सीता जी की अग्नि परीक्षा रामायण के सबसे विवादास्पद प्रसंगों में से एक है। इस प्रसंग के आधार पर शताब्दियों से श्रीराम की भूमिका पर कई प्रश्न उठाए जाते रहे हैं। इस संदर्भ में मुख्य रूप से दो प्रश्न सामने आते हैं:
क्या अग्नि परीक्षा और उत्तरकांड का प्रसंग महर्षि वाल्मीकि रचित मूल रामायण का अभिन्न अंग हैं या बाद में जोड़े गए ‘प्रक्षिप्त’ (interpolated) अंश हैं?
क्या श्रीराम वास्तव में अपनी पत्नी के प्रति संदेहशील थे अथवा लोक-अपवाद के भय से कठोर निर्णय लेने वाले व्यक्ति थे?
इन प्रश्नों का समाधान खोजने के लिए पहले वर्तमान वाल्मीकि रामायण में वर्णित कथा-क्रम को देखना आवश्यक है:
1. उपलब्ध वाल्मीकि रामायण के अनुसार घटनाक्रम (सर्ग 115-120)
रणभूमि में सीता जी का आगमन एवं श्रीराम का अप्रत्याशित व्यवहार:
रावण वध और विभीषण के राज्याभिषेक के पश्चात् माता सीता को ससम्मान श्रीराम के समक्ष लाया गया। सीता जी के चेहरे पर लज्जा, संकोच और स्वामी के प्रति अगाध स्नेह था। किंतु उन्हें देखते ही श्रीराम के मुख पर प्रेम, प्रसन्नता, शोक और रोष का एक साथ सम्मिश्रण दिखाई दिया। वे पूर्णतः निरपेक्ष और रूखे प्रतीत हो रहे थे, जिससे सुग्रीव, लक्ष्मण और विभीषण स्तब्ध रह गए।
श्रीराम के कठोर वचन एवं सीता जी का त्याग
श्रीराम ने उपस्थित विशाल जनसमुदाय के समक्ष कहा कि उन्होंने रावण का वध अपने कुल के कलंक और लोकापवाद के परिमार्जन के लिए किया है, न कि केवल सीता को पाने के लिए। उन्होंने कहा:
“तुम्हारे चरित्र में संदेह का अवसर उपस्थित हो गया है। कोई भी कुलीन पुरुष किसी स्त्री को, जो दूसरों के घर में रही हुई हो, को केवल इस कारण स्वीकार नहीं करेगा कि वह उसके साथ बहुत दिनों तक रह कर सौहार्द स्थापित कर चुकी है। रावण तुम्हें अपनी गोद में उठा कर ले गया और तुम पर अपनी दूषित दृष्टि डाल चुका है। तुम जैसी मनोरम नारी को अपने घर में देख वह अधिक दिनों तक तुम से दूर नहीं रह सका होगा। ऐसी दशा में अपने कुल को महान बताता हुआ मैं फिर तुम्हें कैसे ग्रहण कर सकता हूँ।… … तुम अपनी इच्छानुसार भरत, लक्ष्मण, सुग्रीव या विभीषण के यहाँ अथवा कहीं भी जाने के लिए स्वतंत्र हो।”
सीता जी का प्रतिवाद एवं अग्नि-प्रवेश का संकल्प
सार्वजनिक रूप से अपने चरित्र पर ऐसा आक्षेप सुनकर सीता जी तिलमिला उठीं। उन्होंने श्रीराम को उलाहना दिया कि यदि उनका यही विचार था, तो हनुमान जी के आगमन के समय ही वे उन्हें त्याग देते; वे वहीं अपने प्राण त्याग देतीं। और उनके कारण सब को व्यर्थ मे कष्ट नहीं उठाना पड़ता।

सीता ने यह भी कहा कि वे साधारण स्त्री नहीं है। भूतल से प्रकट हुई है। इसलिए उनके चरित्र और आचार-विचार दिव्य है। लेकिन राम ने रोष में आकर उनके शील-स्वभाव, आचार-विचार और उनके प्रति अपनी भक्ति को भूल कर निम्न कोटि की स्त्री की तरह उनके चरित्र पर संदेह किया है।
