राम ने विराध राक्षस का वध कैसे किया और उसे जमीन में क्यों गाड़ा? | Valmiki Ramayan – Part 25

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राम ने अपने वनवास काल में चित्रकूट के बाद दंडकारण्य को अपना दूसरा निवास बनाया था। दंडकारण्य एक अत्यंत दुर्गम वन था, जहाँ राक्षस और अन्य खतरे चित्रकूट की अपेक्षा कहीं अधिक थे। महर्षि अत्रि ने उन्हें पहले ही इन खतरों की चेतावनी दे दी थी। लेकिन दुष्ट राक्षसों का संहार करना और अपने भक्तों की रक्षा करना ही तो उनके इस अवतार का मुख्य उद्देश्य था। दंडकारण्य में सबसे पहले जिस राक्षस से उनका सामना हुआ, उसका नाम विराध था। यह प्रसंग वाल्मीकि रामायण में इस प्रकार वर्णित है:

जब राम, लक्ष्मण और सीता के साथ दंडकारण्य में रहने के लिए आए, तो रास्ते में पड़ने वाले ऋषि-मुनियों के आश्रमों में जाकर उनसे मिलते और उनका आतिथ्य सत्कार पाते हुए अपने गंतव्य की ओर बढ़ रहे थे। दंडकारण्य में अभी राम ने अपना कोई स्थायी निवास नहीं बनाया था। जब वे अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ बातचीत करते हुए आगे बढ़ रहे थे, तभी उसी मार्ग से आता हुआ उन्हें विराध दिखाई दिया।

विराध कौन था?

विराध एक विशाल, बेडौल आकार और डरावने मुख वाला नरभक्षी राक्षस था। वह कई जंगली पशुओं को मारकर उन सभी को एक बड़े से लोहे के भाले में गूँथकर अपने कंधे पर लादे हुए था। उसने बाघ की खाल के वस्त्र पहन रखे थे, जो खून से पूरी तरह गीले हो रहे थे।

विराध को कुबेर का शाप और ब्रह्मा का वरदान मिलना

विराध वास्तव में तुमुरु नामक एक गंधर्व था। एक बार वह अपनी प्रेमिका अप्सरा रंभा के साथ था और अपने स्वामी कुबेर के बुलाने पर बहुत देर से पहुँचा। इस पर कुबेर को तीव्र क्रोध आ गया और उन्होंने उसे राक्षस योनि में जन्म लेने का शाप दे दिया था। साथ ही कुबेर ने यह भी कहा था कि जब युद्ध में दशरथपुत्र राम के हाथों उसका वध होगा, तभी उसे इस शाप से मुक्ति मिलेगी और उसका वास्तविक गंधर्व शरीर वापस प्राप्त होगा।

इसी कारण तुमुरु गंधर्व ने राक्षस कुल में विराध के रूप में जन्म लिया था। उसके पिता का नाम राक्षस जव और माता का नाम शतह्रीदा था। कठोर तपस्या करने के कारण ब्रह्माजी ने उसे यह वरदान दिया था कि किसी भी साधारण अस्त्र-शस्त्र से उसकी मृत्यु नहीं हो सकती।

विराध द्वारा राम को ललकारना

जब राम, लक्ष्मण और सीता ने विराध को देखा, तो उस राक्षस की नजर भी उन पर पड़ी और वह तुरंत आक्रामक हो गया। वह तीव्र गति से आगे बढ़ा और माता सीता को पकड़कर कुछ दूर ले गया। फिर वहाँ खड़े होकर वह दोनों भाइयों से बोला कि वे वेश से तो संन्यासी जैसे लगते हैं, किंतु उन्होंने क्षत्रियों की तरह अस्त्र-शस्त्र धारण कर रखे हैं। यदि वे संन्यासी हैं, तो साथ में यह स्त्री क्यों है? और यदि क्षत्रिय हैं, तो उन्होंने संन्यासियों जैसे वस्त्र क्यों पहने हैं? इसलिए अवश्य ही वे दोनों कोई धोखेबाज हैं। उसने अपना नाम विराध बताते हुए कहा कि वह इन दोनों धोखेबाज पुरुषों को मारकर इस स्त्री को अपने साथ ले जाएगा।

उसने गरजते हुए दोनों भाइयों से पूछा, “तुम दोनों कौन हो और कहाँ जा रहे हो?” इस पर राम ने अपना परिचय देते हुए विराध से उसका परिचय पूछा। अपने परिचय में राम ने केवल स्वयं को इक्ष्वाकु वंश का क्षत्रिय बताया, किंतु अपने या अपने पिता का नाम नहीं लिया।

राम द्वारा विराध का वध

विराध ने राम और लक्ष्मण से अपनी “साथ की स्त्री” (सीता) को उसके हवाले कर अपनी जान बचा लेने के लिए कहा। उसके इस दुस्साहस पर क्रोधित होकर राम ने उस पर लगातार सात बाण छोड़े, किंतु ब्रह्माजी के वरदान के कारण वह केवल घायल हुआ, उसकी मृत्यु नहीं हुई।

घायल होने पर विराध माता सीता को छोड़कर एक बड़ा शूल (भाला) लेकर राम और लक्ष्मण की ओर झपटा। वह दोनों भाइयों को पकड़कर अपने कंधों पर बैठा लिया और घने जंगल की तरफ दौड़ पड़ा। दोनों भाई भी बिना किसी प्रतिरोध के उसके कंधों पर बैठे रहे, किंतु कुछ ही पल बाद उन्होंने विराध की दोनों बाहें पकड़कर तोड़ दीं। इस पर वह विशाल राक्षस दर्द से कराहता हुआ बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ा।

जब उसे होश आया, तो संघर्ष फिर से शुरू हुआ। वरदान के कारण किसी भी अस्त्र-शस्त्र या प्रहार से उसकी मृत्यु नहीं हो रही थी, इसलिए राम ने उसे जीवित ही जमीन में गाड़ देने का निर्णय लिया और लक्ष्मण से एक बड़ा गड्ढा खोदने के लिए कहा। स्वयं राम उसकी गर्दन पर पैर रखकर खड़े हो गए।

राम की इस मुद्रा को देखकर विराध उन्हें पहचान गया और बोला, “मोहवश मैं आपको पहले पहचान नहीं सका था, आप दोनों ही साक्षात राम और लक्ष्मण हैं।” चूँकि राम ने पहले अपना या अपने पिता का नाम नहीं बताया था, इसलिए विराध उन्हें तुरंत पहचान नहीं पाया था।

विराध की मुक्ति

जब उसे यह ज्ञात हुआ कि वह भगवान राम के हाथों मारा जा रहा है, जो कि कुबेर के वचनों के अनुसार उसकी शाप-मुक्ति का एकमात्र जरिया था, तो वह अत्यंत प्रसन्न हुआ। राक्षसों की परंपरा के अनुसार मृत होने पर उन्हें जमीन में ही गाड़ा जाता था, अतः विराध का यह अंत उसी परंपरा के अनुकूल था। गड्ढे में दबाए जाने के बाद विराध अपना पूर्व गंधर्व शरीर प्राप्त कर अपने लोक को प्रस्थान कर गया।

किंतु अपने शरीर का त्याग करने से ठीक पहले उसने राम से वहाँ से डेढ़ योजन की दूरी पर स्थित महर्षि शरभंग के आश्रम जाकर उनसे मिलने का आग्रह किया। विराध को मुक्त करने के पश्चात उसके वचनानुसार वे तीनों महर्षि शरभंग के आश्रम की ओर चल पड़े।

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