एक ब्राह्मण पिता का शापित पुत्र रावण कैसे बना राक्षसों का राजा?/ramayan katha part 78

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अगस्त-राम संवाद

श्रीराम की सभा में अगस्त ऋषि पहले रावण के माता-पिता और उनके कुल के विषय में बताने के बाद विस्तार से बताते हैं कि रावण कैसे राक्षसों का राजा बना। उसका जन्म और बाल्यकाल अपने पिता और पितामह के आश्रम में ही बिता था। वहीं उसने ब्राह्मणों के अनुकूल शिक्षा प्राप्त किया।

लेकिन उसके पालन-पोषण में उसके मातृ कुल का प्रभाव अधिक था। उसके नाना ने इसी कारण अपनी पुत्री से ऋषि विश्रवा से संतान प्राप्ति करने के लिए कहा ताकि उसकी पुत्री का पुत्र भी कुबेर की तरह तेजस्वी हो और राक्षस कुल का खोया वैभव वापस दिला सके।

सर्ग 10 (रावण एवं उसके भाइयों की तपस्या और वरदान)

रावण की माता अपने पुत्रों से अपने सौतेले भाई कुबेर की तरह तेजस्वी, शक्तिशाली और वैभवशाली होने की अपेक्षा रखती थी। पिता विश्रवा ऋषि के शाप के प्रभाव वश चार में से तीन बड़े भाई बहन देखने में कुरूप, विकृत और अत्यंत क्रूर थे। लेकिन सबसे छोटा विभीषण पर अपने पिता के कुल का प्रभाव अधिक था जैसा कि पिता ने शाप देते हुए कहा था।

शक्तिशाली बनाने के लिए तीनों भाइयों ने गोकर्ण आश्रम में 10 हजार वर्षों तक अत्यंत कठोर तपस्या की। रावण प्रति एक हजार वर्षों की तपस्या के बाद अपना एक सिर काट कर होम की अग्नि में आहुति के रूप में डाल देता था। 10 हजार वर्ष पूर्ण होने पर उनके समक्ष ब्रह्मा जी प्रकट हुए और वरदान माँगने के लिए कहा।

रावण ने कहा, “मृत्यु से बढ़ कर प्राणियों का और दूसरा शत्रु नहीं। अतः मृत्यु-भय से बचने के लिए आप मुझे वरदान में अमरत्व दें।” ब्रह्मा जी ने कहा कि ऐसा संभव नहीं है, इसलिए तुम कुछ और माँगो। तब रावण ने इसी वरदान को कुछ दूसरे तरीके से माँगा, “हे प्रजाध्यक्ष! गरुड़, सर्प, यक्ष, दैत्य, दानव, राक्षस और देवताओं से सदा के लिए मुझे अवध्य कर दीजिए। इनके अतिरिक्त किसी अन्य प्राणी की मुझे चिंता नहीं है। मनुष्यों को तो मैं तृणवत समझता हूँ।”

ब्रह्मा जी ने यह वरदान दे दिया। साथ ही अपनी तरफ से एक वरदान दिया कि “जिन सिरों को काट कर तूने अग्नि में होम कर दिया है, वे सिर फिर से पूर्ववत हो जाएँगे। तू अपनी इच्छानुसार रूप धारण कर सकेगा।” उनके ऐसा कहते ही रावण के दस सिर फिर से हो गए।

अब ब्रह्मा जी ने विभीषण से वर माँगने के लिए कहा। विभीषण बोले, “आप मुझे यह वर दें कि दारुण विपत्ति पड़ने पर भी मेरी बुद्धि धर्म में ही बनी रहे। मुझे बिना सिखाए ही ब्रह्मास्त्रों का प्रयोग करना आ जाए और जिस आश्रम में मैं रहूँ, उस आश्रमोचित धर्मों का पालन मैं यथोचित रूप से कर सकूँ;” क्योंकि जो धर्मनिष्ठ हैं, उनके लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं है। ब्रह्मा जी प्रसन्न होकर बोले, “हे वत्स! धर्मनिष्ठ तो तुम हो ही। जैसा तुम होना चाहते हो, वैसे हो जाओगे। राक्षस-कुल में उत्पन्न होकर भी तुम्हारी अधर्म बुद्धि नहीं है। अतः मैं तुमको अमर होने का भी वरदान देता हूँ।”

