12 ज्योतिर्लिंग और उनकी उत्पत्ति की कथा: जानिए सभी शिवलिंगों का इतिहास और रहस्य

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हिन्दू धर्म में 12 ज्योतिर्लिंगों का विशेष महत्त्व है। ज्योतिर्लिंग ऐसे शिवलिंग होते हैं, जिनके बारे में माना जाता है कि वे स्वयं निर्मित (स्वयंभू) हैं, मानव द्वारा निर्मित नहीं हैं। पुराणों में इनकी संख्या 12 बताई गई है, जो देश के अलग-अलग भागों में अवस्थित हैं।

पुराणों में इनके संबंध में यह श्लोक मिलता है:

सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्। उज्जयिन्यां महाकालमोंकारे परमेश्वरम् ।।

केदारं हिमवत्पृष्ठे डाकिन्यां भीमशङ्करम्। वाराणस्यां च विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे ।।

वैद्यनाथं चिताभूमौ नागेशं दारुकावने। सेतुबन्धे च रामेशं घुश्मेशं तु शिवालये ।।

द्वादशैतानि नामानि प्रातरूत्थाय यः पठेत्। सर्वपापैर्विनिर्मुक्तः सर्वसिद्धिफलं लभेत् ।।

अर्थात: जो कोई इन 12 ज्योतिर्लिंगों का प्रतिदिन सुबह उठकर नाम लेता है और उनकी कथा का श्रवण करता है, उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे सभी सिद्धियों की प्राप्ति होती है।

ये 12 ज्योतिर्लिंग निम्नलिखित हैं:

1. सोमनाथ ज्योतिर्लिंग

  • स्थिति: सोमनाथ, सौराष्ट्र, गुजरात
  • कथा: प्रजापति दक्ष ने अपनी 27 पुत्रियों का विवाह चंद्रमा से किया था, लेकिन चंद्रमा इनमें से रोहिणी को अधिक प्रेम करते थे। इससे अन्य बहनें दुखी होकर अपने पिता के पास गईं। प्रजापति दक्ष ने चंद्रमा को समझाकर सभी पत्नियों के साथ समान व्यवहार करने को कहा, किंतु चंद्रमा पर इसका कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा। बार-बार समझाने पर भी जब चंद्रमा में सुधार नहीं हुआ, तब क्रोधित होकर दक्ष ने उन्हें क्षय रोग (टीबी) होने का शाप दे दिया।
  • चंद्रमा के क्षय रोग से ग्रसित होने पर उनकी चमक समाप्त हो गई और पूरी सृष्टि में हाहाकार मच गया। देवताओं और ऋषियों के पूछने पर चंद्रमा ने अपनी समस्या बताई। तब ब्रह्मा जी ने उपाय बताया कि चंद्रमा धरती के प्रभास नामक शुभ क्षेत्र में जाकर मृत्युंजय मंत्र का जप करें और भगवान शिव को प्रसन्न करें।
  • ब्रह्मा जी की सलाह के अनुसार चंद्रमा ने प्रभास क्षेत्र में शिवलिंग की स्थापना की और तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और वरदान दिया—“एक पक्ष में तुम्हारी कलाएँ निरंतर क्षीण होंगी और दूसरे पक्ष में वे निरंतर बढ़ती जाएंगी।” चंद्रमा द्वारा स्थापित होने के कारण यह शिवलिंग ‘सोमनाथ’ कहलाया। उस स्थान पर देवताओं ने ‘सोमकुंड’ की भी स्थापना की।

2. मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग (श्री भ्रमराम्बा मल्लिकार्जुन मंदिर)

