भरत राम से मिलने चित्रकूट क्यों गए थे? | Valmiki Ramayan – Part 22

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जब कैकेयी ने वरदान माँगा तब भरत-शत्रुघ्न अपने राज्य में नहीं थे। यहाँ आने के बाद उन्हें पिता की मृत्यु और भाइयों के वनवास का पता चला। दिवंगत राजा दशरथ का अंतिम संस्कार सम्पन्न हो जाने के बाद राज्य के सभी उच्च अधिकारियों ने एक सभा बुलाया जिसमे भरत को राजा बनाने का प्रस्ताव रखा गया। यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से पास हुआ।

लेकिन भरत ने इसे धर्म विरुद्ध और अनुचित बताया कि बड़े भाई के रहते छोटे का राज्याभिषेक हो। उन्होने राम के बदले स्वयं वन में रहने और राम को राजा बनाने का प्रस्ताव दिया। यह सहमति बनी कि भरत अपने सगे-संबंधियों, उच्चाधिकारियों और सैनिकों के साथ वन में जाएँगे। वहीं राम का राज्याभिषेक होगा। सभी मिलकर राम को वापस अयोध्या आने के लिए मनाएंगे।

राम के पास जाने की तैयारी

राम को लाने के लिए भरत के साथ राजपरिवार से सभी सदस्य, सभासद, सेना, नगरवासी इत्यादि के भी साथ जाने का निर्णय था। सबको ले जाने का कारण यह था कि सबके कहने पर शायद राम अपना निर्णय बदल ले और अयोध्या लौट आए। सुरक्षा के लिए सेना थी।

पर इतने सारे लोगों के जाने के लिए विशेष प्रशासनिक प्रबंध की जरूरत थी। सबके लिए भोजन, आवास आदि की व्यवस्था होनी थी। रास्ते अच्छे चाहिए थे। इसी तैयारी के तहत अयोध्या से कोसल जनपद की सीमा पर स्थित गंगा तट तक के लिए राजमार्ग के निर्माण कार्य का आदेश हुआ। ये ज़िम्मेदारी शत्रुघ्न को दी गई।

भरत ने अपने को राम का मंत्री और सेवक मानते हुए किसी भी प्रकार का राजकीय चिह्न धारण नहीं किया। राजा के लिए बजने वाले प्रातःकालीन मंगल वाद्य को भी उन्होने अपने लिए नहीं बजने दिया।

भरत का राम से मिलने के लिए यात्रा

समस्त तैयारी कर भरत और शत्रुघ्न काफिले के साथ राम से मिलने के लिए निकले। उनके साथ सभी रानियाँ, गुरु, मंत्री, सभासद आदि थे। उद्देश्य था राम को वापस लौटने के लिए मनाना। अगर फिर भी राम लौटने के लिए तैयार नहीं होते तो लक्ष्मण की तरह भरत भी राम के साथ वन में रहते।

भरत के साथ इस काफिले की यात्रा सुबह में शुरू हुई। यात्रा का मार्ग वही था जो राम का था। राम के साथ गंगा तक जाने वाले सुमंत्र भी इनके साथ थे। राम की तरह ही रात इन लोगों ने श्रिंगवेरपुर में गुजारी।

निषादराज गुह से भरत का मिलना

भरत के साथ सेना देख कर गुह को उनकी मंशा पर संदेह हुआ। लेकिन बाद में मिलने पर जब उन्होने जाना कि वे राम को मनाने के लिए जा रहे है, तो उन्होने उन सबका आतिथ्य किया। राम के मित्र और सहायक जान कर भरत भी उनसे बड़े प्रेम से मिले। राम और सीता ने जिस शय्या पर विश्राम किया था उसे देख कर सभी भावुक हो गए।

भारद्वाज मुनि से भरत का मिलना

गुह की सहायता से सब ने गंगा पार किया। अगले दिन वे सब प्रयाग में भारद्वाज के उसी आश्रम में पहुँचे, जहाँ राम रुके थे। पहले दोनों भाई अकेले ही गए लेकिन मुनि के कहने पर सेना सहित सब लोगों को बुलाया। मुनि ने अपने तप बल से सब के लिए अच्छे भोजन और आवास की व्यवस्था किया।

