रावण का 10 सिर उसके अधिक बुद्धिमान होने की निशानी थी, प्रतीक था या कोई चमत्कार? वह कितना विद्वान, बुद्धिमान और शिव भक्त था? इन सब सवालों का जवाब आदि कवि वाल्मीकि अपने रामायण में कैसे देते हैं? आज के आलेख में इसी पर बात करते हैं।
ऋषि अगस्त -श्रीराम संवाद
रामायण के पहले छह कांडों में सीता हरण से पहले के रावण के जीवन के विषय में अधिक विस्तार से कुछ नहीं बताया गया है। लेकिन जब युद्ध जीत कर राम अयोध्या आते हैं और यहाँ उनका राज्याभिषेक विधिवत रूप से होता है, उसके बाद एक बड़ी सभा में ऋषि अगस्त श्रीराम को रावण के विषय में बताते हैं। उत्तर कांड के सर्ग 1 से 40 तक में रावण के विषय में ही बताया गया था।
इसी संवाद में अगस्त राम को बताते हैं कि दस सिर रावण की एक शारीरिक विकृति थी जो कि उसे उसके अपने ही पिता के शाप के कारण मिला था। तो क्यों एक पिता ने अपने ही संतान को ऐसा भयंकर शाप दे दिया था? उसके पिता एक उच्च कुल के ऋषि और माँ एक राक्षस कन्या थी। कैसे हुआ दोनों का विवाह? एक ऋषि पिता का पुत्र कैसे इतना अत्याचारी हो गया? क्यों रावण ने अपने ही भाई कुबेर को हरा कर उससे लंका और पुष्पक विमान छीन लिया? कितने युद्ध किए थे उसने? सीता से पहले कितनी स्त्रियॉं का अपहरण और दुष्कर्म किया था उसने? ये सारी बातें ऋषि अगस्त इसी सभा में बताते हैं। रावण के विषय में जानने का यही सबसे प्राचीनतम और उपलब्ध स्रोतों में सबसे विश्वसनीय स्रोत है। इसलिए अगस्त-राम संवाद को सर्ग के क्रम में यथासंभव मूल रूप में देने का प्रयास इस आलेख में किया गया है।
श्रीराम की सभा
राक्षसों का नाश कर श्रीराम राजगद्दी पर बैठे तब समस्त ऋषि-मुनि गण उनसे मिलने आए। इन ऋषि मुनियों में प्रमुख नाम थे:
- पूर्व दिशा से आए: कौशिक, यवक्रीत, गार्ग्य, गालव, और मेघातिथि के पुत्र कण्व।
- दक्षिण दिशा से आए: स्वस्त्यात्रेय, नमुचि, प्रमुचि, अगस्त्य।
- पश्चिम दिशा से आए: तृषद्गु, कवष, धौम्य, कौषेय।
- उत्तर दिशा से आए: वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि, और भरद्वाज।
कुशल-प्रश्न के बाद इन ऋषियों ने श्रीराम-लक्ष्मण द्वारा राक्षसों पर विजय पर अपनी प्रसन्नता व्यक्त की और उन्हें बधाई दी। इसी क्रम में इन ऋषियों ने लक्ष्मण जी द्वारा मेघनाद-वध को विशेष महत्त्वपूर्ण माना। इस पर श्रीराम ने उनसे पूछा कि वे लोग अन्य राक्षसों से, यहाँ तक कि रावण से भी, अधिक पराक्रमी मेघनाद को क्यों मान रहे हैं? क्या उसके जन्म, वरदान आदि में कोई विशेष बात थी?
