अयोध्या में अपने पिता राजा दशरथ का अंतिम संस्कार करने के बाद, भरत अपने भाई शत्रुघ्न, समस्त परिवारजनों, उच्चाधिकारियों, सेना और प्रजाजनों को साथ लेकर राम को मनाने और उन्हें वापस अयोध्या लाने के लिए चित्रकूट पहुँचे, जहाँ राम उस समय माता सीता और लक्ष्मण के साथ तपस्वी वेश में निवास कर रहे थे। परस्पर मिलने-जुलने, कुशल-क्षेम के आदान-प्रदान और दिवंगत पिता को पिंडदान अर्पित करने के बाद, सभी लोग एक सभा के रूप में बैठे ताकि राम के समक्ष उनके आने का मुख्य प्रयोजन रखा जा सके।
राम से अयोध्या चलने के लिए आग्रह
सभा में भरत ने अत्यंत विनम्रता से राम से अयोध्या वापस चलने के लिए निवेदन किया। किंतु राम ने उन्हें धर्म का उपदेश दिया और वन में ही रहकर अपने पिता के वचनों का पालन करने का अपना दृढ़ निश्चय प्रकट किया।

दोनों भाई बारी-बारी से अपने-अपने तर्कों और मतों का विभिन्न प्रकार से प्रतिपादन करते रहे। राम ने भरत को समझाकर उन्हें अयोध्या वापस जाकर राजकाज संभालने का आदेश दिया। इसी बीच, महर्षि जाबालि ने नास्तिक दर्शन के तर्कों के आधार पर राम को अयोध्या की राजगद्दी स्वीकार करने के लिए समझाया, किंतु राम ने नास्तिक मत का कटुता से खंडन किया। कुलगुरु वसिष्ठ ने भी उन्हें बड़े भाई के अधिकारों और कुल-परंपरा का हवाला देते हुए समझाने का प्रयास किया।
किंतु जब इतना समझाने पर भी राम अपने पिता के वचन की रक्षा के लिए अयोध्या लौटने को तैयार नहीं हुए, तो भरत वहीं कुश का आसन बिछाकर आमरण अनशन की मुद्रा में धरने पर बैठ गए। तब राम ने प्रेमपूर्वक उन्हें उठाया और समझा-बुझाकर अयोध्या लौटने का पुनः आदेश दिया।
भरत द्वारा राम की चरण-पादुका ग्रहण करना
अंततः सभी ऋषियों और मुनियों ने भरत को सलाह दी कि उन्हें राम की आजायनुसार अयोध्या लौट जाना चाहिए। भरत ने राम के आदेश और गुरुजनों की इस सलाह को मानकर अयोध्या लौटने की सहमति दे दी, किंतु उन्होंने राम से उनकी स्वर्ण-जड़ित खड़ाऊ (चरण-पादुका) पर अपने चरण स्पर्श करने का अनुरोध किया। राम ने वैसा ही किया।
भरत ने उन खड़ाऊओं को राम का ही प्रतीक और प्रतिनिधि मानकर अपने सिर पर धारण किया और भारी मन से अयोध्या के लिए प्रस्थान किया।
भरत की कठोर प्रतिज्ञा
भरत ने राम की चरण-पादुकाएँ लेते समय यह दृढ़ प्रतिज्ञा भी की कि वे स्वयं कभी राजमहल में निवास नहीं करेंगे। वे भी जटा धारण करेंगे, वल्कल (छाल के) वस्त्र पहनेंगे और कंद-मूल-फल खाकर नगर के बाहर कठोर जीवन बिताएँगे। वे ज़मीन पर सोएंगे और इस प्रकार चौदह वर्ष तक राम के लौटने की प्रतीक्षा करेंगे। वे इन चरण-पादुकाओं को ही राजा का प्रतीक मानकर उनके प्रतिनिधि के रूप में सारा राजकाज संभालेंगे।
भरत ने यह भी कसम खाई कि यदि चौदह वर्ष पूरे होने के ठीक अगले दिन सूर्योदय तक राम वापस अयोध्या नहीं लौटे, तो वे जलती हुई चिता में प्रवेश कर अपने प्राणों का अंत कर लेंगे। राम ने उनकी इस बात को स्वीकार कर लिया।
(आगे चलकर रावण से युद्ध के दौरान जब चौदह वर्ष की अवधि पूरी होने वाली थी, तब लंका से अयोध्या लौटने में कुछ विलंब हो रहा था और वे ठीक अगले दिन तक नहीं पहुँच पाते, तो इसी प्रतिज्ञा के अनुसार भरत अपने प्राण त्याग देते। यही कारण था कि राम को लौटने की अति शीघ्रता थी और वे हनुमान व अन्य सहयोगियों के साथ पुष्पक विमान से तुरंत अयोध्या लौटे थे।)
भरत का अयोध्या लौटना और नंदीग्राम प्रस्थान
उस समय वहाँ उपस्थित स्थानीय ऋषि-मुनि और देवतागण भी इन चारों भाइयों के इस पवित्र और अद्वितीय सम्मेलन को देखने के लिए एकत्र हो गए थे। चारों भाइयों के आपसी प्रेम, त्याग और धर्मपरायणता को देखकर वे सभी उनकी मुक्तकंठ से प्रशंसा करने लगे।
राम ने अपनी शपथ दिलाकर भरत से यह भी आग्रह किया कि वे अपनी माता कैकेयी के प्रति मन में कोई दुर्भावना न रखें। इसके पश्चात परस्पर प्रेम और आलिंगन के साथ सबने एक-दूसरे से विदा ली। जिस मार्ग से वे आए थे, उसी मार्ग से वे वापस लौट पड़े और रास्ते में महर्षि भरद्वाज के आश्रम में रुककर उनका आशीर्वाद भी लिया।
राम की चरण-पादुका की राजसिंहासन पर प्रतिष्ठा
अयोध्या वापस आकर भरत ने अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार राम की चरण-पादुकाओं को मुख्य राजसिंहासन पर सुशोभित किया और उन्हें ही अपना वास्तविक राजा मानकर उनके प्रतिनिधि के रूप में सारा प्रशासनिक कार्य संचालित किया।
भरत ने चौदह वर्ष के वनवास की पूरी अवधि के दौरान एक दिन भी महलों में प्रवेश नहीं किया। वे नगर से कुछ दूर नंदीग्राम में रहे और राम की ही तरह वेशभूषा धारण कर एक तपस्वी का अत्यंत कठोर जीवन व्यतीत करते रहे। जिस प्रकार लक्ष्मण ने वन में रहकर राम की सेवा की थी, उसी प्रकार शत्रुघ्न ने भी हर कदम पर भरत का ही अनुकरण किया। इस प्रकार पूरी अयोध्या के लोग गहरी व्यग्रता और राम के पुनरागमन की आशा के साथ उस लंबी अवधि को व्यतीत करने लगे।
