भारतीय उपमहाद्वीप में युद्ध का एक सामान्य नियम था कि रात के समय युद्ध नहीं होता था, किंतु राक्षसों की शक्ति रात्रि के समय और अधिक बढ़ जाती थी। इसलिए वे रात में भी युद्ध करते रहे और यह महायुद्ध दिन-रात दोनों समय निरंतर चलता रहा। राक्षसों को पूर्ण आशा थी कि रात्रि के इस युद्ध में वे नर (श्रीराम और लक्ष्मण) तथा वानर एवं रीछ आदि सेना की टुकड़ियों को आसानी से परास्त कर देंगे। किंतु ऐसा हुआ नहीं; रात्रि-युद्ध में भी श्रीराम की सेना ने उन्हें कड़ी टक्कर दी।
युद्धभूमि में मेघनाद का प्रवेश
इसी दौरान रावण का पराक्रमी पुत्र मेघनाद युद्धभूमि में उतर आया। वह न केवल दिव्य अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञाता था, बल्कि विभिन्न प्रकार की मायावी शक्तियों में भी अत्यंत कुशल था।
अंगद द्वारा मेघनाद की पराजय और उसका मायावी युद्ध
घमासान द्वंद्व युद्ध में वानरराज युवराज अंगद ने उसे पराजित कर दिया। अपनी हार से तिलमिलाकर मेघनाद ने मायावी युद्ध का सहारा लिया। देवराज इंद्र को पराजित करने के कारण वह इंद्रजीत भी कहलाता था। उसे अदृश्य होने का विशेष वरदान प्राप्त था, जिसके कारण युद्धभूमि में गायब होने पर उसे देख पाना किसी के लिए भी संभव नहीं था। अदृश्य होकर उसने वानर सेना पर अस्त्र-शस्त्रों की भीषण वर्षा शुरू कर दी, जिससे पूरी वानर सेना अत्यंत व्याकुल हो गई।

श्रीराम और लक्ष्मण का नागपाश में बंधना
सेना को इस प्रकार व्यथित देख मेघनाद ने बाणों से श्रीराम और लक्ष्मण को भी गंभीर रूप से घायल कर दिया, जिससे उनके कवच टूट गए। बुरी तरह घायल होने के बावजूद श्रीराम ने अपने दस प्रमुख वानर योद्धाओं को मेघनाद की छिपी हुई स्थिति का पता लगाने का निर्देश दिया। तब तक कुटिल मेघनाद ने श्रीराम और लक्ष्मण पर नागपाश (ब्रह्मास्त्र) का प्रयोग कर दिया।
इस दिव्य अस्त्र का प्रभाव अत्यंत घातक था। इसके तीर विषैले सांपों का रूप धारण करके सीधे शरीर से लिपट जाते थे और उनके नुकीले विषैले दाँत शरीर में धँस जाते थे, जिससे मुक्त होना असंभव होता था। नागपाश से बंधने वाले की मृत्यु निश्चित मानी जाती थी।
मेघनाद का श्रीराम-लक्ष्मण को मृत समझना
नागपाश में बंधकर दोनों भाई अचेत होकर भूमि पर गिर पड़े। वे पहले से ही गंभीर रूप से घायल थे और उनके संपूर्ण शरीर में बाण इस प्रकार धँसे हुए थे मानो नागफनी उगी हो। उनके अंगों से निरंतर रक्त बह रहा था और उनके धनुष हाथों से छूटकर कुछ ही दूरी पर गिर पड़े थे।
मेघनाद उन्हें मृत समझकर और अपनी विजय मानकर गर्व के साथ नगर के भीतर लौट गया। उसने सोचा कि मुख्य सेनापतियों के मारे जाने के बाद शत्रु सेना स्वयं ही भयभीत होकर भाग जाएगी। लंका पहुँचकर उसने अपने पिता रावण को श्रीराम-लक्ष्मण की मृत्यु का यह सुखद समाचार सुनाया। रावण ने अपने पुत्र का अभिनंदन किया और पूरी राक्षस सेना में हर्ष की लहर दौड़ गई। रावण ने राक्षसियों को आज्ञा दी कि वे पुष्पक विमान के माध्यम से माता सीता को रणभूमि में ले जाकर उनके पति की यह दुर्दशा दिखाएँ।
