शव को सुरक्षित रखने के लिए नाव में तेल भरवाकर उसमें रख दिया गया था। इसके बाद कुलगुरु वसिष्ठ ने पाँच दूतों को बुलाकर उन्हें यथाशीघ्र कैकेय देश जाने के लिए कहा (इन पाँचों के नाम थे—सिद्धार्थ, विजय, जयंत, अशोक और नन्दन)।
भरत को बुलाने के लिए दूत भेजना
इन पाँचों को यह सख्त आदेश दिया गया था कि वे राजा की मृत्यु की सूचना भरत या किसी अन्य को न दें। कैकेय नरेश या भरत को किसी भी अनहोनी की आशंका न हो, इसलिए दूतों के साथ बहुत से उपहार भी भेजे गए थे।

सूचना गुप्त रखने का एक कारण तो यह था कि इतने बड़े आघात से पता नहीं भरत की प्रतिक्रिया कैसी होती। दूसरा, राजनीतिक और सुरक्षा की दृष्टि से राजा की मृत्यु की सूचना तब तक सार्वजनिक नहीं की जाती है जब तक नया राजा न चुन लिया जाए, क्योंकि इस स्थिति का लाभ उठाकर कोई शत्रु राज्य पर आक्रमण कर सकता था।
उस दिन यह सब प्रबंध करते-करते रात हो गई थी, इसलिए अगली सुबह ये पाँचों दूत तीव्रगामी घोड़ों पर सवार होकर कैकेय देश के लिए रवाना हो गए।
जिस दिन ये दूत कैकेय देश की राजधानी पहुँचे, उस रात भरत ने एक बुरा स्वप्न देखा और उन्हें कई तरह के अपशकुन भी महसूस हुए। उस स्वप्न का आशय उनके किसी अतिप्रिय व्यक्ति की मृत्यु से हो सकता था, इसलिए वे अपने कुल की कुशलता के लिए अत्यधिक चिंतित हो गए और उनका मन किसी भी कार्य में नहीं लगा।
तभी वहाँ अयोध्या से दूत आ पहुँचे। दूत कैकेय के राजा अश्वपति और युवराज युधाजित (भरत के नाना और मामा) से मिले, परस्पर कुशलक्षेम का आदान-प्रदान किया और उन्हें उपहार भेंट किए।
तत्पश्चात दूतों ने भरत से मिलकर किसी अत्यंत आवश्यक कार्य के लिए गुरु वसिष्ठ द्वारा उन्हें तुरंत अयोध्या बुलाए जाने का संदेश सुनाया। भरत और शत्रुघ्न सभी से मिलकर और उनकी आज्ञा लेकर जल्दी से अयोध्या के लिए निकल पड़े। आते समय उनके नाना और मामा ने बहुत से हाथी, घोड़ों और गाड़ियों में लादकर अनेक उपहार दिए तथा उनकी सुरक्षा के लिए सेना और अन्य कर्मचारी भी साथ कर दिए। लेकिन उस बुरे स्वप्न और दूतों द्वारा दिखाई गई जल्दबाजी के कारण भरत और शत्रुघ्न को किसी अनहोनी की आशंका सताने लगी थी।
दूत जब आए थे तब घोड़ों पर सवार थे, इसलिए उन्होंने छोटा रास्ता चुना और जल्दी पहुँच गए थे। किंतु इस बार भरत के साथ इतने सारे लोग, पशु और गाड़ियाँ थीं, इसलिए उनके काफिले को लंबा रास्ता लेना पड़ा।
भरत का अयोध्या पहुँचना
भरत को हर हाल में जल्दी अयोध्या पहुँचने की बेचैनी थी, लेकिन भारी सेना और काफिले के कारण विलंब हो रहा था। इसलिए आधे से अधिक रास्ता तय करने के बाद उन्होंने सेना को पीछे से आने के लिए कहा और स्वयं रथ से आगे निकल पड़े। कैकेय से चलने के आठवें दिन वे अपनी राजधानी अयोध्यापुरी पहुँच गए।
अयोध्या में हर तरफ अजीब सा शोक और सन्नाटा देखकर भरत और अधिक घबरा गए। उन्होंने अपनी आशंका अपने सारथी से व्यक्त की। वे सीधे अपने पिता से मिलने उनके महल की ओर गए, पर वहाँ किसी की भी हिम्मत उन्हें सच बताने की नहीं हुई। जब पिता अपने कक्ष में नहीं मिले, तो वे अपनी माता कैकेयी के महल की ओर बढ़े, क्योंकि सबसे प्रिय रानी होने के कारण राजा प्रायः वहीं हुआ करते थे।
कैकेयी सामान्य रूप से उनसे मिलीं और अपने मायके का हालचाल पूछा। वहाँ की चर्चा करने के बाद भरत ने अपने कुल का हालचाल और अयोध्या में छाई इस उदासी का कारण पूछा। इस पर रानी ने उन्हें राजा दशरथ की मृत्यु का समाचार सुना दिया। यह सुनते ही दोनों भाई फूट-फूटकर रोने लगे।
चूँकि पिता के पश्चात बड़ा भाई ही पिता के समान होता है, इसलिए भरत अपने बड़े भाइयों राम और लक्ष्मण से मिलने उनके महल जाने के लिए उत्सुक हुए। लेकिन जाने से पहले उन्होंने माता से पिता की मृत्यु का मुख्य कारण पूछा।
