राजा दशरथ और श्रवण कुमार की कथा का पूरा प्रसंग | Valmiki Ramayan – Part 20

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श्रवण कुमार की हत्या

राम के पिता राजा दशरथ जब राजकुमार थे और उनका विवाह भी नहीं हुआ था, उसी समय उनसे अनजाने में श्रवण कुमार का वध हो गया था। श्रवण कुमार एक निर्दोष मुनिपुत्र था, जो अपने अंधे और वृद्ध माता-पिता के लिए जल लेने नदी के किनारे आया हुआ था। लेकिन यह उन्होंने जानबूझकर नहीं किया था, अपितु उनकी एक भूल (लापरवाही) के कारण यह भयंकर अपराध हो गया था। तीर तो केवल श्रवण कुमार को लगा था, लेकिन सदमे से उसके माता-पिता की भी मृत्यु हो गई थी। इस तरह दशरथ की एक लापरवाही के कारण तीन जानें चली गईं। पश्चाताप और अपराधबोध से वे जानें तो वापस नहीं आ सकती थीं, इसलिए उन्हें इसका कर्मफल भुगतना ही पड़ा।

हत्या का कारण

हुआ यह था कि युवावस्था में राजकुमार दशरथ ने शब्दभेदी बाण चलाना सीख लिया था और इस कला में उन्हें महारत हासिल हो गई थी। वे बिना देखे, केवल आवाज सुनकर ही बिल्कुल सटीक निशाना लगा लेते थे। उनकी इस प्रवीणता की सभी प्रशंसा किया करते थे। अपनी प्रशंसा सुन-सुनकर तरुणवय राजकुमार दशरथ में और अधिक उत्साह आ जाता था और वे हमेशा ऐसे अवसरों की तलाश में रहते थे जहाँ वे अपनी इस कला का प्रदर्शन कर सकें।

एक दिन, जब बरसात का मौसम था, वे शिकार खेलने के लिए सरयू नदी के तट पर गए। उनकी योजना नदी में जल पीने के लिए आने वाले हिंसक पशुओं को निशाना बनाने की थी। रात हो जाने के कारण वे नदी के तट के पास ही रुक गए थे।

श्रवण कुमार की हत्या

उस रात, सुबह होने से कुछ ही पहले जब चारों ओर घना अंधेरा था, उन्होंने नदी से कुछ पानी भरने की आवाजें सुनीं। उस आवाज से दशरथ ने अनुमान लगाया कि कोई जंगली हाथी अपने सूँड़ से नदी में जल भर रहा है। अतः अपने नए सीखे हुए शब्दभेदी बाण चलाने की कला के उत्साह में उन्होंने यह सच्चाई जानने का कोई प्रयास नहीं किया कि वह वास्तव में कोई जानवर है भी या नहीं। उन्होंने मान लिया कि वह कोई हाथी या अन्य जंगली जानवर है और उसी आवाज को लक्ष्य बनाकर बाण चला दिया।

लेकिन बाण लगते ही किसी मनुष्य के चीखने की आवाज आई। वह दर्द से तड़पते हुए कह रहा था कि इस निर्दोष मुनिकुमार को किसने मारा है, अब उसके वृद्ध और अंधे माता-पिता की देखभाल कौन करेगा, इत्यादि।

राजकुमार दशरथ का पश्चाताप

यह आवाज सुनकर दशरथ बहुत घबरा गए। वे तुरंत नदी के किनारे दौड़कर गए और देखा कि एक नवयुवक मुनि खून से लथपथ होकर ज़मीन पर तड़प रहा है और उसका शरीर पानी से भीगा हुआ है। उन्होंने गलती से यह महान अपराध हो जाने की घोर ग्लानि प्रकट करते हुए उस मुनि से क्षमा माँगी और उन्हें संभाला।

