हनुमान-सीता भेंट | Valmiki Ramayan Katha Part 41

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सीता जी के वेश और आसपास के परिवेश से हनुमानजी को यह तो निश्चय हो गया कि अशोक वाटिका में बंदिनी अवस्था में बैठी स्त्री उनके प्रभु श्रीराम की धर्मपत्नी सीता ही हैं। जब तक वे सीता की खोज कर उनके पास पहुँचे, तब तक रात समाप्त होने वाली थी। वे सोचने लगे कि अब उन्हें क्या करना चाहिए। उन्होंने रुककर और विस्तार से सीता की स्थिति देखने का निश्चय किया।

रावण का अशोक वाटिका में आना

सुबह हुई। रावण अपने अंतःपुर की स्त्रियों के साथ अशोक वाटिका में आया। रावण को देखकर सीताजी के मुख पर भय, दुःख और चिंता—तीनों भाव एक साथ उभर आए। हनुमानजी रावण की बातें और सीता के भावों को देखना चाहते थे, इसलिए वे वृक्ष में छिपे रहे और थोड़ा और नजदीक आ गए।

रावण ने तरह-तरह से सीता को अपनी पत्नी बनने के लिए प्रलोभन दिए। जब इससे बात नहीं बनी, तो उसने भय और झूठे कुतर्कों से उन्हें समझाने का प्रयास किया। उसने याद दिलाया कि उसके द्वारा दी गई एक वर्ष की अवधि में से दस महीने बीत चुके हैं और अब उनके पास केवल दो महीने ही शेष हैं (एक वर्ष तक यदि सीता उसके प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करती हैं, तो रावण ने धमकी दी थी कि वह उन्हें मारकर नाश्ते में परोस देगा)।

किंतु सीताजी ने तिनके की ओट करके निर्भयतापूर्वक उसे फटकारा और श्रीराम के सामने उसे अत्यंत नगण्य बताया। क्रुद्ध होकर रावण ने पहरे पर लगी राक्षसियों को सीता को नियंत्रण में लाने के लिए हरसंभव उपाय करने का आदेश दिया और वहाँ से चला गया।

सीता का अपने जीवन को समाप्त करने का विचार

रावण के जाने के बाद राक्षसियाँ सीताजी को समझाने, डराने और धमकाने लगीं। वे उन्हें काटकर खा जाने की धमकी दे रही थीं और विभिन्न प्रकार से प्रताड़ित कर रही थीं। राक्षसों की बातें सुनकर और अपमान से आहत होकर सीताजी रोने लगीं। रोते-रोते इस भीषण प्रताड़ना से मुक्ति पाने के लिए उन्होंने मृत्यु को बेहतर मानते हुए अपने शरीर का अंत करने का विचार किया।

किंतु आत्महत्या करने के लिए उन्हें शस्त्र या विष कौन देता? इसलिए उन्होंने अपनी ही चोटी से फाँसी लगाने का विचार किया। वे राक्षसियों से कहने लगीं कि वे उन्हें काटने की धमकी देने के बजाय शीघ्र ही काटकर मार क्यों नहीं डालतीं।

त्रिजटा का स्वप्न और उसका सीता को सांत्वना देना

सीताजी को इस प्रकार अनाथ और विक्षिप्त की तरह रोते देख हनुमानजी को बहुत दुःख और क्रोध आया। तभी त्रिजटा नामक एक वृद्धा राक्षसी सीताजी के पास आई, जो अब तक सो रही थी, इसलिए वहाँ नहीं थी। उसने अपने एक स्वप्न की बात बताकर सीताजी को शांत किया।

त्रिजटा ने स्वप्न में देखा था कि राक्षसों सहित रावण का सर्वनाश होगा और युद्ध जीतकर श्रीराम सीता को वापस ले जाएँगे। उसने यह भी देखा था कि एक वानर पूरी लंका को जला रहा है। त्रिजटा के समझाने पर राक्षसियाँ सीताजी को तंग करना छोड़कर दूर हट गईं। इतने में सीताजी को कुछ शुभ शकुन भी होने लगे, जिससे उनका मन कुछ शांत हुआ।

हनुमान द्वारा सीता के समक्ष प्रकट होने का निर्णय

इधर हनुमानजी विचार करने लगे कि उन्हें तो केवल सीता का पता लगाने के लिए भेजा गया था। क्या उन्हें सीता को इस अवस्था में देखकर चुपचाप लौट जाना चाहिए या उनसे बात करनी चाहिए? बहुत सोच-विचार के बाद उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि यदि वे बिना मिले चुपचाप चले गए, तो हो सकता है कि जब तक श्रीराम अपनी सेना के साथ आएँ, तब तक वे जीवित ही न रहें। इसलिए उनसे बात करके उन्हें सांत्वना देना आवश्यक है।

अब दूसरी समस्या यह थी कि उनसे बात कैसे की जाए? वे संस्कृत में बात कर सकते थे, किंतु यदि वे वानर रूप में संस्कृत में बोलते, तो सीता कहीं उन्हें वेश बदलकर आया हुआ रावण या उसका कोई राक्षस न समझ लें। इसलिए उन्हें अवध के आसपास बोली जाने वाली सामान्य भाषा में ही बात करनी चाहिए।

इसके साथ ही यह भी भय था कि वे कुछ ऐसा न कर बैठें जिससे पहरा दे रही राक्षसियों का ध्यान उन पर चला जाए। वे सीता को पूर्ण विश्वास और सांत्वना दिए बिना वहाँ से नहीं जाना चाहते थे।

