पर श्रीराम को ‘स्त्री-विरोधी’ सिद्ध करना न तो शास्त्रीय दृष्टि से तर्कसंगत है और न ही ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से उचित। श्रीराम का चरित्र एक मर्यादा पुरुषोत्तम, आदर्श पति और न्यायप्रिय राजा का है।
