राम समुद्र पार कर लंका कैसे पहुंचे? | Valmiki Ramayan Katha Part 44

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हनुमानजी से माता सीता की संपूर्ण सूचना मिलने के बाद श्रीराम, लक्ष्मण और सभी वानर प्रमुखों का यही विचार था कि शीघ्र ही लंका पर आक्रमण कर रावण के अत्याचारों से माता सीता को मुक्त कराया जाए। सभी तैयारियाँ पूरी करने के बाद वानर सेना समुद्र के तट पर जा पहुँचे।

Ram Setu Nirmaan

वहाँ सबसे बड़ी समस्या यह थी कि इस असीम समुद्र को कैसे पार किया जाए। जब वे सब तट पर शिविर लगाकर रुके हुए थे और समुद्र पार करने के उपाय पर विचार कर रहे थे, उसी दौरान रावण का भाई विभीषण अपने चार मंत्रियों के साथ आकर श्रीराम की शरण में मिल गया।

उधर, शत्रु सेना की ताकतों, खूबियों और कमियों का जायजा लेने तथा यदि संभव हो तो उनमें आपसी फूट डालने के उद्देश्य से रावण ने अपने दो गुप्तचरों को श्रीराम के शिविर में भेजा था। इसी यात्रा और योजना के पश्चात समुद्र को पार करने के लिए जिस पुल का निर्माण किया गया था, उसे आज ‘राम सेतु’ के नाम से जाना जाता है। रामेश्वरम और लंका के बीच आज भी सेतु जैसा एक प्राचीन ढांचा मौजूद है, जिसके मानव-निर्मित या प्रकृति-निर्मित होने को लेकर आज भी बहस जारी है। राम सेतु प्रभु की कृपा, मनुष्य के अदम्य दृढ़ निश्चय और प्राचीन काल की उच्च तकनीकी प्रगति का एक महान प्रतीक बन गया है। यह संपूर्ण घटनाक्रम वाल्मीकि रामायण में इस प्रकार वर्णित है:

समुद्र से मार्ग देने के लिए आग्रह

समुद्र पार करने के संबंध में हुए विचार-विमर्श के बाद श्रीराम ने यह निर्णय लिया कि पहले विनयपूर्वक समुद्र से मार्ग माँगा जाना चाहिए; यदि इससे बात न बने, तब अपने बल और शक्ति का प्रदर्शन किया जाए। तदनुसार, श्रीराम कुश का आसन बिछाकर तीन दिनों तक लगातार समुद्र के तट पर बैठे रहे।

रावण द्वारा राम और सुग्रीव में फूट डलवाने के लिए गुप्तचर भेजना

जब श्रीराम समुद्र से मार्ग माँगने के लिए बैठे थे, उसी समय लंका में रावण की सभा में भी गंभीर मंत्रणा चल रही थी। शत्रु अब अत्यंत निकट आ चुका था और उसका अपना भाई विभीषण भी जाकर उनसे मिल चुका था। रावण के गुप्तचर शार्दूल ने यह सारा हाल आकर रावण को सुनाया। उसने सुझाव दिया कि किसी प्रकार श्रीराम और सुग्रीव के बीच फूट डालने का प्रयास किया जाए या सुग्रीव को अपनी ओर मिलाने की कोशिश की जाए। इस सुझाव को मानते हुए रावण ने अपने मंत्री शुक को दूत बनाकर श्रीराम के शिविर में भेजा।

रावण के निर्देशानुसार शुक एक पक्षी (तोता) का रूप बदलकर उस स्थान पर पहुँचा जहाँ सुग्रीव थे। वह आकाश में ही स्थिर रहकर सुग्रीव को रावण का संदेश सुनाने लगा। किंतु वहाँ उपस्थित वानरों को उसकी इस धृष्टता पर तीव्र क्रोध आ गया। उन्होंने उछलकर उस शुक (तोते) को पकड़ लिया और बंदी बना लिया।

सभी वानर उसे मारने के लिए दौड़े। वह घबराकर जोर-जोर से चीखने लगा और श्रीराम से अपनी रक्षा की गुहार लगाने लगा। जब श्रीराम की दृष्टि उस पर पड़ी, तो उन्होंने उसे दूत समझकर वानरों से मुक्त कराया और आदरपूर्वक वापस लंका भेज दिया।

