श्रीराम का अयोध्या प्रत्यावर्तन और पुष्पक विमान यात्रा | Valmiki Ramayan – Part 59

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सीता जी की शुद्धता के प्रमाणीकरण के उपरांत समस्त देवताओं ने श्रीराम को युद्ध में विजय की बधाई दी तथा त्रिलोक को रावण के भय से मुक्त करने हेतु उनका धन्यवाद व्यक्त किया।

हताहत वानरों का पुनर्जीवन एवं विश्राम (सर्ग 120 – 121)

श्रीराम के आग्रह पर देवराज इंद्र ने युद्ध में मारे गए समस्त वानरों और भालुओं को पुनः जीवित कर दिया। इसके अतिरिक्त इंद्र ने यह वरदान भी दिया कि वानर वीर जहाँ भी निवास करेंगे, वहाँ असमय भी फल, फूल और निर्मल जल की कोई कमी नहीं होगी। तत्पश्चात सभी देवता अपने-अपने लोकों को प्रस्थान कर गए। श्रीराम ने सेना को विश्राम की आज्ञा दी और उस रात्रि सबने सुखपूर्वक विश्राम किया।

विभीषण का आतिथ्य एवं अयोध्या पहुँचने की चिंता

अगले दिन लंकापति विभीषण सबको स्नान कर शृंगार करने के लिए आग्रह किया। उन्होने राम से कुछ दिन उनके यहाँ रुक कर आतिथ्य ग्रहण करने का भी आग्रह किया।

राम ने उन्हे सुग्रीव आदि को स्नान कराने के लिए कहा। लेकिन स्वयं लंका नगर में नहीं गए। उन्होने विभीषण द्वारा लाए गए उपहार में से दूर्वा, दहि, अक्षत (बिना टूटा हुआ चावल) जैसे मंगल चीजों के अलावा और कोई चीज नहीं लिया।

विभीषण ने श्रीराम की आज्ञा के अनुसार सभी वानरों का विशेष सत्कार किया और उन्हे उपहार दिए।

तदुपरान्त श्रीराम ने सभी वानरों का आभार प्रकट करते हुए उन्हें अपने-अपने घर जाने की आज्ञा दी।

राम ने विभीषण से शीघ्र अयोध्या पहुँचने का उपाय पूछा। उन्होंने अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि वनवास की चौदह वर्ष की अवधि पूर्ण होने वाली है। भ्राता भरत ने चित्रकूट में प्रतिज्ञा की थी कि यदि वनवास बीतने के अगले ही दिन श्रीराम अयोध्या नहीं पहुँचे, तो वे अग्नि-प्रवेश कर अपने प्राण त्याग देंगे।

तब विभीषण ने रावण द्वारा कुबेर से छीने गए ‘पुष्पक विमान’ का सुझाव दिया। यह दिव्य विमान मन की गति से चलने वाला और आवश्यकतानुसार अपना आकार छोटा या बड़ा करने में सक्षम था।

सपरिवार एवं वानर-राक्षस मित्रों का पुष्पक विमान से प्रस्थान

जब श्रीराम, सीता जी और लक्ष्मण जी पुष्पक विमान पर आरूढ़ होने लगे, तब लंकापति विभीषण तथा वानरराज सुग्रीव सहित समस्त वानर यूथपतियों ने श्रीराम का राज्याभिषेक देखने हेतु साथ चलने की इच्छा व्यक्त की। श्रीराम ने सहर्ष उन सभी का आग्रह स्वीकार किया।

मार्ग में श्रीराम सीता जी को उन सभी स्थलों का दर्शन कराते जा रहे थे, जहाँ उन्होंने सीता-हरण के बाद का समय व्यतीत किया था या कोई महत्त्वपूर्ण कार्य किया था।

किष्किंधा में ठहराव एवं महर्षि भारद्वाज का आश्रम

वानर-पत्नियों को साथ लेना: किष्किंधापुरी के ऊपर से गुज़रते समय माता सीता की इच्छा पर विमान वहाँ रुका। सीता जी के स्नेहाग्रह पर सुग्रीव और अन्य प्रमुख वानरों की रानियों (रुमा, तारा आदि) को भी विमान में बैठाया गया।