क्रोध, दुख और अपमान के कारण सीता गला बोलते-बोलते रूँध गया। आँखों में आँसू आ गए। पति ने उन्हे कभी कोई कठोर वचन नहीं बोला था। लेकिन आज उनके वाणी की कठोरता रोंगटे खड़े करने वाला था। घोर अपमान और दुख से आहत होकर सीता जी ने लक्ष्मण जी से तुरंत चिता तैयार करने को कहा। उन्होंने कहा—”मिथ्या कलंक से कलंकित होकर मैं जीवित नहीं रह सकती।”
अग्नि-प्रवेश एवं देवताओं का आगमन
लक्ष्मण को अपने बड़े भाई का यह व्यवहार उचित नहीं लगा। भाभी सीता का यह अपमान उनके लिए असहनीय था। उन्होने क्रोध से राम की ओर देखा। लेकिन राम ने उन्हे संकेत कर दिया कि सीता जैसा कहती है, वैसा ही करे।
वहाँ उपस्थित सुग्रीव, विभीषण, हनुमान, आदि भी सीता के अपमान से क्षुब्ध थे। लेकिन उस समय राम के चेहरे पर क्रोध और क्षोभ का जो भाव था, इससे किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी कि उन्हे कुछ कहे। उनका चेहरा देखने से उस समय भय होता था।
लक्ष्मण जी ने अत्यंत क्षुब्ध होकर चिता तैयार की। श्रीराम शांत सिर झुकाए खड़े रहे। सीता जी ने श्रीराम की परिक्रमा की, देवताओं का ध्यान किया और सत्य की शपथ लेते हुए प्रज्वलित अग्नि में शांत भाव से प्रवेश कर गईं:
“यदि मेरा हृदय कभी एक क्षण के लिए भी श्रीरघुनाथ जी से दूर न हुआ हो, तो संपूर्ण जगत के साक्षी अग्निदेव मेरी सब ओर से रक्षा करें”।
वहाँ विशाल जन समुदाय उपस्थित था। इसमें सुग्रीव के सैनिकों के अतिरिक्त लंका के भी लोग थे। सीता को इस तरह अग्नि में प्रवेश करते हुए सभी चेष्टाशून्य हो कर देखते रह गए। उनके अग्नि मे प्रवेश करते ही लंका की जो स्त्रियाँ वहाँ थीं, उनकी चीखें निकल गई। वानर और राक्षस भी हाहाकार करने लगे।
इन सब हाहाकार और चित्कार की आवाज राम के कानों में पड़ी तब वे मन-ही-मन बहुत दुखी हुए। उनके आँखों में आँसू आ गए। वे अवसाद की अवस्था में कुछ देर सोचते रहे।
तभी ब्रह्मा, शिव, इंद्र, कुबेर, यमराज आदि देवता दिव्य विमानों से आए। स्वयं अग्निदेव पुत्री कि तरह सीता जी को अपनी गोद में लेकर प्रकट हुए। उनके आभूषण और फूलों की मालाएँ तक अग्निसंतप्त नहीं हुई थीं। अग्निदेव ने सीता के परम सतीत्व की साक्षी देते हुए कहा:
विशुद्धभावां निष्पापां प्रतिगृह्णीष्व मैथिलीम्।
न किंचिदभिधातव्या अहमाज्ञापयामि ते॥१०॥
(अर्थात: “हे राम! मैथिली (सीता) सर्वथा निष्पाप और परम पवित्र हैं। इन्हें आदरपूर्वक स्वीकार कीजिए। मैं आपको आज्ञा देता हूँ कि इनके प्रति कभी कोई कठोर शब्द न कहें।”- श्लोक 10, सर्ग 118)
श्रीराम द्वारा स्वीकार एवं राजा दशरथ का आशीर्वाद
अग्निदेव के वचन सुनकर श्रीराम ने कहा कि उन्हें सीता जी की पवित्रता पर तनिक भी संदेह नहीं था, किंतु संसार को सीता के सतीत्व का विश्वास दिलाने और लोकापवाद को सदा के लिए समाप्त करने हेतु उन्होंने यह कठिन परिस्थिति आने दी। ऐसा कह कर उन्होने सीता को अपना लिया।
दशरथ जी का आना (सर्ग 119)