श्रीराम का समुद्र पर क्रोध

इधर, तीन दिनों तक तट पर बैठे रहने के बाद भी जब समुद्र की ओर से कोई प्रतिक्रिया या मार्ग नहीं मिला, तब श्रीराम को अत्यंत क्रोध आ गया। क्रुद्ध होकर उन्होंने कहा कि यह समुद्र केवल विनय की भाषा नहीं समझता, अतः वे अपने बाणों से इसे सुखा देंगे। यह कहकर उन्होंने एक अत्यंत तेजस्वी बाण समुद्र की ओर छोड़ा।

उस बाण के प्रभाव से समुद्र में प्रलयकारी भयंकर तरंगें उठने लगीं और उसमें रहने वाले सभी जीव-जंतु भयभीत हो उठे। जब श्रीराम दूसरा अमोघ बाण संधान करने लगे, तब लक्ष्मण जी ने उन्हें रोका। उन्होंने शांत भाव से समझाया कि आपके इस प्रकार अत्यधिक क्रोध करने से समुद्र के समस्त निरीह जीव-जंतु नष्ट हो जाएंगे, और महर्षि तथा देवगण भी ऐसा नहीं चाहते।

किंतु श्रीराम का क्रोध शांत नहीं हुआ। वे समुद्र को कठोर वचन बोलते हुए एक नया बाण लेकर उसे ब्रह्मास्त्र से अभिमंत्रित करने लगे। उनके ऐसा करते ही संपूर्ण ब्रह्मांड में प्रलय के लक्षण प्रकट होने लगे। यह देखकर भयभीत होकर समुद्र स्वयं मानवरूप धारण कर अपने जलराशि के मध्य से प्रकट हुआ। उसने हाथ जोड़कर श्रीराम से क्षमा प्रार्थना की।

समुद्र को क्षमादान और नल द्वारा पुल निर्माण का सुझाव

समुद्र ने अपने ऊपर से मार्ग देने का उपाय बताते हुए कहा कि आपकी सेना में नल नाम के एक महान वानर सेनापति हैं (जो वास्तव में देवशिल्पी विश्वकर्मा के पुत्र हैं)। वे अपनी विशेष कला और वरदान से समुद्र पर पुल का निर्माण कर सकते हैं। समुद्र ने यह भी आश्वासन दिया कि वह इस कार्य में अपनी पूरी सहायता करेगा।

श्रीराम को यह उपाय उचित लगा। किंतु समस्या यह थी कि जो बाण श्रीराम ने अपने धनुष पर चढ़ा लिया था, वह अमोघ था और उसका संधान करने के बाद बिना लक्ष्य भेदन के उसे वापस नहीं लिया जा सकता था। तब समुद्र ने उत्तर दिशा की ओर स्थित ‘द्रुमकुल्य’ नामक क्रूर कर्म करने वाले लोगों के देश की तरफ उस बाण को छोड़ने का सुझाव दिया।

श्रीराम ने वैसा ही किया। उस बाण के प्रभाव से वह सारा क्षेत्र एक विशाल मरुस्थल में परिणत हो गया और वहाँ के सभी जलाशय सूख गए। किंतु श्रीराम ने यह आशीर्वाद भी दिया कि यह मरुप्रदेश पशुओं के लिए अत्यंत हितकारी होगा और यहाँ बीमारियाँ कम होंगी। समुद्र के पास का यह मरुप्रदेश आगे चलकर मरुकांतार कहलाया।

समुद्र पर पुल का निर्माण और लंका प्रस्थान

समुद्र के अंतर्धान होने के बाद श्रीराम ने नल को बुलाया और उन्हें पुल निर्माण का आदेश दिया। नल अपनी इस अद्भुत निर्माण-शक्ति को भूल चुके थे, किंतु समुद्र के स्मरण कराने पर उन्हें अपनी क्षमता का बोध हुआ। नल ने प्रसन्नतापूर्वक इस कार्य का शुभारंभ किया।

नल के कुशल निर्देशन में पुल बनाने का महान कार्य आरंभ हुआ। समस्त वानर अपनी अपार शक्ति से बड़े-बड़े वृक्षों, पर्वतों के शिखरों और शिलाओं को उखाड़कर लाने लगे। अंततः केवल पाँच दिनों में ही सौ योजन लंबा वह विशाल सेतु समुद्र पर बनकर तैयार हो गया।

पुल बन जाने के पश्चात उसके दक्षिणी तट पर, जिधर लंका स्थित थी, विभीषण के नेतृत्व में कुछ प्रमुख वीर योद्धाओं को पुल की सुरक्षा के लिए तैनात कर दिया गया। इसके पश्चात संपूर्ण वानर सेना उस अद्भुत सेतु को पार करके उस द्वीप पर जा पहुँची, जिस पर रावण की स्वर्णनगरी लंका बसी हुई थी।

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