रावण का कुल (सर्ग 2)
सतयुग (सत्ययुग) में प्रजापति ब्रह्मा जी के पुलस्त्य नामक एक पुत्र हुए, जो अपने तप के कारण ब्रह्मा जी के समान ही हो गए। उनके शील और धर्म-निष्ठा के कारण वे सभी के मित्र बन गए थे।
तपस्या और स्वाध्याय करने के लिए वे मेरुपर्वत पर राजर्षि तृणबिन्दु के आश्रम में जा कर रहने लगे।
वह वन रमणीय और सुरम्य था। इस कारण ऋषियों, नागों और राजर्षियों की कन्याएँ वहाँ खेलती और गायन-वादन करती रहती थीं। उनके इस कार्य से पुलस्त्य ऋषि की साधना में विघ्न पड़ने लगा। क्रोध में आकर उन्होंने कहा, “जो भी कन्या मेरी आँखों के समक्ष आ जाएगी, वह मेरी दृष्टि पड़ते ही गर्भवती हो जाएगी।” यह सुनकर वे कन्याएँ भयभीत होकर वहाँ से हट गईं; लेकिन राजर्षि तृणबिन्दु की पुत्री उनके इस कथन से अनभिज्ञ होकर अपनी सखियों को ढूंढते हुए वहाँ आ गई। इस समय ऋषि वेदपाठ कर रहे थे। वह कन्या वेद-श्रवण करने उनके समक्ष चली गई। तत्काल ही उसके शरीर में गर्भावस्था के लक्षण प्रकट हो गए।
घबरा कर वह अपने पिता के पास चली गई। पिता को सारा हाल सुनाया। पिता ने ध्यान कर सब सत्य जान लिया। पिता तृणबिन्दु पुत्री को लेकर पुलस्त्य ऋषि के पास गए और भिक्षा के रूप में अपनी पुत्री ग्रहण करने का निवेदन किया। पुलस्त्य ऋषि ने उनका निवेदन स्वीकार कर उस कन्या से विवाह करना स्वीकार कर लिया।
अपनी पत्नी की सेवा और शील से प्रसन्न होकर पुलस्त्य ने अपनी पत्नी से कहा कि “यह पुत्र मेरी वेदध्वनि सुनने से हुआ है, अतः इसका नाम विश्रवा होगा। यह रूप-गुण में मेरी तरह ही होगा।”
कालांतर में विश्रवा भी अपने माता-पिता के आश्रम में रहते हुए तपस्या करने लगे। पिता की तरह ही वे भी शीलवान, सत्यवादी, धर्मनिष्ठ, और स्वाध्यायनिरत हुए।
सर्ग 3 (रावण के पिता विश्रवा ऋषि का प्रथम विवाह और पुत्र)
विश्रवा का विवाह भरद्वाज मुनि की पुत्री देववर्णिनी से हुआ। इस युगल को एक परम धर्मात्मा पुत्र प्राप्त हुआ, जिसका नाम उसके पितामह (दादा) ने वैश्रवण (कुबेर) रखा और भविष्यवाणी की कि यह “बालक धनाध्यक्ष होगा।” किंतु बालक वैश्रवण के मन में धन से ज्यादा धर्म के प्रति आकर्षण था। उन्होंने धर्म के द्वारा परम गति प्राप्त करने के लिए तपस्या करने का निश्चय किया।
वैश्रवण ने कठोर तपस्या करना शुरू किया। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर प्रजापति ब्रह्मा जी, देवराज इन्द्र एवं अन्य देवताओं के साथ उनके समक्ष प्रकट हुए और वरदान माँगने के लिए कहा।
वैश्रवण (कुबेर) ने वरदान माँगा कि “मैं लोकपाल होऊँ और समस्त संपदा मेरे पास रहे।” ब्रह्मा जी ने इन्द्र, यम और वरुण की तरह ही उन्हें भी लोकपाल (दिग्पाल, दिशाओं के रक्षक) बनाने का वरदान दे दिया। साथ ही उन्हें ‘पुष्पक विमान’ भी दिया, ताकि वे देवताओं के समान हो सकें।
ब्रह्मा जी और देवताओं के जाने के बाद वैश्रवण अपने पिता विश्रवा से बोले कि “मैंने अपना मनचाहा वरदान प्राप्त कर लिया है। परंतु ब्रह्मा जी ने मेरे रहने के लिए किसी स्थान का प्रबंध नहीं किया है। अतः आप मुझे ऐसा स्थान बताइए जहाँ मेरे रहने से किसी को कष्ट न हो।” इस पर विश्रवा ने कहा कि दक्षिण समुद्र के तट पर त्रिकूट पर्वत पर लंका नामक एक सुंदर एवं विशाल नगरी है। इसका निर्माण विश्वकर्मा जी ने राक्षसों के रहने के लिए किया था। पहले वहाँ राक्षस रहा करते थे, पर अब भगवान विष्णु के भय से वे वहाँ से निकल कर रसातल में चले गए हैं। अतः अब वह नगरी सूनी और स्वामिविहीन है। तुम वहीं जाकर रहो।
पिता की आज्ञानुसार वैश्रवण लंकापुरी में जा बसे। उनके वहाँ बसने के बाद हजारों यक्ष आ कर वहाँ बसने लगे। वैश्रवण के कुशल शासन में शीघ्र ही लंका नगरी पुष्पित-पल्लवित हो गई। पुष्पक विमान से कभी-कभी वे अपने माता-पिता से मिलने भी जाते रहते थे।
सर्ग 4 (राक्षस कुल)
वैश्रवण की यह कथा अगस्त्य ऋषि श्रीराम की सभा में सुना रहे थे। जब ऋषि ने यह कहा, तो श्रीराम ने उनसे पूछा, “मैंने तो सुना था कि राक्षसों की उत्पत्ति पुलस्त्य ऋषि से हुई थी, आप कह रहे हैं उनसे पहले भी वहाँ राक्षस रहते थे। तो वास्तव में राक्षसों की उत्पत्ति कैसी हुई थी?”
