भरत और अन्य परिजनों के अयोध्या लौट जाने के बाद राम और लक्ष्मण उदास और भावुक थे। कुछ समय बाद उन्होंने ध्यान दिया कि चित्रकूट में रहने वाले ऋषि-मुनि अपने आश्रम छोड़कर अन्य सुरक्षित स्थानों पर जाने लगे हैं।
पूछने पर पता चला कि खर नामक एक राक्षस, जो रावण का भाई था, उससे इन मुनियों को बड़ा खतरा था। भरत के इतनी बड़ी सेना के साथ वहाँ आने के बाद से यह बात सर्वविदित हो चुकी थी कि अयोध्या के राजकुमार इसी वन में निवास करते हैं। चूंकि भगवान विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा के दौरान राक्षसों का वध किया गया था, इसलिए राक्षस राम से भारी वैर रखते थे। ऐसी स्थिति में उन पर राक्षसों का खतरा और अधिक बढ़ गया था।

चित्रकूट छोड़ने के कारण
उन मुनियों के अन्यत्र चले जाने के बाद राम को भी अब चित्रकूट में रहना उचित नहीं लगा। इसके मुख्य कारण थे—
- यहाँ अयोध्या से उनके परिजन आए थे, इसलिए उनके जाने के बाद उनका स्मरण और भी अधिक सताने लगा था।
- अयोध्या की विशाल सेना और इतने सारे पशुओं के आवागमन से उस शांत क्षेत्र में काफी गंदगी और कोलाहल हो गया था।
- उनके यहाँ रहने के कारण स्थानीय मुनियों और तपस्वियों के जीवन पर भी खतरा मंडराने लगा था।
इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए राम ने चित्रकूट छोड़कर किसी अन्य सुरक्षित स्थान पर जाने का निश्चय किया। ऐसा दृढ़ विचार कर राम, लक्ष्मण और सीता उस वन को छोड़कर आगे बढ़ गए।
ऋषि अत्रि और अनसूया से भेंट
अपनी यात्रा के दौरान रास्ते में वयोवृद्ध महर्षि अत्रि का आश्रम पड़ा। वे तीनों उनसे मिलने उनके आश्रम पहुँचे। अत्रि की पत्नी अनसूया भी एक महान और प्रख्यात तपस्विनी थीं।
ऋषि अत्रि और माता अनसूया ने उन तीनों का स्वागत-सत्कार अपने बच्चों की तरह किया। माता अनसूया ने माता सीता को बहुत स्नेह दिया और उन्हें ऐसे दिव्य वस्त्र तथा आभूषण उपहार स्वरूप प्रदान किए जो कभी मैले या पुराने नहीं होते थे और फूलों के बने होने पर भी कभी मुरझाते नहीं थे। उस रात उन तीनों ने वहीं आश्रम में विश्राम किया।
राम का दंडकारण्य में प्रवेश
अगले दिन वे सब आगे की यात्रा पर निकले और दंडकारण्य नामक घने वन में पहुँचे। यह वन चित्रकूट की अपेक्षा कहीं अधिक दुर्गम और भयानक था। महर्षि अत्रि ने उन्हें उस वन के राक्षसों और अन्य संभावित खतरों के बारे में पहले ही सचेत कर दिया था।
दंडकारण्य में भ्रमण करते हुए राम अपने भाई और पत्नी के साथ विभिन्न ऋषि-मुनियों से मिलते और उनका आतिथ्य स्वीकार करते हुए आगे बढ़ रहे थे। रास्ते में विराध नामक एक भयंकर राक्षस ने उन पर हमला कर दिया, किंतु राम और लक्ष्मण ने उसका वध कर दिया। अपने लोक जाने से पहले विराध ने राम को शरभंग ऋषि के आश्रम जाकर उनसे भेंट करने की सलाह दी।
शरभंग मुनि से भेंट
विराध को मुक्ति देने के बाद उसके कहे अनुसार राम, लक्ष्मण और सीता महर्षि शरभंग के आश्रम पहुँचे। जिस समय वे वहाँ पहुँचे, देवराज इंद्र स्वयं मुनि से चर्चा कर रहे थे। आकाश में उनका दिव्य रथ और कई अन्य देवता उपस्थित थे। इंद्र ने दूर से राम को आते देख लिया था, किंतु उन्होंने यह समय मिलने के लिए उपयुक्त नहीं समझा और रावण वध के पश्चात उनके दर्शन करने की बात कहकर वे बिना मिले ही देवताओं के साथ लौट गए।
इंद्र के प्रस्थान के बाद राम, लक्ष्मण और सीता आश्रम के भीतर गए। मुनि शरभंग ने उनका सत्कार किया। जब राम ने इंद्र के आने का कारण पूछा, तो मुनि ने बताया कि अपनी तपस्या के बल पर उन्होंने ब्रह्मलोक प्राप्त कर लिया है और इंद्र उन्हें वहीं ले जाने के लिए आए थे। परंतु जब मुनि को यह ज्ञात हुआ कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम उनके निकट आए हैं, तो वे राम के दर्शन किए बिना ब्रह्मलोक जाने को तैयार नहीं हुए थे।