जब भगवान ब्रह्मा कुंभकर्ण की तरफ वरदान देने के लिए बढ़े, तब देवताओं ने उनसे नम्रतापूर्वक निवेदन किया कि वे उसे वरदान नहीं दें, क्योंकि “बिना वरदान पाए ही यह दुष्ट तीनों लोकों को सताया करता है। नंदन वन में 7 अप्सराओं और इन्द्र के 10 सेवकों को तो यह खा चुका है। इसके द्वारा खाए हुए ऋषि-मुनियों की तो कोई गिनती ही नहीं हो सकती। अतः वरदान पाने के बाद तो यह तीनों लोकों को ही खा डालेगा। अतः इसे वर के बहाने अज्ञान प्रदान कीजिए।”

देवताओं का मत सुनकर ब्रह्मा जी ने कुछ सोचा और फिर देवी सरस्वती का आह्वान किया। देवी सरस्वती की प्रेरणा से कुंभकर्ण ने माँगा, “हे देव! मैं अनेक वर्षों तक सोया करूँ।” ब्रह्मा जी ने उसे वरदान दे दिया। सरस्वती का प्रभाव समाप्त होते ही कुंभकर्ण को आभास हुआ कि उसने क्या मांग लिया! उसने सोचा, देवताओं के सम्मोहन में उसने ऐसा वरदान मांग लिया। किन्तु अब क्या हो सकता था!

तप और वरदान प्राप्त कर तीनों भाई पुनः उस श्लेष्मान्तक वन में चले गए, जहाँ उनके पिता तप किया करते थे।

सर्ग 11 (मातृकुल द्वारा रावण को सौतेले भाई से लंका छीनने के लिए उसकाना)

उधर जब सुमाली को तीनों भाइयों के वरदान का समाचार प्राप्त हुआ, अपने दौहित्र (पुत्री का पुत्र) रावण को वरदानवश शक्तिशाली जान कर वह अपने अनुचरों सहित भयमुक्त होकर पाताल से निकला। उसके साथ उसके सचिव मारीच, महोदर, प्रहस्त, विरूपाक्ष भी थे।

सुमाली और उसके सचिव रावण के पास पहुँचे। उन्होंने रावण को उसके वरदान के लिए बधाई दी। रावण के नाना सुमाली ने उससे अत्यंत स्नेहपूर्वक कहा कि राक्षस अब तक भगवान विष्णु से भयभीत रहते थे, किन्तु ब्रह्मा जी के वरदान के कारण अब रावण को उनका भी भय नहीं था, इसलिए सभी राक्षस निर्भय हो गए। लंका चूँकि राक्षसों का निवास-स्थान था, जिसे कुबेर ने अब ले लिया था, इसलिए सुमाली ने लंका पर रावण एवं राक्षसों का अधिकार जताया। उसने रावण से कहा, “अगर तुम साम, दाम अथवा युद्ध द्वारा ही लंका अपने अधिकार में कर सको, तो यह राक्षसों के लिए बड़ा काम होगा। ऐसा होने पर तुम लंकेश्वर हो जाओगे और हम सबके स्वामी भी।”

उस समय रावण ने अपने नाना की बात यह कह कर मानने से इंकार कर दिया कि कुबेर उसका बड़ा भाई है। सुमाली उस समय चुप रह गया। कुछ समय बाद पुनः प्रहस्त ने उसे उकसाते हुए कहा, “शूरों के लिए भाईपन का विचार कोई विचार नहीं होता” (श्लोक 14, सर्ग 11)। उसने दिति और अदिति का पौराणिक आख्यान उसे सुनाया। दिति से दैत्यों और अदिति से देवताओं की उत्पत्ति हुई थी। एक ही पिता की किंतु दो माताओं की ये संतानें एक-दूसरे से अनवरत युद्ध करती रहीं और एक-दूसरे की शत्रु हुईं। भगवान विष्णु ने दैत्यों के विरुद्ध देवताओं की सहायता की थी।

सुमाली और प्रहस्त के समझाने पर रावण ने अपने सौतेले भाई कुबेर से लंका छीनने का निश्चय किया।