पारस्परिक परिचय, कुशलमंगल आदि बातों के बाद भरत के पूछने पर भारद्वाज ने चित्रकूट का पता बता दिया जहाँ राम रह रहे थे। राम को चित्रकूट जाने की सलाह और रास्ते की जानकारी उन्होने ही दी थी इसलिए उन्हें पता था कि राम कहाँ गए थे।

सुबह होने पर भरत अपने विशाल समूह के साथ चित्रकूट के लिए चल पड़े।

भरत का चित्रकूट पहुँचना

इधर चित्रकूट में राम, लक्ष्मण और सीता मन्दाकिनी के किनारे घूमने के बाद एक जगह बैठे हुए थे, तो उन्होने वन के पशु-पक्षियों के भागते हुजब रानी कैकेयी ने राजा दशरथ से वरदान माँगे थे, तब भरत और शत्रुघ्न अपने ननिहाल में थे। अयोध्या लौटने के बाद उन्हें पिता की मृत्यु और भाइयों के वनवास का पता चला। दिवंगत राजा दशरथ का अंतिम संस्कार संपन्न हो जाने के बाद राज्य के सभी उच्च अधिकारियों और मंत्रियों की एक सभा बुलाई गई, जिसमें भरत को अयोध्या का राजा बनाने का प्रस्ताव रखा गया। यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से पास भी हो गया।

लेकिन भरत ने इसे पूरी तरह धर्मविरुद्ध और अनुचित बताया कि बड़े भाइयों के जीवित रहते और उनके वन में रहते हुए छोटे भाई का राज्याभिषेक हो। उन्होंने स्वयं राम के बदले चौदह वर्ष वन में रहने और राम को ही वापस लाकर राजा बनाने का प्रस्ताव रखा। अंत में यह सहमति बनी कि भरत अपने सगे-संबंधियों, उच्चाधिकारियों और विशाल सेना के साथ वन में जाएंगे, वहीं राम का राज्याभिषेक करेंगे और सभी मिलकर राम को वापस अयोध्या लौटने के लिए मनाएंगे।

राम के पास जाने की तैयारी

राम को वापस लाने के लिए यह तय हुआ कि भरत के साथ राजपरिवार के सभी सदस्य, सभासद, सेना और नगरवासी भी चलेंगे। सबको साथ ले जाने का मुख्य कारण यह था कि शायद सबके सामूहिक अनुरोध पर राम अपना निर्णय बदल लें और अयोध्या लौट आएँ। सुरक्षा व्यवस्था के लिए सेना का साथ होना आवश्यक था।

परंतु इतने सारे लोगों के एक साथ वन की यात्रा करने के लिए विशेष प्रशासनिक प्रबंधों की आवश्यकता थी। सबके लिए भोजन, आवास और मार्गों की उचित व्यवस्था होनी चाहिए थी। इसी तैयारी के तहत अयोध्या से कोसल जनपद की सीमा पर स्थित गंगा तट तक के लिए एक सुगम राजमार्ग के निर्माण का आदेश दिया गया, जिसकी पूरी ज़िम्मेदारी शत्रुघ्न को सौंपी गई।

भरत ने खुद को राम का सेवक और प्रतिनिधि मानते हुए किसी भी प्रकार के राजकीय चिह्न धारण नहीं किए। यहाँ तक कि राजा के सम्मान में बजने वाले प्रातःकालीन मंगल वाद्यों को भी उन्होंने अपने लिए बजने से मना करवा दिया था।

भरत की राम से मिलने की यात्रा

आवश्यक तैयारियाँ पूरी करने के बाद भरत और शत्रुघ्न अपने विशाल काफिले के साथ राम से मिलने के लिए निकल पड़े। उनके साथ सभी रानियाँ, गुरु वसिष्ठ, मंत्री और सभासद भी थे। उनका एकमात्र उद्देश्य राम को वापस अयोध्या लौटने के लिए मनाना था। यदि इसके बावजूद राम नहीं मानते, तो लक्ष्मण की ही तरह भरत भी उनके साथ वन में ही निवास करने का संकल्प ले चुके थे।

यह यात्रा सुबह के समय आरंभ हुई। उनका मार्ग वही था जिससे राम अयोध्या से आगे बढ़े थे। राम के साथ गंगा तट तक जाने वाले मंत्री सुमंत्र भी इस यात्रा में उनके साथ थे। राम की तरह ही इन लोगों ने भी अपनी पहली रात्रि शृंगवेरपुर में ही बिताई।

