लक्ष्मण द्वारा शूर्पनखा का नाक-कान काटना क्या क्रूरता थी? | Ramayan Part 27

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राम द्वारा राक्षसवध का आरंभ हुआ राक्षसराज रावण की बहन शूर्पनखा के द्वारा राम-लक्ष्मण के प्रति प्रणय निवेदन से। शूर्पनखा को लक्ष्मण ने नाक, कान काट कर कुरूप और घायल कर दिया।

शूर्पनखा प्रसंग संबंधी विवाद

Lakshman and Shurpanakha Episode Ramayan

इस प्रसंग में राम और लक्ष्मण की आलोचना मुख्य रूप से दो कारणों से की जाती है:

  1. पहला कारण: कुछ लोगों का मानना है कि उसने केवल राम और लक्ष्मण के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा था, और केवल इस अपराध के लिए इतना बड़ा दंड देना उचित नहीं था।
  2. दूसरा कारण: इस संबंध में दूसरी आलोचना तुलसीदास जी के ‘रामचरितमानस’ के आधार पर की जाती है। इसमें एक चौपाई का वाक्यांश है— “अहइ कुमार मोर लघु भ्राता”—जो राम ने लक्ष्मण के विषय में शूर्पनखा से कहा था। कुछ लोगों के अनुसार लक्ष्मण जी कुंवारे नहीं बल्कि विवाहित थे, इसलिए मर्यादा पुरुषोत्तम माने जाने वाले राम द्वारा मजाक में ही सही, लेकिन झूठ बोला गया।

किंतु यह आलोचना पूरी तरह अधूरी जानकारी और संदर्भ को न समझने के कारण की जाती है। वाल्मीकि रामायण में इस प्रसंग का बहुत ही विस्तृत और स्पष्ट वर्णन मिलता है।

वाल्मीकि रामायण के अनुसार वास्तविक प्रसंग

पंचवटी में रहते हुए शरद ऋतु बीत गई और हेमंत ऋतु आ गई। एक दिन राम स्नान करने गोदावरी तट पर गए। उनके पीछे-पीछे लक्ष्मण घड़ा लेकर पानी भरने गए और माता सीता भी उनके साथ थीं। वे तीनों मौसम, अपने परिवार और भाई भरत आदि की बातें करते हुए स्नान करके अपनी कुटी पर लौटे। कुछ अन्य आवश्यक कार्य करने के बाद दोनों भाई साथ बैठकर आपस में बातें करने लगे।

शूर्पनखा का राम की कुटी में आगमन

उसी समय रावण की बहन राक्षसी शूर्पनखा वहाँ आ गई। वह राम के रूप पर मोहित होकर एक सुंदर स्त्री का वेश बनाकर उनके पास पहुँची। उसने राम का परिचय और उनके यहाँ आने का प्रयोजन पूछना शुरू किया। राम ने सरलता से उसके सभी प्रश्नों के उत्तर दिए। साथ ही, उसका परिचय पूछते हुए यह आशंका भी व्यक्त की कि वह उन्हें इच्छानुसार रूप बदलने वाली कोई राक्षसी प्रतीत होती है।

शूर्पनखा ने इस बात को स्वीकार करते हुए अपना, अपने भाइयों और पिता का नाम बताया। अपनी शक्ति का बखान करते हुए उसने राम से यह प्रस्ताव रखा कि वे सीता को छोड़कर उसी से विवाह कर लें और उसे अपनी पत्नी बना लें।

इस बात पर हँसते हुए राम ने उसे टालने के लिए कहा कि वे पहले से विवाहित हैं और उनकी पत्नी उनके साथ ही है। हालांकि, उनके छोटे भाई अभी साथ नहीं हैं (अर्थात उनके साथ उनकी पत्नी नहीं है), इसलिए वह चाहें तो उनसे पूछ सकती है। लक्ष्मण ने भी स्वयं को राम का दास बताते हुए उसे टाल दिया। दोनों भाई केवल परिहास (मजाक) में उसे एक-दूसरे की ओर टाल रहे थे, किंतु वह इस मजाक को सच मान बैठी।

शूर्पनखा द्वारा सीता पर हमला

धीरे-धीरे शूर्पनखा को माता सीता ही अपने प्रणय संबंध में बाधक लगने लगीं। अतः वह अचानक क्रोधित होकर सीता पर झपट पड़ी। किंतु राम उससे अधिक फुर्ती दिखाते हुए तुरंत बीच में आ गए। राम की हुंकार सुनकर शूर्पनखा रुक गई।

क्रोधित होकर राम ने उससे कहा, “क्रूर कर्म करने वाले अनार्यों के साथ कभी भी किसी प्रकार का परिहास नहीं करना चाहिए। देखो, सीता के प्राण बड़ी मुश्किल से बचे हैं। अब इस दुष्ट राक्षसी को इसके किसी अंग से हीन कर देना चाहिए।”