  • स्थिति: श्रीशैलम, आंध्र प्रदेश (यह कृष्णा नदी के तट पर श्रीशैलम की पहाड़ियों पर स्थित है। इसे ‘दक्षिण का कैलाश’ भी कहते हैं।)
  • कथा: एक बार विवाह को लेकर कार्तिकेय और गणेश जी में विवाद हो गया। माता-पिता शिव-पार्वती ने पहले गणेश जी का विवाह कर दिया, जिससे नाराज़ होकर कार्तिकेय दक्षिण भारत के क्रौंच पर्वत पर चले गए। उन्हें मनाने जब माता-पिता वहाँ पहुँचे, तब नाराज़ कार्तिकेय वहाँ से 12 कोस और दूर चले गए। पुत्र-मोह के कारण शिव-पार्वती ज्योतिर्लिंग का रूप धारण कर वहीं बस गए।
  • माना जाता है कि कार्तिकेय से मिलने के लिए शिव-पार्वती विशेष तिथियों पर वहाँ आते हैं—अमावस्या को भगवान शिव और पूर्णिमा को माता पार्वती। यही ज्योतिर्लिंग ‘मल्लिकार्जुन’ नाम से प्रसिद्ध हुआ, जहाँ ‘मल्लिकार्जुन’ का अर्थ है—मल्लिका (पार्वती) और अर्जुन (शिव)।

3. महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग

  • स्थिति: उज्जैन, मध्य प्रदेश (यहाँ की भस्म आरती विश्वप्रसिद्ध है। ऐसा माना जाता है कि महाकाल की पूजा करने वाला व्यक्ति अकाल मृत्यु के भय से मुक्त हो जाता है।)
  • कथा: उज्जैन (प्राचीन नाम: अवंती) में वेदप्रिय नामक एक सदाचारी ब्राह्मण रहते थे, जो वेदों और वैदिक कर्मों में लीन रहते थे। उनकी पत्नी और चारों पुत्र भी परम धर्मनिष्ठ थे।
  • उसी समय पास के रत्नमाला पर्वत पर दूषण नामक एक दुष्ट असुर रहता था, जिसे ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त था। अहंकार में आकर उसने अवंती के ब्राह्मणों और धर्म पर आक्रमण कर दिया। ब्राह्मणों के चारों पुत्रों ने लोगों को आश्वस्त किया और शिवलिंग की पूजा करते हुए भगवान शिव का ध्यान करने लगे।
  • जब असुर उन्हें मारने आगे बढ़ा, तब अचानक शिवलिंग के स्थान पर एक विशाल गड्ढा प्रकट हुआ और उससे महाकाल रूपी भगवान शिव प्रकट हुए। भगवान शिव ने तत्काल उस दुष्ट असुर को सेना सहित भस्म कर दिया। भक्तों के अनुरोध पर शिवजी वहीं उस गड्ढे में ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थित हो गए।

4. ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग

  • स्थिति: मांधाता, मध्य प्रदेश (यह नर्मदा नदी के तट पर स्थित है।)
  • कथा: एक समय देवर्षि नारद गोकर्ण तीर्थ से घूमते हुए गिरिराज विंध्य के पास पहुँचे। विंध्य पर्वत ने उनका आदर-सत्कार कर अहंकार में कहा कि उनके पास हर चीज़ की प्रचुरता है। नारद जी ने लंबी साँस खींचते हुए कहा कि सब कुछ होने के बावजूद मेरु पर्वत तुमसे बहुत ऊँचा है।
  • इससे दुखी होकर विंध्य पर्वत ने भगवान शिव की कठिन तपस्या की। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर शिवजी ने उसे मनचाहा बुद्धि का वरदान दिया। देवता और ऋषियों के आग्रह पर भगवान शिव ने वहीं स्थिर रूप से निवास करना स्वीकार किया। वहाँ जो एक ओंकारलिंग था, वह दो स्वरूपों में बँट गया—पहला ओंकारेश्वर और दूसरा अमलेश्वर।

5. केदारनाथ ज्योतिर्लिंग

  • स्थिति: केदारनाथ, उत्तराखंड (यह केदार पर्वत पर मंदाकिनी नदी के तट पर स्थित है।)
  • कथा: सतयुग में भगवान विष्णु के अवतार नर और नारायण ऋषियों ने बद्रीकाश्रम में भगवान शिव की कठिन तपस्या की थी। उन्होंने पार्थिव शिवलिंग बनाकर उसमें शिव की पूजा की। भक्तों की भक्ति से प्रसन्न होकर शिवजी ने उन्हें वरदान मांगने को कहा।
  • नर-नारायण ने लोक कल्याण के लिए शिवजी से सदा के लिए वहीं बस जाने का अनुरोध किया। उनकी प्रार्थना स्वीकार कर भगवान शिव ज्योतिर्लिंग के रूप में केदारनाथ में स्थापित हो गए।

