सुग्रीव ने रात को लंका नगर पर आक्रमण क्यों किया? | Valmiki Ramayan Part 52

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भारतीय युद्ध-संस्कृति में युद्ध के अपने नीतिमत्तापूर्ण नियम थे, जिनमें सूर्यास्त के पश्चात् रात्रि में आक्रमण करना अधर्म माना जाता था। किंतु राक्षस सेना युद्ध के प्रथम दिन से ही इन नियमों का उल्लंघन कर रही थी; क्योंकि रात्रि में राक्षसों की शक्तियाँ बढ़ जाती थी। अतः राम-रावण युद्ध प्रथम दिवस से ही अल्पविरामों के साथ दिन-रात अनवरत चल रहा था।

मेघनाद राम-लक्ष्मण को अचेत कर अपने विजय को निश्चित मान कर नगर के अंदर चला गया। नगर के अंदर राक्षस विजय उत्सव मनाने की तैयारी कर रहे थे। पर उनके जाने के बाद राम-लक्ष्मण सहित सभी पूर्णत: स्वस्थ हो गए थे।    

मरणासन्न होने के बाद फिर से नया जीवन पाकर वानर सेना में नया उत्साह आ गया था। दूसरी तरफ राक्षस शक्ति का बहुत विनाश हो चुका था। लंका नगर की अधिक सुरक्षा नहीं थी। सुग्रीव ने अब लंका नगर पर हमला करने का विचार किया।

1. लंका नगर पर आक्रमण का रणनीतिक विचार

युद्ध अभी तक लंका नगर के बाह्य क्षेत्र में ही लड़ा जा रहा था। वानरराज सुग्रीव ने इस स्थिति का रणनीतिक लाभ उठाने का विचार किया:

मनोवैज्ञानिक दबाव: सुग्रीव का मानना था कि विजयोत्सव में डूबी राक्षस सेना के समक्ष सीधे नगर के भीतर घुसकर अपनी अजेय शक्ति का प्रदर्शन करना आवश्यक है।

वानर सेना का पुनरुत्थान: सुषेण द्वारा दी गई औषधियों (संजीवनी) से मेघनाद के बाणों से आहत वानर वीर पुनः पूर्ण उत्साह और ऊर्जा से भर चुके थे।

शत्रु पक्ष की शिथिलता: रावण के भ्राता (कुंभकर्ण), पुत्रगण (अतिकाय, अक्षयकुमार आदि) तथा कई प्रमुख सेनापति मारे जा चुके थे। लंका की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था इस समय अत्यंत दुर्बल थी।

धर्म-संकट एवं समाधान

सुग्रीव के सम्मुख धर्म-संकट यह था कि युद्ध से विमुख या असावधान नागरिकों पर प्रहार करना धर्म-विरुद्ध था और श्रीराम कभी भी अधर्मसंगत आचरण स्वीकार नहीं कर सकते थे। गहन विचार-विमर्श के उपरांत यह मार्ग निकाला गया कि वानर सेना लंका में प्रवेश कर अपनी शक्ति का प्रदर्शन और शत्रुओं का मनोबल ध्वस्त अवश्य करेगी, किंतु किसी भी निर्दोष नागरिक या अशस्त्र नागरिक पर आघात नहीं करेगी।

2. सुग्रीव का लंका-आक्रमण एवं भीषण लंका-दहन

सुग्रीव की आज्ञा मिलते ही प्ररात्रि काल में महाबली वानर वीरों की एक विशेष सैन्य टुकड़ी हाथों में जलती हुई मशालें लेकर लंका के किला-द्वारों को लाँघकर भीतर प्रविष्ट हो गई।

द्वार-रक्षक वानरों के सहसा आक्रमण से भयभीत होकर भाग खड़े हुए।

वानरों ने त्वरित गति से बढ़ते हुए प्रासादों और अट्टालिकाओं में मशालें फेंककर आग लगाना आरंभ कर दिया।

आग की लपटें फैलते ही लंका के अश्वपालों और गजपालों ने पशुआहार एवं प्राण रक्षा हेतु हाथियों व घोड़ों की रस्सियाँ खोल दीं, जिससे नगर में भगदड़ मच गई।

अद्भुत दृश्य: जलती हुई स्वर्णमयी लंका की लाल-पीली प्रतिछाया जब अंधेरे में सागर के जल पर पड़ी, तो वह दृश्य अत्यंत विहंगम प्रतीत होने लगा। दूर से संपूर्ण लंकापुरी खिलते हुए ‘पलाश के पुष्पों’ (टेशू) की भांति धधकती दिखाई दे रही थी। (हनुमान जी द्वारा किए गए प्रथम लंका-दहन के समय दिन का प्रकाश था, अतः ऐसी प्रतिछाया उस समय नहीं दिखी थी।)

3. राक्षसों में हाहाकार एवं श्रीराम का टंकार

नगर में मचते कोलाहल के बीच रणभूमि में खड़े श्रीराम ने अपने कोदंड धनुष की घोर टंकार की। वानर सेना की गर्जना, राक्षसों का आर्त्तनाद और श्रीराम के धनुष की टंकार ने मिलकर समस्त लंकावासियों के हृदय में भय उत्पन्न कर दिया।

श्रीराम ने अपने अमोघ बाणों से लंका के गगनचुंबी द्वारों और बुर्जों को ध्वस्त कर दिया।

राक्षसों के लिए वह रात्रि साक्षात ‘कालरात्रि’ बन गई। वे आनन-फानन में कवच और अस्त्र-शस्त्र धारण कर युद्ध हेतु बाहर निकले।

4. भयंकर रात्रि-युद्ध एवं राक्षस सेनापतियों का वध

कुपित रावण ने कुंभकर्ण के पराक्रमी पुत्रों—कुंभ और निकुंभ को एक विशाल राक्षस सेना के साथ युद्ध भूमि में उतारा। रात्रि के अंधकार में एक बार पुनः भीषण संग्राम छिड़ गया। वानर वीरों ने राक्षसों को चारों ओर से घेर लिया। इस घोर युद्ध में प्रमुख राक्षसों का अंत हुआ:

अंगद ने राक्षस कंपन और प्रजघ्नी (प्रजांघ) का संहार किया।

द्विविद ने शोणिताक्ष को और मैंद ने युपाक्ष को मार गिराया।

सुग्रीव ने कुंभकर्ण के महाबलशाली पुत्र कुंभ का वध किया।

हनुमान जी ने निकुंभ का वध कर दिया।

5. मकराक्ष का वध एवं युद्ध-विराम

अपने समस्त प्रमुख सेनापतियों के वध से घबराकर रावण ने अंत में पंचवटी में श्रीराम द्वारा मारे गए राक्षस ‘खर’ के पुत्र मकराक्ष को भेजा। मकराक्ष अत्यंत क्रुद्ध होकर युद्ध भूमि में आया, किंतु श्रीराम ने अपने बाणों से उसका भी वध कर दिया।

विशाल सेनापतियों और योद्धाओं के मारे जाने के पश्चात् अवशिष्ट राक्षस सैनिक प्राण बचाकर लंका में शरण लेने भाग गए। इस प्रकार रात्रि-काल के इस भीषण युद्ध में राक्षस सेना की संपूर्ण पराजय के साथ युद्ध में पुनः अल्पविराम आया।

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