आकाश में विमान द्वारा राम के पिता दशरथ भी आए। उन्हें इन्द्र लोक मिला था। राम, लक्ष्मण और सीता- तीनों ने उन्हे प्रणाम किया। पुत्रों को देख कर दशरथ बहुत ही प्रसन्न हुए। अपने दोनों पुत्रों और पुत्र वधू को आशीर्वाद देकर और पुत्र वधू से अपनी परीक्षा के लिए राम के प्रति कोई विपरीत भाव नहीं लाने का आग्रह कर दशरथ अपने लोक को चले गए।
2. अग्नि परीक्षा प्रसंग के ‘मूल रामायण‘ न होने के ऐतिहासिक एवं साहित्यिक साक्ष्य
अनेक आधुनिक विद्वान, भाषाशास्त्री और प्राच्यविद्या विशेषज्ञ सर्ग 115 से 120 तक के छह सर्गों को मूल रामायण में बाद में जोड़ा गया (प्रक्षिप्त) मानते हैं। इसके पीछे निम्नलिखित ठोस प्रमाण प्रस्तुत किए जाते हैं:
(क) प्राचीन वैदिक एवं पौराणिक परंपराओं से विचलन
अग्नि परीक्षा का वैदिक साहित्य में अभाव: अग्नि परीक्षा (Ordeal by Fire) जैसी मध्यकालीन कुप्रथाओं का कोई उल्लेख वेद, वेदांग, उपनिषद या आरण्यक ग्रंथों में नहीं मिलता।
अहल्या प्रसंग का दृष्टांत: महर्षि गौतम और अहल्या के प्रसंग में भी दोष सिद्ध होने पर अहल्या को तपस्या और पश्चाताप का विधान था, किसी अग्नि परीक्षा का नहीं।
(ख) ग्रंथ प्रसारण और मध्यकालीन प्रक्षेप (Textual Interpolation)
मुद्रण कला (Printing Press) के अभाव में रामायण सहित अन्य प्राचीन ग्रंथों की पांडुलिपियाँ मौखिक परंपरा और हस्तलिखित प्रतियों द्वारा प्रसारित होती थीं।
गुप्तकाल और पूर्व-मध्यकाल के दौरान (जब बौद्ध/जैन प्रभाव के उत्तर-काल में सनातन ग्रंथों का पुनर्संपादन हुआ), तत्कालीन सामाजिक मान्यताओं और स्त्री-विषयक रूढ़िवादी विचारों को प्रामाणिकता देने के लिए लोकप्रिय सम्मानित धार्मिक ग्रंथों में कई सर्ग जोड़े गए। विद्वानों के अनुसार संपूर्ण उत्तरकांड तथा बालकांड के कुछ अंश भी बाद के प्रक्षेप हैं।
(ग) कथानक के स्वाभाविक प्रवाह में व्यवधान (6 सर्गों की विसंगति)
सर्ग 114 का अंत: सर्ग 114 के अंतिम (36वें) श्लोक में सीता जी श्रीराम के पास आकर अत्यंत प्रसन्नतापूर्वक खड़ी होती हैं और अपने स्वामी के चंद्रोपम मुख मंडल को निहारकर अपनी सारी व्यथा भूल जाती हैं:
अथ सा समपनुदन्मनःक्लमं सुचिरमदृष्टमुदीक्ष्य वै प्रियस्य।
वदनमुदितपूर्णचन्द्रकान्तं विमलशशाङ्कनिभानना तदाऽऽसीत्॥३६॥
(हिन्दी अनुवाद- उदयकालीन पूर्ण चन्द्रमा को भी लज्जित करनेवाले प्रियतम के सुन्दर मुख को, जिसके दर्शन से वे बहुत दिनों से वञ्चित थीं, सीता ने जी भरकर निहारा और अपने मनकी पीड़ा दूर की। उस समय उनका मुख प्रसन्नता से खिल उठा और निर्मल चन्द्रमा के समान शोभा पाने लगा।)
इस श्लोक के साथ ही सर्ग 114 समाप्त हो जाता है। इसके बाद के छह श्लोक में राम का क्रोध, वितृष्णा, सीता का दुख से अग्नि प्रवेश, देवताओं एवं राम-लक्ष्मण के पिता राजा दशरथ के स्वर्ग लोक से आने इत्यादि का वर्णन है। 20वें सर्ग का अंत होता है राजा दशरथ द्वारा सबको राम-लक्ष्मण से कुछ बात कर अयोध्या लौटने की बात कह कर अपने लोक लौट जाने और उसके बाद राम द्वारा वानरों से विश्राम के लिए कहने से। इस सर्ग के अंतिम श्लोक (श्लोक संख्या 24) राम का भाई और वानर सैनिकों के साथ खड़े होने का वर्णन करता है। उसके बाद 121वें सर्ग से राम द्वारा अयोध्या जाने की चर्चा आदि के वर्णन है।