6. भीमशंकर ज्योतिर्लिंग

  • स्थिति: भीमाशंकर, महाराष्ट्र (यह पुणे के पास स्थित है।)
  • कथा: प्राचीन काल में कुंभकर्ण के पुत्र ‘भीम’ नामक एक महापराक्रमी राक्षस ने ब्रह्मा जी से अतुलित बल का वरदान पाकर देवताओं और पृथ्वी पर आतंक मचाना शुरू कर दिया। उसने कामरूप (असम) के राजा सुदक्षिण को हरा कर बंदी बना लिया। राजा सुदक्षिण कारागार में भी पार्थिव शिवलिंग बनाकर शिव की पूजा करते थे।
  • जब भीम ने राजा सुदक्षिण के कारागार में जाकर भगवान शिव के पार्थिव लिंग पर तलवार चलानी चाही, तो उससे पहले ही साक्षात भगवान शंकर वहाँ प्रकट हो गए। शिवजी ने अपने त्रिशूल से उसकी तलवार के टुकड़े कर दिए और हुंकार मात्र से भीम सहित समस्त राक्षसों का संहार कर दिया। देवताओं और ऋषियों की प्रार्थना पर भगवान शिव वहीं भीमशंकर के रूप में स्थापित हो गए।

7. काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग

  • स्थिति: श्री काशी विश्वनाथ मंदिर, वाराणसी, उत्तर प्रदेश
  • कथा: पुराणों के अनुसार, जब निर्गुण परमब्रह्म परमात्मा ने सगुण रूप धारण किया, तब वे शिव और शक्ति कहलाए। सृष्टि के विस्तार के लिए उन्होंने पुरुष (विष्णु) और प्रकृति की रचना की। तपस्या के लिए निर्गुण शिव ने पाँच कोस लंबी-चौड़ी एक सुंदर नगरी का निर्माण किया, जो मुक्तिदायिनी ‘काशी’ कहलाई।
  • यह नगरी इतनी पवित्र और अमुक है कि प्रलयकाल में भी नष्ट नहीं होती। जब संपूर्ण संसार प्रलय में मग्न हो जाता है, तब भी भगवान शिव इस काशी नगरी को अपने त्रिशूल की नोक पर धारण कर लेते हैं और सृष्टि की रचना होने पर इसे पुनः भूतल पर स्थापित कर देते हैं।

8. त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग

  • स्थिति: त्र्यंबक, नासिक, महाराष्ट्र
  • कथा: एक बार दक्षिण में ब्रह्मगिरि पर्वत पर भयानक अकाल पड़ा। गौतम ऋषि ने वरुण देवता की कृपा से वहाँ अक्षय जल प्राप्त कर लिया और हरा-भरा आश्रम बसा लिया। इससे ईर्ष्यावश कुछ ब्राह्मणों ने गौतम ऋषि को नीचा दिखाने के लिए गणेश जी से ऐसा उपाय करने को कहा जिससे ऋषि को वह स्थान छोड़ना पड़े।
  • गणेश जी के मना करने पर भी वे नहीं माने, तब एक दुर्बल गाय गौतम ऋषि के खेत में आई और गौतम जी द्वारा तिनके से हांकने पर वह दैववश मृत हो गई। उन द्वेषी ब्राह्मणों ने गौतम ऋषि पर ‘गौ हत्या’ का झूठा आरोप लगाया।
  • गौतम ऋषि के प्रायश्चित करने और भगवान शिव की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर शिवजी ने उन्हें निष्पाप किया और माता गंगा को गौतम ऋषि के उद्धार के लिए वहाँ प्रवाहित होने का आदेश दिया। गंगा जी वहाँ गौतमी (गोदावरी) नदी के रूप में प्रकट हुईं और भगवान शिव त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित हुए।

9. बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग

  • स्थिति: देवघर, झारखंड
  • कथा: रावण ने कैलाश पर जाकर भगवान शिव की कठिन तपस्या की और उन्हें अपनी लंका ले जाने का वरदान प्राप्त किया। शिवजी ने शर्त रखी कि रास्ते में इस लिंग को कहीं भी भूमि पर मत रखना, अन्यथा यह वहीं स्थापित हो जाएगा।
  • मार्ग में लघुशंका (मूत्रोत्सर्ग) की आवश्यकता पड़ने पर रावण ने एक ग्वाले (जो असल में भगवान विष्णु की माया थी) को वह शिवलिंग थमा दिया। भारी होने के कारण ग्वाले ने उसे ज़मीन पर रख दिया, जिससे वह शिवलिंग वहीं स्थापित हो गया। निराश होकर रावण लंका लौट गया और देवताओं ने आकर उस ज्योतिर्लिंग की स्थापना की, जो वैद्यनाथ नाम से प्रसिद्ध हुआ।

10. नागेश्वर ज्योतिर्लिंग

  • स्थिति: दारुकावन, द्वारका के पास, गुजरात
  • कथा: एक समय दारुका नाम की एक महा बलशाली राक्षसी हुई जिसे माता पार्वती से वरदान पाकर बहुत अहंकार हो गया था। पश्चिम समुद्र तट पर 16 योजन में विस्तृत उसका एक वन था जो सम्पूर्ण समृद्धियों से भरा रहता था। दारुका अपने विलास के लिए जहाँ जाती थी, वह वन समस्त भूमि, वृक्षों तथा अन्य सभी वस्तुओं समेत वहीं चला जाता था। देवी पार्वती ने उस वन की रक्षा का भार दारुका को सौंप दिया था।

    दारुका अपने पति के साथ इच्छानुसार उस वन में विचरण करती थी। उसके पति का नाम दारुक था जो अत्यंत शक्तिशाली था। राक्षस दारुक अपनी पत्नी दारुका के साथ वहाँ रहकर सबको भय देता था। उसने बहुत से राक्षसों को साथ लेकर वहाँ सत्पुरुषों का संहार मचा रखा था। वह सदा यज्ञ और धर्म का नाश करता था। उससे पीड़ित हुई प्रजा ने महर्षि और्व की शरण में जाकर उनको अपना दुःख सुनाया।

    और्व मुनि ने शरणागतों की रक्षा के लिए राक्षसों को यह श्राप दिया कि– ‘ये राक्षस यदि पृथ्वी पर प्राणियों की हिंसा या यज्ञों का विध्वंस करेंगे तो उसी समय अपने प्राणों से हाथ धो बैठेंगे।’

    देवताओं ने जब यह बात सुनी तो उन्होंने दुराचारी राक्षसों पर आक्रमण कर दिया। राक्षस दुविधा में पड़ गए यदि वे युद्ध में देवताओं को मारते तो मुनि के शाप से स्वयं मर जाते और नहीं मारते तो पराजित हो जाते। इस अवस्था में राक्षसी दारुका ने कहा– “माता भवानी के वरदान से मैं इस सारे वन को जहाँ चाहूँ ले जा सकती हूँ।”

    यह कहकर वह समस्त वन को साथ ले जाकर समुद्र में जा बसी। राक्षस लोग पृथ्वी से हटकर जल में निर्भय होकर रहने लगे और वहाँ के प्राणियों को पीड़ा देने लगे। एक बार बहुत सी नावें उधर से गुजरी जो मनुष्यों से भरी थीं। वे सभी वैश्यगण व्यापार के उद्देश्य से परदेश जा रहे थे। राक्षसों ने उन सब को पकड़ लिया और बेड़ियों से बांधकर कारागार में डाल दिया और उनको विभिन्न प्रकार से कष्ट देने लगे। उनमें सुप्रिय नाम का एक प्रसिद्ध वैश्य था जो उस दल का मुखिया था। वह बड़ा सदाचारी, भस्म-रुद्राक्षधारी तथा भगवान शिव का परम भक्त था।

    सुप्रिय वैश्य के प्रार्थना पर भगवान शिव एक विवर से वहाँ प्रकट हो गए। उन्होने पाशुपतास्त्र लेकर सभी राक्षसों का तत्काल संहार कर दिया और अपने भक्त सुप्रिय की रक्षा की। इसके बाद भगवान शिव ने उस वन को यह वर दिया कि– ‘आज से इस वन में श्रेष्ठ मुनि निवास करें और तमोगुणी राक्षस इसमें कभी न रहें। शिवधर्म के उपदेशक और प्रवर्तक लोग इसमें सदा निवास करें।’

