श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण सनातन संस्कृति का आदिग्रंथ है और महर्षि वाल्मीकि को ‘आदिकवि’ माना जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि संसार के इस प्रथम महाकाव्य की रचना की प्रेरणा महर्षि वाल्मीकि को कैसे मिली? उन्होंने किस प्रकार श्रीराम के जीवनचरित को पद्यबद्ध किया और इसका जन-जन तक प्रचार-प्रसार कैसे कराया? आइए जानते हैं इस पावन कथा की शुरुआत।

1. रामायण की रचना की प्रेरणा (नारद जी से संवाद)
एक बार महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में देवर्षि नारद पधारे। महर्षि वाल्मीकि ने उनसे जिज्ञासावश पूछा कि “हे देवर्षि! इस संसार में इस समय कौन ऐसा मनुष्य है जो सर्वगुण संपन्न, पराक्रमी, धर्मज्ञ, सत्यवादी, दृढ़व्रती और सब प्राणियों का हित करने वाला हो?”
तब नारद जी ने महर्षि वाल्मीकि को इक्ष्वाकु वंश में जन्मे श्रीराम के दिव्य गुणों और उनके पूरे जीवनचरित का संक्षेप में वर्णन सुनाया। नारद जी से श्रीराम की मंगलमयी कथा सुनकर महर्षि का मन अत्यंत आनंदित और भावविभोर हो गया।
2. ‘क्रौंच वध’ और संसार के प्रथम श्लोक का प्राकट्य
नारद जी के जाने के बाद महर्षि वाल्मीकि अपने शिष्य भरद्वाज के साथ तमसा नदी के तट पर स्नान के लिए गए। वहाँ उन्होंने वृक्ष पर सारस (क्रौंच) पक्षी के जोड़े को प्रेम-क्रीड़ा करते देखा। तभी एक निषाद (शिकारी) ने बाण चलाकर नर पक्षी का वध कर दिया।
मादा पक्षी का करुण विलाप देखकर महर्षि वाल्मीकि का हृदय करुणा से भर गया। उनके मुख से स्वतः ही एक छंदोबद्ध वाक्य निकल पड़ा:
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः। यत्क्रौंचमिथुनादेकमवधीः काममोहितम्॥
(अर्थ: हे निषाद! तुमको अनंत काल तक कभी प्रतिष्ठा (अथवा शांति) प्राप्त न हो, क्योंकि तुमने काममोहित क्रौंच पक्षी के जोड़े में से एक का वध किया है।)
यह संसार का पहला ‘श्लोक’ था, जो महर्षि के शोक और करुणा से प्रकट हुआ था।
3. ब्रह्मा जी का आगमन और काव्य रचना का वरदान
जब महर्षि वाल्मीकि इस श्लोक की रचना पर विचार कर रहे थे, तब स्वयं सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी उनके आश्रम में प्रकट हुए। ब्रह्मा जी ने महर्षि से कहा:
- “हे मुने! आपके मुख से जो वाणी निकली है, वह मेरी ही प्रेरणा से श्लोकबद्ध हुई है।”
- “आप श्री रघुनाथ जी के संपूर्ण जीवन का चरित्र श्लोकबद्ध रूप में लिखें। जब तक इस पृथ्वी पर पर्वत और नदियाँ रहेंगी, तब तक आपकी रची हुई रामायण की कथा लोक में प्रचलित रहेगी।”
इसके बाद महर्षि वाल्मीकि ने अपनी दिव्य दृष्टि (योगशक्ति) से श्रीराम, सीता और लक्ष्मण के जीवन की समस्त गुप्त व प्रकट घटनाओं को देखा और 24,000 श्लोकों में वाल्मीकि रामायण महाकाव्य की रचना की।
4. लव और कुश द्वारा रामायण का प्रथम प्रचार-प्रसार
महाकाव्य की रचना पूर्ण होने के बाद महर्षि वाल्मीकि विचार करने लगे कि इस पावन कथा को जन-जन तक पहुँचाने के लिए इसका गान कौन कर सकता है।
सभा में उपस्थित सभी राजा, ऋषि और स्वयं श्रीराम दोनों बालकों के गान और कथा के प्रभाव से भावविभोर हो गए। इस प्रकार लव और कुश के माध्यम से संसार में रामायण कथा का प्रथम प्रचार-प्रसार हुआ।
लव और कुश को शिक्षा: उसी समय माता सीता के पुत्र लव और कुश महर्षि के आश्रम में ही विद्याध्ययन कर रहे थे। महर्षि ने दोनों बालकों को संपूर्ण रामायण कंठस्थ कराई और उन्हें इसे मधुर स्वर व वीणा की तान पर गाना सिखाया।
अयोध्या की सभा में गान: लव और कुश ने ऋषियों के आश्रमों, अयोध्या की गलियों और आगे चलकर स्वयं महाराज श्रीराम के ‘अश्वमेध यज्ञ’ की सभा में इस रामायण कथा का अत्यंत मधुर गान किया।
