हनुमान जी द्वारा बाल्यकाल में सूर्य को निगलने की घटना जनसामान्य में अत्यंत प्रचलित है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने ‘हनुमान चालीसा’ में लिखा:
“युग सहस्र योजन पर भानु। लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥”
तथा ‘हनुमान बाहुक’ में लिखा:
“बाल समय रबि भक्षि लियो तब तिनहुँ लोक भयो अँधियारो॥”
इन पंक्तियों के आधार पर समाज में यह धारणा बनी कि हनुमान जी ने सूर्य को अपने मुख में रख लिया था। किंतु जब हम इस प्रसंग के सबसे प्राचीन एवं मूल स्रोत ‘वाल्मीकि रामायण’ का अध्ययन करते हैं, तो वास्तविकता कुछ और ही सामने आती है।
1. वाल्मीकि रामायण का मूल साक्ष्य (किष्किंधा काण्ड)
वाल्मीकि रामायण के प्रथम पाँच काण्डों में हनुमान जी के बाल्यकाल का कोई वर्णन नहीं है। उनका पहला उल्लेख किष्किंधा काण्ड में राम-लक्ष्मण से भेंट के समय होता है। बाल्यकाल की इस घटना का उल्लेख केवल एक स्थान पर आता है, जब समुद्र तट पर वानर दल 100 योजन का समुद्र पार करने में असमर्थ महसूस कर रहा था। तब ऋक्षराज जांबवान जी हनुमान जी को उनकी असीम शक्ति का स्मरण कराते हुए यह प्रसंग सुनाते हैं।
वाल्मीकि रामायण (किष्किंधा काण्ड, सर्ग 66, श्लोक 21-23):
अभ्युत्थितं ततः सूर्यं बालो दृष्ट्वा महावने।
फलं चेति जिघृक्षुस्त्वमुत्प्लुत्याभ्युत्पतो दिवम्॥२१॥
अर्थ: बाल्यावस्था में एक विशाल वन के भीतर उदित होते हुए सूर्य को देखकर तुमने समझा कि यह कोई स्वादिष्ट फल है; अतः उसे लेने के लिए तुम सहसा आकाश में उछल पड़े।
शतानि त्रीणि गत्वाथ योजनानां महाकपे।
तेजसा तस्य निर्धूतो न विषादं गतस्ततः॥२२॥
अर्थ: हे महाकपे! तीन सौ योजन ऊँचे जाने के बाद सूर्य के प्रचंड तेज से आक्रांत होने पर भी तुम्हारे मन में कोई खेद, भय या चिंता नहीं हुई।
त्वामप्युपगतं तूर्णमन्तरिक्षं महाकपे।
क्षिप्तमिन्द्रेण ते वज्रं कोपाविष्टेन तेजसा॥२३॥
अर्थ: हे कपिश्रेष्ठ! जब तुम आकाश में तेज़ी से आगे बढ़ते हुए सूर्य के समीप पहुँच गए, तब इंद्र ने कुपित होकर तुम्हारे ऊपर अपने तेजस वज्र का प्रहार किया।
2. श्लोकों का वास्तविक अर्थ एवं दूरी का गणित

वाल्मीकि रामायण के इन तीनों श्लोकों का स्पष्ट अर्थ यह है कि:
हनुमान जी ने उदित होते सूर्य को फल समझकर उसकी ओर केवल छलांग लगाई (उड़ान भरी) थी। वे आकाश में तीन सौ योजन की दूरी तक गए थे। जब वे सूर्य के ताप व तेज के निकट पहुँचने लगे, तब स्थिति को देखते हुए देवराज इंद्र ने उन पर वज्र का प्रहार कर दिया।
दूरी एवं योजन का विश्लेषण:
यदि प्राचीन माप ‘योजन’ को आधुनिक दूरी की इकाइयों से तुलना करें (जहाँ 1 योजन लगभग 12 से 15 किमी माना जाता है), तो 300 मानक योजन की दूरी लगभग 3,600 से 4,000 किलोमीटर होती है। रामायण काल में भारत और लंका के बीच की दूरी 100 योजन बताई गई है। जांबवान जी का मुख्य उद्देश्य हनुमान जी को यह याद दिलाना था कि “जब तुम बचपन में 300 यजन ऊँचे आकाश में उड़ सकते थे, तो अब केवल 100 योजन (समुद्र) पार करना तुम्हारे लिए अत्यंत सरल कार्य है।”
3. तुलसीदास जी की चौपाई और खगोलीय गणना
हनुमान चालीसा की पंक्ति “युग सहस्र योजन पर भानु” का यदि प्राचीन गणितीय विश्लेषण किया जाए:
- 1 युग = 12,000 वर्ष
- 1 सहस्र = 1,000
- 1 योजन = 8 मील (लगभग)
गणना: 12,000×1,000×9=9,60,000,000 मील (लगभग 15 करोड़ किलोमीटर), जो सूर्य और पृथ्वी के बीच की वास्तविक वैज्ञानिक दूरी के अत्यंत निकट है।
तुलसीदास जी ने इस खगोलीय दूरी का उल्लेख करते हुए हनुमान जी के अतुलित बल और गति का काव्य रूप में वर्णन किया है। लोक-परंपराओं और पुराणों (जैसे शिव पुराण व पद्म पुराण) में इस कथा को अधिक नाटकीय और रोचक बनाने के लिए ‘निगलने’ और ‘अंधकार छा जाने’ का रूपक दिया गया।
निष्कर्ष
वाल्मीकि रामायण के प्रामाणिक साक्ष्यों से यह सिद्ध होता है कि हनुमान जी ने सूर्य को निगला (खाया) नहीं था। उन्होंने बालसुलभ जिज्ञासा में सूर्य की ओर ऊर्ध्व छलांग (उड़ान) लगाई थी। जांबवान जी ने इसी पराक्रम का स्मरण कराकर उन्हें समुद्र लाँघने हेतु प्रेरित किया था। कालान्तर में काव्य-सौंदर्य, पौराणिक कथाओं और भक्ति-साहित्य में इसे भक्तिमय व रूपकात्मक शैली में ‘सूर्य को निगलने’ के रूप में चित्रित किया जाने लगा।