जब राम ने उनके रहने के लिए उपयुक्त स्थान के बारे में पूछा, तो मुनि शरभंग ने उन्हें महर्षि सुतीक्ष्ण से मिलने की सलाह दी और वहाँ जाने का मार्ग भी समझाया।
इसके साथ ही मुनि ने राम से तब तक अपने पास ही ठहरने का आग्रह किया जब तक वे स्वयं अपने शरीर का त्याग कर ब्रह्मलोक नहीं चले जाते। यह कहकर शरभंग मुनि ने अग्नि प्रज्वलित की और राम की उपस्थिति में उसमें प्रवेश कर गए। उनका संपूर्ण शरीर भस्म हो जाने के बाद, अग्नि की शिखाओं से वे एक सूक्ष्म और दिव्य देह धारण करके प्रकट हुए और सीधे ब्रह्मलोक को प्रस्थान कर गए।
तभी वहाँ आसपास के बहुत से ऋषि-मुनि एकत्रित हो गए और उन्होंने राम से राक्षसों के अत्याचारों से अपनी रक्षा करने की प्रार्थना की। राम ने उन सभी ऋषियों को पूर्ण आश्वासन दिया और मुनि शरभंग द्वारा बताए गए मार्ग से होते हुए सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम की ओर चल पड़े।
सुतीक्ष्ण मुनि से भेंट
महर्षि सुतीक्ष्ण ने उन तीनों का अत्यंत आदर-सत्कार किया। उन्होंने भी बताया कि वे केवल राम के दर्शन की प्रतीक्षा में ही जीवित थे और उन्होंने अभी तक शरीर नहीं छोड़ा था। सुतीक्ष्ण मुनि के बार-बार आग्रह करने पर भी राम ने उनके आश्रम में स्थायी रूप से रहने का अनुरोध तो स्वीकार नहीं किया, किंतु उस रात वे वहीं विश्राम के लिए रुके।
अगली सुबह जब उन्होंने मुनि से विदा माँगी, तब तक दंडकारण्य में निवास करने वाले अनेक अन्य ऋषि-मुनि भी राम को अपने-अपने आश्रमों में ले जाने के लिए सुतीक्ष्ण के आश्रम में आ पहुँचे। सुतीक्ष्ण मुनि ने राम से यह वचन ले लिया कि वे अन्य ऋषियों के आश्रमों में घूमने के पश्चात पुनः लौटकर उनके आश्रम में अवश्य आएंगे।
सीता जी का अहिंसा का आग्रह और राम का उत्तर
वहाँ से जब वे तीनों आगे बढ़े, तब मार्ग में माता सीता ने प्रेमपूर्वक राम से यह आग्रह किया कि उन्हें किसी भी निरपराध प्राणी (या राक्षस) का वध नहीं करना चाहिए और अहिंसा धर्म का पूर्ण पालन करना चाहिए। किंतु राम ने ऋषियों और साधु-संतों की रक्षा करने के अपने प्रण को दोहराया और राक्षसों के वध के प्रति अपनी दृढ़ प्रतिज्ञा पर अडिग रहने का विचार स्पष्ट किया।
दंडकारण्य में 10 वर्ष का निवास
इसके पश्चात वे तीनों दंडकारण्य के पंचाप्सर आदि विभिन्न तीर्थों और कई ऋषि-मुनियों के आश्रमों में गए। वे कई महीनों तक अलग-अलग ऋषियों के आश्रमों में रहे। इस प्रकार दंडकारण्य के जंगलों में घूमते-घूमते उन्हें लगभग दस वर्ष बीत चुके थे।
दंडकारण्य छोड़ने का विचार और पंचवटी का चयन
वनवास की अधिकांश अवधि अब बीत चुकी थी। राम का लक्ष्मण और सीता के साथ वन में रहते हुए ऋषि-मुनियों को दर्शन देने और उनके कष्ट दूर करने का कार्य लगभग पूरा हो चुका था। अब मुख्य कार्य राक्षसों के संहार का था। अकारण या बिना किसी उकसावे के राक्षसों का वध करना धर्म के प्रतिकूल होता, इसलिए राम चाहते थे कि राक्षस स्वयं पहले कोई आक्रामक कार्रवाई करें ताकि उन्हें वध करने का उचित आधार मिले।
अतः अब वे दंडकारण्य छोड़कर किसी अन्य उपयुक्त और शांत स्थान पर निवास करना चाहते थे। महर्षि अगस्त्य की सलाह पर उन्होंने पंचवटी को अपने निवास के लिए सबसे उपयुक्त स्थान के रूप में चुना।
सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम की दूसरी बार यात्रा
दंडकारण्य में प्रवेश करने के बाद राम सबसे पहले शरभंग और फिर उनके शिष्य सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम गए थे। अन्य ऋषियों के यहाँ जाने से पहले उन्होंने सुतीक्ष्ण मुनि को वचन दिया था कि वे लौटकर उनके पास अवश्य आएंगे। इसलिए दंडकारण्य छोड़ने से पहले वे अपने वचन के अनुसार पुनः सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम पहुँचे और कुछ समय वहाँ बिताया।
