भगवान राम ने 14 वर्ष का वनवास कहाँ-कहाँ बिताया था? | Valmiki Ramayan – Part 26

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राम अपने वनवास काल का अधिकांश भाग मुख्य रूप से इन तीन प्रमुख स्थानों पर रहे थे:

1. चित्रकूट

(वर्तमान उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा पर)

वनवास काल में चित्रकूट राम का पहला आश्रय स्थल था। यहाँ उन्होंने मन्दाकिनी नदी के किनारे पर्णकुटी (पत्ते की झोपड़ी) बनाई थी। जब वे अयोध्या से निकले थे, तो प्रयाग होते हुए यहीं आए थे। यहाँ निवास करने का सुझाव उन्हें प्रयाग में महर्षि भारद्वाज ने दिया था। लेकिन वे यहाँ अधिक दिनों तक नहीं रह सके।

Ram Vanwas Journey Locations

हुआ यह कि जब उन्हें वन आए हुए कुछ ही दिन हुए थे, तब अयोध्या से उनके भाई भरत अपने सगे-संबंधियों, नगरवासियों और भारी सेना के साथ उन्हें मनाने और वापस अयोध्या लौटाने के लिए आ गए। राज परिवार और इतने सारे लोगों के आने से चित्रकूट के स्थानीय लोगों और ऋषि-मुनियों में यह बात फैल गई कि वहाँ अयोध्या के राजकुमार निवास करते हैं। महर्षि विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा के लिए राम-लक्ष्मण दोनों भाइयों ने उस समय से करीब 12-13 वर्ष पहले, जब वे अल्पवयस्क किशोर थे, कई राक्षसों का वध किया था; अतः राक्षस उन्हें अपना शत्रु मानते थे। इस क्षेत्र में रावण के भाई खर नामक राक्षस का आतंक था, इसलिए राम के वहाँ रहने से राक्षसों के हमले का खतरा बढ़ गया था।

दूसरा कारण यह था कि अयोध्या से आने वाले इतने अधिक लोगों और उनके सवारी पशुओं के कारण उस शांत क्षेत्र में काफी गंदगी और कोलाहल फैल गया था।

इन दोनों कारणों से चित्रकूट में रहने वाले ऋषि-मुनि वहाँ से अन्यत्र जाने लगे। जब राम को यह पता चला, तो उन्होंने सोचा कि उनके वहाँ रहने के कारण उन तपस्वियों पर संकट आ सकता है। इसके अलावा, अयोध्या से उनके परिजन वहाँ आए थे, जिनकी स्मृति उनके लिए और अधिक कष्टकारी हो रही थी। यदि वे वहीं रहते, तो उनके परिजन बार-बार मिलने आ सकते थे, क्योंकि अयोध्या से चित्रकूट अधिक दूर नहीं था और उनका आश्रम अब सबको ज्ञात हो चुका था।

इ इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए राम ने चित्रकूट छोड़ने का निर्णय लिया।

2. दंडकारण्य

(वर्तमान छत्तीसगढ़ का बस्तर संभाग)

राम, लक्ष्मण और सीता चित्रकूट छोड़कर आगे बढ़े। रास्ते में वे वयोवृद्ध ऋषि अत्रि और उनकी परम तपस्विनी पत्नी अनसूया से मिलने उनके आश्रम गए। ऋषि अत्रि ने उन्हें दंडकारण्य में निवास करने का सुझाव दिया, यद्यपि उन्होंने वहाँ के खतरों के विषय में चेतावनी भी दी थी।

दंडकारण्य एक विस्तृत पर्वतीय और वनीय क्षेत्र था। यहाँ राक्षसों का खतरा तो था ही, साथ ही कई ऋषि-मुनियों के आश्रम भी स्थित थे। राम ने अपने वनवास का सबसे अधिक भाग यहीं व्यतीत किया। लेकिन यहाँ उन्होंने कोई स्थायी आश्रम या पर्णकुटी नहीं बनाई, बल्कि अपने भक्त ऋषियों के आश्रमों में कुछ-कुछ समय तक निवास करते रहे। इस प्रकार अलग-अलग स्थानों पर रहते हुए उन्होंने लगभग दस वर्ष व्यतीत किए।

