रावण ने अपने बड़े सौतेले भाई कुबेर से जब लंका ले लिया तब वे पिता की आज्ञा से कैलाश पर्वत के पास अलकापुरी नामक राज्य बसा कर रहने लगे। पहले के अंकों में यह प्रसंग विस्तार से बताया गया है। लेकिन रावण ने वर्षों बाद रावण ने वहाँ भी आक्रमण किया। क्यों उसने अपने ही भाई पर आक्रमण किया और क्या रहा इसका परिणाम?
ऋषि अगस्त श्रीराम की सभा में यह प्रसंग इस तरह सुनाते हैं:
कुबेर की अलकापुरी पर आक्रमण (सर्ग 13 )
रावण के अत्याचार
कुछ समय उपरांत ब्रह्मा जी के वरदान के अनुसार कुंभकर्ण को निद्रा ने आ घेरा। उसने अपने बड़े भाई से कहा, “हे राजन! मुझे नींद सता रही है, अतः मेरे शयन के लिए भवन बनवा दीजिए।” रावण ने एक योजन चौड़ा और दो योजन लंबा एक सुंदर घर बनवा दिया, ताकि वह आराम से सो सके।
कुंभकर्ण हजारों वर्षों तक वहाँ सोया रहा। जिन दिनों कुंभकर्ण सोया हुआ था, रावण देवताओं, ऋषियों, यक्षों और गंधर्वों को मारता फिरता था। वह अकारण ही क्रोध में भर कर बाग-बगीचों को उजाड़ देता। देवताओं के प्रसिद्ध नंदन वन को भी उसने ऐसे ही उजाड़ दिया। उसके इन कार्यों से देवताओं और ऋषियों में उसके विरुद्ध रोष बढ़ता जा रहा था।
कुबेर द्वारा रावण के पास दूत भेजना और दूत की हत्या
रावण के इन कृत्यों का समाचार उसके बड़े भाई कुबेर को मिला। धर्मज्ञ कुबेर ने अपने कुल की कीर्ति एवं रीति का स्मरण कराते हुए इन दुष्टतापूर्ण कार्यों को छोड़ देने के लिए समझाने हेतु अपने छोटे भाई रावण के पास एक दूत भेजा।
वह दूत लंका जाकर सर्वप्रथम सबसे छोटे भाई विभीषण से मिला। विभीषण ने शिष्टता से उस दूत का स्वागत-सत्कार किया, अपने बड़े भाई कुबेर का कुशल-समाचार पूछा और फिर दूत को राजसभा में ले जाकर रावण से मिलाया।
कुबेर के दूत ने रावण को उसके उज्ज्वल कुल का वास्ता देते हुए अपने बुरे कार्यों को रोक देने के लिए विनम्रतापूर्वक कहा। साथ ही यह भी कहा कि देवता और ऋषि उसके वध के उपाय के विषय में बातचीत करने लगे हैं। दूत ने यह संदेश भी दिया कि रावण ने कुबेर का बार-बार निरादर किया है, किन्तु बंधु होने के नाते वे फिर भी रावण की रक्षा करना चाहते हैं।
दूत ने कुबेर और भगवान शिव में मैत्री की कथा भी सुनाई। कुबेर भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए अनुष्ठान कर रहे थे। कैलाश पर्वत पर उन्हें देवी पार्वती के दर्शन हुए। लेकिन उन्होंने पार्वती को पहचाना नहीं और उन्हें पहचानने के लिए उनकी तरफ देखा। देवी पार्वती के तेज से उनकी बाईं आँख दग्ध होकर पीली पड़ गई।
