समुद्र पार करके श्रीराम अपनी संपूर्ण सेना सहित उस द्वीप पर आ गए, जिस पर लंका स्थित थी। इस पार पहुँचकर श्रीराम ने लंका नगर को घेरे हुए वनों और पर्वतों का मुआयना किया तथा नगर की सुरक्षा व्यवस्था का बारीकी से निरीक्षण किया। इसके बाद उन्होंने अपनी सेना को विभिन्न व्यूहों में विभाजित कर खड़ा किया और सुवेल पर्वत पर अपना मुख्य शिविर स्थापित किया।
शुक द्वारा रावण को राम की सैन्य शक्ति का परिचय
जब श्रीराम सेना सहित लंका के द्वीप पर पहुँच चुके थे, तब तक रामेश्वरम तट से छोड़ा गया रावण का दूत (गुप्तचर) शुक भी वापस लंका पहुँच चुका था। उसने रावण को राम की विशाल सेना और उनके वीर सैनिकों के भारी युद्ध-उत्साह के विषय में विस्तार से बताया। किंतु अहंकार में डूबे रावण ने अपनी शक्ति का झूठा बखान करके उसे चुप करा दिया।

उसी समय रावण को यह सूचना मिली कि श्रीराम ने समुद्र पार कर लिया है। तब उसने पुनः शुक और सारण नामक दो गुप्तचरों को राम की सेना की थाह लेने के लिए उनके शिविर में भेजा। दोनों गुप्तचर वानर का वेश बनाकर चुपचाप राम की सेना में जा मिले, किंतु विभीषण ने उन्हें तुरंत पहचान लिया। इस बार भी दयालु श्रीराम ने उन्हें क्षमा कर सुरक्षित बचाकर वापस भेज दिया।
वानर सेना के चंगुल से मुक्त होकर शुक और सारण रावण के पास लौटे। उन्होंने श्रीराम के पराक्रम का वर्णन करते हुए रावण को समझाया कि इतनी विशाल वानर सेना और उनके अजेय योद्धाओं को जीतना असंभव है, इसलिए बेहतर यही होगा कि श्रीराम से संधि कर ली जाए। किंतु यह सुनकर रावण अत्यंत क्रुद्ध हुआ और अपने निर्णय पर अडिग रहा।
रावण का ऊँचे महल से राम की सेना का निरीक्षण
रावण उन दोनों गुप्तचरों को साथ लेकर अपने राजमहल की बहुमंजिला और ऊँची अट्टालिका पर गया। उस ऊँचे स्थान से नीचे श्रीराम का विशाल सैन्य शिविर स्पष्ट दिखाई दे रहा था। जब उसने देखा कि लंका के द्वारों के बाहर चारों ओर वनों, पर्वतों और मैदानों में करोड़ों वानर सैनिक फैले हुए हैं, तो वह उनकी विशालता देखकर अछंभित रह गया।
इसके बाद उसने शुक और सारण से राम की सेना के प्रमुख सेनापतियों का परिचय देने के लिए कहा। दोनों ने उस ऊँचे भवन से रावण को प्रमुख वानर सेनापतियों के नाम और उनकी शक्तियों के बारे में बताया। वहीं से रावण ने श्रीराम और लक्ष्मण को भी अपनी आँखों से देखा।
रावण द्वारा सीता को राम की मृत्यु की झूठी सूचना देना
अब दोनों पक्ष आमने-सामने थे और अपनी-अपनी रणनीतियों को अंतिम रूप दे रहे थे। इसी बीच रावण ने माता सीता को मानसिक रूप से तोड़ने और भ्रमित करने के लिए एक कुटिल योजना बनाई।
उसने अपने एक मायावी मंत्री विद्युत्जिह्व को बुलाया और उसे आदेश दिया कि वह माया के प्रभाव से श्रीराम का एक कटा हुआ सिर और उनका धनुष-बाण लेकर अशोक वाटिका में सीता के पास जाए। साथ ही यह झूठी खबर सुनाए कि सोते हुए श्रीराम, लक्ष्मण और उनके प्रमुख वानर सेनापतियों की हत्या कर दी गई है। रावण का विचार था कि राम की मृत्यु का समाचार सुनकर सीता विवश होकर उसकी बात मान लेंगी।