अगस्त्य जी ने कथा सुनाते हुए कहा कि जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना करते हुए सबसे पहले जल की और फिर जल की रक्षा के लिए जलीय जीवों की रचना की।
भूख और प्यास से व्याकुल हो कर सभी जीव ब्रह्मा जी के पास पहुँचा। ब्रह्मा जी ने कहा, “हे प्राणियों! तुम यत्नपूर्वक मनुष्यों की रक्षा करो।” यह सुनकर उनमें से कुछ भूखे प्राणियों ने कहा “रक्षाम:” (अर्थात हम रक्षा करते हैं) और कुछ ने कहा “यक्षाम:” (अर्थात हम पूजन/वृद्धि करते हैं)। ब्रह्मा जी ने कहा, “जिन्होंने कहा है ‘रक्षाम:’ वे राक्षस हों और जिन्होंने कहा है ‘यक्षाम:’ वे यक्ष हों।”
इन्हीं राक्षसों में से हेती और प्रहेती नामक दो भाई हुए, जो कि राक्षसों के स्वामी हुए। प्रहेती धार्मिक स्वभाव का था और वह तपस्या करने वन में चला गया। हेती ने काल की बहन भया से विवाह किया। इस युगल को विद्युत्केश नामक महाबलवान पुत्र हुआ। बड़े होने पर उसका विवाह राक्षसी संध्या की पुत्री सालकटंकटा से हुआ। सालकटंकटा ने अपने प्रथम पुत्र को एक पर्वत पर जन्म दिया। नवोत्पन्न पुत्र को पर्वत पर ही छोड़ कर वह पति के पास आ गई।
इधर पर्वत पर अकेले पड़े रोते राक्षस-शिशु को शिव-पार्वती ने देखा। दयावश उन्होंने उस शिशु को तुरंत ही माता की उम्र का बड़ा और दीर्घायु होने का वरदान दे दिया। उसे एक पुर (नगर) के समान विमान भी दे दिया। यही बालक आगे चल कर सुकेश कहलाया। माता पार्वती ने सभी राक्षस-स्त्रियों को यह वरदान भी दे दिया कि वे गर्भधारण करते ही बालक जने और वह शिशु तुरंत ही माता के समान उम्र का हो जाए।
बलवान और विमान से युक्त सुकेश को अभिमान हो गया।
सर्ग 5 (रावण के परनाना सुकेश का वृतांत)
ग्रामणी नामक गंधर्व ने अपनी पुत्री देववती का विवाह सुकेश से कर दिया। इस युगल को तीन पुत्र हुए – माल्यवान, सुमाली और माली। इन तीनों ने भी मेरु पर्वत पर जाकर तपस्या की। इन तीनों ने ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त किया: “हममें आपस में स्नेह बना रहे, कोई हम लोगों को जीत न पाए, अपने शत्रुओं का हम संहार किया करें और हम अजर-अमर बने रहें।”
वरदान पाकर ये तीनों भाई सभी लोगों को भयभीत करने लगे। उन्होंने शिल्पियों में श्रेष्ठ चिरजीवी विश्वकर्मा जी से अपने लिए भवन बनाने के लिए कहा। विश्वकर्मा जी ने कहा कि उन्होंने इन्द्र की आज्ञा से त्रिकूट पर्वत पर लंका नामक एक अत्यंत सुंदर नगर बनाया है, तुम लोग जाकर वहीं रहो।
ये तीनों भाई लंका नगर में अन्य राक्षसों के साथ रहने लगे। उन तीनों का विवाह नर्मदा नामक एक गंधर्वी की तीन पुत्रियों के साथ हुआ। माल्यवान की पत्नी का नाम था सुंदरी। इस युगल को सात पुत्र (वज्रमुष्टि, विरूपाक्ष, दुर्मुख, सुप्तघ्न, यज्ञकोपी, मत्त, उन्मत्त) और एक पुत्री (अनला) हुई।
सुमाली की पत्नी का नाम था केतुमती। इस युगल को दस पुत्र हुए- प्रहस्त, कंपन, विकट, कलिकामुख, धूम्राक्ष, दण्ड, महाबली, सुपार्श्व, संह्रादि, प्रघस, भासकर्ण। इनके अतिरिक्त चार पुत्रियाँ भी थीं- कुंभीनसी, कैकसी, राका, पुष्पोत्कटा।
