अपहृत सीता का पता राम को कैसे मिला? | Valmiki Ramayan Katha Part 38

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यह सच है कि माता सीता का पता हनुमानजी ने लंका जाकर लगाया था, लेकिन हनुमान से राम, सीता का पता करने के क्रम में ही मिले थे। वास्तव में सीता के अपहरण से लेकर लंका में हनुमान के उनसे मिलने तक की खोज को तीन चरणों में रखा जा सकता है:

1. राम-लक्ष्मण द्वारा अकेले सीता को ढूँढना

  • मृगों और जटायु द्वारा सीता हरण की सूचना: सबसे पहले आश्रम के आसपास रहने वाले मृगों से यह संकेत मिला कि सीता को आकाशमार्ग से दक्षिण दिशा की तरफ ले जाया गया था। उसी दिशा में आगे चलने पर जटायु मिले, जिन्होंने बताया कि सीता को रावण ले गया है। लेकिन रावण कौन था, कहाँ रहता था और सीता को लेकर कहाँ गया, यह कुछ भी पता नहीं था। अतः जटायु का अंतिम संस्कार करने के बाद वे लोग क्रौञ्चारण्य नामक गहन वन की तरफ बढ़े, जहाँ उन्हें कबंध राक्षस मिला।
  • कबंध द्वारा सुग्रीव से मित्रता की सलाह: कबंध वास्तव में एक शापग्रस्त गंधर्व था। राम ने उसे शापमुक्त कर दिया। कबंध ने वानरों के राज्य किष्किंधा के निर्वासित पूर्व राजा सुग्रीव से मित्रता करने का सुझाव दिया, जो उस समय ऋष्यमूक पर्वत पर रह रहे थे। इसका कारण यह था कि सुग्रीव को न केवल दंडकारण्य, बल्कि उससे दक्षिण के समस्त क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति का बहुत अच्छा ज्ञान था। इसलिए कबंध का अनुमान था कि सुग्रीव सीता की खोज में राम की सहायता कर सकते हैं।
  • शबरी के आश्रम का आगमन: उस समय तक शाम होने लगी थी, पर दोनों भाई वापस पंचवटी स्थित अपनी पर्णकुटी नहीं गए। रास्ते में उचित स्थान पर रात्रि विश्राम करते हुए वे कबंध के बताए रास्ते से पंपा सरोवर, मातंग वन होते हुए ऋष्यमूक पर्वत पहुँचे। रास्ते में मातंग वन में वे शबरी के आश्रम जाकर उससे भी मिले।