सीता का युद्धभूमि में श्रीराम-लक्ष्मण को देखना
रावण की आज्ञा पाकर सीता को विमान से नीचे रणभूमि में पड़े दोनों भाइयों को दिखाया गया। (यद्यपि उस समय भी रात्रि का अंधकार था, किंतु युद्ध क्षेत्र में जली हुई मशालों की रोशनी से सब स्पष्ट दिख रहा था)। माता सीता उन्हें देखकर विलाप करने लगीं, किंतु राक्षसी त्रिजटा ने उन्हें ढांढस बंधाते हुए कहा कि श्रीराम और लक्ष्मण के शरीर में अभी भी जीवित होने के स्पष्ट लक्षण दिखाई दे रहे हैं।
त्रिजटा ने समझाया कि यदि किसी राजा की मृत्यु हो जाती है, तो उसकी सेना में भगदड़ मच जाती है और वे डरकर भाग जाते हैं। किंतु इतनी विशाल वानर सेना शांति से उन्हें घेरे खड़ी है, और उनके मुख पर भय के स्थान पर आक्रोश और तेज है। यहाँ तक कि दोनों भाइयों के चेहरों पर भी मृत्यु जैसे कोई भाव या चिह्न नहीं थे।
माता सीता भली-भांति जानती थीं कि श्रीराम के पास अनेक दिव्य अस्त्र हैं, जिन्हें वे चाहें तो तुरंत निष्फल कर सकते हैं, किंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया। इससे यह स्पष्ट था कि वे स्वेच्छा से इस स्थिति में हैं। इन सभी लक्षणों को देखकर माता सीता को पूर्ण संतोष हुआ कि उनके स्वामी और देवर पूर्णतः सुरक्षित हैं। इसके बाद राक्षसियाँ उन्हें वापस अशोक वाटिका में छोड़ आईं।
श्रीराम का सचेत होना
श्रीराम और लक्ष्मण को मरणासन्न अवस्था में अचेत देखकर पूरी वानर सेना भारी शोक में डूब गई और उन्हें घेरकर खड़ी हो गई। किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था। वास्तव में, श्रीराम ने ब्रह्मास्त्र और मेघनाद के वरदान का मान रखने के लिए ही उसका प्रभाव अपने ऊपर स्वीकार किया था, अन्यथा वे उसे पलभर में निष्फल कर सकते थे। कुछ ही देर में श्रीराम स्वयं सचेत हो गए, यद्यपि वे अभी भी नागपाश के बंधन में जकड़े हुए थे।
श्रीराम से कुछ ही दूरी पर लक्ष्मण अचेत अवस्था में थे। उन्हें उस स्थिति में देखकर श्रीराम विलाप करने लगे। तभी दूसरे द्वार पर अपनी सैन्य टुकड़ी संभाल रहे विभीषण भी वहाँ आ पहुँचे। सुग्रीव और विभीषण भी विलाप कर रहे सैनिकों को ढांढस बंधा रहे थे।
सुषेण द्वारा दिव्य औषधियों का परामर्श
इसी बीच वानर सेनापति सुषेण ने सभी को सांत्वना देते हुए बताया कि जब पूर्वकाल में देवासुर संग्राम हुआ था, तब वे भी उसमें सम्मिलित थे। उस युद्ध में देवगुरु बृहस्पति मंत्र-विद्या और दिव्य औषधियों के प्रयोग से घायल देवताओं को पुनर्जीवित और स्वस्थ कर देते थे, और उसी युद्ध के दौरान सुषेण ने उन दिव्य औषधियों का ज्ञान प्राप्त किया था।
