कुंभकर्ण, अतिकाय, प्रहस्त सहित लंका के लगभग सभी दुर्धर्ष योद्धा युद्धभूमि में मारे जा चुके थे। स्वयं रावण भी श्रीराम के हाथों अपमानजनक रूप से पराजित हो चुका था। वानर सेना की प्रचंड मार और लंका दुर्ग में उनके प्रवेश से यह स्पष्ट हो गया था कि राक्षस शक्ति अत्यंत क्षीण हो चुकी थी।
रावण का अंतिम और सबसे शक्तिशाली सहारा उसका ज्येष्ठ पुत्र मेघनाद (इंद्रजीत) ही बचा था। मेघनाद ने पूर्व में राम-लक्ष्मण को नागपाश में बाँधा था और दूसरी बार मायावी युद्ध करके संपूर्ण वानर सेना सहित दोनों भाइयों को मूर्छित कर चुका था। रावण ने मेघनाद की प्रशंसा कर उसे पुनः समरांगण में जाकर राम-लक्ष्मण का वध करने का आदेश दिया।
मेघनाद का तृतीय युद्ध एवं मायावी अंधकार
मेघनाद इस बार कोई असावधानी नहीं बरतना चाहता था। उसने आभिचारिक यज्ञ (किसी को मारने के लिए किया जाने वाला अनुष्ठान) शुरू किया। हवन सम्पन्न कर वह एक ऐसे रथ में सवार हुआ जो आकाश में अदृश्य होने की क्षमता रखता था। समस्त दिव्य अस्त्रों के साथ अत्यंत क्रोधित होकर मेघनाद युद्धभूमि के लिए चला।
अदृश्य रथ पर सवार होकर मेघनाद ने युद्धभूमि में आकर बाणों की भीषण बौछार प्रारंभ कर दी। श्रीराम और लक्ष्मण जी भूमि पर खड़े होकर निरंतर अस्त्र चला रहे थे, किंतु मेघनाद आकाश में अदृश्य रहकर प्रहार कर रहा था। उसने अपनी असुरी माया से गगन को धुएँ और धुंध से भर दिया, जिससे चारों ओर घना अंधकार छा गया।
न तो उसके धनुष की टंकार सुनाई दे रही थी और न ही रथ के पहियों की गूँज। वह घूम-घूम कर आकाश से तरह-तरह के अस्त्रों की वर्षा कर रहा था। ऐसे में उसके होने के स्थान का पता ही नहीं लगता था। इससे राम-लक्ष्मण अपनी ओर आते हुए अस्त्रों को काट देते थे, लेकिन मेघनाद का कोई नुकसान नहीं कर पाते थे।

श्रीराम द्वारा लक्ष्मण को ब्रह्मास्त्र चलाने से रोकना: मेघनाद के इस छद्म युद्ध से क्रुद्ध होकर लक्ष्मण जी ने श्रीराम से निवेदन किया—“हे भ्राता! मैं संपूर्ण राक्षस जाति का संहार करने हेतु दिव्यास्त्र ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करना चाहता हूँ।”
किंतु परम दयालु श्रीराम ने उन्हें रोकते हुए धर्म का स्मरण कराया:
“हे लक्ष्मण! केवल एक शत्रु को मारने के लिए संपूर्ण राक्षस जाति का विनाश करना न्यायसंगत नहीं है। जो युद्ध नहीं कर रहे हैं, जो भयभीत होकर छिपे हैं, जो शरण में आए हैं या असहाय हैं, उनका वध धर्म के विरुद्ध है। यदि मेघनाद का रथ प्रत्यक्ष हो जाए, तो हम उसे सहज ही परास्त कर देंगे।”
मायावी सीता का वध (सर्ग 81)
श्रीराम और लक्ष्मण जी की बातचीत सुनकर मेघनाद समझ गया कि उसका मायावी युद्ध यहाँ अधिक प्रभावी नहीं हो रहा है। वह तुरंत नगर में गया और वानरों का मनोबल तोड़ने के लिए एक क्रूर योजना बनाई।