माली-वसुधा के पुत्र हुए – अनल, शरभ, हर, संपाती (ये चारों आगे चल कर विभीषण के मंत्री हुए और उनके साथ ही श्रीराम की शरण में चले गए थे)।
सर्ग 6 (रावण की माँ का कुल)
अब राक्षसों का परिवार बहुत बढ़ गया था। धन और बल भी था उनके पास। अतः उन्होंने अभिमान में आकर निर्दोष लोगों को सताना शुरू किया। उनसे सताए हुए सभी देवता, ऋषि-मुनि आदि भगवान शिव की शरण में पहुँचे। भगवान शिव ने कहा कि सुकेश को उन्होंने वरदान दिया है, इसलिए वे तो स्वयं उनका संहार नहीं कर सकते, पर भगवान विष्णु ऐसा जरूर कर सकते हैं। तदनुसार देवताओं ने जाकर भगवान विष्णु से प्रार्थना की। विष्णु जी ने सुकेश के तीनों पुत्रों का वध करने का आश्वासन दे दिया।
यह समाचार माल्यवान को मिला। वह जानता था कि भगवान विष्णु से वे बच नहीं सकते। इसलिए उसने इस संबंध में अपने दोनों भाइयों से विमर्श किया। उन तीनों ने सोचा कि विष्णु से उनकी कोई शत्रुता तो है नहीं; विष्णु ने देवताओं के कहने से ही उन्हें मारने का मन बनाया है। अतः देवताओं को ही हरा कर मार डालना चाहिए।
उन तीनों ने अपनी भयंकर सेना लेकर देवलोक पर आक्रमण कर दिया। जब भगवान विष्णु को इस आक्रमण का पता चला, तो वे स्वयं युद्ध के लिए आ गए। वे गरुड़ पर आसीन थे। उनके हाथों में सुदर्शन चक्र, नंदक खड्ग, शारंग धनुष और पांचजन्य शंख था।
सर्ग 7
सभी राक्षसों ने अपने भयंकर अस्त्र-शस्त्र लेकर भगवान श्रीहरि विष्णु पर एक साथ ही आक्रमण शुरू कर दिया। भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र एवं बाणों द्वारा सहस्रों राक्षसों का संहार कर दिया और अपने पांचजन्य शंख का नाद किया। शंखनाद और धनुष-टंकार की ध्वनि से भयभीत बची हुई राक्षसी सेना भाग खड़ी हुई।
अपनी सेना को भागते देख पहले सुमाली, फिर उसे कमजोर पड़ता देख उसका भाई माली, भगवान विष्णु से भिड़ गया। दोनों भाई भगवान विष्णु के समक्ष टिक नहीं सके। माली जब पराजित होने लगा, तब उसने अपनी गदा से भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ जी पर प्रहार कर दिया। अर्द्ध-मूर्छित होकर गरुड़ जी रणभूमि से क्षणभर के लिए विमुख हो गए। पर भगवान विष्णु ने गरुड़ जी की पूँछ की तरफ सिर घुमा कर चक्र से माली का मस्तक काट डाला।
भाई की मृत्यु देख कर सुमाली और माल्यवान लंका की तरफ भागने लगे। तब तक गरुड़ जी चैतन्य हो गए। भगवान विष्णु और उनके वाहन गरुड़ जी ने राक्षसी सेना में भयंकर संहार मचा दिया।
सर्ग 8
भयभीत राक्षस लंका की तरफ भागने लगे, किन्तु क्रोधित भगवान विष्णु उनका पीछा करते हुए चले। इस पर माल्यवान ने उन्हें ललकारते हुए कहा कि “हे नारायण! तुम क्षात्र-धर्म को नहीं जानते, इसलिए भागते हुए शत्रुओं पर प्रहार कर रहे हो।” भगवान विष्णु ने प्रत्युत्तर में निर्दोष देवताओं एवं ऋषियों पर राक्षसों के अत्याचारों का स्मरण दिलाते हुए कहा कि उनके कर्मों को देखते हुए उन्हें मारने का प्रण उन्होंने लिया है, इसलिए उनका कृत्य धर्म-विरुद्ध नहीं है।