तदुपरांत दिग्पाल कुबेर ने कैलाश के समीप ही एक पर्वत शिखर पर आठ सौ वर्षों तक मौन धारण कर तपस्या/व्रत पूर्ण किया। उनकी तपस्या से अंततः भगवान शिव प्रसन्न हुए। ऐसा ही व्रत कभी भगवान शिव ने भी किया था। अतः प्रसन्न होकर उन्होंने कुबेर से मित्रता कर ली। उन्होंने यह भी कहा कि पार्वती जी का रूप-अवलोकन करने के कारण उनकी एक आँख दग्ध होकर पीली हो गई थी, इसलिए अब उनका एक नाम ‘एकाक्ष पिंगल’ होगा।
शिव से अनुमति लेकर जब कुबेर घर लौटे, तब उन्होंने अपने भाई रावण की पापकथाएँ सुनीं। इससे पहले उन्हें इन सबकी कोई जानकारी नहीं थी।
दूत की इन बातों से रावण अत्यंत क्रोधित हो गया। उसने कहा कि कुबेर को वह केवल अपना बड़ा भाई समझ कर जीवित छोड़ रहा था। लेकिन अब वह “धन की रखवाली करने वाले इस लोकपाल के साथ अन्य सभी लोकपालों को मार डालूँगा।”
ऐसा कह कर रावण ने तलवार से उस दूत को मार कर उसका मांस खाने की आज्ञा अपने राक्षसों को दे दी। स्पष्टत: उसका यह कार्य अत्यंत क्रूर और धर्म विरुद्ध था। दूत को किसी भी स्थिति में मारना धर्मसंगत नहीं था।
तदुपरांत तीनों लोकों पर विजय प्राप्त करने के लिए विधिपूर्वक दिग्विजय-अभियान शुरू किया। इस अभियान का आरंभ उसने कुबेर के राज्य से ही करने का निश्चय किया।
कुबेर के विरुद्ध अभियान (सर्ग 14)
रावण के इस विजय-अभियान में उसके साथ उसके विश्वासपात्र सेनापति थे – महोदर, प्रहस्त, मारीच, शुक, सारण, और धूम्राक्ष। रास्ते में पड़ने वाले लोकों, नगरों, नदियों, पर्वतों, वनों और उपवनों को नष्ट करता हुआ वह कैलाश पर्वत पर जा पहुँचा।
यक्षों ने जब रावण को आते देखा, तो अपने राजा कुबेर को शीघ्रता से जाकर सब समाचार सुनाया। कुबेर ने और कोई उपाय न देख कर युद्ध करने की आज्ञा दे दी। यक्षों ने अद्भुत पराक्रम प्रदर्शित कर युद्ध किया। रावण इस युद्ध में गंभीर रूप से घायल भी हो गया। लेकिन जल्दी ही फिर से राक्षस-सेना ने बढ़त बना ली। दो सैन्य-टुकड़ियों के पराजित होने पर कुबेर ने संयोधकंटक नामक यक्ष-सेनापति के नेतृत्व में नई टुकड़ी भेजी।

संयोधकंटक ने भीषण युद्ध में रावण के एक सेनापति मारीच को घायल कर गिरा दिया। कुछ देर के लिए राक्षस-सेना के पाँव उखड़ गए, पर अंततः यक्षों को हारना पड़ा।
सेना को पराजित कर रावण राजधानी की तरफ बढ़ा। नगर-दुर्ग के द्वार पर सूर्यभानु नामक द्वारपाल ने उसे रोका। सूर्यभानु यक्ष के रोकने पर भी जब रावण अंदर जाने लगा, तब उस महाबलवान यक्ष ने द्वार का तोरण उखाड़ कर उसी से रावण को पीटना शुरू किया। इस चोट से रावण अत्यंत विचलित हो उठा, लेकिन ब्रह्मा जी के वरदान के कारण उसकी मृत्यु नहीं हुई। उसने उसी तोरण से द्वारपाल को मार डाला और नगर में प्रवेश कर लिया।
राक्षस-यक्ष युद्ध (सर्ग 15)