वह अपने रथ पर सीता जी के रूप वाली एक मायावी स्त्री को बैठाकर पश्चिमी द्वार पर आया, जहाँ हनुमान जी कमान संभाल रहे थे। मेघनाद के रथ के चारों तरफ राक्षस सेना का घेरा था। वानर वीरों ने सीता जी को देखकर रथ पर प्रहार करना बंद कर दिया। फिर भी हनुमान उसे कठोर शब्द कहते हुए अन्य वानर वीरों के साथ उसके रथ पर टूट पड़े। भयानक राक्षस सेना उन्हे रोक रही थी।
तभी सबके देखते-देखते मेघनाद ने उस मायावी सीता के बाल पकड़े, उसे पीटा और हनुमान जी व वानरों के समक्ष अपनी तलवार से यज्ञोपवीत की तरह काट डाला।
सीता जी के वध का यह क्रूर दृश्य देखकर हनुमान जी और समस्त वानर सेना स्तब्ध रह गई। वानर शोकग्रस्त होकर युद्ध से विमुख होने लगे। मेघनाद अपने इस छल पर अट्टहास करता हुआ हर्षातिरेक में गर्जना करने लगा।
श्रीराम का शोक एवं विभीषण द्वारा रहस्योद्घाटन
यह भयंकर दृश्य देखने के बाद भी हनुमान जी कुछ देर युद्ध करते रहे। उन्होने मेघनाद के सैनिकों का भयंकर संहार किया। मेघनाद की सेना का संहार करते हुए वे उत्तर द्वार पर श्रीराम और सुग्रीव जी के पास पहुँचकर सीता-वध का दारुण समाचार देने चल पड़ें ताकि इस स्थिति का उचित प्रतीकार किया जा सके।
इधर पश्चिम द्वार से युद्ध का भयंकर कोलाहल सुन कर श्रीराम ने रीछराज जांबवान को अपनी रीछ सेना के साथ हनुमान जी की सहायता के लिए जाने का आदेश दिया।
किन्तु मार्ग में ही जांबवान को हनुमान जी आते हुए मिल गए। सीता वध का समाचार सुनते ही श्रीराम स्तंभित रह गए। लक्ष्मण जी उन्हें संभालने लगे।
तभी विभीषण वहाँ पहुँचे। पूरी घटना सुनकर विभीषण ने श्रीराम को आश्वस्त किया कि सीता जी जीवित हैं:
“हे प्रभु! यह मेघनाद की कपटनीति और मायाजाल है। मेघनाद ने यह स्वांग केवल इसलिए रचा है ताकि वानर सेना शोक में डूब जाए और वह निर्विघ्न निकुंभिला (निकुंभला) देवी के मंदिर में जाकर अपना तांत्रिक यज्ञ पूर्ण कर सके।”
सब लोगों को यह बात सही लगी। अब सब मेघनाद के माया युद्ध का तोड़ निकालने के लिए सोचने लगे।
निकुंभिला यज्ञ का रहस्य एवं लक्ष्मण जी का प्रस्थान
जब हनुमान राम से मिलने के लिए उत्तर द्वार की तरफ चले तो उन्हे राम के पास जाते देख कर मेघनाद हवन करने की इच्छा से निकुंभिला (निकुंभला) देवी के मंदिर में चला गया। उसे विश्वास हो गया था कि सामान्य तरीके से वह राम को जीत नहीं सकता था। अतः वह कोई विशेष शक्ति प्राप्त करना चाहता था।
विभीषण ने मेघनाद की मृत्यु का परम गोपनीय रहस्य बताते हुए श्रीराम से कहा:
“मेघनाद लंका के भीतर ‘निकुंभिला देवी‘ मंदिर/चैत्य प्रासाद (यह वटवृक्ष के नीचे चबूतरा की तरह का स्थल था जहाँ पूजा होती थी।) में तांत्रिक हवन करने गया है। अगर वह सफल हो गया तो उसकी मृत्यु असंभव हो जाएगी। किंतु यदि यज्ञ पूर्ण होने से पूर्व, उस स्थान पर ही उस पर आक्रमण कर दिया जाए, तो उसका वध संभव हो सकता है!”
