राम ने युद्ध रोकने के अंतिम प्रयास के रूप में किसे दूत बनाकर भेजा? | Valmiki Ramayan Katha Part 46

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दोनों सेनाएँ अपने-अपने मोर्चों पर पूरी तरह डट चुकी थीं। दुर्ग की दीवार पर सुषेण की टुकड़ी की राक्षसों से छोटी-मोटी झड़पें शुरू हो चुकी थीं। किंतु विधिवत युद्ध का आदेश अभी किसी पक्ष ने नहीं दिया था।

श्रीराम समरांगण में होने वाले भीषण नरसंहार और निरपराध जीवों के विनाश को भली-भांति समझते थे। अतः एक उत्तम राजा और धर्मनिष्ठ योद्धा का कर्तव्य निभाते हुए उन्होंने अंतिम क्षणों में भी युद्ध टालने का एक अंतिम अवसर देने का निश्चय किया।

श्रीराम ने बाली-पुत्र अंगद को दूत बनाकर रावण के पास भेजने का निर्णय लिया। उन्होंने अंगद से कहा:

हे अंगद! तुम बिना कोई उपद्रव किए सीधे रावण की राजसभा में जाओ और उसे अंतिम बार समझाओ कि यदि वह अब भी सीता जी को आदर सहित लौटा दे, तो इस महाविनाश को टाला जा सकता है। अन्यथा उसके समस्त कुल और राज्य का सर्वनाश निश्चित है।”

अंगद का लंका जाना एवं शौर्य-प्रदर्शन

अंगद श्रीराम की आज्ञा लेकर एक ही छलांग में आकाशमार्ग से सीधे रावण की राजसभा में जा पहुँचे। उस समय रावण अपने मंत्रियों के साथ बैठा हुआ था। अंगद बिना किसी भय के सीधे उसके सिंहासन के समक्ष उतरे, अपना परिचय दिया और श्रीराम का संदेश ज्यों का त्यों कह सुनाया।

श्रीराम का कठोर चेतावनी भरा संदेश सुनकर रावण क्रोध से आग-बबूला हो उठा। उसने चीखते हुए अपने मंत्रियों से कहा—इस दुर्बुद्धि वानर को पकड़कर तुरंत मार डालो!”

उसके आदेश पर चार विशालकाय और भयंकर राक्षस अंगद को पकड़ने के लिए झपटे। अंगद ने राक्षसों के मनोबल को तोड़ने के लिए स्वयं को आसानी से पकड़ने दिया। फिर, जैसे ही चारों राक्षसों ने उन्हें कसकर पकड़ा, अंगद ने अत्यंत तीव्र वेग से आकाश की ओर छलांग लगा दी और सीधे राजमहल की सबसे ऊँची अटारी (छत) पर जा पहुँचे। उनके इस प्रचंड वेग को न संभाल पाने के कारण चारों राक्षस छत से नीचे ज़मीन पर गिर पड़े।

रावण यह दृश्य देखकर हक्का-बक्का रह गया। तभी अंगद ने प्रचंड हुंकार भरते हुए रावण के भव्य सभाभवन के प्राचीर/अटारी पर अपने पैर से ज़ोरदार प्रहार किया। उनके एक ही आघात से महल का वह विशाल छत्र टूटकर चकनाचूर हो गया।

अंगद ने टूटी हुई अटारी पर खड़े होकर अपना नाम पुकारते हुए ऐसा प्रचंड सिंहनाद किया कि संपूर्ण लंका नगरी काँप उठी। प्राचीर पर खड़े वानरों ने जब यह गर्जना सुनी तो वे हर्षातिरेक से झूम उठे, जबकि भयभीत राक्षसों का बचा-कुचा मनोबल भी ढह गया।

यह सब इतनी तीव्र गति से घटित हुआ कि रावण को सँभलने का अवसर ही नहीं मिला। टूटे हुए राजमहल और मूर्छित पड़े सेवकों को देखकर वह क्रोध से तिलमिला उठा, किंतु तब तक अंगद आकाशमार्ग से उड़कर पुनः श्रीराम के पास पहुँच चुके थे।