सर्ग 121 से पुनः पुराना प्रवाह: सर्ग 120 समाप्त होते ही सर्ग 121 से कथा पुनः स्वाभाविक रूप से शुरू होती है। श्रीराम सीता जी के साथ परम प्रेम और सम्मान से व्यवहार करते हैं। पुष्पक विमान में अयोध्या लौटते समय वे मार्ग के प्रत्येक स्थल को सीता जी को प्रेमपूर्वक दिखाते हैं। कहीं भी इस भीषण अपमान या अग्नि परीक्षा की कड़वाहट या मानसिक आघात का कोई प्रभाव सीता या राम के व्यवहार में नहीं दिखाई देता।
अस्वाभाविक नाटकीयता (सर्ग 115-120): सर्ग 114 के अंतिम (36वें) श्लोक के तुरंत बाद अचानक सर्ग 115 से श्रीराम का कठोर रुख, सीता का अग्नि-प्रवेश, ब्रह्मा-शिव का आगमन और अग्निदेव का प्रकट होना आदि अत्यंत नाटकीय घटनाएँ होती हैं। पूरे रामायण में देवता श्रीराम की स्तुति करते हैं, किंतु केवल यहाँ अग्निदेव श्रीराम को ‘आज्ञा’ (अहमाज्ञापयामि ते) देते हैं—जो श्रीराम के ईश्वर/अवतार रूप से मेल नहीं खाता।
जितना नाटकीय वर्णन सर्ग 115-120 तक में होता है उतना नाटकीय वर्णन इन छह सर्ग और उत्तर काण्ड से पहले पूरे रामायण में और कहीं नहीं है। यहाँ तक कि जब राम ने रावण को मारा या अकेले खर-दूषण के चौदह हजार राक्षसों की सेना को मारा, तब भी देवताओं का इतना नाटकीय आगमन नहीं हुआ।
यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि एक दिन पहले ही रावण का वध राम ने किया था। इसका विवरण संक्षेप में इस तरह किया गया है- राम के बाणों की चोट से रावण का जीवन समाप्त हो गया। उसके धनुष उसके हाथ से छूट गए और वह गिर पड़ा। वानर सेना हर्षोल्लास करने लगी और राक्षस डर कर नगर के अंदर भाग कर चले गए। देवताओं ने हर्षित हो कर उनके रथ पर पुष्प वर्षा किए, मधुर स्वर में दुंदुभियाँ बजाया, सुंगंधित हवाएँ बहने लगी, और देवताओं के मुख से निकले राम की स्तुति और साधुवाद सुनाई देने लगा। (सर्ग 108, श्लोक 18-30)
यानि रावण वध जैसा चीर प्रतीक्षित कार्य सम्पन्न होने पर भी देवता इतने नाटकीय ढंग से नहीं आए। परंतु, एक दिन बाद, जब विभीषण का राज्याभिषेक हो गया, सीता आदरपूर्वक नगर के बाहर रणभूमि में अपने पति के पास लायी गई, तब, देवता लोग रावण वध पर दुबारा विस्तार से उनकी स्तुति करते हैं। सर्ग 108 (जिसमें रावण वध का वर्णन है) में केवल ‘देवता’ शब्द है लेकिन सर्ग 115-120 में ब्रह्मा, शिव आदि देवताओं का नाम दिया गया है। सर्ग 117 (जिसमें ब्रह्मा द्वारा राम की स्तुति है) के 32 श्लोक में से 30 श्लोक ब्रह्मा द्वारा राम की स्तुति ही है। ब्रह्मा के बाद अग्नि देव, भगवान शिव और फिर राजा दशरथ आते हैं। अन्य देवता भी उपस्थित थे। सर्ग 120 में इन्द्र राम से कहते हैं कि आपको मेरा दर्शन हुआ है जो अमोघ है जिसे व्यर्थ नहीं जाना चाहिए, इसलिए मुझे से अपनी कोई इच्छा कहिए। इस पर राम वानर भालुओं को जीवित कर देने के लिए कहते हैं। एक दिन पहले, रावण वध के तुरंत बाद, इन्द्र ऐसा कोई वरदान मांगने के लिए नहीं कहते।