2. सुग्रीव और हनुमान से मिलना तथा वानर सेना का प्रस्थान

Seeta ki khoj Ramayan story
  • सुग्रीव से भेंट और आभूषणों की प्राप्ति: सुग्रीव से उन्हें वह पोटली मिली जिसे सीता ने सुग्रीव आदि वानरों को लक्ष्य कर नीचे फेंका था।’उस स्त्री’ द्वारा राम-लक्ष्मण का नाम पुकारने और आभूषणों को देखकर यह तो निश्चित हो गया कि वह सीता ही थीं। पर केवल इतना पता चल सका कि कोई राक्षस सीता को लेकर आकाशमार्ग से पंपा सरोवर को पार करते हुए दक्षिण की तरफ ले गया है। लेकिन दक्षिण दिशा में कहाँ और कितनी दूर ले गया, यह पता नहीं चल पाया था।
  • बाली वध और वर्षा ऋतु: सुग्रीव ने अपने वानरों को भेजकर सीता की खोज कराने का आश्वासन दिया। इस बीच राम ने बाली का वध कर सुग्रीव को किष्किंधा का राजा बना दिया। अब तक वर्षा ऋतु आ गई थी। बरसात में जंगलों और पहाड़ों से भरे दक्षिण के प्रदेश में सीता की खोज व्यावहारिक दृष्टि से कठिन थी। अतः यह विचार हुआ कि बरसात के चार महीने तक राम-लक्ष्मण ऋष्यमूक पर्वत के पास ही स्थित प्रस्रवण गिरि नामक पर्वत की एक गुफा में निवास करेंगे और बरसात के बाद सुग्रीव वानरों को सीता की खोज में भेजेंगे।
  • वानर सेना का समुद्र तट तक सीता को खोजना: वर्षा ऋतु बीतने पर भी सुग्रीव की तरफ से कोई संदेश नहीं आया, तो राम को रोष हो आया और उन्होंने लक्ष्मण को किष्किंधा भेजा। क्रोध में लक्ष्मण को आया देखकर किष्किंधापुरी में सभी डर गए, लेकिन तारा और हनुमानजी के समझाने तथा सुग्रीव के क्षमा माँगने पर वे शांत हुए।
  • दक्षिण दिशा में वानर दल का प्रस्थान: सुग्रीव ने राम की आज्ञा से वानरों के समूह बनाकर भिन्न-भिन्न दिशाओं में भेजे। चूँकि सीता के मिलने की सबसे अधिक संभावना दक्षिण दिशा में थी, इसलिए इस समूह में हनुमान और युवराज अंगद के अतिरिक्त जांबवान, नील, गंधमादन आदि प्रमुख सेनापति रखे गए।
  • अंगूठी देना: राम को हनुमान से विशेष आशा थी कि वही सीता का पता लगाने में सक्षम हैं। इसलिए उन्होंने अपने नाम के अक्षरों से युक्त एक अंगूठी पहचान चिह्न के रूप में हनुमान को दी और यह समूह दक्षिण दिशा के लिए रवाना हो गया।

3. लंका में हनुमान द्वारा सीता की खोज

रहस्यमयी गुफा और तपस्विनी स्वयंप्रभा: दक्षिण दिशा में विंध्य पर्वत के आसपास दुर्गम जंगलों को पार करते हुए वानर थक चुके थे। तभी एक रहस्यमयी गुफा के भीतर उन्हें दिव्य सरोवर और तपस्विनी स्वयंप्रभा के दर्शन हुए। स्वयंप्रभा ने अपनी योगशक्ति से सभी भूखे-प्यासे वानरों के लिए भोजन और विश्राम का प्रबंध किया और तदुपरान्त सुरक्षित समुद्र तट पर पहुँचा दिया।

संपाती गिद्ध से भेंट: समुद्र तट पर निराश बैठे वानरों की भेंट जटायु के बड़े भाई, विशालकाय गिद्ध संपाती से हुई। संपाती ने ही वानरों को सबसे पहले पक्की सूचना दी कि रावण ने सीता को लंका में नजरबंद कर रखा है और वे वहाँ बहुत कष्ट में दिन बिता रही हैं।

संपाती का कायाकल्प: अपने छोटे भाई जटायु की मृत्यु का समाचार सुनकर संपाती बहुत व्यथित हुए। उन्होने कहा कि शारीरिक रूप से अब वे इतने सक्षम नहीं थे कि उनलोगों कि सहायता कर सकें लेकिन जिसने उनके भाई को मारा है उसे दंडित करने में और जिस उद्देश्य हेतु उनका भाई मारा गया है, उसे पूरा करने में वे वानरों की यथाशक्ति अवश्य करेंगे। उन्होने सीता और रावण के विषय में उन लोगों को सूचना देकर उनकी सहायता की। उनकी सहायता करने के बाद संपाती के पंख वापस उग गए और शरीर में भी थोड़ी शक्ति आ गई जिससे वे ऊर्जावान होकर उड़ चले।

लंका में प्रवेश: यहाँ से आगे की समुद्र पार करने और लंका में अशोक वाटिका तक पहुँचकर सीता की खोज करने की संपूर्ण यात्रा हनुमानजी ने अकेले ही पूरी की।

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