    इसी समय राक्षसी दारुका ने दीन भाव से देवी पार्वती की स्तुति की। उसकी प्रार्थना से पार्वती माता प्रसन्न हो गयीं। उनके द्वारा वरदान मांगने के लिए कहने पर दारुका बोली “माता, मेरे वंश की रक्षा कीजिये।” माता पार्वती ने उसे वरदान देते हुए कहा “मैं तेरे कुल की रक्षा करूँगी।” ऐसा कहकर माता पार्वती ने भगवान शिव से कहा– “नाथ! मैं आपकी ही हूँ और आपके ही आश्रय में रहती हूँ अतः मेरी बात को भी सत्य कीजिये। यह राक्षसी दारुका मेरी भक्त है और राक्षसियों में बलिष्ठ है। अतः यही राक्षसों के राज्य का शासन करे। ये राक्षस पत्नियां जिन पुत्रों को पैदा करेंगी वे सब मिलकर इस वन में निवास करें, ऐसी मेरी इच्छा है।”

    शिव बोले– “यदि तुम्हारी ऐसी इच्छा है तो ऐसा ही हो। मैं भक्तों का पालन करने के लिए प्रसन्नतापूर्वक इस वन में निवास करूँगा।” इस प्रकार भगवान शिव और माता पार्वती वहाँ स्थित हो गए। ज्योतिर्लिंग स्वरुप महादेव वहाँ नागेश्वर के नाम से विख्यात हुए।
  • माता पार्वती की प्रार्थना पर शिवजी ने उस वन में भक्तों की रक्षा के लिए निवास करना स्वीकार किया और तब से यह ज्योतिर्लिंग नागेश्वर के नाम से विख्यात हुआ।

11. रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग

  • स्थिति: रामनाथस्वामी मंदिर, रामेश्वरम, तमिलनाडु
  • कथा: यहाँ लंका पर विजय पाने के लिए स्वयं भगवान राम ने पूजा किया था। भगवान विष्णु के रामावतार में जब रावण सीताजी का हरण करके लंका ले गया, तब सुग्रीव के साथ वानर सेना लेकर श्रीराम समुद्र तट पर आये। वहाँ वे विचार करने लगे कि हम किस प्रकार इस समुद्र को पार करेंगे और किस प्रकार रावण को जीतेंगे। इतने में ही श्रीराम को प्यास लगी। उन्होंने जल माँगा और वानर मीठा जल ले आये। प्रभु श्रीराम ने प्रसन्न होकर वह जल ले लिया। तभी उन्हें याद आया कि ‘मैंने अपने स्वामी भगवान शिव का दर्शन तो किया ही नहीं। फिर यह जल मैं कैसे ग्रहण कर सकता हूँ?’

    इस प्रकार विचार कर उन्होंने उस जल को नहीं पिया। इसके बाद उन्होंने भगवान शिव का पार्थिव पूजन किया। आवाहन आदि सोलह उपचारों का पालन करके उन्होंने विधिपूर्वक बड़े प्रेम से शिव की पूजा अर्चना की। इसके बाद दिव्य स्तोत्रों के द्वारा यत्नपूर्वक भगवान शंकर को संतुष्ट करके श्रीराम ने उनसे प्रार्थना की  कि  “आप मेरी सहायता कीजिये। आपके सहयोग के बिना मेरे कार्य की सिद्धि अत्यंत कठिन है। रावण भी आपका ही भक्त है। वह सबके लिए सर्वथा दुर्जय और महावीर है पर आपके दिए हुए वरदान के कारण सदा अहंकार से भरा रहता है और संसार को कष्ट देता है। इस प्रकार विचार कर आपको मुझ पर कृपा करनी चाहिए।”

    श्रीराम के पूजन से प्रसन्न होकर भगवान शंकर माता पार्वती तथा पार्षदगणों के साथ निर्मल रूप धारण करके वहाँ प्रकट हो गए। उन्होने राम से वरदान मांगने के लिए कहा। राम ने उनसे रावण के साथ होने वाले युद्ध में अपने लिए विजय की प्रार्थना की। भगवान शिव ने श्रीराम को युद्ध की आज्ञा और रावण पर विजय का वरदान दिया। भगवान शिव से विजय का वरदान पाकर श्रीराम बोले– “यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो संसार के कल्याण के लिए आप सदा यहाँ निवास करें।”
  • श्रीराम के अनुरोध पर भगवान शिव लोक कल्याण के लिए सदा के लिए वहीं ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थित हो गए, जो रामेश्वरम कहलाए।

