सीता-परित्याग के पश्चात् श्रीराम व्यक्तिगत रूप से अत्यंत व्यथित थे, किंतु उन्होंने इस व्यक्तिगत संताप को अपने ‘राजधर्म’ के मार्ग में बाधा नहीं बनने दिया। वे अपना अधिकांश समय प्रजा-पालन, न्याय व्यवस्था और धर्म-कार्यों के संपादन में व्यतीत करने लगे।
1. यमुना तट के ऋषियों का आगमन एवं लवणासुर का आतंक
एक दिन राजसभा में महर्षि च्यवन के नेतृत्व में यमुना तट के लगभग सौ ऋषि-मुनियों का शिष्टमंडल श्रीराम से मिलने अयोध्या आया। वे लवण नाम के महाबली असुर के आतंक से मुक्ति की प्रार्थना लेकर पधारे थे। वे पूर्व में अनेक राजाओं से रक्षा की प्रार्थना कर चुके थे, किंतु कोई भी लवण का अंत करने में सक्षम न हो सका। अंततः वे महान इक्ष्वाकु वंशी राजा राम की शरण में आए।
2. लवणासुर की उत्पत्ति एवं शिव-शूल का रहस्य
लवणासुर रावण की मौसी कुंभीनसी का पुत्र था। उसके पिता दैत्यराज मधु देवताओं के प्रति मित्रभाव रखते थे।
भगवान शिव ने प्रसन्न होकर दानव मधु को एक अजेय शूल (त्रिशूल) प्रदान किया था। शिवजी का वरदान था कि जब तक यह शूल धारक के हाथ में रहेगा, तब तक उसे त्रिलोक में कोई पराजित नहीं कर सकेगा।
पर, मधु का पुत्र लवण अत्यंत क्रूर, अधार्मिक और अत्याचारी निकला। मधु के समझाने पर भी जब वह न सुधरा, तो व्यथित होकर मधु समुद्र में तपस्या करने चले गए और वह अमोघ शूल लवण को सौंप दिया।
इस अजेय शूल के बल पर लवणासुर निरंकुश हो गया। वह ऋषियों और निर्दोष नागरिकों को मारकर खा जाता था। जो भी उसका विरोध करता, वह शूल से उसका संहार कर देता था।
3. शत्रुघ्न को उत्तरदायित्व एवं अयोध्या में राज्याभिषेक
ऋषियों की व्यथा सुनकर श्रीराम ने अपने सबसे छोटे भ्राता शत्रुघ्न को लवणासुर का अंत करने का दायित्व सौंपा।
श्रीराम की सोच केवल असुर का वध करने तक सीमित नहीं थी; वे जानते थे कि राजाहीन और असंगठित होने के कारण यमुना तट के निवासी भविष्य में पुनः असुरों का शिकार बन सकते हैं। अतः श्रीराम ने शत्रुघ्न को आदेश दिया कि वे लवण को मारकर उस क्षेत्र में एक सुव्यवस्थित, न्यायप्रिय और नए राज्य की स्थापना करें।
चूँकि शत्रुघ्न को यमुना तटवर्ती क्षेत्र का स्वतंत्र राजा बनना था, इसलिए श्रीराम ने अभियान पर भेजने से पूर्व अयोध्या में ही शत्रुघ्न का विधिवत राज्याभिषेक कर दिया।
4. लवणासुर-वध की रणनीतिक योजना
श्रीराम ने शत्रुघ्न को युद्ध की सूक्ष्म रणनीति समझाई। लवणासुर जब भी आहार (भोजन) की खोज में नगर से बाहर जाता, तो वह शिव-शूल को अपने प्रासाद में ही छोड़कर जाता था।
रणनीति यह बनी कि जब वह भोजन संग्रह करके अपने नगर, जिसका नाम उसने अपने पिता के नाम पर ‘मधुरा पुरी’ रखा था, लौटे, तो द्वार पर ही शत्रुघ्न उसे युद्ध के लिए ललकारें। इसका कारण यह था कि प्राप्त सूचना के अनुसार अपना अमोघ शूल घर में ही रख कर वह भोजन संग्रह करने जाता था। अतः इस समय शूल उसके पास नहीं होता।
श्रीराम ने शत्रुघ्न को वह दिव्य वैष्णवास्त्र प्रदान किया, जिससे पूर्वकाल में भगवान विष्णु ने मधु और कैटभ दैत्यों का संहार किया था।
रणनीति के अनुसार शत्रुघ्न को सेना लेकर जाना था। लेकिन वे युद्ध अकेले ही करते। सेना उनसे पहले जाती और जब वे लवण से युद्ध करते तो वह यमुना के दक्षिण तट पर रहती क्योंकि यह लवण-शत्रुघ्न का द्वंद्व युद्ध होता। पर अगर कोई अप्रत्याशित सहायता उसे मिल जाती, उस स्थिति के लिए सेना पास ही मुस्तैद रखी गई थी। इस सेना का प्रयोग बाद में राज्य स्थापना के क्रम में भी होता। अतः शत्रुघ्न की सेना पहले प्रस्थान कर गई और यमुना के दक्षिण तट पर डट गई। इसके एक माह पश्चात शत्रुघ्न अकेले ही यात्रा पर निकले ताकि असुर लवण को भनक न लगे।
5. महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में विश्राम एवं लव-कुश का जन्म
अयोध्या से मधुरापुरी (मधुपुरा) जाते समय शत्रुघ्न ने गंगा पार कर महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में विश्राम किया। महर्षि वाल्मीकि का रघुकुल से पुराने और अच्छे संबंध थे। उन्होने शत्रुघ्न का स्वागत किया।
अत्यंत शुभ संयोग: जिस रात्रि शत्रुघ्न वाल्मीकि आश्रम में ठहरे थे, उसी मध्यरात्रि को देवी सीता ने दो जुड़वाँ पुत्रों को जन्म दिया। मुनि-कुमारों ने महर्षि वाल्मीकि को यह शुभ समाचार दिया। वृदधा स्त्रियाँ वाल्मीकि के निर्देश के अनुसार राम और सीता के गोत्र का नाम लेकर बालकों की रक्षा के लिए उनका मार्जन करने लगी। ये नाम सुन शत्रुघ्न भी वहाँ आ गए। उन्हें सीता के दो पुत्र होने की सूचना मिली। वे यह सुनकर बड़े हर्षित हुए और सीता की पर्ण कुटी मे जाकर हर्ष प्रकट किया।
उस सावन की संपूर्ण रात्रि वाल्मीकि आश्रम में आनंद उत्सव मनाया गया और कोई न सोया।
अगले दिन शत्रुघ्न लवणासुर का आतंक मिटाने के अपने उद्देश्य पूर्ति के लिए चले गए।
6. लवणासुर का वध एवं शूरसेन राज्य (मथुरा) की स्थापना

शत्रुघ्न ने श्रीराम द्वारा बताई गई योजना का अचूक पालन किया। जैसे ही लवणासुर भोजन/शिकार लेकर मधुरापुरी के मुख्य द्वार पर पहुँचा, शत्रुघ्न ने उसे ललकारा। दोनों में द्वंद्व युद्ध हुआ। शत्रुघ्न ने इस निमित्त दिए गए दिव्य अस्त्र के प्रहार से उसका वध कर दिया। उनके इस महान कार्य पर देवताओं ने उन्हें उस नगर के मनोहर राजधानी के रूप में बस जाने का वरदान दिया।
असुर का अंत होते ही यमुना पार खड़ी शत्रुघ्न की सेना उनसे आ मिली। देवताओं ने प्रसन्न होकर शत्रुघ्न को वरदान दिया। तत्पश्चात शत्रुघ्न ने बारह वर्षों के अनथक परिश्रम से उस उजड़े क्षेत्र को एक समृद्ध और सुंदर जनपद में परिवर्तित किया, जिसका नाम ‘शूरसेन जनपद’ रखा गया। इसकी भव्य राजधानी ‘मधुरा पुरी’ बनी, जो कालान्तर में ‘मथुरा’ नाम से जगत् प्रसिद्ध हुई।
इस राज्य की स्थापना से यमुना तट के निवासियों को एक सुव्यवस्थित शासन और सुरक्षा मिली। यहाँ के पहले राजा के रूप में शत्रुघ्न का अभिषेक राम पहले ही अयोध्या में कर चुके थे।
7. शत्रुघ्न का पुनः अयोध्या आगमन एवं अंतिम यात्रा
बारह वर्षों के शासन के उपरांत, परिजनों की स्मृति से व्याकुल होकर शत्रुघ्न एक छोटी सैन्य टुकड़ी के साथ अयोध्या आए। रास्ते में वे पुनः वाल्मीकि आश्रम में रुके, जहाँ उन्होंने दो बालकों (लव-कुश) के मुख से रामायण का अति-मधुर गायन सुना। यद्यपि वे गान सुनकर मुग्ध हुए, किंतु मर्यादावश उन्होंने बालकों का परिचय पूछना उचित न समझा।
अयोध्या पहुँचकर उन्होंने श्रीराम और भाइयों के दर्शन किए। श्रीराम की आज्ञा से सात दिनों तक रुककर वे पुनः मथुरा लौट गए।
इसके बाद वे शूरसेन राज्य में ही अपनी पत्नी श्रुतकीर्ति और पुत्रों के साथ धर्मपूर्वक शासन करते हुए रहते रहे। कभी-कभी अपने परिवार से मिलने अयोध्या आते रहते थे।
कालक्रम में जब श्रीराम के स्वधाम गमन (पृथ्वी छोड़ने) के निश्चय का समाचार मिला, तब शत्रुघ्न ने अपने दोनों पुत्रों (सुबाहु और शत्रुघाती) का राज्याभिषेक किया और त्वरित गति से अयोध्या पहुँचकर अपने प्रिय भाइयों के साथ ही महाप्रस्थान किया।