श्रीराम ने तुरंत लक्ष्मण जी को विभीषण, हनुमान, सुग्रीव और जामवंत के साथ एक विशाल सेना देकर निकुंभिला यज्ञ का विध्वंस करने और मेघनाद का वध करने का आदेश दिया।
निकुंभिला यज्ञ का विध्वंस
लक्ष्मण जी सेना के साथ निकुंभिला पहुँचे, जहाँ राक्षस सेना मंदिर को चारों ओर से घेरकर सुरक्षा दे रही थी। हनुमान जी के नेतृत्व में वानरों ने राक्षस सेना पर प्रचंड धावा बोला।
बाहर भीषण संग्राम का कोलाहल सुनकर मेघनाद हवन अधूरा छोड़कर अत्यंत क्रोध में धनुष-बाण लेकर बाहर निकल आया और हनुमान जी से भिड़ गया।
लक्ष्मण-मेघनाद का घोर संग्राम
लक्ष्मण ने मेघनाद को रोषपूर्वक ललकारा। लक्ष्मण के पास खड़े अपने चाचा विभीषण को देखकर मेघनाद आपे से बाहर हो गया और विभीषण को ‘कुलघाती’ व ‘देशद्रोही’ कहते हुए कटु वचन बोलने लगा। विभीषण ने निडर होकर उत्तर दिया कि अधर्म का साथ देने वाले का त्याग करना ही सच्चा धर्म है।
वाकयुद्ध के पश्चात लक्ष्मण और मेघनाद के बीच भयंकर शस्त्र-युद्ध आरंभ हुआ। दोनों दिव्यास्त्रों का प्रयोग कर रहे थे। दोनों ही घायल होने के बावजूद घायल सिंह की तरह लड़ते रहे। मेघनाद रथ पर सवार था, जबकि हनुमान जी स्वयं लक्ष्मण जी के वाहन बन गए।
लक्ष्मण जी को युद्ध में थके हुए देख कर विभीषण स्वयं मैदान में आ गए और राक्षस सेना पर प्रहार करना शुरू किया। उन्होने वानर सेना का मनोबल भी बढ़ाया। इसी बीच युद्ध में लक्ष्मण जी ने तीक्ष्ण बाणों से मेघनाद के सारथी को मार गिराया। सारथी के मरने से उसका उत्साह भी कम हो गया था क्योंकि उसे अब रथ भी संभालना पड़ता था और युद्ध भी करना पड़ता था। तब तक वानरों ने उसके रथ के घोड़ों को भी मार डाला। दोनों महारथी अब भूमि पर आकर पैदल ही युद्ध करने लगे।
दूसरी तरफ हनुमान जी भी लक्ष्मण को उतार कर युद्ध में भाग लेने लगे थे। राक्षस सेना से घिरे हुए जांबवान अपने रीछ सेना के साथ घोर युद्ध कर रहे थे।
शाम होने लगी, अंधेरा छाने लगा। अब तक लक्ष्मण जी के अचूक बाणों से मेघनाद क्षत-विक्षत होकर व्याकुल होने लगा था। वह अपनी सेना को वानरों को उलझाए रखने का आदेश देकर बीच युद्ध से सबको चकमा देते हुए छिपकर राजमहल की ओर भाग गया। वह अत्यंत शीघ्रता से नए योद्धा, नया रथ, नए अस्त्र और नया सारथी लेकर पुनः समरांगण में आ गया। उसकी इस अद्भुत स्फूर्ति को देखकर प्रतिद्वंद्वी योद्धा भी विस्मित रह गए।
द्वितीय दौर एवं मेघनाद का वध