जब वे सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम में थे, तब वहाँ के कई ऋषि एकत्रित होकर अपने आश्रमों में रहने की प्रार्थना लेकर आए थे। सुतीक्ष्ण मुनि स्वयं चाहते थे कि राम उनके आश्रम में ही रहें; उन्होंने केवल राम के दर्शन की प्रतीक्षा में ही अभी तक अपना शरीर नहीं छोड़ा था। किंतु राम केवल एक रात वहाँ रुके। तब सुतीक्ष्ण मुनि ने अन्य ऋषियों की इच्छा पूरी करने के बाद पुनः उनके आश्रम में लौटने का वचन राम से ले लिया।

अपने वचन के अनुसार अनेक मुनियों के आश्रमों में समय बिताने के लगभग दस वर्षों बाद वे पुनः सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम में लौटे।

अब तक वनवास की अवधि का अधिकांश भाग बीत चुका था। इन विभिन्न मुनियों के आश्रमों में रहते समय ऋषियों ने उन्हें राक्षसों के अत्याचारों का वर्णन किया था और उनका वध करके मुनियों को अभय करने की प्रार्थना की थी। राम ने उन्हें राक्षस वध का वचन भी दिया था।

किंतु ये राक्षस किसी मुनि के आश्रम पर प्रत्यक्ष रूप से आक्रमण नहीं करते थे, बल्कि अकेले या असावधान अवस्था में मिलने पर उन्हें मार डालते थे। इसलिए आश्रम में रहते हुए इतने दिनों में किसी राक्षस से उनका सीधा आमना-सामना नहीं हुआ था। अकारण या बिना किसी उकसावे के राक्षसों का वध करना धर्म के विरुद्ध होता, इसलिए अब उन्होंने मुनियों के आश्रम से अलग किसी ऐसी जगह पर रहने का निश्चय किया जहाँ राक्षस स्वयं आकर उनसे शत्रुता मोल लें।

इस क्षेत्र में रहने वाले अधिकांश ऋषि-मुनियों से राम मिल चुके थे, केवल महर्षि अगस्त्य और उनके भाई से मिलना शेष था। अतः सुतीक्ष्ण मुनि से अनुमति लेकर वे अगस्त्य मुनि के भाई के आश्रम गए और वहाँ एक रात्रि विश्राम के पश्चात स्वयं महर्षि अगस्त्य के आश्रम पहुँचे। अगस्त्य मुनि ने उन्हें कई दिव्य अस्त्र-शस्त्र भी प्रदान किए, क्योंकि वे जानते थे कि भक्तों के कल्याण का कार्य संपन्न होने के बाद अब राक्षसों के संहार का मुख्य चरण आरंभ होने वाला था। महर्षि अगस्त्य ने ही उन्हें इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए पंचवटी में निवास करने का श्रेष्ठ सुझाव दिया था।

3. पंचवटी

(वर्तमान में महाराष्ट्र के नासिक जिले में)

पंचवटी में निवास करने का मूल उद्देश्य राक्षसों का संहार करना ही था। तब तक उनके वनवास की लगभग 11-12 वर्ष की अवधि बीत चुकी थी। शेष अवधि भी वे किसी आश्रम में बिता सकते थे, किंतु वे प्रत्यक्ष रूप से अलग और अकेले दिखना चाहते थे ताकि राक्षस स्वयं आकर उनसे शत्रुता करें। पंचवटी में राक्षसों का आतंक अपेक्षाकृत बहुत अधिक था; खर और दूषण जैसे हजारों राक्षसों का निवास स्थान इसके बहुत पास था। पति की मृत्यु के बाद रावण की बहन शूर्पनखा भी अभी यहीं अपने भाइयों के पास रह रही थी।

इन्हीं सभी कारणों से पंचवटी में गोदावरी नदी के किनारे राम ने पर्णकुटी (पत्ते की झोपड़ी) बनाकर रहना शुरू किया। पंचवटी में रहने का सुझाव उन्हें अगस्त्य मुनि ने दिया था, तथा गोदावरी के किनारे उस अत्यंत रमणीय स्थल पर कुटी बनाने का सुझाव जटायु ने दिया था।

जिस प्रमुख उद्देश्य से राम पंचवटी आए थे, वह अंततः पूरा हुआ। पंचवटी स्थित गोदावरी तट के इसी आश्रम में शूर्पनखा का आगमन हुआ और यहीं से रावण द्वारा माता सीता के अपहरण के पश्चात राक्षसों के संहार का वह ऐतिहासिक अध्याय शुरू हुआ, जिसने रामायण की पूरी कथा को एक नया मोड़ दिया।

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