निषादराज गुह से भरत की मुलाकात

भरत के साथ इतनी बड़ी सेना को देखकर निषादराज गुह को उनकी मंशा पर कुछ संदेह हुआ। किंतु जब वे व्यक्तिगत रूप से मिले और उन्होंने जाना कि भरत राम को मनाने और उन्हें वापस अयोध्या ले जाने जा रहे हैं, तो उन्होंने उन सबका भव्य आतिथ्य किया। राम का परम मित्र और सहायक जानकर भरत भी उनसे बड़े प्रेम और आदर से मिले। राम और माता सीता ने जिस शय्या पर विश्राम किया था, उसे देखकर वहाँ मौजूद सभी लोग भावुक हो गए।

महर्षि भरद्वाज से भेंट

निषादराज गुह की सहायता से सभी ने गंगा नदी पार की। अगले दिन वे सब प्रयाग में महर्षि भरद्वाज के उसी आश्रम में पहुँचे, जहाँ कुछ समय पहले राम रुके थे। पहले दोनों भाई अकेले ही ऋषि के पास गए, किंतु मुनि के कहने पर उन्होंने सेना और पूरे समूह को भी वहीं बुला लिया। महर्षि ने अपने तप के प्रभाव से सभी के लिए उत्तम भोजन और आवास की भव्य व्यवस्था की।

पारस्परिक परिचय और कुशलक्षेम पूछने के बाद, जब भरत ने राम के बारे में जानना चाहा, तो महर्षि भरद्वाज ने उन्हें चित्रकूट का मार्ग बता दिया जहाँ राम निवास कर रहे थे। चूँकि राम को चित्रकूट जाने की सलाह और मार्ग की जानकारी महर्षि ने ही दी थी, इसलिए उन्हें भली-भांति पता था कि राम इस समय कहाँ हैं।

अगली सुबह होते ही भरत अपने विशाल जनसमुदाय के साथ चित्रकूट के लिए आगे बढ़ चले।

भरत का चित्रकूट पहुँचना

इधर चित्रकूट में राम, लक्ष्मण और माता सीता मन्दाकिनी नदी के तट पर विचरने के बाद एक स्थान पर बैठे हुए थे, तभी उन्होंने वन के पशु-पक्षियों को अचानक भयभीत होकर भागते हुए देखा। दूर आसमान में धूल उड़ती हुई दिखाई दी और कोलाहल सुनाई दिया। इस शांत तपोवन में किसी राजा का सेना या शिकार के उद्देश्य से आना तर्कसंगत नहीं था, इसलिए राम ने लक्ष्मण से ऊपर जाकर वस्तुस्थिति देखने के लिए कहा।

लक्ष्मण ने जब एक ऊँचे शाल के वृक्ष पर चढ़कर देखा, तो ध्वजा और चिह्नों से पहचान लिया कि यह अयोध्या से आने वाली भरत की सेना है। सेना के साथ भरत को देखकर उनके मन में कुछ संदेह हुआ और उन्हें उनके आने के उद्देश्य पर क्रोध भी आया, किंतु राम के प्रेमपूर्ण और संयम भरे वध्रनों ने उन्हें शांत कर दिया।

इधर भरत ने भी इतनी बड़ी सेना के साथ सीधे तपोवन के भीतर प्रवेश करना उचित नहीं समझा। इसलिए उन्होंने पहाड़ के नीचे ही अपना शिविर लगवाया और सभी को वहीं रोक दिया। इसके बाद भरत, शत्रुघ्न और निषादराज गुह पैदल ही राम के आश्रम की खोज करते हुए आगे बढ़े। मंत्री सुमंत्र भी उनके पीछे-पीछे आ रहे थे।

राम-भरत मिलन

आश्रम से उठने वाले हवन के धुएँ, यज्ञ की लकड़ी की महक और मार्ग के चिह्नों को पहचानकर भरत समझ गए कि वे ऋषियों की इस पावन बस्ती के करीब आ चुके हैं। वे रोते-रोते अपने बड़े भाई के आश्रम की तलाश करने लगे। वे इस बात से दुःखी थे कि राजा के पुत्र होने के बावजूद उनके भाई इस प्रकार वनों में कष्ट सह रहे हैं। जब उन्होंने एक पर्णकुटी के बाहर धनुष-बाण और यज्ञ-वेदी देखी, तो वे तुरंत पहचान गए। वहीं उन्होंने जटा धारण किए और मुनियों जैसे वस्त्र पहने अपने बड़े भाई राम को देखा।

