राम सेना द्वारा लंका पर आक्रमण और महायुद्ध का आरंभ | Valmiki Ramayan Katha Part 47

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दोनों सेनाओं के अग्रिम दस्तों (Advance Guards) के मध्य छोटी-मोटी मुठभेड़ें तो प्रारंभ हो चुकी थीं, किंतु विधिवत रूप से महायुद्ध का शंखनाद होना अभी शेष था।

वीर हनुमान और युवराज अंगद बिना किसी भय के लंका के भीतर तक जाकर रावण को अपनी शक्ति का परिचय दे चुके थे। श्रीराम अपनी सेना के साथ समुद्र पर विशाल सेतु (नल-सेतु/राम सेतु) बनाकर उसे पार कर चुके थे। सैकड़ों अक्षौहिणी वानर-सेना ने लंका सहित समस्त त्रिकुट पर्वत को चारों ओर से घेर लिया था, और सुषेण के नेतृत्व में अग्रिम वानर दस्ता लंका के दुर्ग की दीवारों (प्राचीर) पर निर्भीकता से विचरण कर रहा था। इन सब घटनाओं से लंका के अधिकांश राक्षस भीतर ही भीतर भयभीत थे, तथा कई नागरिक इस युद्ध को अधर्म और अनर्थकारी मान रहे थे। ऐसे में, दूत बनकर गए अंगद के सकुशल लौटने के पश्चात युद्ध का औपचारिक आरंभ होना पूर्णतः तय हो गया।

लंका के दुर्ग पर वानर सेना का अधिकार एवं रणनीतिक बढ़त

पूर्व-नियोजित रणनीति के अनुसार युद्ध का श्रीगणेश सुषेण के नेतृत्व में दुर्ग की प्राचीर पर तैनात वानर सेना ने किया। वानरों ने तत्काल आक्रमण करके दुर्ग-रक्षकों को खदेड़ दिया और लंका की प्राचीर पर पूर्ण रूप से अधिकार कर लिया।

प्राचीर पर अधिकार हो जाने से वानरों को एक बड़ी रणनीतिक बढ़त प्राप्त हुई। वे ऊँचे स्थान पर खड़े होकर नगर के भीतर होने वाली राक्षसी सेना की प्रत्येक गतिविधि पर सीधी नज़र रख सकते थे। कौन-सा राक्षस सेनापति कितनी सेना लेकर किस द्वार से युद्ध के लिए निकल रहा है, इसकी सटीक सूचना सुषेण की टुकड़ी तुरंत नीचे खड़ी मुख्य वानर सेना को दे रही थी।

युद्ध के प्रथम चरण में वानरों ने नगर की सुरक्षा हेतु बनी गहरी खाइयों को मिट्टी, पत्थरों और उखाड़े गए वृक्षों से पाट दिया। वे सुगमता से दुर्ग की दीवारों पर चढ़ गए, विशाल फाटकों को उखाड़ फेंका और स्वर्ण निर्मित भव्य तोरण-द्वारों को चकनाचूर कर दिया। दुर्ग की दीवारों पर दौड़ते और हर्षध्वनि करते वानरों को देखकर लंका के भीतर भय व्याप्त हो गया। संपूर्ण लंका नगरी श्रीरामचंद्र की जय!”, “महाबली लक्ष्मण की जय!”, “महाराज सुग्रीव की जय!” के प्रचंड जयघोषों से गूँज उठी।

रावण द्वारा युद्ध का आदेश

उधर, अंगद द्वारा सभाभवन में किए गए शौर्य-प्रदर्शन से रावण क्रोध और रोष से तिलमिलाया हुआ था। तभी उसे सूचना मिली कि वानर सेना ने दुर्ग की दीवारों पर अधिकार कर लिया है और वे मुख्य द्वारों के अत्यंत निकट पहुँच चुके हैं। रावण ने नगर की सुरक्षा व्यवस्था और कड़ी की तथा स्वयं अपने प्रासाद (महल) की सबसे ऊँची अटारी पर चढ़कर बाहर का दृश्य देखने गया।