इस पर माल्यवान और उसके कुछ राक्षसों ने रुक कर भगवान विष्णु पर एक साथ प्रहार शुरू कर दिया। परंतु उसे भी पराजित होकर लंका भागना पड़ा। इस तरह भगवान विष्णु ने अनेक बार राक्षसों को पराजित किया और उनके प्रमुख सेनापतियों का वध किया। जब बहुत प्रयत्न करने के बाद भी राक्षस उन्हें नहीं पराजित कर सके, तब वे सब अपने परिवार के साथ लंका को त्याग कर पाताल में जा बसे।
पाताल में सालकटंकटा के वंश के समस्त राक्षसों का राजा सुमाली बना।
श्रीराम की सभा में यह कथा सुनाते हुए ऋषि अगस्त्य कहते हैं कि आपने पुलस्त्य वंश के जिन राक्षसों का संहार किया था, वे सब सुमाली, माली और माल्यवान के ही वंशज थे और ये सब रावण से भी शक्तिशाली थे, जिन्हें भगवान विष्णु को छोड़ कर कोई और नहीं पराजित कर सकता था।
ऋषि अगस्त्य श्रीराम से कहते हैं कि चूंकि इन सब राक्षसों को भगवान विष्णु के अतिरिक्त और कोई नहीं पराजित कर सकता है, इसलिए आप साक्षात भगवान विष्णु के अवतार हैं। जब कभी धर्म की अव्यवस्था होती है, तब उसे सुव्यवस्थित करने के लिए आप शरणागतवत्सलता के कारण जन्म लेते हैं (सर्ग 8, श्लोक 27)।
इसके बाद ऋषि पुनः रावण और उसके पुत्रों के जन्म की कथा सुनाना आरंभ करते हैं।
जिस समय राक्षसगण भगवान विष्णु के भय से सुमाली के नेतृत्व में लंका छोड़ कर रसातल में रह रहे थे, उसी समय खाली लंका नगरी में ऋषि पुलस्त्य के बड़े पौत्र विश्रवण (कुबेर) अपने पितामह की आज्ञा से रहने आए। ब्रह्मा जी के वरदान से वे अब लोकपाल (दिग्पाल) बन गए थे। उनके नेतृत्व में लंका नगरी फिर से पुष्पित-पल्लवित होने लगी।
सर्ग 9 (रावण के जन्म और पिता के शाप का वृतांत)

कुछ समय तक तो सुमाली शांति से रसातल में रहता रहा, परंतु बाद में वह वहाँ से निकल कर कभी-कभार मनुष्य-लोक (पृथ्वी) में आने लगा। एक दिन वह पृथ्वी पर अपनी पुत्री कैकसी के साथ विचरण कर रहा था, तो उसने कुबेर जी को पुष्पक विमान पर देखा, जो कि अपने पिता और पितामह से मिलने जा रहे थे।
कुबेर की समृद्धि देख कर उसे बड़ा विस्मय हुआ। रसातल आकर वह हमेशा यही सोचने लगा कि किस तरह कोई ऐसा उपाय करे, जिससे राक्षसों की वृद्धि हो और उनकी समृद्धि बढ़े। उसने सोचा कि अगर वह अपनी पुत्री कैकसी का विवाह ऋषि पुलस्त्य के पुत्र और कुबेर के पिता विश्रवा से करवा देगा, तो उनकी शक्ति और बढ़ जाएगी। इसी उद्देश्य से उसने अपनी पुत्री से कहा कि “हे पुत्री! तू ब्रह्मा के कुल में उत्पन्न पुलस्त्य के पुत्र विश्रवा को स्वयं जाकर वर ले। इससे तुझे भी कुबेर की तरह तेजस्वी पुत्र होंगे।”
पिता की बात मान कर कैकसी विश्रवा ऋषि के आश्रम में गई। उस समय ऋषि शाम को किया जाने वाला अग्निहोत्र कर रहे थे। वह जानती थी कि यह समय प्रणय के लिए उचित नहीं है, फिर भी अपने कुल के गौरव के लिए वह प्रतीक्षा किए बिना उसी समय आई। वह चुपचाप खड़ी होकर अपने पैर के अंगूठे से जमीन को कुरेद रही थी। उसे देख कर विश्रवा ने कहा, “हे भद्रे! तुम किसकी पुत्री हो और यहाँ किसलिए आई हो?”