योजना के अनुसार रावण स्वयं अशोक वाटिका में सीता के पास पहुँचा और उन्हें राम-लक्ष्मण की हत्या की झूठी मनगढ़ंत कहानी सुनाई। तभी विद्युत्जिह्व वहाँ आ गया और खून से लथपथ राम का माया-रचित कटा हुआ मस्तक सीता के सामने रख दिया। इसे देखकर माता सीता फफक-फफक कर रो पड़ीं। किंतु उन्होंने रावण की शरण में जाने के बजाय अपने प्राण त्यागकर पति के साथ सती हो जाना या मर जाना अधिक श्रेयस्कर समझा।
तभी, सेनापति प्रहस्त का एक सेवक आवश्यक राजकीय कार्य के लिए रावण को बुलाने का संदेश लेकर वहाँ आ गया। संदेश मिलते ही रावण तुरंत वहाँ से उठकर चला गया। रावण के जाते ही वह मायावी कटा हुआ मस्तक भी हवा में गायब हो गया।
सरमा द्वारा सीता को सांत्वना
रावण के जाने के बाद यद्यपि वह कटा सिर गायब हो चुका था, किंतु सीता का विलाप जारी था। उसी समय अशोक वाटिका में सीता की देखरेख और रक्षा में तैनात सरमा नाम की एक राक्षसी (जो स्वभाव से बहुत भद्र थी और सीता के प्रति जिसके मन में मैत्री भाव था) उनके पास आई।
सरमा ने सीता को प्रेमपूर्वक सांत्वना दी और समझाया कि यह रावण की कोई माया थी; श्रीराम पूर्णतः जीवित और सुरक्षित हैं तथा वे युद्ध में अवश्य विजयी होंगे। सरमा ने ही सीता को यह भी बताया कि रावण ने अपने मंत्रियों के साथ अभी-अभी क्या गुप्त मंत्रणा की है।
रावण द्वारा युद्ध की तैयारी और माल्यवान की सलाह
उधर, रावण अपनी सभा में वापस लौट आया। चूँकि श्रीराम की सेना ने लंका को चारों तरफ से घेर लिया था, इसलिए अब तुरंत ठोस कार्रवाई करना आवश्यक हो गया था। उसने तत्काल सभी राक्षस सैनिकों और सेनापतियों को युद्ध के लिए तैयार होने का आदेश दिया।
इस गंभीर स्थिति में भी रावण के वृद्ध और समझदार मंत्री माल्यवान ने उसे समझाया कि वह माता सीता को ससम्मान लौटाकर श्रीराम से संधि कर ले। किंतु अहंकार में अंधे रावण ने श्रीराम को एक साधारण मनुष्य मात्र कहकर अपमानित किया और माल्यवान की सलाह को दुत्कार दिया। इसके बाद रावण ने लंका की सुरक्षा व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़ किया तथा विभिन्न द्वारों पर अपने पराक्रमी सेनापतियों की नियुक्ति की।
श्रीराम द्वारा शत्रु सेना और नगर का निरीक्षण
श्रीराम अंतिम आक्रमण करने से पहले लंका की संपूर्ण भौगोलिक स्थिति और सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लेना चाहते थे। इसलिए वे प्रमुख वानरों के साथ सुवेल पर्वत पर चढ़ गए और उस रात वहीं विश्राम किया।
अगली सुबह वे सब सुवेल पर्वत के सबसे ऊँचे शिखर पर पहुँचे। वहाँ से पूरी लंका नगरी अत्यंत स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही थी। उस ऊँचे शिखर से उन्होंने ‘त्रिकूट पर्वत’ पर स्थित लंका के राजमहल, महलों की ऊँचाइयों और नगर के विभिन्न द्वारों की स्थितियों का बारीकी से निरीक्षण किया।