अंगद के इस अभूतपूर्व शौर्य, पराक्रम और विजय-घोष से वानर सेना का उत्साह चरम पर पहुँच गया। अब सभी वीर पूरी तैयारी के साथ श्रीराम के ‘आक्रमण’ के अंतिम आदेश की प्रतीक्षा करने लगे।

दोनों पक्षों की अपनी-अपनी सबल और दुर्बल स्थितियाँ थीं, जिनके आधार पर दोनों ओर से युद्ध-रणनीति तैयार की गई।

लंकापति रावण की सेना की दुर्बलताएँ एवं सबलताएँ

  • दुर्बलताएँ: लंका का सबसे बड़ा दुर्बल पक्ष यह था कि युद्ध उनके स्वयं के क्षेत्र (घर) में लड़ा जा रहा था, जिससे सर्वाधिक जन-धन की हानि लंकावासियों को ही होनी थी। शत्रु सेना द्वारा चारों ओर से घेराबंदी किए जाने के कारण बाहर से किसी भी प्रकार की सहायता या रसद सामग्री पाना असंभव था।
  • सबलताएँ: राक्षसों के पास सबसे बड़ी सुविधा यह थी कि थकने या घायल होने पर उनके सैनिक अपने गृह-क्षेत्र में विश्राम कर सकते थे। उनके पास अस्त्र-शस्त्रों, रथों, हाथियों तथा खाद्य-सामग्री का विपुल भंडार सुरक्षित था। इसके अतिरिक्त, शल्य-चिकित्सक (वैद्य), रथकार तथा सूत आदि की तत्काल सहायता उन्हें नगर के भीतर ही उपलब्ध थी।

यद्यपि लंका के कई विवेकशील नागरिक इस युद्ध को अनावश्यक और विनाशकारी मानते थे, किंतु ‘अपने देश के प्रति निष्ठा’ के कारण कुंभकर्ण जैसे योद्धा अधर्म का साथ देने के लिए विवश थे। वहीं विभीषण जैसे धर्मनिष्ठ नीतिज्ञों ने राज्य-हित में रावण का विरोध करते हुए लंका का त्याग कर दिया था। किंतु अहंकारी रावण और उसके चाटुकार मंत्रियों को अपनी अक्षौहिणी सेना, मायावी शक्तियों, दिव्यास्त्रों और अभेद्य दुर्ग पर अत्यधिक अभिमान था। वे इस युद्ध को सुगमता से जीत लेने के प्रति आश्वस्त थे।

श्रीराम की सेना की दुर्बलताएँ एवं सबलताएँ

  • सबलताएँ: श्रीराम की सेना का सबसे बड़ा बल उनका नैतिक साहस, धर्म-निष्ठा और श्रीराम के प्रति अनन्य श्रद्धा थी। उन सबका एकमात्र स्पष्ट लक्ष्य था—अधर्म पर विजय प्राप्त कर सीता जी को रावण के चंगुल से मुक्त कराना।
  • दुर्बलताएँ: वानर सेना के पास आधुनिक अस्त्र-शस्त्र, रथ या हाथी जैसे साधन नहीं थे। उनकी रसद (खाद्य-सामग्री) सीमित थी और वे एक ओर लंका की दीवारों तो दूसरी ओर विशाल समुद्र से घिरे थे।

इसी कारण श्रीराम की सेना ने रणनीति बनाई कि वे युद्ध और जीवन-निर्वाह के लिए पूर्णतः प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर रहेंगे। निकटवर्ती पर्वतों और वनों में उपलब्ध फल-मूल ही उनका आहार थे, तथा विशाल शिलाएँ और उखाड़े गए वृक्ष ही उनके अस्त्र थे। वे युद्ध को यथाशीघ्र समाप्त करना चाहते थे, क्योंकि श्रीराम के 14 वर्षों के वनवास की अवधि भी पूर्ण होने के निकट थी।

युद्ध हेतु सैन्य विन्यास एवं व्यूहरचना

दोनों पक्षों ने अपने-अपने प्रमुख सेनापतियों को उनकी सैन्य टुकड़ियों के साथ रणनीतिक मोर्चों पर नियुक्त कर दिया:

