रावण का या तो युद्ध या पराजय का प्रस्ताव
अपनी शक्ति के अभिमान में चूर राक्षसराज रावण घूम-घूम कर राजाओं को युद्ध करने या अधीनता मनने के लिए चुनौती देता था। अधीनता नहीं मनाने वालों को पराजित कर अपनी शक्ति मनवा कर वह चला जाता था। इससे उसके अभिमानी मस्तिष्क को संतुष्टि मिलती साथ ही अभिमान और बढ़ता जाता था।
इसी तरह उसने राजा मरुत्त हो हराया। उसे हराने के बाद रावण युद्ध की कामना करता हुआ पुनः विचरने लगा। वह बड़े-बड़े राजाओं के पास जाकर कहता, “या तो मुझसे लड़ो या अपनी पराजय स्वीकार करो।”
इन राजाओं ने विचार किया कि वरदान के कारण रावण अजेय है, वे उससे जीत नहीं सकते; अतः उन सभी ने अपनी पराजय स्वीकार कर ली। इन राजाओं में प्रमुख थे राजा दुष्यंत, सुरथ, गाधि, गय और पुरूरवा इत्यादि।
अयोध्या के राजा अनरण्य से रावण का युद्ध (सर्ग 19)
इन सब राजाओं को अपने अधीन कर रावण अयोध्या पहुँचा। इस समय अयोध्या के राजा थे अनरण्य। रावण ने उनके पास जाकर भी यही आज्ञा दी कि या तो युद्ध करो या फिर अधीनता। महाराजा अनरण्य ने रावण का वृत्तांत सुन रखा था और इसके लिए अपनी सेना भी तैयार रखी थी। सेना का युद्ध सेना से होना था, किन्तु रावण को अनरण्य ने अपने से द्वंद्व-युद्ध के लिए ललकारा।

यह युद्ध महाराज अनरण्य की सेना के लिए विनाशकारी हुआ। यद्यपि महाराज ने मारीच, शुक, सारण और प्रहस्त जैसे रावण के सेनापतियों को हरा कर भगा दिया, और रावण के मस्तक में आठ सौ बाण मारे, किन्तु उसके मस्तक के अतिरिक्त शरीर के किसी और भाग पर कोई चोट नहीं की।
पराजित अनरण्य का अपमान और मरणासन्न राजा द्वारा शाप
रावण ने उनके मस्तक पर एक मुक्का मारा, जिससे वे विचलित होकर जमीन पर गिर पड़े। रावण ने उनका मज़ाक उड़ाते हुए कहा, “मुझसे लड़ कर क्या फल पाया?” उसने और भी दुर्वचन कहे।
महाराज ने आत्मसम्मान से प्रत्युत्तर देते हुए कहा, “तुम्हारी सामर्थ्य ही क्या है! हाँ, काल की बलिहारी है, जिसके प्रभाव से कोई नहीं बच पाया है। तूने मुझे नहीं जीता, किंतु काल ने मुझे विपद्ग्रस्त किया है। तू इसके लिए निमित्त मात्र है। मैं तो मर रहा हूँ, पर याद रखना, मैं युद्ध से विमुख नहीं हुआ, अपितु युद्ध करता हुआ मैं तेरे हाथों से मारा गया हूँ। तूने इक्ष्वाकु कुल का अपमान किया है। अगर मैंने धर्मपूर्वक प्रजापालन किया है, तो इसी कुल में दाशरथि राम उत्पन्न होंगे जो तेरा वध करेंगे।”
महाराज अनरण्य के इस कथन का देवताओं ने स्वर्गीय वाद्य और पुष्प द्वारा समर्थन किया। इतना कह कर महाराज ने देह त्याग दी। रावण भी शाप की परवाह किए बिना वहाँ से चला गया।
[स्पष्टीकरण: रामायण में गुरु वशिष्ठ द्वारा दिए गए राम के कुल के परिचय के अनुसार राजा अनरण्य श्रीराम से 29 पीढ़ी ऊपर थे अर्थात अनरण्य के वंश में उनके बाद 30वीं पीढ़ी में श्रीराम का जन्म हुआ था। रावण को दीर्घ जीवन का वरदान मिला था। पर क्या वह वही अनरण्य थे या कोई और, इसका कोई ठोस निष्कर्ष रामायणविद अभी तक नहीं निकाल सके हैं।]
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