सुषेण ने उन चमत्कारी औषधियों के नाम ‘संजीवकरणी’ और ‘विशल्यकरणी’ बताए, जिनका निर्माण स्वयं ब्रह्माजी ने किया था। उन्होंने इन औषधियों का स्थान क्षीर सागर के तट पर स्थित चंद्र और द्रोण नामक दो पर्वतों पर बताया।
(यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि यद्यपि बाद में लक्ष्मण के दोबारा घायल होने पर हनुमानजी संजीवनी बूटी लाए थे और कई ग्रंथों में लक्ष्मण का उपचार करने वाले सुषेण को ‘लंका का राजवैद्य’ बताया गया है, किंतु वाल्मीकि रामायण के अनुसार वे लंका के वैद्य नहीं बल्कि वानर सेनापति और बालि की पत्नी तारा के पिता थे। उन्होंने यह आयुर्वेद ज्ञान देवासुर संग्राम के समय प्राप्त किया था। समान नाम होने के कारण ही यह भ्रम उत्पन्न हुआ है।)
गरुड़जी द्वारा नागपाश से मुक्ति
जब औषधियों और उपचार की चर्चा चल रही थी, तभी अचानक आकाश में एक तीव्र आंधी और हवा का प्रचंड झोंका आया। सभी ने उधर देखा तो पाया कि वे भगवान विष्णु के वाहन महाभाग गरुड़जी थे। उन्हें देवताओं के माध्यम से सूचना मिल चुकी थी कि श्रीराम और लक्ष्मण नागपाश में बंध गए हैं।
गरुड़जी को देखते ही सर्प रूप में दोनों भाइयों के शरीर से लिपटे वे सभी मायावी बाण स्वतः ही भयभीत होकर निकल भागे। गरुड़जी ने बताया कि वे वास्तव में नाग थे जो मायावी मंत्र के प्रभाव से बाण बन गए थे, इसलिए किसी साधारण उपाय से उनका छूटना असंभव था, किंतु सर्प स्वभाव से गरुड़ से भय खाते हैं, इसलिए उनके आते ही वे भाग खड़े हुए।
इसके पश्चात गरुड़जी ने दोनों भाइयों के शरीरों को प्रेमपूर्वक स्पर्श किया। उनके दिव्य स्पर्श मात्र से ही श्रीराम और लक्ष्मण के सारे घाव तुरंत भर गए, समस्त पीड़ा समाप्त हो गई और वे पहले की भाँति स्वस्थ एवं तेजोमय हो गए। इसके बाद गरुड़जी श्रीराम को प्रणाम कर अपने लोक लौट गए।
श्रीराम-लक्ष्मण के स्वस्थ होने की रावण को सूचना
गरुड़जी के प्रस्थान करते ही श्रीराम और लक्ष्मण को पूर्णतः स्वस्थ देखकर समस्त वानर सेना में अभूतपूर्व हर्ष और उत्साह की लहर दौड़ गई। पूरी वानर सेना ने एक स्वर में ऐसा प्रचंड गर्जन किया कि उसकी गूँज लंका के महलों तक जा पहुँची।
शोक के समय सेना में इस प्रकार का उत्साह देखकर चिंतित रावण ने कुछ गुप्तचरों को इसका कारण पता लगाने का आदेश दिया। जब उन गुप्तचरों ने परकोटे पर चढ़कर देखा कि दोनों भाई जीवित और स्वस्थ हैं, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। इस असंभव घटना को सत्य होते देख राक्षस सेना में शोक और भय की छाया छा गई।
रावण और मेघनाद दोनों ही इस बात से गहरे विस्मय और आश्चर्य में डूब गए कि जिसे कोई नहीं काट सकता था, वह अभेद्य नागपाश आज पहली बार इस प्रकार निष्फल कैसे हो गया।
