अपने परम पराक्रमी पुत्र मेघनाद—जो लंका की अंतिम आशा था—के लक्ष्मण जी के हाथों मारे जाने पर लंका की संपूर्ण सेना और स्वयं रावण की विजय की रही-सही उम्मीद भी समाप्त हो गई। अब युद्ध में भेजने योग्य कोई भी महान महारथी या सेनापति जीवित नहीं बचा था। रावण अत्यंत कातर, शोकाकुल और हतोत्साहित हो उठा।
सीता-वध का विचार एवं सुपार्श्व द्वारा निवारण (सर्ग 92)
घोर निराशा और हताशा के क्षणों में रावण का क्रोध सीता जी पर उमड़ पड़ा। उसे स्वयं को मिले समस्त शापों का स्मरण हो आया। अति-क्रोध से विक्षिप्त होकर वह हाथ में तलवार लिए सीता जी का वध करने हेतु अशोक वाटिका की ओर दौड़ा। किंतु उसके बुद्धिमान मंत्री सुपार्श्व ने उसे समझाबुझा कर शांत किया।
रात्रि में राक्षसों का अचानक आक्रमण एवं श्रीराम का पराक्रम
राजकोष खाली हो चुका था, सेना समाप्तप्राय थी और लंका की प्रजा में भय व्याप्त था। रावण ने किसी भी उचित-अनुचित साधन से श्रीराम-लक्ष्मण का वध करने का अंतिम प्रयास करने का निश्चय किया।

उसने रात्रि में ही बचे-खुचे प्रधान राक्षसों को बुलाकर चतुरंगिणी सेना (हाथी, घोड़े, रथ और पैदल) के साथ श्रीराम को घेरकर मारने का आदेश दिया। राक्षसों ने रात्रि के अंधकार में वानर सेना पर अचानक धावा बोल दिया।
आक्रमण अप्रत्याशित था, किंतु वानर वीर सुषेण वैद्य की औषधियों से पूर्णतः स्वस्थ और सजग थे। उन्होंने इस आक्रमण का कड़ा उत्तर दिया। सूर्योदय तक युद्ध अत्यंत भयावह रूप ले चुका था। युद्ध से उड़ता हुआ धूल रक्त की बौछार से शांत होने लगा।
इस आक्रमण का मुख्य लक्ष्य राम को मारना था। इसलिए राक्षस सैनिक वानर सैनिकों का मुक़ाबला करते हुए राम की तरफ बढ़ रहे थे। श्रीराम इतनी तीव्र गति से धनुष संधान कर रहे थे कि शत्रुओं को केवल आघात का अनुभव होता था, धनुष का चाप दिखाई देता था, पर बाण कब छूटते थे—इसका अनुमान भी नहीं लगता था। श्रीराम के बाणों की मार से सहस्रों राक्षस ढेर हो गए और बचे-हुए राक्षस भाग खड़े हुए।
लंका नगर के अधिकांश घर का कोई-न-कोई सदस्य इस युद्ध में मारा गया था। मारे गए राक्षसों के परिवार वालों के विलाप के कारण समस्त नगर विलाप करता प्रतीत होता था। इन विलापों की आवाज रावण के कानों तक भी पहुँच रही थी।
रावण के अंतिम तीन सेनापति: विरूपाक्ष, महोदर और महापार्श्व
अब रावण के पास केवल तीन प्रमुख योद्धा शेष बचे थे—विरूपाक्ष, महोदर और महापार्श्व। रावण ने इन तीनों को लंका का अंतिम सेनापति बनाकर बची-खुची राक्षस सेना के साथ युद्धभूमि में भेजा।
राक्षस सैनिकों का मनोबल पूरी तरह टूट चुका था। रावण ने अपने पराक्रम का बखान कर उनका उत्साह बढ़ाना चाहा, किंतु सैनिकों में जीत की कोई आशा शेष नहीं थी। फिर भी अपने राजा की आज्ञा मानकर वे अपने अंतिम सेनापतियों के साथ समरांगण में पहुँचे।
रावण का स्वयं रणभूमि में आना एवं अंतिम सेनापतियों का वध
यह जानते हुए कि राक्षस सेना मन से हार चुकी है, उनका उत्साह बढ़ाने के लिए रावण स्वयं भी रथ पर सवार होकर युद्धभूमि में आ पहुँचा। उसने आते ही वानरों पर अंधाधुंध बाण वर्षा शुरू कर दी।
