राम ने बाली वध क्यों किया? | Valmiki Ramayan Katha Part 37

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बाली-सुग्रीव में शत्रुता के कारण

वानरों के राजा ऋक्षरजा की राजधानी किष्किंधा थी। उनके दो पुत्र थे—बाली और सुग्रीव। कई जगहों पर यह कथा मिलती है कि किसी कारणवश ऋक्षराज स्त्री के रूप में परिवर्तित हो गए थे, इसलिए उन्हें कुछ कथाओं में बाली और सुग्रीव की माता भी कहा गया है। उनके पिता सूर्य भगवान को माना गया है। बाली का नाम प्रायः लोग “बाली” लिखते हैं, लेकिन रामायण में उसे “वाली” कहा गया है।

बाली बहुत बलशाली और पराक्रमी था। पिता उसे बहुत मानते थे और दोनों भाइयों में भी बहुत प्रेम था। पिता की मृत्यु होने पर मंत्रियों ने बड़े होने के कारण बाली को राजा बनाया और छोटा भाई सुग्रीव युवराज बना।

एक बार की बात है, मायावी दानव से बाली की शत्रुता हो गई। यह मायावी, मय दानव का पुत्र और दुंदुभी का बड़ा भाई था (दुंदुभी को भी बाली पहले ही मार चुका था)। मायावी दानव बहुत ही बलवान था। एक बार आधी रात को नगर के दरवाजे पर आकर मायावी दानव बाली को युद्ध के लिए ललकारने लगा। अपनी पत्नियों और भाई सुग्रीव के बार-बार मना करने के बावजूद बाली उससे लड़ने के लिए चल पड़ा और उसके साथ उसका भाई सुग्रीव भी गया।

मय दानव और बाली का युद्ध

दोनों भाइयों को साथ आया देखकर मायावी दानव भागकर एक सुरंग में चला गया। दोनों भाई भी उसके पीछे-पीछे उस सुरंग के द्वार तक पहुँच गए। बाली ने अपनी शपथ देकर सुग्रीव को साथ जाने से रोक दिया और उसे वहीं द्वार के पास रखवाली के लिए छोड़कर स्वयं मायावी से लड़ने के लिए उस सुरंग में प्रवेश कर गया।

बाली एक साल से अधिक समय तक उस सुरंग (गुफा) से बाहर नहीं आया। सुग्रीव को अब अपने भाई की चिंता होने लगी। एक दिन उस सुरंग से खून की धारा बाहर आई और साथ ही असुर के गरजने की आवाज़ भी सुनाई दी।

भ्रमवश बाली को मरा हुआ समझकर सुग्रीव द्वारा गुफा बंद करना

सुग्रीव ने यह समझा कि उसका भाई बाली मारा गया है (जबकि वास्तव में मायावी मारा गया था)। सुग्रीव ने एक बड़ा-सा पत्थर गुफा के द्वार पर रख दिया ताकि मायावी दानव गुफा से बाहर आकर राज्य को नुकसान न पहुँचा सके। भाई को जलांजलि देकर सुग्रीव दुखी मन से राजधानी किष्किंधापुरी लौट आया।

मंत्रियों द्वारा सुग्रीव को राजा बनाना

मंत्रियों ने बाली को मरा हुआ मानकर सुग्रीव को राजा बना दिया। इतने में अचानक बाली जीवित लौट आया। सुग्रीव को राजा बने देखकर उसने सोचा कि सुग्रीव ने जानबूझकर उसे मारने के लिए गुफा के द्वार पर पत्थर रखा था ताकि वह खुद राजा बन सके। बड़े भाई के प्रति प्रेम होने के कारण सुग्रीव ने उससे कोई विवाद नहीं किया, बल्कि वह उसे जीवित देखकर अत्यंत प्रसन्न था। वह बाली को उसका राजसिंहासन वापस सौंपने के लिए भी तैयार था। सुग्रीव ने उसे पूरी वस्तुस्थिति बताई, लेकिन बाली संतुष्ट नहीं हुआ और उसने सुग्रीव को अपना शत्रु मान लिया।