रावण द्वारा लंका पर अधिकार

योजना को कार्य-रूप देते हुए रावण स्वयं लंका के बाहर त्रिकूट पर्वत पर रुका और प्रहस्त को अपना दूत बना कर कुबेर के पास यह संदेश देने भेजा कि यह नगरी राक्षसों की है, इसलिए वे इसे लौटा दें।

दूत प्रहस्त ने ऐसा ही लंकाधिपति कुबेर से कहा। कुबेर ने कहा, “हे दूत! यह लंका नगरी खाली पड़ी थी। इसमें कोई भी राक्षस नहीं रहता था। इसे खाली देख कर मेरे पिता ने मुझे यह रहने के लिए दी। मैंने दान और मान देकर अनेक लोगों को यहाँ बसा कर इसे आबाद किया। भाई होने के नाते यह राज्य और धन आदि मेरा और तुम्हारा दोनों का है।”

अपने छोटे भाई रावण के दूत को इस संदेश के साथ विदा कर कुबेर अपने पिता के पास आए और सारा हाल उन्हें सुना दिया। पिता विश्रवा ने कहा कि रावण ने यह बात मुझसे भी कही थी और मैंने उसे इस बात के लिए डाँटा। मैंने यह भी कहा कि “भाई के धन को अधर्मपूर्वक लेने से तू नष्ट हो जाएगा; लेकिन उसने मेरी बात को अनसुना कर तुम्हारे पास अपना दूत भेजा।” विश्रवा ने यह भी कहा, “जब से रावण को वरदान मिला है, तब से वह बहुत दुष्टबुद्धि हो गया है। मेरे शाप के कारण उसका स्वभाव और उग्र हो गया है।”

पिता विश्रवा ऋषि ने अपने ज्येष्ठ पुत्र कुबेर को अपने अनुयायियों के साथ कैलाश पर्वत पर मंदाकिनी नदी के पास, जहाँ देवता, गंधर्व, अप्सराएँ और किन्नर रहते हैं, एक और नगर बसा कर रहने और लंका को खाली कर देने का परामर्श दिया।

यह सुन कर कुबेर पिता की आज्ञा मान कर अपने परिवार, मंत्रियों, वाहन और धन के साथ कैलाश पर चले गए।

प्रहस्त ने प्रसन्नतापूर्वक यह सब समाचार रावण को देते हुए कहा कि कुबेर लंका खाली कर चले गए हैं, अतः अब आप हम सब लोगों के साथ वहाँ चलिए और राज्य कीजिए। इस तरह लंका नगर पर रावण का अधिकार बिना किसी रक्तपात के हो गया।

रावण का लंका नरेश बनाना

ब्रह्मा जी के वरदान के कारण रावण शक्तिशाली हो गया था। क्रूर स्वभाव का तो वह बचपन से ही था। अपने भाई से उसे लंका का वह नगर भी मिल गया जिसे राक्षस अपनी संपत्ति समझते थे। रावण ने जब अपने सहयोगियों के साथ कुबेर की त्यागी हुई लंका में प्रवेश किया तब जैसा कि उसके नाना सुमाली ने कहा था, उसे सभी राक्षसों ने राजा मान कर राजतिलक किया।

उन सबके वहाँ आने के बाद अन्य अनेक राक्षस-यूथ आकर वहाँ रहने लगे। इस तरह राशस जाति का वैभव और सम्मान फिर से वापस पाने के कारण उसका राक्षसों में सम्मान और प्रभाव बहुत बढ़ गया। माता कुल के लगभग सभी शक्तिशाली राक्षस उसके सहायक थे।

[(1) लंका की स्थापना देवराज इन्द्र के कहने पर विश्वकर्मा जी ने किया था। (2) पर वह क्यों और कैसे खाली हुआ यह रामायण में नहीं दिया गया है। (3) रावण ने नाना सुमाली और उसके भाइयों ने अपने लिए नगर बनाने हेतु जब विश्वकर्मा जी से कहा तो उन्होने रिक्त पड़े लंका में जाकर रहने का सुझाव दिया। इसके बाद वहाँ राक्षस रहने लगे। (4) विष्णु भगवान के भय से राक्षस लोग जब रसातल जाकर रहने लगे तब से यह नगर खाली पड़ा था। इस खाली नगर में अपने पिता के कहें पर कुबेर ने यक्षों के साथ रहना शुरू किया। (5) रावण के कहने पर कुबेर ने फिर से यह नगर खाली कर दिया और यह यक्षों से फिर राक्षसों के पास आ गई। रावण यहाँ का राजा बना।]                 