इसी आश्रम में रहते हुए उन्हें महर्षि अगस्त्य और उनके भाई के विषय में जानकारी मिली, जिनका आश्रम वहाँ से अधिक दूर नहीं था। सुतीक्ष्ण मुनि से अनुमति और मार्ग की जानकारी लेकर वे अगस्त्य मुनि के भाई के आश्रम गए, जहाँ एक रात्रि विश्राम के पश्चात वे स्वयं महर्षि अगस्त्य के आश्रम पहुँचे। महर्षि अगस्त्य राम से मिलने के लिए पहले से ही बहुत उत्सुक थे, अतः उन्हें देखकर वे अत्यंत प्रसन्न हुए।
महर्षि अगस्त्य से भेंट और दिव्य अस्त्रों की प्राप्ति
समुचित आतिथ्य-सत्कार और कुशलक्षेम जानने के बाद महर्षि अगस्त्य ने राम को भगवान विश्वकर्मा द्वारा निर्मित और भगवान विष्णु को प्रदत सोने तथा हीरों से जटित एक दिव्य धनुष प्रदान किया। इसके साथ ही उन्होंने ब्रह्माजी का दिया हुआ अचूक बाण और कभी खाली न होने वाले इंद्र के दो दिव्य तरकश भी उन्हें सौंपे। इसके अतिरिक्त, सोने की मूठ वाली एक तलवार भी दी गई। ये सभी दिव्य अस्त्र राक्षसों के संहार में अत्यंत सहायक सिद्ध होने वाले थे। राम के पूछने पर महर्षि अगस्त्य ने ही उन्हें पंचवटी में निवास करने का श्रेष्ठ सुझाव दिया था।
जटायु से भेंट
पंचवटी के मार्ग में राम ने एक विशाल पक्षी को जंगल में बैठे हुए देखा, जो आकार में एक बड़े गिद्ध जैसा प्रतीत हो रहा था। उसके इतने विराट आकार को देखकर पहले राम को उसके राक्षस होने का संदेह हुआ, इसलिए उन्होंने पूछा, “आप कौन हैं?”
इस पर उस पक्षी ने अत्यंत मधुर वाणी में उत्तर दिया, “हे पुत्र! मुझे अपने पिता का मित्र समझो।”
यह सुनकर राम ने शांत भाव से उनका कुल और परिचय पूछा। अपना परिचय देते हुए उस विशाल पक्षी ने समस्त प्राणियों की उत्पत्ति का क्रम विस्तार से समझाया और अंत में बताया कि विनीता के पुत्र अरुण के दो पुत्र हुए—संपाति और जटायु। उस विशाल गिद्ध का नाम जटायु था।
गिद्धराज जटायु ने राम को पंचवटी में निवास करने में सहायता करने तथा दोनों भाइयों की अनुपस्थिति में माता सीता की रक्षा करने का भी पावन वचन दिया। यह सुनकर राम अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने प्रेम से गले मिलकर अपने पिता राजा दशरथ के साथ उनकी मित्रता के संस्मरण पूछे।
जटायु ने ही उन्हें अपने निवास के समीप ही गोदावरी नदी के तट पर एक अत्यंत रमणीय स्थल पर पर्णकुटी बनाने का सुझाव दिया। अपने मित्र राजा दशरथ के पुत्र होने के नाते उन्होंने राम-लक्ष्मण को अपने बच्चों की तरह माना और हरसंभव सुरक्षा तथा सहायता का आश्वासन दिया। अपने इसी वचन को निभाते हुए आगे चलकर रावण से माता सीता की रक्षा के लिए वे अपने प्राणों को न्योछावर करने वाले थे।
पंचवटी में गोदावरी तट पर पर्णकुटी का निर्माण
जटायु के साथ विचार-विमर्श के पश्चात राम, लक्ष्मण और सीता पंचवटी के एक सुंदर क्षेत्र में पहुँचे। वहाँ एक उपयुक्त स्थान देखकर राम ने लक्ष्मण से एक पर्णकुटी (झोपड़ी) के निर्माण के लिए कहा। गोदावरी नदी उनकी कुटी के बिल्कुल पास ही बहती थी।
मिट्टी की मजबूत दीवारें और मजबूत खंभे खड़े करके लक्ष्मण ने बहुत ही सुंदर और भव्य कुटी तैयार कर ली। गोदावरी नदी में स्नान कर और विधिवत वास्तु-शांति संपन्न करके लक्ष्मण ने वह आश्रम राम को दिखाया। उस सुंदर कुटी को देखकर राम ने अत्यंत प्रसन्न होकर लक्ष्मण को अपने गले से लगा लिया और उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। इस प्रकार उस पर्णकुटी में उनका गृह-प्रवेश हुआ और वे तीनों आनंदपूर्वक वहाँ निवास करने लगे।