बाली द्वारा सुग्रीव को प्रताड़ित करना

बाली ने सुग्रीव के सभी मंत्रियों को कैद कर लिया और सुग्रीव को बुरी तरह मारा-पीटा। उसकी सारी संपत्ति और पत्नी (रुमा) को भी छीन लिया।

अपनी जान बचाने के लिए सुग्रीव यहाँ-वहाँ भागता फिरा, लेकिन बाली या उसके भेजे गए लोग उसे मारने के लिए हर समय तत्पर रहते थे। ऋष्यमूक पर्वत पर एक विशेष शाप के कारण बाली प्रवेश नहीं कर सकता था, इसलिए सुग्रीव ने अपने चार विश्वस्त मंत्रियों के साथ वहीं शरण ली थी।

राम द्वारा बाली वध की प्रतिज्ञा

सुग्रीव द्वारा बाली से अपनी शत्रुता का पूरा कारण सुनने के बाद राम ने बाली के वध का संकल्प लिया। इस पर सुग्रीव ने उन्हें बाली के असीम बल और पराक्रम के बारे में बताया और इसी क्रम में बाली को मिले एक शाप की कथा भी सुनाई।

बाली को मतंग ऋषि का शाप

बाली इतना बलशाली था कि बड़े-बड़े शिलाखंडों और वृक्षों को गेंद की तरह उठा लेता था। एक बार उसने दुंदुभी नामक राक्षस (जो भैंसे के रूप में था) को मारकर उसके शव को इतनी ज़ोर से फेंका कि वह एक योजन दूर मतंग ऋषि के आश्रम के पास जा गिरा। उसके शरीर से निकले खून की कुछ बूँदें मुनि के आश्रम और आसपास के क्षेत्र में भी जा गिरीं।

इससे क्रुद्ध होकर ऋषि ने शाप दिया—“जिसने खून के छींटे डालकर मेरे निवास-स्थान इस वन को अपवित्र किया है, वह आज से इस वन में प्रवेश न करे। अगर वह इस वन में या मेरे आश्रम के आसपास एक योजन के दायरे में भी आया, तो उसकी तत्काल मृत्यु हो जाएगी।” ऋषि ने बाली के अन्य सहायकों को भी उस वन से खदेड़ दिया। चूँकि इस शाप के कारण मृत्यु के भय से बाली उस वन में नहीं आ सकता था, इसलिए सुग्रीव अपने साथियों के साथ सुरक्षित वहीं निवास करते थे।

दुंदुभि की अस्थियों को राम द्वारा दूर फेंकना

राम ने सारा वृत्तांत जानने के बाद बाली के वध की प्रतिज्ञा की। राम द्वारा दुंदुभि राक्षस के कंकाल को अपने पैर के अंगूठे से उठाकर मीलों दूर फेंक देने और एक ही बाण से सात ताड़ के पेड़ों को भेद देने की घटना से सुग्रीव को उनकी अपार शक्ति पर पूरा भरोसा हो गया। इसके बाद राम के उत्साह-वर्धन पर सुग्रीव सभी के साथ बाली को ललकारने के लिए किष्किंधापुरी गए।

सुग्रीव-बाली का प्रथम युद्ध

नगर के द्वार पर जाकर सुग्रीव ने बाली को युद्ध के लिए ललकारा। ललकार सुनकर बाली अत्यंत क्रोध में बाहर आया और दोनों भाइयों में भयंकर द्वंद्व युद्ध शुरू हो गया।

राम वृक्ष की ओट से यह सब देख रहे थे, लेकिन बाली और सुग्रीव दोनों भाई दिखने में इतने एक जैसे थे कि उनमें भेद करना कठिन था कि कौन बाली है और कौन सुग्रीव। इसलिए राम ने बाण नहीं चलाया। राम से समय पर सहायता न मिलने के कारण घायल सुग्रीव वहाँ से जान बचाकर ऋष्यमूक पर्वत की तरफ भागे और बाली ने उनका पीछा किया, लेकिन मतंग वन की सीमा आते ही बाली को ऋषि के शाप का भय सताया और वह लौट गया।