बाहर का दृश्य देखकर रावण हतप्रभ रह गया। लंका के चारों ओर अपरंपार वानर सेना जयघोष करती हुई खड़ी थी, जिन्हें वहाँ से हटाना असंभव प्रतीत हो रहा था। युद्ध को अपने नगर की सीमा तक पहुँचा देख रावण ने अपनी सेना को तुरंत नगर से बाहर निकलकर आक्रमण करने का आदेश दिया, ताकि वानर सेना नगर के भीतर प्रवेश करके आम नागरिकों और संपत्ति को क्षति न पहुँचा सके।

राक्षस सेना लंका के चारों द्वारों से बाहर निकल आई। बाहर वानर सेना उनका मान-मर्दन करने के लिए पूरी तरह तैयार खड़ी थी। इधर श्रीराम ने भी अपनी सेना को ‘आक्रमण’ का अंतिम आदेश दे दिया।

राक्षस एवं वानर सेना में भीषण द्वंद्व युद्ध (सर्ग 42 – 43)

आदेश मिलते ही लंका के प्रत्येक द्वार पर दोनों सेनाओं के मध्य अत्यंत भीषण संग्राम छिड़ गया। प्रारंभ में तो सामूहिक भिड़ंत हुई, किंतु शीघ्र ही यह युद्ध ‘द्वंद्व युद्ध’ (One-on-One Combat) में बदल गया। प्रत्येक वीर योद्धा अपने समकक्ष शत्रु से भिड़ गया:

  • मेघनाद का मुकाबला युवराज अंगद से हुआ।
  • विभीषण का युद्ध रावण के योद्धा मित्रघ्न से हुआ।
  • सेनापति नील राक्षस योद्धा निकुंभ से लड़े।
  • महाराज सुग्रीव का सामना प्रघसेन से हुआ।
  • हनुमान जी राक्षस जंबुमाली से भिड़ गए।
  • वानर वीर गज का सामना तपन से हुआ।
  • लक्ष्मण जी का युद्ध विरूपाक्ष से हुआ।
  • श्रीराम स्वयं सुप्तघ्न तथा यज्ञकोपी जैसे भयंकर राक्षसों से युद्ध करने लगे।

इस द्वंद्व युद्ध में राक्षस सेना धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ने लगी। वानर सेनापति सुबाहु, नल और पनस दुर्ग के परकोटे को तोड़कर लंका नगर के भीतर तक घुस गए। यद्यपि उन्होंने श्रीराम के सिद्धांतों का पालन करते हुए आम नागरिकों को कोई क्षति नहीं पहुँचाई। वानर सेनापतियों ने सेना के विश्राम हेतु प्राचीर के निकट अपने ‘स्कंधवार’ (सैन्य शिविर) भी स्थापित कर लिए।

सुषेण अब पश्चिमी द्वार पर आकर पूर्ण युद्ध में सम्मिलित हो चुके थे। संध्या ढलने लगी थी और राक्षस सूर्यास्त की प्रतीक्षा कर रहे थे, क्योंकि रात्रिचर होने के कारण अंधकार होते ही राक्षसों की शक्तियाँ कई गुना बढ़ जाती थीं। पीछे हटने के बजाय राक्षस रावण का जयघोष करते हुए रात्रि के इंतज़ार में डटे रहे। प्रथम दिन का यह युद्ध इतना भयावह था कि वीरों के मांस और रक्त से समरांगण में कीचड़ जम गया था।

भीषण रात्रि-युद्ध एवं मेघनाद की पराजय (सर्ग 44)

सूर्यास्त होते ही राक्षसों ने दुगुने उत्साह से वानरों पर धावा बोल दिया। घनघोर अंधकार में अति-भीषण रात्रि-युद्ध प्रारंभ हो गया। अंधकार में दृश्यता शून्य होने के कारण सैनिक एक-दूसरे से पूछ-पूछकर प्रहार कर रहे थे—तुम राक्षस हो?तुम वानर हो?