हनुमान द्वारा सीता को राम-कथा सुनाना

बहुत सोच-समझकर हनुमानजी ने धीरे-धीरे इस प्रकार राम-कथा सुनाना शुरू किया, जिसे पहरेदार राक्षसियाँ न सुन सकें। वे उसी वृक्ष की निचली शाखा पर आ गए थे, जिसके नीचे सीताजी बैठी हुई थीं। उन्होंने श्रीराम के जन्म, वनवास से लेकर सीता-हरण और उसके बाद सीता की खोज करते हुए वानरराज सुग्रीव से उनकी मित्रता, वानरों का उन्हें चारों तरफ ढूँढना और एक वानर का खोजते-खोजते समुद्र पार कर अशोक वाटिका तक पहुँचने का संपूर्ण वृत्तांत सुना दिया।

सीताजी जब से लंका आई थीं, तब से उन्होंने पहली बार किसी के मुख से श्रीराम का नाम सुना था। सुनाने वाले ने उनके अपहरण से पहले और उसके बाद की सभी बातें बताई थीं, जिससे वे हर्षित तो हुईं, किंतु साथ ही सशंकित भी हो उठीं। उन्हें आशंका इस बात की थी कि वे ऐसे राक्षसों के बीच हैं, जो माया रचने, धोखा देने और वेश बदलने में अत्यंत कुशल हैं। कहीं उनके साथ कोई छल तो नहीं हो रहा है?

सीता और हनुमान में वार्तालाप

यह सोचकर उन्होंने चारों तरफ सावधानी से देखा। उन्हें ऊपर की डाली पर बैठे श्वेत रंग के वस्त्र पहने एक छोटे-से वानर पर दृष्टि पड़ी। कुछ देर तक तो उन्हें समझ ही नहीं आया कि वे वास्तव में देख रही हैं या यह उनका कोई स्वप्न है। फिर उन्होंने हनुमानजी से बातचीत शुरू की।

हनुमानजी द्वारा श्रीराम के शारीरिक चिह्नों, नर-वानर की मित्रता और अन्य प्रसंगों का वर्णन सुनने के बाद उन्हें पूर्ण विश्वास हो गया कि वे वास्तव में श्रीराम के ही भेजे हुए दूत हैं।

अब हनुमानजी ने सीताजी को श्रीराम की दी हुई अँगूठी सौंपी और विभिन्न प्रकार से उन्हें सांत्वना दी। सीताजी ने हनुमान से श्रीराम को शीघ्र वहाँ लाने का आग्रह किया। उनकी अधीरता को देखकर हनुमानजी ने कहा कि वे उसी समय उनकी पीठ पर बैठकर उनके साथ श्रीराम के पास चल सकती हैं। तुरंत श्रीराम से मिलने की बात सुनकर वे प्रसन्न तो हुईं, किंतु उन्होंने इसके लिए विनम्रतापूर्वक मना कर दिया।

वे नहीं चाहती थीं कि जिस प्रकार रावण उन्हें छलपूर्वक चुराकर ले आया था, उसी प्रकार श्रीराम भी उन्हें छुपकर ले जाएँ। वे चाहती थीं कि श्रीराम स्वयं आएँ और अपना पराक्रम दिखाकर उन्हें यहाँ से मुक्त कराकर ले जाएँ। दूसरा, रघुवंश के प्रतापी राजा श्रीराम की पत्नी को कोई दूसरा बचाकर ले जाए, यह श्रीराम के शौर्य और पराक्रम के विरुद्ध होता। तीसरा, वे स्वेच्छा से किसी अन्य पुरुष (हनुमान) का स्पर्श नहीं करना चाहती थीं। सीताजी की इन तार्किक और निष्ठावान बातों से हनुमानजी को अत्यंत प्रसन्नता हुई।

संदेश और चूड़ामणि प्रदान करना

इसके पश्चात सीताजी ने हनुमानजी को श्रीराम के लिए एक संदेश देकर विदा किया। श्रीराम को यह विश्वास हो जाए कि हनुमान वास्तव में सीता से मिलकर आए हैं, इसलिए उन्होंने चित्रकूट प्रवास के दौरान घटी एक गुप्त घटना का स्मरण कराया, जिसे सीता और श्रीराम के अतिरिक्त और कोई नहीं जानता था। वह घटना एक कौए (जो वास्तव में इंद्र का पुत्र जयंत था) द्वारा सीता पर प्रहार करने और श्रीराम द्वारा उसे दंड देने की थी। इसके प्रमाण के रूप में उन्होंने अपनी चूड़ामणि भी निशानी के रूप में दे दी।

हनुमान द्वारा रावण के पराक्रम और लंका के परीक्षण का विचार

इस प्रकार सीताजी को समझा-बुझाकर और सांत्वना देकर हनुमानजी उस स्थान से उत्तर दिशा की ओर बढ़े। उनके मन में इस बात का संतोष था कि माता सीता का पता लगाने का मुख्य कार्य संपन्न हो चुका था। किंतु अब श्रीराम और रावण के बीच युद्ध होना भी अवश्यंभावी था, इसलिए शत्रु के पराक्रम, सेना और दुर्ग की रचना आदि की जानकारी भी प्राप्त कर लेना आवश्यक था।

पिछली रात वे पूरी नगर में घूमे तो अवश्य थे, किंतु एक तो उनका पूरा ध्यान सीता की खोज में था और दूसरा समय रात्रि का था, इसलिए वे सब कुछ भली-भांति देख नहीं पाए थे। अब दिन के समय लंका की हर व्यवस्था का जायजा लेना जरूरी था, किंतु यह कार्य छिपकर संभव नहीं था; इसलिए उन्होंने अब खुले रूप में प्रकट होने का विचार किया।

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