मुनि ने अपना नाम श्रवण कुमार बताया और पास ही के आश्रम में रहने वाले अपने वृद्ध एवं अंधे माता-पिता के विषय में बताते हुए उनके लिए गहरी चिंता व्यक्त की।

श्रवण कुमार की मृत्यु

शरीर में बाण धंसे होने के कारण श्रवण कुमार को असहनीय पीड़ा हो रही थी, इसलिए उन्होंने दशरथ से वह बाण निकाल देने के लिए कहा। दशरथ जानते थे कि तीर निकालते ही प्राण निकल जाएंगे, किंतु शरीर में तीर रहने से उन्हें अत्यंत कष्ट हो रहा था। अंततः श्रवण कुमार के बार-बार कहने पर उन्होंने तीर बाहर निकाल लिया और तीर निकलते ही श्रवण कुमार की मृत्यु हो गई।

दशरथ का श्रवण कुमार के माता-पिता से मिलना

अत्यंत दुःखी होकर दशरथ ने श्रवण कुमार का जलपात्र स्वयं भरा और उनके बताए मार्ग से होते हुए उनके वृद्ध माता-पिता के पास पहुँचे।

यद्यपि वे शाप के भय से डरे हुए थे, फिर भी चुपचाप वहाँ से भागने के बजाय वे उनके सामने गए और किसी तरह हिम्मत जुटाकर अपने हाथों से गलती से उनके पुत्र की मृत्यु हो जाने का सत्य उन्हें बताया।

चूँकि यह अपराध अनजाने में हुआ था, वे स्वयं भारी पश्चाताप की अग्नि में जलते हुए आए थे और उन्होंने अपने मुँह से अपना अपराध स्वीकार किया था, इसलिए श्रवण कुमार के माता-पिता ने उन्हें तुरंत कोई शाप नहीं दिया, बल्कि अपने पुत्र के शव के पास ले चलने का अनुरोध किया।

दशरथ को शाप और माता-पिता की मृत्यु

अपने इकलौते पुत्र श्रवण कुमार के शव का स्पर्श करते ही उसके माता-पिता फूट-फूटकर रो पड़े और उन्होंने जलती हुई अंजलि से उसे जलांजलि दी। पुत्र के मृत शरीर को छूते ही उनके मन में उस व्यक्ति के प्रति तीव्र रोष और कोक्र जाग उठा जिसने उनके निर्दोष पुत्र को मारा था। अतः उन्होंने राजा दशरथ को भी ठीक वैसे ही “पुत्र-वियोग में तड़पकर मरने” का शाप दे दिया। यदि वे चाहते तो अपने योगबल से दशरथ का राज्य या उनका जीवन भी नष्ट कर सकते थे, किंतु वे पहले ही उन्हें क्षमा कर चुके थे।

दशरथ उन्हें अपने साथ महल ले जाकर उनकी हर प्रकार से सेवा और देखभाल करने का प्रस्ताव लेकर आए, किंतु वे दोनों शोक के कारण साथ नहीं गए और वहीं नदी के तट पर अपने प्राण त्याग दिए।

शाप का प्रभाव

भयंकर अपराध-बोध और पश्चाताप के साथ दशरथ अपनी राजधानी अयोध्या लौट आए थे। जब वर्षों बाद उन्हें अपने प्रिय पुत्र राम से वियोग सहन करना पड़ा, तब उन्हें अपने इसी प्राचीन अपराध की पूरी बात याद आ गई। दशरथ ने माना कि जैसे अनजाने में भी विष खा लेने पर उसका घातक प्रभाव वैसा ही होता है जैसा जानबूझकर खाने पर होता है, उसी प्रकार पाप चाहे अनजाने में किया गया हो या जानबूझकर, उसका दुष्परिणाम भुगतना ही पड़ता है। श्रवण के पिता का वह शाप अनजाने में हुए उनके पाप का ही कर्मफल था और तदनुसार ही पुत्र राम के वियोग में राजा दशरथ ने अपने प्राणों का त्याग किया।

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