रणभूमि में लौटकर मेघनाद ने पुनः भयंकर बाण चलाए। किंतु लक्ष्मण जी ने अत्यंत सतर्कता और लाघव का परिचय देते हुए मेघनाद के धनुष को काट डाला। उसने दूसरा धनुष उठाया, लक्ष्मण जी ने उसे भी काट दिया।
जब तक वह संभाल पाता, लक्ष्मण जी ने तुरंत पाँच तीखे बाण मारकर मेघनाद की छाती बिंध दी और उसके नए सारथी को भी मार गिराया। फिर भी घायल मेघनाद नए धनुष उठाकर बाण चलाता रहा। उसने लक्ष्मण को भी घायल कर दिया। घायल होकर भी दोनों योद्धा अद्भुत कौशल से युद्ध करते रहें।
अंततः लक्ष्मण जी ने अपने धनुष पर इंद्रदेव का अमोघ ‘ऐंद्र अस्त्र’ संधान करते हुए कहा:
“यदि दशरथ-पुत्र श्रीराम धर्मनिष्ठ, सत्यप्रतिज्ञ और पराक्रमी हैं, तो हे दिव्यास्त्र! तू इस रावण-पुत्र मेघनाद का मस्तक काट दे!”
बाण छूटते ही मेघनाद का कुंडल और मुकुट से सुशोभित मस्तक कटकर रणभूमि में गिर पड़ा।
इस तरह, तीन दिनों से चला आ रहा यह महासंग्राम मेघनाद के वध के साथ समाप्त हुआ। सेनापति के मारे जाने से बचे-खुचे भयभीत राक्षस सैनिक विजय से उल्लासित वानर सेना की मार से जल्दी ही भाग गए।
[स्पष्टीकरण: एक लोक मान्यता के अनुसार मेघनाद को वरदान था कि उसे वही व्यक्ति मार सकता था जिसने 12 वर्षों तक न तो नींद ली हो, न ही अपनी पत्नी को देखा हो, इसीलिए उसे लक्ष्मण जी ने मारा। किंतु वाल्मीकि रामायण के अनुसार यह गलत है। निकुंभला देवी मंदिर चूँकि लंका नगर के अंदर था जहाँ राम अपने वनवास की प्रतिज्ञा के कारण नहीं जा सकते थे, इसलिए उन्होने लक्ष्मण जी को भेजा था। यह एकमात्र युद्ध था जो नगर के अंदर लड़ा गया था। रामायण में लक्ष्मण जी द्वारा वनवास के दौरान नींद लेने का भी उल्लेख है। इसी तरह, मेघनाद के कटे मस्तक के उसकी पत्नी के गोद में गिरने का कोई उल्लेख नहीं है, अपितु इसके विपरीत स्पष्ट रूप से कहा गया है कि उसका मस्तक युद्धभूमि में ही गिरा था।]
विजयोत्सव एवं श्रीराम द्वारा उपचार
मेघनाद वध से देवताओं, ऋषियों और वानर सेना में अपरंपार हर्ष छा गया। जयघोष करते हुए विजेता वीर श्रीराम के समीप पहुँचे।
लक्ष्मण जी का शरीर बाणों से छलनी था और अत्यधिक रक्त बह रहा था। जब वे राम के पास पहुँचे तब भी बाण के टुकड़े उनके शरीर में बचे थे। विभीषण और हनुमान जी भी आहत थे। श्रीराम ने अत्यंत भावुक होकर लक्ष्मण जी को हृदय से लगाया। तत्पश्चात सुषेण वैद्य ने औषधियों से लक्ष्मण जी, विभीषण तथा समस्त घायल वानर योद्धाओं के उपचार किए और बाण निकाले। जल्दी ही वे सब पूर्णतः स्वस्थ हो गए।