अपने ससुर राजा दशरथ द्वारा पति राम के प्रति कोई विद्वेष नहीं रखने की बात कह कर जाने के बाद सीता जी का कहीं उल्लेख नहीं मिलता है। यह भी नहीं कि वह उस रात रणभूमि ने ही रही या नगर में चली गई? उनका उल्लेख फिर अयोध्या लौटते समय पुष्पक विमान में ही मिलता है जब राम उन्हे उन स्थानों को दिखाते हैं जहाँ-जहाँ सीता जी की अनुपस्थिति में उन्होने कोई महत्वपूर्ण कार्य किया था। सीता जी सामान्य रूप से प्रसन्न हैं।
इन सबसे लगता है ये छह सर्ग बाद में जोड़े गए हैं और कथा के प्रवाह में एक व्यवधान की तरह आते हैं और मूल कथा में सीता के प्रसन्नता से अपने पति के पास खड़े होने का साथ ही सर्ग 120 तक में यह प्रसंग समाप्त हो गया था। सर्ग 114 तक राम का व्यक्तित्व सीता के प्रति बहुत ही सहज है। विवादास्पद छह श्लोक के बाद अचानक कथा अपने मूल रूप में लौट आती है। राम सीता के साथ प्रसन्न खड़े हैं जैसे कि छह श्लोक पहले थे। राम पहले की ही तरह सीता से प्रेम करते हैं और स्त्रियों को सम्मान देते हैं।
(घ) श्रीराम के चरित्र और ग्रंथ के अन्य संदर्भों से विरोधाभास
स्त्रियों के प्रति उदार दृष्टिकोण: संपूर्ण वाल्मीकि रामायण में श्रीराम का चरित्र स्त्री-सम्मान का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है। ग्रंथ के आरंभ से लेकर सीता के परीक्षा तक सभी जगह राम स्त्रियों के प्रति उदार दृष्टिकोण रखते हैं। उस समय का समाज भी ऐसा ही प्रतीत होता है। उदाहरण के लिए:
- राम की सौतेली माँ कैकेयी ने अपने पति के साथ युद्ध में भाग लिया। युद्ध में स्त्रियों को वही समाज इजाजत दे सकता है, जो उनके युद्ध बंदी बन जाने के बाद की स्थिति को भी स्वीकार करता हो। यहाँ तक कि आज भी बहुत-से देश युद्ध के मैदान में अपने स्त्री सैनिकों को भेजने की हिम्मत नहीं कर पाते हैं।
- उनकी माँ कौशल्या को उनके व्यक्तिगत खर्च के लिए 1000 गाँव मिले हुए थे।
- स्वयं राम ने पतिव्रत से च्युत हुए अहल्या को उचित सम्मान दिया था।
- उनके मित्र सुग्रीव की पत्नी रुमा बाली द्वारा बहुत दिनों तक बलपूर्वक पत्नी बना कर रखी गई थी। बाली को छलपूर्वक मारने को राम ने इसी कारण धर्मसंगत सिद्ध किया था। सुग्रीव के मामले में दूसरे पुरुष के कब्जे में रही पत्नी को अपनाने में उन्होने कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाया था। वे स्वयं अपनी पत्नी को, जो रावण द्वारा बलपूर्वक बंदिनी बना कर रखी गई थी, इसी कारण से कैसे लांछित कर सकते थे।
पर्दा-प्रथा का खंडन: सर्ग 114 में स्वयं श्रीराम ने सीता को पालकी से उतारकर पैदल लाने का आदेश देते हुए कहा था कि “स्त्री का सदाचार ही उसका वास्तविक आवरण (पर्दा) है।” जो श्रीराम सीता के चरित्र को ही उनका सबसे बड़ा रक्षण मानते थे, वे अगले ही क्षण उनके चरित्र पर संशय कैसे कर सकते हैं?