अपने प्रिय भाई राम को देखते ही भरत शोक से विलाप करते हुए उनकी ओर दौड़े। वे राम के चरण स्पर्श करना चाहते थे, किंतु अत्यधिक भावातिरेक और दुर्बलता के कारण वे रास्ते में ही ज़मीन पर गिर पड़े। आँखों के आंसुओं से उनका गला रुंध गया और वे “हा! आर्य” के अतिरिक्त कुछ और नहीं बोल सके। शत्रुघ्न ने भी रोते हुए राम को प्रणाम किया और राम ने आगे बढ़कर दोनों भाइयों को अपने हृदय से लगा लिया।

इसके पश्चात लक्ष्मण, निषादराज गुह और मंत्री सुमंत्र भी मिले। इन वैभवशाली और सुकुमार राजकुमारों को वन में इस दयनीय दशा में देखकर वहाँ के स्थानीय वनवासी भी भावुक होकर रो पड़े।

भरत द्वारा पिता की मृत्यु की सूचना और राज्याभिषेक की विनती

परस्पर हालचाल जानने के बाद राम ने भरत से उनके इतनी दूर वन में आने का मुख्य प्रयोजन पूछा। तब भरत ने अत्यंत विनम्रता से उन्हें वापस अयोध्या चलकर राज्यभार संभालने की विनती की, किंतु राम ने मर्यादा का पालन करते हुए इसे अस्वीकार कर दिया। तब भरत ने भारी मन से उन्हें अपने पिता राजा दशरथ के परलोक सिधारने का दुखद समाचार सुनाया।

पिता की मृत्यु का यह वज्राघात जैसा समाचार सुनते ही राम और लक्ष्मण फफककर रो पड़े। कुछ देर तक निरंतर शोक और विलाप करने के बाद वे सभी मन्दाकिनी नदी के तट पर पहुँचे। वहाँ दोनों भाइयों और माता सीता ने दिवंगत पिता को जलांजलि दी और उनके निमित्त पिंडदान किया। यह पिंडदान उन्होंने इंगुदी फल के पिसे हुए गूदे में बेर मिलाकर बनाए गए पिंड से किया था।

अन्य अयोध्यावासियों का राम-लक्ष्मण से मिलना

मन्दाकिनी नदी के किनारे बैठकर पिता को पिंडदान देते समय वे सभी शोक में डूब गए। रोने की इस आवाज को सुनकर पर्वत के नीचे शिविर में प्रतीक्षा कर रहे सैनिकों और नगरवासियों ने समझ लिया कि भरत की भेंट राम से हो चुकी है। वे सब व्याकुल होकर उसी दिशा में पैदल ही नदी की ओर दौड़े।

यद्यपि राम को अयोध्या छोड़े अभी कुछ ही दिन बीते थे, फिर भी वहाँ उपस्थित लोगों को ऐसा प्रतीत हो रहा था मानों वे वर्षों से उनसे बिछुड़े हुए थे। सब लोग अधीर होकर उनके आश्रम की ओर बढ़ने लगे। कुछ लोग जल्दी पहुँचने के लिए अपनी सवारियों से भी आने लगे, जिससे उस शांत वन क्षेत्र में अचानक तीव्र कोलाहल मच गया और वन के पशु-पक्षी डरकर इधर-उधर भागने लगे।

कुछ ही देर में कुलगुरु वसिष्ठ के साथ रानियाँ (माताएँ) भी वहाँ आ गईं। यथायोग्य परस्पर मिलने और दुःख साझा करने के बाद वे सभी मन्दाकिनी नदी के तट पर एक शांत स्थान पर बैठ गए।ए देखा। दूर से कोलाहल और धूल भी दिख रहा था। इस तपोवन में शिकार या युद्ध के लिए किसी राजा का आना तर्कसंगत नहीं था। इसलिए राम ने लक्ष्मण से वस्तुस्थिति देखने के लिए कहा।

