हनुमान जी ने लंका में माता सीता को कैसे ढूँढा? | Valmiki Ramayan Katha Part 40

Share

हनुमानजी जब लंका पहुँचे, तब उनके समक्ष सबसे बड़ी समस्या यह थी कि इतने बड़े नगर में वे एक स्त्री को कैसे ढूँढें? और अगर ढूँढ भी लें, तो पहचानें कैसे? वे सीताजी से मिलने से पहले रक्षकों के सामने भी नहीं आना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने रात के समय बहुत ही छोटा-सा रूप धारण करके प्रत्येक भवन में चुपचाप देखने का निश्चय किया।

इस संबंध में कुछ लोग प्रश्न करते हैं कि हनुमानजी ब्रह्मचारी थे; अतः इस तरह स्त्रियों के अंतःपुर (महलों) में रात को जाकर देखना क्या धर्म के प्रतिकूल नहीं था? कुछ लोग किसी अप्रमाणिक ग्रंथ के आधार पर उनके द्वारा प्रायश्चित करने की बात भी कहते हैं। लेकिन इस तरह की सभी शंकाएँ धर्म और ब्रह्मचर्य को गलत तरीके से समझने के कारण उत्पन्न हुई हैं। इस प्रकार की शंका स्वयं हनुमानजी के मन में भी आई थी, लेकिन उन्होंने स्वयं ही इसका उचित समाधान भी कर लिया था।

वास्तव में हनुमानजी का स्वभाव और व्यवहार प्रत्येक व्यक्ति के लिए आदर्श और अनुकरणीय है। सीताजी को ढूँढने संबंधी यह वृत्तांत रामायण में इस प्रकार है:

अंतःपुर में सीता की खोज

लंका में प्रवेश करने के बाद हनुमानजी ने सबसे पहले यह विचार किया कि इतने बड़े नगर में सीताजी को कहाँ ढूँढा जाए? उन्होंने सोचा कि रावण ने उन्हें अपने अंतःपुर में ही रखा होगा। अतः वे अंतःपुर के एक-एक भवन और कमरे में जाकर देखने लगे, लेकिन उन्हें कोई ऐसी स्त्री नहीं मिली जिसके सीता होने का अनुमान लगाया जा सके।

रावण और दूसरे राक्षसों के महलों में खोज

इसके बाद वे वहाँ से निकलकर पहले रावण के मुख्य महल में और फिर दूसरे राक्षसों के महलों में ढूँढने लगे। इसके बाद उन्होंने महल से लगे हुए अन्य स्थानों तथा पुष्पक विमान आदि सभी संभावित स्थलों की अच्छी तरह तलाशी ली।

इन महलों में रहने वाली प्रत्येक स्त्री को उन्होंने देखा, किंतु उनमें उन्हें सीताजी जैसे लक्षण नहीं दिखे। चूँकि उन्होंने पहले कभी सीता को देखा नहीं था, इसलिए वे केवल अनुमान ही लगा रहे थे। रावण के महल में सोई हुई मंदोदरी की सुंदरता को देखकर एक पल के लिए उन्हें उनके सीता होने का संदेह हुआ, किंतु फिर उन्होंने विचार किया कि बलपूर्वक अपहरण करके लाई गई कोई पतिव्रता स्त्री इतने सुंदर आभूषण और वस्त्र पहनकर इतने आराम से कैसे सो सकती है?

जब रावण या किसी अन्य राक्षस के महल में भी सीताजी नहीं मिलीं, तो वे दोबारा रावण के अंतःपुर में गए, किंतु इस बार भी उन्हें सफलता नहीं मिली।

हनुमानजी का पापबोध और उसका समाधान

कुछ देर के लिए अचानक उनके मन में एक प्रकार का पापबोध, ग्लानि और निराशा का भाव उत्पन्न हुआ। हनुमानजी को पापबोध इस बात के लिए हुआ कि ब्रह्मचारी होने के कारण उन्होंने आज तक किसी पराई स्त्री की तरफ देखा तक नहीं था, किंतु आज एकांत में असावधान अवस्था में सोई हुई स्त्रियों को छुपकर देखने से क्या उनसे कोई पाप तो नहीं हो गया?