लक्ष्मण द्वारा शूर्पनखा के नाक-कान काटना

राम का संकेत पाते ही क्रुद्ध लक्ष्मण ने अपनी तलवार निकाली और उसके नाक व कान काट दिए। नाक और कान कट जाने के बाद खून बहाती हुई वह अपने वास्तविक रूप (जो कि एक कुरूप राक्षसी का था) में आ गई और ज़ोर-जॉरों से रोते हुए जंगल में भाग गई।

शूर्पनखा का व्यवहार और राम-लक्ष्मण की प्रतिक्रिया (विश्लेषण)

वाल्मीकि रामायण को श्रीराम के चरित्र के संबंध में सबसे पहला और मौलिक ग्रंथ माना जाता है। इसके अनुसार, जब शूर्पनखा राम के आश्रम में आई थी, तब वे तीनों शांत भाव से आपस में बातें कर रहे थे। शूर्पनखा एक सुंदर स्त्री का रूप धरकर आई थी और उसने सामान्य रूप से बातचीत शुरू की थी। राम ने भी अत्यंत सरलता और शिष्टाचार से उसके प्रश्नों के उत्तर दिए थे। फिर भी राम ने उसके साथ कोई दुर्व्यवहार नहीं किया था।

शूर्पनखा ने जब राम के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा, तो यदि हम राम को सामान्य पुरुष के रूप में भी देखें, तो कोई भी व्यक्ति अपनी पत्नी और भाई के साथ घर में बैठा हो और कोई अनजान स्त्री आकर सीधे विवाह का प्रस्ताव रख दे, तो वह उसे तुरंत मार नहीं डालेगा। राम ने भी उसकी बात को अधिक गंभीरता से नहीं लिया और हल्के-फुल्के अंदाज में मजाक में कह दिया कि वे विवाहित हैं और उनकी पत्नी उनके साथ है, हाँ, उनके छोटे भाई अकेले हैं (यानी उनके साथ उनकी पत्नी नहीं है), वह चाहें तो उनसे पूछ सकती है।

किंतु शूर्पनखा उनके इस परिहास को समझ नहीं पाई और उसने सचमुच लक्ष्मण के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रख दिया। लक्ष्मण ने भी स्वयं को राम का सेवक बताते हुए उसका वह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया।

दोनों भाई उसकी बातों को अनसुना कर आपस में बातें करने लगे और उसे प्रेमपूर्वक टालने का प्रयास कर रहे थे। परंतु शूर्पनखा बार-बार दोनों भाइयों के समक्ष अपनी जिद दोहराती रही। यहाँ तक कि उसने माता सीता को कुरूप, बूढ़ी और बड़े पेट वाली कहकर खुद को उनसे अधिक सुंदर साबित करने और अपनी स्वीकार्यता के लिए दबाव बनाने का प्रयास किया। किंतु सीता के प्रति कही गई इन अपमानजनक बातों को भी दोनों भाइयों ने केवल उपहास में ही टाल दिया।

लक्ष्मण द्वारा दिए गए दंड की वैधता

जब दोनों भाइयों ने उसके प्रस्ताव को किसी भी रूप में गंभीरता से नहीं लिया, तो अचानक वह आवेश में आकर सीता को जान से मारने के लिए उन पर झपट पड़ी। यह आक्रमण पूरी तरह अचानक था, फिर भी राम अत्यधिक फुर्तीले साबित हुए। वे तेजी से माता सीता के आगे आ गए और शूर्पनखा के उस आक्रामक प्रयास को विफल कर दिया।

अभी तक राम या लक्ष्मण में से किसी ने भी शूर्पनखा के साथ कोई शारीरिक कठोरता नहीं बरती थी। किंतु जब उसने बिना किसी अपराध या पूर्व कारण के सीधे माता सीता की हत्या करने का प्रयास किया, तब राम को तीव्र क्रोध आया। उन्होंने लक्ष्मण से स्पष्ट रूप से कहा कि इस राक्षसी को इसके किसी अंग से हीन कर देना चाहिए। तब लक्ष्मण ने अपनी तलवार से उसके नाक और कान काट दिए।

स्पष्ट है कि लक्ष्मण ने शूर्पनखा को यह दंड केवल इसलिए नहीं दिया कि उसने विवाह का प्रस्ताव रखा था, बल्कि इसलिए दिया क्योंकि उसने बिना किसी कारण के माता सीता की हत्या करने का गंभीर प्रयास किया था। इसके अलावा, यह कोई आवेश में किया गया अनियंत्रित कृत्य नहीं था, बल्कि राम द्वारा सीता की रक्षा करने के बाद राक्षस को विधिवत दंडित करने का निर्देश था।

उस काल के न्यायशास्त्र और दंड विधान के अनुसार, शास्त्रों में स्त्रियों का वध वर्जित माना गया था। किंतु यदि कोई स्त्री ऐसा जघन्य अपराध करे जिसके लिए मृत्युदंड निर्धारित हो, तो उस स्थिति में उसके नाक और कान काटकर उसे जीवित छोड़ देना तत्कालीन न्याय व्यवस्था के अंतर्गत एक मान्य और कानूनी रूप से स्वीकृत दंड था।

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