वियोग काल की व्याकुलता: सीता-हरण के बाद श्रीराम निरंतर सीता की कुशलता के लिए रोते रहे और वियोग में व्याकुल रहे। उन्होंने कभी यह संकेत नहीं दिया कि रावण के पास रहने से सीता ‘अपवित्र’ हो गई हैं। युद्ध समाप्त होने के बाद राम ने यह शुभ समाचार देने हनुमान जी को सीता के पास भेजा, इस समय भी वे प्रसन्न थे। वाल्मीकि जी कहते हैं कि उस रात राम और सारे सैनिक आराम से सोए। (क्योंकि दस दिनों तक दिन-रात युद्ध होने के करण उन्हे आराम नहीं मिला था)।
अतार्किक दृष्टिकोण: राम कहीं भी यह विचार प्रकट नहीं करते हैं कि पतिव्रता स्त्री अग्नि-रोधी हो जाती है (जो अग्नि परीक्षा का सैद्धान्तिक आधा है)। अन्य संदर्भों से राम एक वैज्ञानिक दृष्टि सम्पन्न व्यक्ति लगते हैं। ऐसा अतार्किक दृष्टिकोण उनके व्यक्तित्व से मेल नहीं खाता लगता हैं।
(ङ) भाषाशास्त्रीय आधार (Linguistic Evidence)
भाषाशास्त्रियों (Linguists) ने अध्ययन में पाया कि सर्ग 115 से 120 के श्लोकों की छंद-रचना, शैली, प्रयुक्त शब्दावली और व्याकरण महर्षि वाल्मीकि की सहज, आर्ष और ओजस्वी ‘अनुष्टुप’ शैली से भिन्न है। इसमें पूर्व-मध्यकालीन अलंकृत और नाटकीय शैली का प्रभाव झलकता है।
3. निष्कर्ष एवं दार्शनिक परिप्रेक्ष्य
इन समस्त साक्ष्यों से यह स्पष्ट होता है कि सर्ग 115 से 120 के छह सर्ग और उत्तरकांड का सीता-त्याग प्रसंग मूल वाल्मीकि रामायण का भाग न होकर उत्तरवर्ती काल में जोड़े गए प्रक्षिप्त अंश हैं।
बाद के काल में जब भारतीय समाज में स्त्रियों की स्वतंत्रता और स्थिति में गिरावट आई, तब तत्कालीन रचनाकारों ने अपने विचारों को धार्मिक मान्यता देने के लिए रामायण में ये सर्ग जोड़ दिए।
इसी भ्रांति और कलंक से श्रीराम और सीता जी के पावन चरित्र की रक्षा करने के लिए कालांतर में संत तुलसीदास जी ने ‘रामचरितमानस’ में वास्तविक सीता जी को अग्निदेव की शरण में रखकर केवल उनकी ‘प्रतिछाया’ (माया-सीता) के हरण और अंत में उसी छाया के बदले वास्तविक सीता को अग्नि से प्राप्त करने की कथा प्रस्तुत की। माया सीता का उल्लेख कुछ अन्य मध्यकालीन राम कथाओं में भी है।
अतः ऐतिहासिक और साहित्यिक साक्ष्यों के आलोक में श्रीराम न तो स्त्री-विरोधी थे और न ही संदेहशील पति; वे एक धर्मनिष्ठ, वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाले और अपनी अर्धांगिनी के प्रति अनन्य प्रेम व सम्मान रखने वाले मर्यादा पुरुषोत्तम थे।
