लगातार मिलने वाली सफलताओं और शक्ति ने रावण के अहंकार और अत्याचार को और अधिक बढ़ा दिया। अब वह सबको युद्ध के लिए ललकारते हुए पुष्पक विमान पर चढ़ कर घूमा करता था। इसी प्रकार घूमता हुआ एक दिन रावण हिमालय के एक वन में पहुँच गया। वहाँ उसे वेदवती नामकी एक ऋषिका ने शाप दिया।
यहा कहता ऋषि अगस्त्य श्रीराम की सभा में सुना रहे थे। उत्तर कांड के सर्ग 17 में यह कथा इस तरह दिया गया है:
हिमालय के वनों में धूमते हुए उसने एक अत्यंत रूपवती कन्या को देखा। वह कन्या काला मृगचर्म धारण कर तपस्विनी के वेष में थी। वह उस कन्या के रूप पर मोहित होकर उससे अमर्यादित भाषा में वार्तालाप करने लगा।
कन्या ने सौम्य भाव से अपना परिचय देते हुए कहा कि
“मैं बृहस्पति के पुत्र कुशध्वज नामक ब्रह्मर्षि की पुत्री हूँ। मेरा नाम वेदवती है।” उसने अपने विषय में बताते हुए कहा कि उसके पिता उसका विवाह भगवान श्रीविष्णु से कराना चाहते थे, इसलिए उन्होंने दैत्यराज शंभु के विवाह-प्रस्ताव को मना कर दिया। इससे क्रुद्ध उस दैत्य ने सोते हुए में उसके पिता की हत्या कर दी। पति की हत्या से दुखी माता ने भी प्राण त्याग दिए। पिता के संकल्प को पूरा करने हेतु श्रीविष्णु की मैं आराधना कर रही हूँ। उस कन्या ने यह भी कहा कि श्रीविष्णु के अतिरिक्त और कोई उसका पति नहीं हो सकता। उसने बताया कि वह रावण का परिचय अपने तपबल से जान गई थी, लेकिन वह उनसे विवाह नहीं करेगी, अतः उसे वहाँ से चले जाना चाहिए।
पर रावण अलग-अलग प्रकार से अपना कामुक प्रस्ताव रखता रहा। उसने भगवान विष्णु की बुराई भी की।
वेदवती का शाप (सर्ग17)
रावण के कुत्सित वचन और अपने आराध्य भगवान विष्णु के अपमान से क्रोधित होकर वेदवती बोली,
“भगवान विष्णु त्रैलोक्याधिपति और सबके पूज्य हैं, तुम्हारे सिवाय कौन ऐसा बुद्धिमान होगा जो उनका अपमान करेगा?”
अपने तिरस्कार से क्रुद्ध होकर रावण ने वेदवती के केशों की चोटी को पकड़ लिया। वेदवती ने अपनी चोटी को अपने हाथ से ही काट डाला। साथ ही वह अग्नि जला कर बोली,
“अरे नीच! तूने मेरा अंग स्पर्श किया है, अतः मैं अब जीना नहीं चाहती और तेरे सामने ही अग्नि में प्रवेश करती हूँ। तूने मेरे केशों को स्पर्श कर वन में मुझे अपमानित किया है। अतः तेरा वध करने के लिए मैं पुनः उत्पन्न होऊँगी। किसी पापी पुरुष को मारना स्त्री के वश की बात नहीं है; अगर मैं तुझे शाप देती हूँ, तो मेरी तपस्या की हानि होगी। इसलिए मैंने अगर कोई सुकृत किया है, तो मैं किसी धर्मात्मा के घर में आयोनिजा जन्म लूँ।”
ऐसा कह कर वेदवती ने अग्नि में अपना शरीर भस्म कर लिया।
महर्षि अगस्त्य श्रीराम को यह कथा सुनाते हुए कहते हैं कि वही वेदवती जनकराज के घर में कन्या के रूप में उत्पन्न हुई और आपकी भार्या बनी। उसने विष्णु को पति रूप में प्राप्त करने के लिए ही तप किया था, इसलिए विष्णुरूप आपको पति के रूप में प्राप्त किया।
[स्पष्टीकरण: श्लोक 37 तक भूतकाल में लिखा है कि वेदवती ने रावण का नाश कर दिया। किन्तु उसके आगे के दो श्लोक भविष्य काल में लिखे हैं कि वेदवती आने वाले कल्प में हल के नोक से जोते हुए खेत से इस प्रकार पुनः उत्पन्न होगी। सत्ययुग में यह वेदवती के नाम से विख्यात थी, यही अब त्रेतायुग में राक्षसों के विनाश के लिए सीता के रूप में उत्पन्न हुई है।]