काली अंधियारी रात में राक्षसों के शरीरों पर धारण किए गए स्वर्णिम कवच ही उनकी एकमात्र पहचान थे, जो रह-रहकर चमक उठते थे। घोड़ों और रथों के पहियों से उड़ती धूल ने आँखों में पड़कर स्थिति को और विकट बना दिया था। अंधकार में अस्त्र-शस्त्रों की झंकार, युद्ध-वाद्य, पकड़ो!”, “मारो!”, “कहाँ भागते हो!” की गर्जनाएँ और घायलों की चीत्कारें—इन सबसे रणभूमि का वातावरण अत्यंत भयानक हो उठा था।

रात्रि होने के बावजूद, वानर सेना पीछे नहीं हटी और राक्षसों को बराबरी की टक्कर देती रही। श्रीराम और लक्ष्मण के बाण अंधकार में भी अचूक प्रहार कर रहे थे। राक्षस मायावी शक्तियों का सहारा लेकर अदृश्य होकर वार कर रहे थे, किंतु श्रीराम और लक्ष्मण जी के दिव्यास्त्र दृश्य और अदृश्य दोनों प्रकार के राक्षसों का संहार कर रहे थे।

इसी बीच छह दुर्धर्ष राक्षस योद्धा—यमशत्रु, महापार्श्व, महोदर, वज्रदंष्ट्र, शुक और सारण—एकजुट होकर अंधकार में श्रीराम पर बाणों की बौछार करने लगे। किंतु श्रीराम ने क्षण भर में अपने तीक्ष्ण बाणों से उन छहों को लहूलुहान कर दिया, जिससे वे भयभीत होकर रणभूमि से भाग खड़े हुए। राम के बाण अनवरत शत्रुओं का विनाश करते रहें।

अंगद द्वारा मेघनाद की पराजय: उधर, युवराज अंगद ने असीम शौर्य का परिचय देते हुए रावण के जेष्ठ पुत्र मेघनाद को द्वंद्व युद्ध में बुरी तरह पराजित कर दिया।

अंगद के हाथों आहत और अपमानित होकर मेघनाद क्रोध से भर उठा। श्रीराम जानते थे कि ब्रह्मा जी के वरदान के कारण मेघनाद की मृत्यु साधारण तरीके से संभव नहीं है, इसलिए उन्होंने अपनी सेना को निर्देश दिया कि वे मेघनाद को छोड़ दें ताकि सही समय आने पर वे स्वयं या लक्ष्मण उसका वध कर सकें।

पराजित मेघनाद प्रत्यक्ष युद्ध का साहस खो बैठा और माया से अंतर्धान (अदृश्य) होकर युद्ध करने की योजना बनाने लगा।

इस तरह, यह रात्रि युद्ध भी बड़ी भयानक हुई। रक्त की नदी की तरह बहने लगी।

प्राचीन भारतीय उपमहाद्वीप में युद्ध का सर्वमान्य नियम था कि सूर्यास्त के पश्चात युद्ध रोक दिया जाता था। किंतु राक्षसों की शक्ति रात्रि में बढ़ जाती थी, इसलिए उन्होंने नियमों का उल्लंघन करते हुए रात्रि-युद्ध जारी रखा। राक्षसों को आशा थी कि वे रात के अंधकार में श्रीराम, लक्ष्मण और वानर सेना को आसानी से परास्त कर देंगे। किंतु श्रीराम की सेना ने इस विकट परिस्थिति में भी अद्भुत अदम्य साहस का परिचय दिया और रात्रि-युद्ध में भी राक्षसों की योजना को पूरी तरह विफल कर दिया।

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