लेकिन इसके तुरंत बाद उन्होंने विचार किया—किसी अज्ञात स्त्री को ढूँढने के लिए अंतःपुर या स्त्रियों के बीच जाना एक अनिवार्यता थी। ऐसा उन्होंने किसी कुविचार से नहीं किया था। इसके अलावा, उन स्त्रियों को देखने पर उनके मन में किसी भी प्रकार का विक्षोभ या विकार उत्पन्न नहीं हुआ था। वास्तव में, उनका ध्यान केवल माता सीता और अपने आराध्य श्रीराम में इस प्रकार लीन था कि सीता को ढूँढने के अपने पवित्र लक्ष्य के अलावा उनका ध्यान किसी अन्य तरफ गया ही नहीं। ब्रह्मचर्य का अर्थ स्त्रियों से दूर रहना नहीं, बल्कि उनके प्रति किसी भी प्रकार के कुविचार से दूर रहना है।

हनुमानजी की निराशा और संकल्प

उनके मन में निराशा के भाव इसलिए आए क्योंकि सीताजी के न मिलने पर एक संभावना यह भी हो सकती थी कि रावण ने उनकी हत्या कर दी हो। यदि वे उनकी मृत्यु या उनके न मिलने का समाचार लेकर अपने आराध्य राम के पास जाते, तो उन पर क्या बीतती!

किंतु शीघ्र ही उन्होंने इस निराशा को त्याग दिया और श्रीराम का स्मरण करते हुए यह दृढ़ निश्चय किया कि बिना माता सीता का पता लगाए वे वहाँ से वापस नहीं जाएँगे और जब तक उनका पता नहीं चल जाता, वे अपने प्रयास बंद नहीं करेंगे।

अशोक वाटिका में सीता की खोज

ऐसा दृढ़ निश्चय करने के बाद वे तीसरी बार रावण के अंतःपुर में गए। अचानक उनके मन में विचार आया कि वे अंतःपुर के कोने-कोने को तीन बार देख चुके हैं, किंतु अंतःपुर के महलों के बीच बनी वाटिका (अशोक वाटिका या प्रमाद वन) में वे एक बार भी नहीं गए थे। अतः वहाँ भी एक बार अवश्य देखना चाहिए।

यह सोचकर वे उस छोटे, सुंदर और कड़े पहरे वाली अशोक वाटिका में पहुँचे। वाटिका में एक वृक्ष के नीचे एक चैत्य बना हुआ था (चैत्य चबूतरे की तरह का एक स्थान होता था, जहाँ कुलदेवी या कुलदेवता की पूजा की जाती थी)। उस चैत्य के पास एक स्त्री बहुत ही दयनीय अवस्था में बैठी हुई थी।

हनुमानजी द्वारा सीता को पहचानना

हनुमानजी पास के एक वृक्ष पर चढ़कर देखने लगे। वह स्त्री दिखने में अत्यंत सुंदर थी, किंतु उसका सौंदर्य उसके असीम दुःख के कारण जैसे छिप-सा गया था। उसकी पीली साड़ी मैली हो गई थी और लंबे समय से चोटी न सँवारे जाने के कारण उसके बाल जटा के समान प्रतीत हो रहे थे। वह इतनी दुर्बल लग रही थी मानो उसे कई दिनों से भोजन ही न मिला हो।

हनुमानजी को उस स्त्री के सीता होने का प्रबल अनुमान हुआ। वे और थोड़ा पास गए। उन्होंने देखा कि उस स्त्री के गालों पर सूखे हुए आँसुओं के निशान थे। इतनी रात को जब सारा नगर गहरी नींद में सो रहा था, वह अकेली जाग रही थी।

वे पूरी तरह तसल्ली कर लेना चाहते थे कि वह स्त्री सीता ही हैं। उन्हें उन वस्त्रों और आभूषणों की स्मरण हुआ, जिन्हें रावण द्वारा आकाशमार्ग से ले जाते समय सीताजी ने राम का नाम लेते हुए ऋष्यमूक पर्वत पर नीचे गिराया था। वाटिका में बैठी स्त्री वही पीली साड़ी पहने हुए थी। यद्यपि उसके शरीर पर आभूषण बहुत कम थे, किंतु जो कंगन और चूड़ामणि आदि आभूषण ऋष्यमूक पर्वत पर गिराए गए थे, वे उस स्त्री के शरीर पर शोभायमान थे।

उस स्त्री के चारों तरफ कड़े राक्षसों का पहरा था, जिससे स्पष्ट था कि वह वहाँ बंदिनी बनाकर रखी गई थी। इतने सारे अकाट्य प्रमाणों को देखकर हनुमानजी को पूर्ण निश्चय हो गया कि वह स्त्री उनके प्रभु श्रीराम की अर्धांगिनी माता सीता ही हैं।

माता सीता के जीवित होने और उनका पता मिल जाने से एक ओर जहाँ हनुमानजी के मन में अपार प्रसन्नता हुई, वहीं उनकी इस दयनीय और कष्टदायक अवस्था को देखकर उन्हें असीम दुख भी हुआ।

Leave a Comment

Scroll to Top