नगर के अंदर रावण और उसकी राक्षस-सेना को देख कर यक्षों में भय संचारित हो गया। यक्षराज कुबेर ने मणिभद्र नामक सेनापति के नेतृत्व में चार हजार यक्षों की एक और सैन्य-टुकड़ी भेजी। महाभयंकर युद्ध में महोदर, प्रहस्त और मारीच ने चारों हजार यक्ष-सैनिकों को मार डाला। इस युद्ध में रावण के प्रहार से मणिभद्र का मुकुट एक ओर गिर गया, जिस कारण उसका नाम ‘पार्श्वमौली’ कहा जाने लगा।
मणिभद्र के पराजित होते ही कुबेर स्वयं रणभूमि में आ गए। उनके साथ शुक और प्रौष्ठपद नामक दो धनकोष के रक्षक और पद्म एवं शंख नामक धनकोष के देवता भी सेनापति के रूप में थे।
यक्ष बहुत ही वीरता से युद्ध कर रहे थे। पर राक्षस युद्ध में मायावी चालों का उपयोग अधिक करते थे।
रावण-कुबेर युद्ध
युद्ध में अब दो भाई कुबेर और रावण आमने-सामने थे। रावण ने अपने भाई को शिष्टाचारवश भी प्रणाम नहीं किया। कुबेर ने उसके कर्मों के बुरे परिणामों की चेतावनी देते हुए युद्ध शुरू किया, “तेरी बुद्धि भ्रष्ट हो गई है, स्वभाव में क्रूरता आ रही है। तुझे स्वयं ये बातें नहीं जान पड़तीं। जो व्यक्ति माता-पिता, ब्राह्मण और आचार्य का अपमान करता है, वह मृत्यु के वश में पड़ कर अपने कर्मों का परिणाम पाता है।”
कुबेर के भीषण प्रहार से रावण के मंत्री/सेनापति घायल होकर रणभूमि से भाग गए। रावण ने जब देखा कि वह कुबेर से जीत नहीं पाएगा, तब उसने मायावी युद्ध शुरू कर दिया। वह असली रूप में अदृश्य था, किंतु अनेक मायावी रूप में प्रकट होकर अस्त्र-शस्त्र चला रहा था। इस मायावी युद्ध में कुबेर जीत नहीं सके। रावण ने उनके मस्तक पर भीषण प्रहार किया, जिससे वे बेहोश होकर गिर पड़े। उनके सहयोगी उन्हें युद्धभूमि से निकाल कर नंदनवन ले गए, जहाँ कुछ देर बाद उनकी चेतना लौटी।
पुष्पक विमान की प्राप्ति
इधर रावण इस युद्ध में जीत प्राप्त कर अपने विजय के स्मृति-चिह्न के रूप में पुष्पक विमान ले आया। इस विमान पर राक्षसों की कुदृष्टि रावण के जन्म से पहले से ही थी। इस विमान पर बैठे कुबेर को देख कर उसके नाना सुमाली ने अपनी पुत्री कैकसी का विवाह ऋषि विश्रवा से करवाने का विचार किया था ताकि उसके कुल में भी कोई वैसा तेजस्वी पुत्र उत्पन्न हो।
पुष्पक विमान की रचना ब्रह्मा जी की आज्ञा से विश्वकर्मा ने की थी। यह एक अद्भुत विमान था। इसके स्तंभ, सोपान और आसन सोने के बने थे, पन्नों और मोतियों से सजाया हुआ था। उसकी कारीगरी अद्भुत थी। उसमें ऐसे वृक्ष थे, जिनमें प्रत्येक ऋतु में फल लगते थे। वह इच्छानुसार गति से उड़ सकता था। यहाँ तक कि किसी भी मौसम के अति का इसमें प्रभाव नहीं रहता था और हर ऋतु में इसका वातावरण सुखदायी रहता था।
कुबेर से छीने गए पुष्पक विमान में बैठ कर जब रावण कैलाश पर्वत से नीचे उतरा, तो उसे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे उसने त्रिलोक जीत लिया हो।
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