12. घृश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग

स्थिति: एलोरा, औरंगाबाद, महाराष्ट्र

कथा- दक्षिण में देवगिरि नामक पर्वत के निकट भरद्वाज कुल में उत्पन्न सुधर्मा नाम के एक ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण रहते थे। उनकी पत्नी का नाम सुदेहा था। वह सदा शिवधर्म के पालन में तत्पर रहती थी। वह गृहकार्य में निपुण और पतिव्रता स्त्री थी। द्विजश्रेष्ठ सुधर्मा भी देवताओं और अतिथियों के पूजक थे। वे सदाचारी और वेद–शास्त्र के मर्मज्ञ थे। वे सदा शिव सम्बन्धी पूजनादि कार्यों में ही लगे रहते थे।

यह सब कुछ होने पर भी उनके कोई पुत्र नहीं था जिससे उनकी पत्नी बहुत दुखी रहती थी। तब उस ब्राह्मणी ने अत्यंत दुखी होकर हठपूर्वक अपनी बहन घुश्मा से पति का दूसरा विवाह करा दिया। विवाह से पहले सुधर्मा ने सुदेहा को समझाया कि ‘इस समय तो बहन के प्रति तुम्हारा प्रेम है पर जब इसके पुत्र हो जायेगा तब तुम इससे स्पर्धा करने लगोगी।’ यह सुनकर सुदेहा ने सब प्रकार से अपने पति को विश्वास दिलाया कि वह कभी भी अपनी बहन से ईर्ष्या नहीं करेगी।

विवाह हो जाने पर घुश्मा दासी की भाँति बड़ी बहन की सेवा करने लगी। सुदेहा भी उसे बहुत स्नेह करती थी। घुश्मा अपनी शिवभक्ता बहन की आज्ञा से नित्य एक सौ एक पार्थिव शिवलिंग बनाकर विधिवत पूजा करने लगी। पूजा करके वह नजदीक के तालाब में उनका विसर्जन कर देती थी।

शंकर जी की कृपा से उसको एक सुन्दर, सौभाग्यवान और सद्गुण संपन्न पुत्र हुआ। इससे घुश्मा का कुछ मान बढ़ा और यह देखकर सुदेहा के मन में ईर्ष्या उत्पन्न हो गया। समय आने पर घुश्मा के पुत्र का विवाह हुआ और पुत्रवधु घर में आ गयी। अब तो सुदेहा घुश्मा से और भी जलने लगी। उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गयी और एक दिन उसने रात में सोते हुए पुत्र को छुरे से मार कर उसके शरीर के टुकड़े टुकड़े कर दिए और कटे हुए अंगों को उसी तालाब में ले जाकर डाल दिया जहाँ घुश्मा प्रतिदिन पार्थिव लिंगों का विसर्जन करती थी।

घुश्मा के पुत्र के अंगों को उस तालाब में फेंककर वह लौट आयी और घर में सुखपूर्वक सो गयी। घुश्मा सबेरे उठकर प्रतिदिन का पूजनादि कर्म करने लगी। सुधर्मा स्वयं भी नित्यकर्म में लग गए। सुदेहा भी उठकर बड़े आनंद से घर के काम काज करने लगी क्योंकि उसके ह्रदय में पहले जो ईर्ष्या की आग जलती थी वह अब बुझ गयी थी।

प्रातःकाल उठकर जब बहु ने पति की शय्या को देखा तो वह खून से भीगी दिखायी दी और वहाँ शरीर के कुछ अंग भी दिखाई दिए, इससे उसको बड़ा दुःख हुआ। वह तुरंत घुश्मा के पास गयी और कहा– “माता! आपके पुत्र कहाँ गए? उनकी शय्या रक्त से भीगी हुई है। किसने यह क्रूर कर्म किया है?” यह कहकर घुश्मा की बहु करुण विलाप करती हुई रोने लगी। सुदेहा भी उस समय रोने का नाटक करने लगी पर मन ही मन वह हर्ष से भरी हुई थी।