जब उन्हें पता चला कि उनके दोनों भाई और भाभी को निर्वासन मिला है, तो यह सदमा उनके लिए पिता की मृत्यु के दुःख से भी कहीं अधिक बड़ा था। वे समझ ही नहीं पा रहे थे कि राम जैसा पुण्यात्मा और मर्यादा पुरुष ऐसा कौन सा अपराध कर सकता है, जिसके लिए उन्हें चौदह वर्ष का वनवास दिया जाए। इस पर कैकेयी ने गर्व के साथ अपनी सारी करतूत उन्हें बता दी।
यह सारा वृत्तांत भरत के लिए वज्राघात जैसा था। उन्हें यह अहसास हुआ कि इन सारे अनर्थों की जड़ कहीं न कहीं वे स्वयं हैं। उन्होंने अनेक प्रकार से कैकेयी को धिक्कारा और उनके प्रति अपना तीव्र रोष प्रकट किया।
कौशल्या से भेंट और सांत्वना
भरत और शत्रुघ्न दोनों भाई कैकेयी के महल से निकलकर रोते-बिलखते हुए कौशल्या के महल की ओर बढ़े। उधर महारानी कौशल्या भी उनकी आवाज सुनकर उधर ही आ रही थीं, इसलिए दोनों की मुलाकात रास्ते में ही हो गई। भरत ने अनेक प्रकार की शपथें लेकर कौशल्या को यह विश्वास दिलाया कि इस भयंकर षड्यंत्र में उनकी अपनी कोई सहमति नहीं थी।
भरत बार-बार यही कहते रहे कि उन्हें इस कुचक्र की कोई जानकारी नहीं थी और न ही उन्हें राज्य का कोई लोभ है। ऐसा कहते-कहते वे ज़मीन पर गिर पड़े और फफककर रोने लगे। तब माता कौशल्या ने उन्हें उठाया और अपने गले लगाकर सांत्वना दी। वह पूरी रात कौशल्या के भवन में रोते, विलाप करते और शोक मनाते हुए ही बीती।
राजा दशरथ का अंतिम संस्कार
अगले दिन राजा दशरथ के पार्थिव शरीर को तेल से बाहर निकाला गया और वैदिक विधि-विधान के साथ उनका अंतिम संस्कार संपन्न हुआ। तेरहवें दिन तक भरत ने अपने दिवंगत पिता के निमित्त सभी आवश्यक धार्मिक कार्य और कर्मकांड किए। अस्थि-संचय (फूल चुनने) के लिए जब दोनों भाई पिता की चिता के पास गए, तो वे फिर से फूट-फूटकर रोने लगे। तब कुलगुरु वसिष्ठ और मंत्री सुमंत्र ने उन्हें प्रेमपूर्वक समझा-बुझाकर शांत किया।
शत्रुघ्न द्वारा मंथरा की पिटाई और भरत द्वारा उसका बचाव
तेरहवीं का कार्य संपन्न होने के बाद जब भरत और शत्रुघ्न अपने भवन लौटे, तो शत्रुघ्न को अपनी माता (कैकेयी) और इस सारे अनर्थ की जड़ मंथरा पर तीव्र रोष आ गया। जैसे ही दरवाजे पर मंथरा दिखाई दी, शत्रुघ्न का खून खौल उठा। उन्होंने झपटकर उसे ज़मीन पर पटक दिया और गुस्से में घसीटने लगे। उनका भयंकर क्रोध देखकर किसी भी दासी या कैकेयी की भी हिम्मत उसे बचाने की नहीं हुई और मार खाते-खाते मंथरा अचेत हो गई। यह दृश्य देखकर भरत ने आगे बढ़कर शत्रुघ्न को स्त्री-हत्या को धर्मविरुद्ध बताते हुए रोका और मंथरा के प्राण बचाए।
भरत का राजा बनना अस्वीकार करना
राजा की अंतिम क्रियाएँ पूर्ण होने के बाद अगले दिन एक विशाल सभा का आयोजन किया गया। उस सभा में सर्वसम्मति से भरत को अयोध्या का राजा बनाने का प्रस्ताव रखा गया। उपस्थित सभी लोगों ने इसका समर्थन किया, सिवाय भरत के। सभासदों और गुरुजनों द्वारा बार-बार समझाने के बावजूद भरत राजा बनने के लिए एक पल के लिए भी तैयार नहीं हुए।
भरत का राम को वापस लाने और मनाने का निर्णय
भरत ने आगे बढ़कर राम के राज्याभिषेक के लिए पहले से एकत्र की गई पवित्र सामग्रियों की परिक्रमा की और उन्हें सादर प्रणाम किया। उन्होंने घोषणा की कि धर्म के नियमानुसार ज्येष्ठ पुत्र ही सिंहासन का अधिकारी होना चाहिए, इसलिए वे स्वयं वन में जाकर राम को वापस लेकर आएंगे और उन्हीं का राज्याभिषेक होगा। पिता के वचन की रक्षा के लिए वे स्वयं राम के बदले चौदह वर्ष तक वन में निवास करेंगे।
सभी की आपसी सलाह और विचार-विमर्श के बाद अंततः यह तय हुआ कि राज्याभिषेक के लिए रखी गई सारी सामग्री साथ लेकर पूरी अयोध्यावासी वन की ओर प्रस्थान करेंगे और वहीं चित्रकूट में राम का अभिषेक कर उन्हें वापस अयोध्या लौटा लाएँगे।
यह शुभ समाचार शीघ्र ही पूरे नगर में फैल गया। यह सुनकर अयोध्या का प्रत्येक वासी राम के दर्शन करने और उन्हें वापस मनाने के लिए वन में जाने को तत्पर हो गया। पूरा नगर एक बार फिर उत्साह से भर उठा और लोग राम तथा भरत के बीच के असीम प्रेम और धर्मपरायणता की मुक्तकंठ से प्रशंसा करने लगे।