वानरराज सुग्रीव और युवराज अंगद ने आगे बढ़कर इस आक्रमण का प्रचंड प्रतिकार किया:
- विरूपाक्ष को सुग्रीव ने एक भयानक मुष्टिक-प्रहार (घूँसे) से मार गिराया।
- महोदर को भी वानरराज सुग्रीव ने गदा-युद्ध में मार डाला।
- महापार्श्व का वध युवराज अंगद ने एक विशाल परिघ के प्रहार से कर दिया।
रावण के अंतिम तीनों सेनापतियों के मारे जाते ही राक्षसी सेना में भगदड़ मच गई। सेनापतियों के मरने से राक्षस सैनिक, जो पहले ही हतोत्साहित थे, और भी निराश हो गए।
श्रीराम-रावण का प्रत्यक्ष महासंग्राम (सर्ग 99)
अपने अंतिम सेनापतियों के वध से अत्यंत क्रुद्ध होकर रावण अपना रथ सीधे श्रीराम और लक्ष्मण जी की ओर ले आया। उसके अस्त्र प्रहार से वानर सेना में भगदड़ मच गई। अपने भागते सैनिकों के पीछे रावण को आते देख श्रीराम और लक्ष्मण अत्यंत हर्षित हुए कि अब इस महायुद्ध को अंतिम परिणति तक पहुँचाने का समय आ गया है।
लक्ष्मण जी पर शक्ति प्रहार
श्रीराम ने अपने कोदंड धनुष की टंकार की। लक्ष्मण जी आगे बढ़कर रावण की ओर बाण छोड़ने लगें। परंतु, रावण उनके बाणों को काटते हुए राम के पास जा पहुँचा। रावण ने एक प्रचंड अस्त्र‘शक्ति’का प्रयोग लक्ष्मण जी पर कर दिया। उस अस्त्र के प्रहार से लक्ष्मण जी अचेत हो गए।
अब श्रीराम और रावण के बीच भीषण द्वंद्व-युद्ध आरंभ हुआ। दोनों एक-दूसरे पर अस्त्र-शस्त्रों की बौछार करने लगे। दोनों ही घायल हो गए पर युद्ध का उत्साह कम नहीं हुआ। सूर्य अस्त हो गया। युद्ध अनवरत अगले दिन तक चलता रहा। श्रीराम, रावण के चलाए प्रत्येक अमोघ अस्त्र को अपने बाणों से निष्फल करते जा रहे थे।
युद्ध के दौरान रावण ने देखा कि वह श्रीराम के समक्ष कमजोर पड़ रहा है। उसका स्वयं युद्धभूमि में आना भी उसकी सेना का मनोबल नहीं बढ़ा पाया। वह जानता था कि वह हार चुका है। दुर्ग पर राम सैनिकों का नियंत्रण है, नगर के अंदर तक अपनी इच्छानुसार वे आराम से आ-जा सकते हैं, लंका की कोई और रक्षा पंक्ति नहीं बची थी, स्वयं के अलावा अब रावण के पास कोई सहायक नहीं बचा है। वह समझ चुका था कि अब उसका अंत निकट है। इसलिए वह राम के सामने कमजोर पड़ने पर और कोई खतरा नहीं लेना चाहता था।
अपने को कमजोर स्थिति में पाकर रावण तुरंत लंका दुर्ग की ओर भाग गया। श्रीराम या किसी अन्य वानर योद्धा ने उसे रोकने का प्रयास नहीं किया क्योंकि सभी लक्ष्मण जी की अवस्था को लेकर अत्यंत चिंतित थे।
लक्ष्मण जी की पुनः मूर्छा एवं संजीवन उपचार
रावण के रणभूमि से भाग जाने के उपरांत श्रीराम अपने अनुज लक्ष्मण जी के समीप आए जो कि रावण के ‘शक्ति’ नामक प्रचंड अस्त्र से घायल होकर वह अचेत हो गए थे। सुषेण वैद्य के परामर्श पर महाबली हनुमान जी पुनः द्रोणाचल पर्वत से संजीवनी बूटी (औषध) लेकर आए। सुषेण के उपचार से लक्ष्मण जी तुरंत स्वस्थ होकर मुस्कुराते हुए खड़े हो गए। लक्ष्मण जी के स्वस्थ होते ही श्रीराम की सेना में अपार हर्ष और जयघोष छा गया।