पर उस परिस्थिति में भी घुश्मा अपने नित्य पार्थिव पूजन व्रत से विचलित नहीं हुई। जब तक नित्य पूजन का नियम पूरा नहीं हुआ तब तक उसे किसी दूसरी बात की चिंता नहीं हुई। दोपहर को पूजन समाप्त होने पर घुश्मा ने अपने पुत्र की भयंकर शय्या पर दृष्टिपात किया। वह सोचने लगी– ‘जिन्होंने यह बेटा दिया था, वे ही इसकी रक्षा करेंगे। वे काल के भी काल हैं और सत्पुरुषों के आश्रय हैं। मेरे चिंता करने से क्या होगा।’

इस तरह विचार करते हुए उसने भगवान शिव के भरोसे धैर्य धारण किया। वह अपने नियम के अनुसार पार्थिव शिवलिंगों को लेकर शिव के नामों का उच्चारण करती हुई उस तालाब के किनारे गयी। उन पार्थिव लिंगों को तालाब में डालकर जब वह लौटने लगी तो उसे अपना पुत्र उसी तालाब के किनारे खड़ा दिखाई दिया।

उस समय अपने पुत्र को जीवित देखकर घुश्मा को न तो हर्ष हुआ और न ही विषाद। वह शांतचित्त से यह सब देख ही रही थी कि तभी ज्योतिस्वरूप महेश्वर शिव उस पर संतुष्ट होकर वहाँ प्रकट हो गए। शिव बोले– “मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। वर माँगो। तुम्हारी दुष्टा सौत ने इस बच्चे को मार डाला था। अतः मैं उसे इस अपराध का दंड दूँगा।”

तब घुश्मा ने शिव जी को प्रणाम करके यह वर माँगा– “नाथ! सुदेहा मेरी बड़ी बहन है अतः आपको उसकी रक्षा करनी चाहिए।” शिव बोले– “उसने तो तुम्हारा बड़ा भारी अपकार किया है तो तुम उसका उपकार क्यों करना चाहती हो? दुष्ट कर्म करने वाली सुदेहा तो मार डालने के ही योग्य है।” घुश्मा ने कहा– “देव! आपके दर्शन मात्र से ही मनुष्यों के पूर्वसंचित पापराशि भस्म हो जाते हैं और मन निर्मल हो जाता है। जो अपकार करने वालों का भी उपकार करता है उसके संसर्ग से पुण्य की प्राप्ति होती है, ऐसा मैंने सुना है। मैं किसी भी प्राणी का अहित नहीं चाहती फिर वह तो मेरी बहन है।”

घुश्मा के ऐसा कहने पर भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए और कहा– “तुम कोई और भी वर माँगो क्योंकि तुम्हारी भक्ति और विकारशून्य स्वभाव से मैं बहुत प्रसन्न हूँ।” भगवान शिव की बात सुनकर घुश्मा बोली– “यदि आप वर देना चाहते हैं तो लोगों की रक्षा के लिए सदा यहाँ निवास कीजिये और मेरे नाम से ही आप की ख्याति हो।”

शिव ने उसे वह वरदान देते हुए कहा “मैं तुम्हारे ही नाम से घुश्मेश्वर कहलाता हुआ सदा यहाँ निवास करूँगा और सबके लिए सुखदायक होऊँगा। मेरा शुभ ज्योतिर्लिंग घुश्मेश्वर नाम से प्रसिद्ध हो। यह सरोवर तीनों लोक में शिवालय नाम से प्रसिद्ध हो। इस सरोवर का दर्शन सम्पूर्ण अभीष्टों को देने वाला हो। तुम्हारे वंश में होनेवाली एक सौ एक पीढ़ियों तक ऐसे ही श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न होंगे। वे सब के सब सुंदरी स्त्री, उत्तम धन और पूर्ण आयु से संपन्न होंगे। वे चतुर, विद्वान, उदार और मोक्ष पाने के उत्तराधिकारी होंगे। तुम्हारे वंश का विस्तार बहुत शोभादायक होगा।”

ऐसा कहकर भगवान शिव वहाँ घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थित हो गए।

भगवान शिव का प्रेत, पशु, विष और मृत्यु से संबंध: शिव: भाग 1

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