कैकसी ने अपना और अपने पिता का नाम बताते हुए कहा कि आप तो महर्षि हैं, मेरे मन की बात जान सकते हैं, तो “शेष वृत्तांत आप स्वयं जान सकते हैं”। इस पर महर्षि विश्रवा ने ध्यान लगा कर देखा और बोले:
“हे भद्रे! तू मुझसे पुत्र उत्पन्न कराने की इच्छा से यहाँ आई है, किन्तु तुमने समय का ध्यान नहीं रखा। इसलिए तुम्हारी इच्छा तो पूरी होगी, तुम्हें पुत्र होंगे, पर वे पुत्र क्रूर कर्म करने वाले होंगे। उन राक्षसों के कर्म ही नहीं बल्कि शक्ल भी भयानक होगी और उनकी प्रीति भी उन जैसे क्रूर कर्म करने वाले बंधु-बांधवों से होगी।”
कैकसी बोली, “हे भगवन! आप जैसे ब्रह्मवादी द्वारा मैं ऐसे दुराचारी पुत्र नहीं चाहती। अतः आप मेरे ऊपर कृपा कीजिए।”
विश्रवा बोले, “तुम्हारा सबसे अंतिम पुत्र राक्षस होकर भी मेरे कुल के अनुरूप धर्मात्मा होगा।”
कुछ समय उपरांत कैकसी ने एक भयंकर रूप वाले राक्षस-पुत्र को जन्म दिया। उसके दस सिर थे, बीस हाथ और दाँत बड़े-बड़े थे। उसका शरीर बहुत बड़ा था। शरीर काला, ओष्ठ लाल, और सिर के बाल चमकीले थे। मुख भी सामान्य राक्षसों से कुछ बड़ा था। उस बालक के जन्म लेते ही बड़े अपशकुन होने लगे। [यानि रावण के दस सिर और बीस भुजाएँ उसके बुद्धिमान और बलवान होने के कारण नहीं, अपितु पिता के शाप से आई विकृति थी।]
पिता विश्रवा ने ही उस बालक का नामकरण किया। दश सिर होने के कारण उन्होंने उसका नाम दशग्रीव रखा। (आगे चल कर यही बालक रावण नाम से प्रसिद्ध हुआ।)
उसके बाद कैकसी ने कुंभकर्ण को जन्म दिया। वह बहुत अधिक लंबा और चौड़ा था।
तीसरी संतान के रूप में शूर्पनखा का जन्म हुआ। वह भी दिखने में सुंदर नहीं थी।
चौथी संतान के रूप में पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम विभीषण रखा गया। यह बालक भी दिखने में तो राक्षस-कुल के अनुरूप काला था, पर उसका रूप भयानक नहीं था। उसके जन्म पर शुभ शकुन हुए।
चारों भाई-बहन उसी वन में पलने लगे। रावण और कुंभकर्ण वन में घूमते; रास्ते में अगर कोई जीव-जंतु या धर्मात्मा ऋषि-मुनि मिल जाते, तो कुंभकर्ण उन्हें मार कर खा जाता था, पर इतना खाने के बाद भी उसकी भूख तृप्त नहीं होती थी। दूसरी तरफ उनका छोटा भाई विभीषण अपना अधिकांश समय धर्म-कार्य और स्वाध्याय में व्यतीत करते। वे नियताहारी और जितेंद्रिय थे।