सुग्रीव का दोबारा बाली से युद्ध के लिए जाना

राम ने सुग्रीव को समझाया कि दोनों भाइयों के एक जैसे दिखने के कारण वे भ्रमित हो गए थे और बाण नहीं चला सके। इस बार राम ने पहचान के लिए सुग्रीव के गले में ‘गजपुष्पी लता’ की माला पहना दी। सभी लोग एक बार फिर किष्किंधापुरी पहुँचे।

तारा द्वारा बाली को समझाना

युद्ध के मैदान में पहुँचकर सुग्रीव ने फिर से बाली को ललकारा। उधर, बाली की समझदार पत्नी तारा ने उसे रोकने का प्रयास किया और राम से मित्रता कर लेने की सलाह दी।

तारा का तर्क था कि एक बार परास्त होने के बाद सुग्रीव इस बार बिना किसी सशक्त सहारे के नहीं आया होगा। गुप्तचरों से उसे यह भी पता चल चुका था कि सुग्रीव ने राम से मित्रता कर ली है, इसलिए वह इस बार अधिक शक्तिशाली बनकर आया है। तारा ने सुग्रीव को युवराज का पद वापस देकर इस वैमनस्य को समाप्त करने का आग्रह किया, किंतु अपने बल के अहंकार में चूर बाली ने इस उचित सलाह को अनसुना कर दिया।

बाली का वध

बाली और सुग्रीव के बीच एक बार फिर घमासान युद्ध छिड़ गया। इस बार सुग्रीव पस्त होने लगे और सहायता के लिए इधर-उधर देखने लगे। राम समझ गए कि अब उनके वचन को पूरा करने का सही समय आ गया है। उन्होंने अपनी ओट से बाली पर बाण चला दिया।

बाण लगते ही बाली खून से लथपथ होकर ज़मीन पर गिर पड़ा। इसके बाद राम और लक्ष्मण उसके समीप गए।

बाली ने मृत्युशैया पर लेटे हुए राम को कड़े वचन कहे कि उन्होंने छिपकर और बिना किसी सीधे युद्ध के उस पर वार किया है।

राम ने इसका यथोचित उत्तर देते हुए कहा—“छोटे भाई की पत्नी पुत्री के समान होती है, किंतु तुमने उस पर कुदृष्टि डाली और अपने ही छोटे भाई के साथ अत्यंत क्रूरता का व्यवहार किया। ये गंभीर अपराध तुम्हें मृत्युदंड के योग्य बनाते हैं।” राम ने उसे राजधर्म और नीति के कई तर्कों से संतुष्ट किया।

मरणासन्न बाली का शरणागत होना

अपनी भूल और धर्म-भ्रष्टता का बोध होने पर बाली राम के शरणागत हुआ। इसके बाद रोते हुए उसने अपने इकलौते पुत्र अंगद के भविष्य के प्रति चिंता व्यक्त की और राम से उसके प्रति सद्भाव रखने तथा उसकी रक्षा करने का वचन लिया। उसने यह भी स्वीकार किया कि यद्यपि तारा ने उसे रोका था, फिर भी वह अपनी नियति के कारण ही युद्ध में आया था। बाली ने अपने कठोर वचनों के लिए क्षमा माँगी। राम ने उसे अंगद के प्रति पूरी तरह आश्वस्त किया।

सुग्रीव का पश्चाताप और विलाप

बाली की मृत्यु पर तारा और अंगद का विलाप देखकर सुग्रीव को अपने ही भाई की हत्या का गहरा पश्चाताप हुआ। ग्लानि के कारण उसने अपने प्राण तक त्याग देने की इच्छा जताई। बाली की पत्नी तारा भी पति के साथ सती होना चाहती थी, किंतु राम और लक्ष्मण ने सभी को प्रेमपूर्वक समझाकर शांत किया।

सुग्रीव का राज्याभिषेक

इसके बाद सभी ने मिलकर विधि-विधान से बाली का अंतिम संस्कार किया। सुग्रीव को किष्किंधा का राजा और अंगद को युवराज बनाया गया। इस राज्याभिषेक के अवसर पर हनुमान के माध्यम से मिले आमंत्रण को राम ने अपने वनवास के नियमों का पालन करते हुए नगर में प्रवेश न करने के कारण विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया।

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