लक्ष्मण ने जब एक ऊँचे शाल वृक्ष पर चढ़ कर देखा तो ध्वजा से पहचान गए कि यह भरत की सेना थी। सेना के साथ भरत को देख कर उनके नियत पर संदेह के कारण उन्हे कुछ रोष हुआ। लेकिन फिर राम के समझाने पर वे शांत हो गए।

इधर भरत ने भी इतनी सेना के साथ तपोवन में जाना उचित नहीं समझा। इसलिए पहाड़ के नीचे शिविर लगा कर सबको वहीं ठहरा दिया। भरत, शत्रुघ्न और गुह के साथ पैदल ही राम के आश्रम की खोज करते हुए बढ़े। सुमंत्र भी पीछे-पीछे आने लगे।

राम-भरत मिलन

आश्रम से निकलने वाले धुआँ और हवन की लकड़ियों, मार्गबोधक चिह्न आदि से भरत जंगल के बीच मनुष्य (ऋषियों) के वास स्थान को पहचान गए। इन्ही स्थानों में रोते हुए वे अपने भाई का आश्रम ढूँढने लगे। वे रो इसलिए रहे थे कि उनके भाई राजा के पुत्र हो कर यहाँ रह रहे थे। एक पर्ण कुटी में धनुष-बाण आदि अस्त्रों के साथ यज्ञ वेदी आदि देख कर वे पहचान गए। वहीं उन्होने जटा और मुनियों-सा वस्त्र पहने अपने भाई राम को देखा।

भाई राम को देखते ही भरत शोक से विलाप करते हुए उनकी ओर दौड़े। वे राम के पैर छूना चाहते थे, लेकिन उससे पहले ही भावातिरेक के कारण धरती पर गिर गए। आँसुओं से उनका गला रूँध गया। वे “हा! आर्य” के अतिरिक्त कुछ और नहीं बोल सके। शत्रुघ्न ने भी रोते हुए राम को प्रणाम किया। राम ने उठा कर दोनों भाइयों को सीने से लगा लिया।

फिर लक्ष्मण, निषादराज गुह और सुमंत्र भी मिले। इन परम वैभवशाली चारों राजकुमारों को वन में इस तरह देख कर स्थानीय वनवासी भी भावुक हो गए।

भरत द्वारा राम को पिता की मृत्यु की सूचना और राजा बनने की विनती

परस्पर हालचाल जानने के बाद राम ने भरत से उनके आगमन का प्रयोजन पूछा। भरत ने उनसे राज्य ग्रहण करने की विनती की। लेकिन राम ने मना कर दिया। अब भरत ने उनसे पुनः विनती करते हुए पिता की मृत्यु के विषय में बताया।

राम, लक्ष्मण और सीता द्वारा पिता के लिए पिण्डदान

पिता की मृत्यु का समाचार सुन कर राम-लक्ष्मण रोने लगे। कुछ देर रोने और शोक करने के बाद वे सभी मन्दाकिनी तट पर आए। वहाँ दोनों भाइयों और सीता ने पिता को जलांजलि देने के बाद उनके लिए पिंड दान किया। पिंडदान इंगुदी फल के पिसे हुए गूदे में बेर का फल मिला कर बनाए गए पिंड से किया।  

अन्य अयोध्यावासियों का राम-लक्ष्मण से मिलन

मन्दाकिनी नदी के किनारे पिता को पिंड देते हुए वे सब रो पड़े। रोने की इस आवाज से पर्वत के नीचे शिविर में रुके हुए उनके सैनिकों ने समझ लिया कि भरत राम से मिल गए है। वे सब पैदल ही आवाज की दिशा में नदी की ओर भागे।

यद्यपि राम को अभी घर से आए अधिक दिन नहीं हुए थे। तथापि लोगों को लग रहा था कि कितने वर्षों से उनसे नहीं मिले थे। सब अधीर होकर उनके आश्रम की तरफ जाने लगे। कुछ लोग जल्दी के लिए सवारी से भी आने लगे। इससे उस क्षेत्र में तीव्र कोलाहल होने लगा। पशु-पक्षी डर कर इधर-उधर भागने लगे।

कुलगुरु वसिष्ठ के साथ माताएँ भी आ गईं। यथायोग्य परस्पर मिलन के बाद सब वहीं मन्दाकिनी नदी के तट पर एक जगह बैठे।

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