एक दिन कुबेर अपने पिता और पितामह से मिलने पुष्पक विमान से उस आश्रम में आए। उन्हें देख कर कैकसी ने अपने बड़े पुत्र दशग्रीव से कहा कि देखो कुबेर को, तुम दोनों एक ही पिता की संतान हो, लेकिन तुम दोनों में कितना अंतर है; तुम कोई ऐसा प्रयत्न करो ताकि तुम भी कुबेर की तरह तेजस्वी हो जाओ। दशग्रीव को भी अपने भाई के ऐश्वर्य से ईर्ष्या हुई। उसने प्रतिज्ञा की कि वह अपने पराक्रम से कुबेर (वैश्रवण) के समान अथवा उससे भी अधिक हो जाएगा।
अपनी इस प्रतिज्ञा को पूरी करने के लिए उसने तपस्या द्वारा सिद्धि प्राप्त करने का निश्चय किया। उसने अपने दोनों छोटे भाइयों को भी अपने साथ तपस्या करने के लिए कहा।
रावण, कुंभकर्ण और विभीषण- तीनों भाई तपस्या के लिए गोकर्ण नामक शुभ आश्रम में आ गए।
[रावण का वंश वृक्ष
ब्रह्मा जी की परंपरा (पितृ पक्ष / ऋषि वंश/ब्राह्मण)
- प्रजापति ब्रह्मा जी –
- पुत्र: पुलस्त्य ऋषि
- पुत्र: विश्रवा (माता: तृणबिन्दु की पुत्री)
- प्रथम विवाह: देववर्षिनी (भरद्वाज मुनि की पुत्री)
- पुत्र: वैश्रवण / कुबेर
- प्रथम विवाह: देववर्षिनी (भरद्वाज मुनि की पुत्री)
- पुत्र: विश्रवा (माता: तृणबिन्दु की पुत्री)
- पुत्र: पुलस्त्य ऋषि
रावण का मातृ पक्ष (राक्षस वंश)
- हेती (विवाह: भया – काल की बहन)
- पुत्र: विद्युत्केश (विवाह: सालकटंकटा – संध्या की पुत्री)
- पुत्र: सुकेश (विवाह: देववती – गंधर्व ग्रामणी की पुत्री)
- पुत्र 1: माल्यवान (विवाह: सुंदरी – नर्मदा गंधर्वी की पुत्री)
- पुत्र (7): वज्रमुष्टि, विरूपाक्ष, दुर्मुख, सुप्तघ्न, यज्ञकोपी, मत्त, उन्मत्त
- पुत्री: अनला
- पुत्र 2: सुमाली (विवाह: केतुमती – नर्मदा गंधर्वी की पुत्री) — [रावण के नाना]
- पुत्र (11): प्रहस्त, कंपन, विकट, कलिकामुख, ध्रुमाक्ष, दण्ड, महाबली, सुपार्श्व, संह्रादि, प्रघस, भासकर्ण
- पुत्री: कुंभीनसी, कैकसी (रावण की माता), राका, पुष्पोत्कटा
- पुत्र3: माली (विवाह: वसुधा – नर्मदा गंधर्वी की पुत्री)
- पुत्र: अनल, शरभ, हर, संपाती (विभीषण के मंत्री)
- पुत्र 1: माल्यवान (विवाह: सुंदरी – नर्मदा गंधर्वी की पुत्री)
- पुत्र: सुकेश (विवाह: देववती – गंधर्व ग्रामणी की पुत्री)
- पुत्र: विद्युत्केश (विवाह: सालकटंकटा – संध्या की पुत्री)
रावण का सीधा वंश संबंध
- पितामह (दादा): पुलस्त्य ऋषि
- मातामह (नाना): सुमाली
- पिता: विश्रवा
- माता: कैकसी (सुमाली और केतुमती की पुत्री)
- सौतेले भाई: वैश्रवण (कुबेर)
मातृपक्ष के अधिकांश राक्षस संबंधी रावण के मंत्री और सेनापति बने और राम के साथ युद्ध में मारे गए।]