इधर कुबेर ने लंका छोडने के बाद कैलाश पर्वत पर अति सुंदर अलकापुरी नामक नगर बसा कर वहाँ रहना शुरू किया।

सर्ग 12 (रावण और उसके भाई-बहनों का विवाह)

रावण के नेतृत्व में लंका में राक्षसों का एक समृद्ध राज्य बस गया। रावण को अपनी बहन शूर्पनखा के विवाह की चिंता हुई। कालकेय वंश के दानव-राजा विद्युज्जिह्व के साथ उसका विवाह हुआ।

एक दिन रावण शिकार खेलने गया। वहाँ उसने वन में मय दानव को देखा। उसके साथ उसकी पुत्री भी थी। पूछने पर मय दानव ने अपनी कथा सुनाई। मय का प्रेम एक अप्सरा हेमा से हुआ। बहुत दिनों तक दोनों साथ रहे। इस युगल को एक पुत्री एवं दो पुत्र हुए। पुत्रों के नाम- मायावी एवं दुंदुभी, एवं पुत्री का नाम था मंदोदरी। तदुपरांत देवताओं के कार्य करने के लिए हेमा देवलोक चली गई। उसके जाने से मय दानव बहुत दुखी हुआ। अपने ही बनाए स्वर्ण-नगर में अपनी पुत्री के साथ वह चौदह वर्ष तक अकेले रहा। इसके बाद उसे पुत्री के विवाह की चिंता हुई। पुत्री के विवाह हेतु वर ढूँढने निकला है।

मय दानव ने अपनी कथा सुनाने के बाद रावण से उसका परिचय पूछा।

रावण ने अपना परिचय ऋषि पुलस्त्य के पौत्र और ऋषि विश्रवा के पुत्र के रूप में दिया। रावण को एक ऋषि का पुत्र जान कर मय दानव ने उससे अपनी पुत्री मंदोदरी को पत्नी के रूप में ग्रहण करने का आग्रह किया। रावण ने इसे स्वीकार कर लिया। वहीं वन में अग्नि जला कर दोनों का पाणिग्रहण-संस्कार (विवाह) सम्पन्न हुआ।

मय दानव को रावण को उसके पिता विश्रवा से मिले शाप (वह क्रूर कर्म करने वाला होगा) का ज्ञान था। फिर भी उसने उसे ब्रह्मा जी के कुल का समझ कर अपनी पुत्री का विवाह उससे किया। पर समय आने पर उसकी सहायता द्वारा एक अमोघ अस्त्र भी दिया, जिसका नाम था ‘शक्ति’ (इसी से उसने लक्ष्मण जी पर प्रहार किया था)। यह ‘शक्ति’ मय दानव ने तपस्या करके प्राप्त की थी। पत्नी और ‘शक्ति’ के साथ रावण अपनी राजधानी लंका चला आया।

बाद में रावण ने अपने दोनों छोटे भाइयों का भी विवाह करवाया। कुंभकर्ण का विवाह हुआ दैत्यों के राजा बलि की दौहित्री (वैरोचना की पुत्री) वज्रज्वाला से। विभीषण का विवाह हुआ गंधर्वराज शैलूष की पुत्री सरमा से। सरमा का जन्म मानसरोवर के तट पर हुआ था। विभीषण की तरह ही उनकी पत्नी सरमा भी बड़ी धर्मज्ञा थी।

समय आने पर रावण को मंदोदरी से एक पुत्र उत्पन्न हुआ। जन्म लेते ही उसने इतनी तेज गर्जना की कि उसका नाम रावण ने मेघनाद रख दिया।

[रावण और उसके भाइयों एवं बहन के पति/पत्नी की सूची:

  • रावण — मंदोदरी (मय दानव और अप्सरा हेमा की पुत्री)
  • कुंभकर्ण — वज्रज्वाला (राजा बलि की दौहित्री (वैरोचना की पुत्री)
  • विभीषण — सरमा (गंधर्वराज शैलूष की पुत्री)
  • शूर्पनखा — विद्युज्जिह्व (कालकेय वंश का दानव-राजा]

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