सुग्रीव और रावण का द्वंद्व युद्ध
जब श्रीराम अपने प्रमुख वानरों के साथ लंका का निरीक्षण कर रहे थे, उसी समय लंका के मुख्य प्रवेश द्वार (गोपुर) की छत पर रावण अपने पूरे राजसी ठाठ-बाठ और अहंकार के साथ बैठा हुआ था। रावण को उस प्रकार निश्चिंत बैठे देख वानराज सुग्रीव को अत्यधिक क्रोध आ गया।
वे किसी को कुछ बताए बिना सुवेल पर्वत के शिखर से ही सीधे छलांग लगाकर लंका के गोपुर की छत पर रावण के ठीक सामने जा कूड़े। उनकी इस अचानक और अद्भुत छलांग को देखकर श्रीराम सहित कोई भी वानर कुछ समझ नहीं पाया।
अचानक अपने सामने सुग्रीव को खड़े देखकर रावण संभल पाता, उससे पहले ही सुग्रीव ने खुद को श्रीराम का सेवक और सखा बताते हुए जोरदार प्रहार कर रावण को जमीन पर गिरा दिया। रावण भी ललकारते हुए तुरंत उठ खड़ा हुआ और दोनों के बीच भयंकर मल्लयुद्ध शुरू हो गया।
रावण और सुग्रीव दोनों ही शारीरिक रूप से अत्यंत बलवान योद्धा थे। वे एक-से-एक बढ़कर दाँव-पेंच के साथ द्वंद्व युद्ध करने लगे। जब रावण को यह अहसास हुआ कि सामान्य मल्लयुद्ध में सुग्रीव को हराना आसान नहीं है, तब उसने अपनी मायावी शक्तियों का प्रयोग करने का विचार किया। सुग्रीव उसकी इस नीयत को भाप गए। इसलिए, जिस प्रकार वे अचानक वहाँ पहुँचे थे, उसी प्रकार रावण को चकमा देकर एक बड़ी छलांग लगाकर वे वापस सुवेल पर्वत पर श्रीराम के पास सुरक्षित लौट आए।
सुग्रीव को सकुशल वापस आया देखकर श्रीराम ने उन्हें प्रेम से गले से लगा लिया, किंतु साथ ही इस प्रकार का भारी जोखिम उठाने और बिना बताए अकेले शत्रु के बीच जाने के लिए उन्हें चेतावनी दी कि इससे उनके प्राणों को खतरा हो सकता था। इसके पश्चात वे सभी वहाँ से नीचे उतर आए।
श्रीराम द्वारा आक्रमण के लिए अंतिम सैन्य-विन्यास
इसके बाद श्रीराम ने अलग-अलग वीर सेनापतियों के नेतृत्व में अपनी वानर सेना का रणनीतिक बँटवारा कर दिया। सभी सैन्य टुकड़ियों को लंका के किले के अलग-अलग द्वारों पर तैनात कर दिया गया और प्रत्येक मोर्चे की जिम्मेदारी एक प्रमुख सेनापति को सौंप दी गई:
- उत्तरी द्वार (मुख्य द्वार): इस सबसे महत्वपूर्ण और मुख्य द्वार पर स्वयं श्रीराम और लक्ष्मण अपनी सेना के साथ डटे हुए थे।
- पूर्वी द्वार: इसकी जिम्मेदारी नील, मैंद और द्विविद को सौंपी गई।
- दक्षिण द्वार: इस ओर अंगद, ऋषभ, गवाक्ष, गज और गवय को तैनात किया गया।
- उत्तर और पश्चिम के मध्य का भाग: इस रणनीतिक मोर्चे का नेतृत्व स्वयं वानराज सुग्रीव संभाल रहे थे।
इसके अतिरिक्त, वानरों के कई विशेष दलों को यह कार्य सौंपा गया कि वे निरंतर किले की दीवारों और आकाशमार्ग पर घूमते हुए शत्रु सेना की हर गतिविधि पर कड़ी नजर रखें।