महर्षि भारद्वाज का आतिथ्य: प्रयाग पहुँचकर श्रीराम महर्षि भारद्वाज के आश्रम में रुके, जिन्हें उन्होंने वन जाते समय लौटते हुए मिलने का वचन दिया था। महर्षि भारद्वाज के आश्रम में एक रात्रि विश्राम कर अगले दिन सभी फिर अयोध्या के लिए चले। महर्षि के वरदान से प्रयाग से अयोध्या के मार्ग के तीन योजन तक के सभी वृक्ष असमय ही स्वादिष्ट फलों से लद गए, जिससे सभी लोगों के लिए भोजन का सुंदर प्रबंध हो गया।

हनुमान जी द्वारा गुह और भरत को शुभ सूचना देना

कोशल देश की सीमा के समीप पहुँचकर श्रीराम ने हनुमान जी को मनुष्य रूप धारण कर पहले श्रृंगवेरपुर में निषादराज गुह को तथा तत्पश्चात नंदीग्राम में भ्राता भरत को अपने आगमन की सूचना देने भेजा।

हनुमान जी मनुष्य का रूप धारण कर तीव्र गति से उड़ चले। पहले गुह को यह सूचना दी।

तत्पश्चात हनुमान जी ने नंदीग्राम पहुँचकर जब भरत जी को श्रीराम के आगमन का समाचार सुनाया, तो भरत जी परम आनंदित होकर भाव-विभोर हो गए। “राम आ रहे हैं” यह समाचार पाकर भरत जैसे पुनर्जीवित हो उठे। प्रसन्नता से उन्होने हनुमान को अनेक उपहार देने की घोषणा कर दिया। हनुमान जी ने भरत जी के पूछने पर चित्रकूट मिलन के बाद से लेकर रावण-वध और पुष्पक विमान से आगमन तक का संपूर्ण वृत्तांत कह सुनाया।

अयोध्या नगर में अभूतपूर्व स्वागत की तैयारी

भरत जी चौदह वर्षों से वल्कल वस्त्र धारण कर एक तपस्वी की भाँति राजधानी के बाहर नंदीग्राम में रहकर श्रीराम की चरण-पादुकाओं को सिंहासन पर रखकर राज्य संचालन कर रहे थे। श्रीराम के आगमन की सूचना मिलते ही वे यह शुभ संदेश सुनने अयोध्या नगर आ गए।

समस्त अयोध्या नगरी को सुंदर तरीके से सजाया गया। मार्ग स्वच्छ किए गए, ध्वजा-पताकाएँ फहराई गईं और वाद्ययंत्रों की मधुर ध्वनि गूँजने लगी। माता कौशल्या, सुमित्रा, कैकेयी, गुरु वशिष्ठ, मंत्रीगण तथा अयोध्यावासी राम-लक्ष्मण और सीता के स्वागत हेतु नंदीग्राम की ओर उमड़ पड़े। श्रीराम के वनवास काल की घटनाएँ लोगों में चर्चा का विषय बन गया।

गंगा-पूजन एवं अयोध्या की सीमा में प्रवेश

अयोध्या की सीमा पर पहुँचकर श्रीराम विमान से उतरे और अपने प्रिय मित्र निषादराज गुह से मिले जैसा कि उन्होने वन जाते समय वचन दिया था।

माता सीता ने वन जाते समय माँ गंगा से की गई अपनी मन्नत के अनुसार विधिपूर्वक गंगा जी का पूजन किया।

निषादराज गुह भी राज्याभिषेकोत्सव में सम्मिलित होने हेतु उनके साथ चल पड़े।

तत्पश्चात पुष्पक विमान से श्रीराम, लक्ष्मण, सीता, विभीषण, सुग्रीव, निषादराज गुह तथा समस्त वानर-राक्षस मित्र अत्यंत हर्षोल्लास के साथ अयोध्या की पावन भूमि पर अवतरित हुए।

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