राम-लक्ष्मण का ऋष्यमूक पर्वत पर आना
कबंध की सलाह के अनुसार राम सुग्रीव से मित्रता करने के लिए ऋष्यमूक पर्वत पर आए। दो आयुधधारी वीर पुरुषों को देखकर सुग्रीव को आशंका हुई कि कहीं वे उनके शत्रु तो नहीं हैं। उन्होंने अपने मंत्री हनुमान को दोनों भाइयों के पास उनके आने का उद्देश्य पता करने के लिए भेजा।
राम-हनुमान प्रथम मिलन
सुग्रीव की आज्ञा के अनुसार हनुमान राम-लक्ष्मण का वास्तविक परिचय जानने के लिए उनसे मिले। पहले वे एक ब्राह्मण के छद्म वेश में उनसे मिले थे। उनके वाक्-चातुर्य और संस्कृत के ज्ञान से दोनों भाई बहुत प्रभावित हुए। बातचीत के बाद हनुमान अपने आराध्य को पहचान गए और वे अपने वास्तविक वानर रूप में आ गए।

उन्हें जब पता चला कि ये दोनों भाई उनके स्वामी सुग्रीव से मित्रता की इच्छा से आए हैं, तो उन्हें और भी प्रसन्नता हुई। उन्हें यह भी विश्वास था कि यही दोनों भाई सुग्रीव की कठिनाइयों का अंत कर सकते हैं। अतः वे दोनों भाइयों को अपने साथ ऋष्यमूक पर्वत पर वहाँ ले आए, जहाँ सुग्रीव रहते थे।
राम-सुग्रीव मित्रता
हनुमान के कहने पर सुग्रीव और राम के बीच अग्नि को साक्षी मानकर मित्रता हुई।
सीता द्वारा गिराए गए आभूषण का सुग्रीव द्वारा राम को दिखाना
जब राम ने सुग्रीव और उनके सभी मंत्रियों को अपनी पत्नी सीता के अपहरण और उन्हें ढूँढने में सहायता के लिए कहा, तो सुग्रीव को कुछ याद आया। सुग्रीव ने राम को बताया कि अपने चार मंत्रियों के साथ ऋष्यमूक पर्वत पर बैठे हुए एक दिन उन्होंने एक स्त्री को देखा था, जिसे कोई राक्षस आकाशमार्ग से लिए जा रहा था। वह रोते हुए राम और लक्ष्मण का नाम ले रही थी, इसलिए वह संभवतः सीता ही होगी।
जब सुग्रीव ने उस स्त्री द्वारा वस्त्र में लपेटकर फेंके गए आभूषण दिखाए, तब राम ने उन आभूषणों को पहचान लिया और कहा कि वे सीता के ही हैं। सुग्रीव भी सीता को ले जाने वाले राक्षस का नाम, पता या कुल नहीं जानते थे, फिर भी उन्होंने उन्हें ढूँढने में हरसंभव सहायता का विश्वास दिलाया।
सुग्रीव और बालि की शत्रुता की कथा
अगले दिन राम के पूछने पर सुग्रीव ने बालि से अपनी शत्रुता और वहाँ छिपकर रहने का कारण बताया। उसने यह भी बताया कि उसके बड़े भाई बालि ने उसका राज्य, संपत्ति और यहाँ तक कि पत्नी तक छीन ली है। सब कुछ लेने के बाद भी बालि का अकारण क्रोध शांत नहीं हुआ और वह सुग्रीव की जान लेना चाहता था। बालि के अधर्मी और संगतिहीन आचरण पर विचार कर राम ने उसका वध करने की प्रतिज्ञा की।
सुग्रीव को राम के बल पर संशय और उसका निवारण
सुग्रीव को यद्यपि राम की शक्ति पर भरोसा था, लेकिन उसने पहले कई बार अपने भाई बालि की शक्ति का प्रत्यक्ष अनुभव किया था। बालि आज तक किसी से हारा नहीं था और उसने बड़े-बड़े शक्तिशाली योद्धाओं को द्वंद्वयुद्ध में परास्त किया था। इसलिए सुग्रीव को शंका हुई कि राम उसे मारने की अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर सकेंगे या नहीं।
राम ने उसकी शंका दूर करने का निश्चय किया और उससे बालि के बल के विषय में पूछा। सुग्रीव ने मातंग वन में पड़े राक्षस दुंदुभि की हड्डियों के ढेर राम को दिखाए। साथ ही, साल के सात विशाल वृक्ष भी दिखाए, जिन्हें बालि हिलाकर पत्रहीन करने का बल रखता था।
दुंदुभि की अस्थियों को राम द्वारा अपने पैर के अंगूठे से दूर फेंकना
बालि की शक्ति के बखान के बाद सुग्रीव ने संशय प्रकट किया कि क्या वे शक्तिशाली बालि को मार सकेंगे। इस पर लक्ष्मण ने हँसते हुए पूछा कि क्या करने से उन्हें विश्वास हो जाएगा कि राम बालि को मार सकते हैं। बातों-बातों में ही राम ने दुंदुभि की अस्थियों को अपने पैर के अंगूठे से उठाया और इतनी ज़ोर से फेंका कि वे कई योजन दूर जा गिरीं। लेकिन फिर भी सुग्रीव उससे पूरी तरह संतुष्ट नहीं हो सके।
राम द्वारा एक तीर से सात साल के वृक्षों को छेदना
तब राम ने अपने धनुष से एक तीर चलाया। वह तीर एक साथ ही सातों साल के वृक्षों को छेदता हुआ पाताल लोक तक चला गया और फिर वापस तरकश में आ गया। यह सब इतनी तीव्रता से हुआ कि सुग्रीव सहित सभी लोग विस्मित रह गए।
अब सुग्रीव को पूरा विश्वास हो गया कि वे बालि को मारने में पूरी तरह सक्षम हैं। अतः अब वह राम के कहे अनुसार बालि को युद्ध के लिए चुनौती देने का साहस कर सके।