  • पूर्वी द्वार: सेनापति नील अपने सहायक नायकों मैंद और द्विविद के साथ तैनात किए गए।
  • दक्षिणी द्वार: युवराज अंगद अपने सहायक सेनापतियों—ऋषभ, गवाक्ष, गज और गवय की सेनाओं के साथ नियुक्त हुए।
  • पश्चिमी द्वार: हनुमान जी इस मोर्चे को संभाल रहे थे। उनकी सहायता हेतु प्रमाथी और प्रघास जैसे यूथपति तैनात थे। यहीं महाराजा सुग्रीव और ऋक्षराज जांबवान भी अपनी-अपनी सैन्य टुकड़ियों के साथ उपस्थित थे।
  • उत्तरी द्वार: स्वयं श्रीराम और लक्ष्मण जी इस मुख्य द्वार पर डटे हुए थे, जहाँ शत्रु पक्ष से स्वयं रावण कमान संभाल रहा था। सुग्रीव और जांबवान का मोर्चा उत्तरी द्वार के ठीक पीछे भी रक्षा-पंक्ति के रूप में कार्य कर रहा था।

अग्रिम दस्ता एवं आरक्षित (रिजर्व) सेना:

  • अग्रिम दस्ता: लंका के दुर्ग की प्राचीर (दीवार) पर एक विशेष सैन्य टुकड़ी तैनात की गई, जिसका नेतृत्व बाली की पत्नी तारा के पिता तथा अंगद के नाना, महाबलशाली सुषेण कर रहे थे। इन्हें आदेश था कि युद्ध छिड़ते ही वे लंका के मुख्य द्वारों पर अधिकार कर लें और ऊँचे प्राचीर से शत्रुओं की हलचलों की सूचना मुख्य सेना तक पहुँचाएँ। इस अग्रिम दस्ते की राक्षसों से प्राचीर पर झड़प भी आरंभ हो चुकी थी।
  • आरक्षित (रिजर्व) सेना: विभीषण के कुशल मार्गदर्शन में 36 करोड़ वानरों की एक विशाल रिजर्व सेना रखी गई थी। इनका कार्य युद्ध में थकी या पीछे हटती सैन्य टुकड़ियों को तत्काल बैकअप देना था। इनमें से 1-1 करोड़ की रिजर्व टुकड़ी चारों द्वारों के पीछे मुस्तैद थी।

श्रीराम की इस सर्वतोमुखी व्यूहरचना ने त्रिकुट पर्वत पर बसी लंका को पूरी तरह से निष्प्रभ कर दिया था। रंग-बिरंगी ध्वजाएँ लहराते और सिंहनाद करते वानरों के अथाह सागर को देखकर राक्षसों के हृदय दहल उठे।

श्रीराम का रणनीतिक व नेतृत्व कौशल

इससे पूर्व श्रीराम द्वारा लड़े गए युद्धों में उनका व्यक्तिगत युद्ध-कौशल उजागर हुआ था, किंतु लंका अभियान में (प्रवर्षण पर्वत से लेकर लंका-विजय तक) उनका अद्भुत नेतृत्व, सैन्य-संचालन और रणनीतिक कौशल उभरकर सामने आया। वे प्रत्येक सूक्ष्म बिंदु का ध्यान रखते थे, सहयोगियों से गहन विचार-विमर्श करते थे और अंत में अचूक निर्णय लेते थे।

उन्होंने सेना को पालियों (Shifts) में युद्ध करने और आरक्षित टुकड़ियाँ रखने का निर्देश दिया, ताकि सैनिक थके या भूखे न रहें। घायलों की चिकित्सा, गुप्तचर सुरक्षा तथा त्वरित सूचना-प्रसार की व्यवस्था बनाई गई। भविष्य में अयोध्या का सम्राट बनने के पश्चात भी श्रीराम की यही युद्ध-नीति हमेशा सफल रही, जिसकी प्रथम एवं स्पष्ट झलक लंका अभियान में देखने को मिली।

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